लहरियों की माला
‘लहरियों की माला’, मेरी कहानी-संग्रहों की नवमी उत्थान की परिचायिका है| इसके पहले, मैं अपने प्रिय पाठकों के समक्ष, आठ और कहानी-संग्रह अवलोकनार्थ रख चुकी हूँ, जिसे आपलोगों ने भरपूर प्यार दिया| इस कहानी-संग्रह में कुल 15 कहानियाँ हैं, जो जीवन और युग के कई स्तरों को छूती हुई, भावनाओं की सीढियाँ चढ़ती हैं| आज मानव जाति के बीच के रिश्तों की मिठास इस प्रकार प्रलय वेग से विलुप्त होती जा रही है, कि कुछ समय के पश्चात मानव सभ्यता कहाँ पर जाकर रूकेगी पता नहीं? मेरे हृदय की लहरों की अज्ञात आकुलता का समुद्र, जिसमें मेरा मन उब-डूबकर कर रहा था, उसे ‘लहरियों की माला’ का हाथ पकड़ाकर किनारे ला खड़ा करने की कोशश-मात्र की हूँ|
‘लहरियों की माला’ अर्थात् विषाद के भीतर व्याप्त वेदना का संकेत, जिसमें क्रंदन, सिसकी,रुदन और चित्कार भरा है, तो दूसरी तरफ इसमें विश्व मांगलिक चेतना भी है| कुछ कहानियाँ, जैसे ‘चरण चिन्ह’, ’अमित स्मृति’, ’दीपाबली’, ’फूल बने अंगारे’, आदि सभी कहानियाँ निराशा और विषाद के साथ-साथ प्रेम की पीड़ा, प्रकृति के अनेक प्रतीकों के माध्यम से, मैं आप तक पहुँचाने की कोशिश की हूँ| ‘स्वर्ग सुख’ में यह मेरा अपना विचार है, कि शान्ति, आनंद अथवा ईश्वर प्राप्ति के लिये भू-जीवन को त्याग करने की आवश्यकता नहीं है| उसके लिये तो नवीन रूप से लोक-जीवन निर्माण करने की आवश्यकता है| ‘माँ का दूध सस्ता क्यों’ कहानी, आज के नव युग, जिस पर पश्चिमी सभ्यता, एकांगी परिवार और लघुवाद के दुष्परिणामों से लगभग नष्ट हो गई है| अपने नव पीढ़ियों के विचारों में, हम जिस प्रकार वयोवृद्ध के प्रति विरक्ति तथा उपेक्षा देखते हैं, लगता है हमारी नव पीढ़ी कृतघ्नता और स्वार्थ के पंक में धंस चुकी है| उनके दिल में नूतन के प्रति उत्साह और आग्रह तो है, मगर पुरातन के प्रति सम्मान नहीं बचा| जिसके कारण अपने आत्मभुवन के स्वर्ग में सम्मिलित परिवार की सोच को प्रतिष्ठित नहीं कर पा रहे हैं|
अंत में, मेरी उस महान शक्ति को शत-शत नमन करती हूँ, जिनके चरणों के नीचे मेरी तपोभूमि है और जिनकी प्रेरणा से मैं इस “लहरियों की माला” कहानी-संग्रह, आपके समक्ष उपस्थित कर सकी| फिर मिलूँगी, एक नई कहानी-संग्रह के साथ---- तारा सिंह
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