काश ! आदमी भी कुत्ता जैसा होता
शायद आप मेरा बेतुका शीर्षक को पढ़कर यही कहेंगे न , लेखिका पागल हो गई है । ख़ुद इन्सान की योनि में जन्म लेकर भी इन्सान को कुत्ते से छोटा बताकर, ईश्वर के सबसे प्रिय संतान का मजाक उड़ा रही है । मैं भी आपकी सोच से पूरी तरह इत्तफ़ाक रखती हूँ । लेकिन, आज के मानव को देखकर , मुझे लगता है, मैंने कोई ज्यादा कुछ मजाक नहीं किया है, बल्कि जो सच है, उसे ही मैंने इस लेख के माध्यम से उजागर करने की कोशिश की है । मैं भी जानती हूँ, ईश्वर ने आदमी को सभी जीवों से अधिक बुद्धिमान बनाया है, जिससे कि इस पृथ्वी पर के छोटे , बड़े, खूँखार से खूँखार जीवों पर भी अपना आधिपत्य जमा सके । उसे अपने अधीन रखकर, खुद खुशी होकर बेफ़िक्र जिंदगी जी सके । लेकिन मेरा दावा है , आप एक भी ऐसा इन्सान ढूँढ़ नहीं सकेंगे जो आपसे कहे, ’हाँ ! मैं अपनी जिंदगी से पूरी तरह खुश हूँ । मुझे और कुछ नहीं चाहिए । मेरे पास जो है, जीने के लिए काफ़ी है ।’ ऐसा इसलिए कि हम मानव स्वार्थी, लोभी और क्रूर बन चुके हैं । तभी तो आये दिन गोधरा, खाड़ी युद्ध जैसे वीभत्स युद्ध अक्सर देखने को मिलता है । हम आदमी होकर भी आदमी के साथ जी नहीं सकते । यूँ कहिए, जीना नहीं चाहते, यह जानते हुए भी कि हमारे पिता एक हैं, हम सभी एक ही ईश्वर के संतान हैं । एक ही नूर से हम बने हैं, फ़िर भी हम कहते हैं, तुम्हारा अल्ला , मेरा भगवान है । ऐसा क्यों ? एक पिता के दो संतान ; अब्बा कहें या पिताश्री कहें, अलग – अलग सम्बोधन करने से क्या पिता अलग हो जाते हैं । पिता तो वही एक रहते हैं, हाँ ! हमारे पुकारने के , प्यार जताने के तरीके भले ही अलग हो जाते हैं । तब फ़िर , हम उस परम पिता को ईश्वर और अल्ला पुकारकर बाँटते क्यों हैं ? मंदिर में बैठे मिलें या मस्जिद में या गिरजाघर में । पायजामा पहने मिलें या धोती या सूट-बूट में : जगह और पोशाक बदलने से ईश्वर नहीं बदल जाते । ये एक हैं और हम सभी इसी एक पिता के संतान हैं ; जानते हुए भी हम पिता को पहचान नहीं पाये हैं ।
लेकिन कुत्ते को देखिए । वह तो नहीं जानता, ईश्वर किसे कहते हैं ? वह तो अपने मालिक को ही ईश्वर ,अल्ला समझता है । चाहे उसका मालिक उसे पायजामे में मिले या धोती – कुरते में, महल में मिले या झोपड़ा में । वह अपने मालिक को पहचानने में जरा भी चूक नहीं करता । सिर्फ़ चेहरे तक को ही नहीं, कुत्ते अपने मालिक के कदमों की आहट तक को पहचानते हैं । मालिक दरवाजे के उस पार घंटी बजाया;
भीतर वह कान खड़ा कर स्वागत में दौड़ने लगता है । क्या है न , कुछ अचम्भे की बात ; लेकिन , हम जब ईश्वर को मंदिर में बैठा देखते हैं तो कहते हैं , ’यह हिन्दुओं का है । मस्जिद में बैठा देखकर कहते हैं, यह मुसलमानों का है । जब कि बचपन से अपने –अपने ग्रंथ में, कुरान – गीता में पढ़ते आये हैं, इस जगत को बनाने वाला एक है । हमारे पिता एक हैं, हम सभी उसके संतान हैं । तो फ़िर सभी जीवों में बुद्धिमान कहलाकर भी अपने पिता को पहचानने में भूल हम क्यों करते हैं ? तुम्हारा ईश्वर, हमारा अल्ला का शोर क्यों मचाये रखते हैं ? काश ! जिस दिन कुत्ते की तरह आदमी भी अपने मालिक को पहचानने लगेगा; चाहे वह मंदिर में बैठा मिले या मस्जिद में , तो फ़िर मेरा दावा है कि दोबारा कोई गोधरा और खाड़ी युद्ध नहीं होगा ।उस दिन सचमुच गौतम बुद्ध , पैगम्बर, मोहम्मद की यह धरती स्वर्ग– खंड बन जायेगी । तब यहाँ न कोई मुसलमान होगा, न होगा हिन्दू । आपस में हम सभी होंगे भाई – भाई और होंगे बंधु ।
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