Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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हिला रही झकोर विश्व की डाली को

 

हिला रही झकोर विश्व की डाली को


आओ हम सब मिलकर फ़िर से
उसी पुरानी विचारधारा के प्रति
नव युग के मानव को करें संगठित
जिसमें आशा और अभिलाषा की
नव मुकुलित कलियों का मधुर संगीत
लहरियों में होता था मुखरित

गिरिपंजर से मांसल कलि-कुसुमों का
मार्दव लिपटा रहता था, राग, बुद्धि
कर्मों में समता रखती थी संस्कृति
मलय पवन अंगों को छूकर
मृदु प्राणों को पुलकित रखता था
जन-भू का मुख फ़ूलों से लदी
डालियों से होता था शोभित

आज मृगतृष्णा का पूजक , मनुज
खुद को अपना भाग्यविधाता बताकर
नृशंस,आदिम बर्बरता का बन गया प्रतिनिधि
कहता , हृदयहीन सृष्टि के महानाश से
जूझ रहे भूजन, सदा रहा पराजित
ऐसे में जीवन सुख का स्वर्ग मानव अपने
अंतरतम नभ में कैसे कर सकता स्थापित



इसके लिये हमें धरती की माटी का
फ़िर से नव निर्माण करना होगा
हिला रही झकोर जो विश्व की
डाली को , उससे टकराना होगा
तभी नव जीवन की शोभा में
अभिलाषाएँ सागर से होंगी स्पंदित

मगर मानवता का विप्र, चिर अभिमानी
मनुज, यह नहीं जानता,रूप कर्मों से मुक्त
शब्दों का पंख मारकर ,युग परिस्थितियों से
मानव मन को किया नहीं जा सकता जागृत
इसके लिए अनिर्वाच्य साम्राज्य
लालसा की देनी होगी आहुति

तभी नव युग के मानव का अंतरव्यापी अंधकार
घृणा , द्वेष , अन्याय, छल, स्पर्धा, हिंसा
विगत युगों के गुण रोशनी में मिटेगा
तभी भुवनों की सप्त-चेतना, अक्षय वैभव
लोक चेतना में होगी फ़िर से मूर्तित

वरना शिशिर में नव पल्लव सी
काँप रही धरती के जन मुख को
युग संस्कृति की विच्छिन्न किरणॊं से बाँधकर
करना संभव नहीं होगा संगठित
मुश्किल होगा ,विविध विरोधी तत्वों के
संघर्षण से करना इसे संचालित






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