Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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एक पालकी , चार कहार

 

एक पालकी , चार कहार

संध्या की इस गोधूलि वेला में
महासमर की अंतिम यात्रा में
शामिल होने को कौन है बैठी
मेरे हृदय की दहलीज में

लगता है विधि हो गया है बावला
भेजा है मुझको ले जाने, अपने घर
संग लाया है एक पालकी, चार कहार
लाल चूनर और एक हार

रह- रहकर है, मुझको पुकार रही
इसकी आवाज में है, कितना दर्द भरा
जो मेरे अस्थिपंजर को खींचकर
मांस से है, बाहर निकाल रहा

ये कैसी आवाज है, बिल्कुल शब्दहीन
हृदय- विदारक, बेचैनी भरी गमगीन
जिसे सुनकर है, मेरा कलेजा काँप रहा
क्यों यह मेरे चट्टान दिल को है हिला रही

इसकी आवाज इतनी हृदय-विदारक क्यों है
क्या छुपा रही है, अपनी करतली में
लगता है, मेरे लिए कोई पैगाम है लाई
जिसे देने की हिम्मत, जुटा रही है दिल में

प्रतिक्षा की घड़ियाँ जब खत्म होने को आई हैं
मधुर - मिलन की वेला हो आई है
तब क्यों मेरे हृदय पर चलने लगा नश्तर
बिखड़ने लगी आकांक्षाओं की माला टूटकर

जिस हृदय से उठती थी, संगीत की ध्वनि बार-बार
आज क्यों मचा हुआ है वहाँ, हाहाकार
जिस तन से निकलती थी मधुरस की धार
वहाँ क्यों बन रहा है, आँसूओं से मोतियों का हार



जिसके लिए छोड़ रही हो तुम
आवाजों का कातर तरल तरंग
किसको डुबाने आई हो तुम
हृदय- खून का बहाकर लाल रंग

क्यों मेरे हृदय में खून रुक- रुककर बहता है
क्यों मेरी आँखों से अश्रुधार निकलने से घबड़ाती है
क्यों चमेली की लतिका, कोमल कलियों को
तोड़कर मेरे लिए सुगंधित हार बनाती है

क्या अपराध किया है मैंने
जो मेरे संचित कोष को लुटाने
अतिथि बन इतनी देर तक
मेरे हृदय- द्वार की चौकठ पर बैठी हो

क्यों डरता है हृदय मेरा, उसके संग जाने से
कागज की यह किश्ती, कैसे बचाएगी डूबने से
सच- सच बतलाना धन्या, कहाँ से तुम आई हो
लाल चूनर में लिपटी, किस ऋषि की कन्या हो

अपने आँचल में अंगारे भर क्यों लाई हो
क्यों इस शीतल विश्व को जलाने पर तुली हो
अपने बृहत् - विशाल डरावने चेहरे से
क्यों बार- बार घूँघट उठा रही हो

जो छटपटा रहे हों खुद ही
उसे तुम अब मत मार
क्यों करती हो तुम, इस भूतल पर
अपनी क्रूरता का व्यापार ?


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