चाहती हूँ ,मैं भी अमर हो जाऊँ
चाहती तोमैं भी हूँ, अमावसकी
अमर गोद में डूबकर, अमर हो जाऊँ
अंगारे को गूँथकर गलेमेंपहनूँ
अणु-अणु में संचित कर वेदना का गान
युग-युग की तुम्हारी पहचान बन जाऊँ
अपने मृदु पलकोंको मुँदकर
दुख की मरकत प्याली से,अतीत को
पी लूँ , बूँद-बूँद कर आँसू छलकाऊँ
अंगारे का पुष्पसेज सजाऊँ
सोकर भस्म शेष रह जाऊँ
तुम्हारी स्मृतियों के तार को,अपने स्वर
तरंग से, सूने नभ को झंकृत कर दूँ
सो रहेतारक – किरण - रोमावली
नीड़ों मेंअलस विहग, कोजगा दूँ
जगाकर उनसे पूछूँ, निष्ठुरदेवता समान
क्योंसुनते होमेरी व्यथित पुकार
तोड़कर अग्निमें जला दो मुझको
होगा तुम्हारा मुझपर सबसे बड़ा उपकार
तुम क्या जानो,बुझ गई जिसके पथ की ज्योति
छिन गया जिसके मधुमय रात्रि का प्यार
वह कैसे जीती इस दुनिया में, कैसे सहती
छाती पर धात्रीके धौसोंकीदुतकार
मगर मेरेजीवनके भाग्य विधाता
कहाँ सेलाऊँ मैं तुम्हारा नाम -पता
तुम तो ठहरे उस दूर देश के वासी
जहाँ से मंथर जल के बिंदु चकित हो
ढुल , गिरपड़ते होकर विचलित
ऐसे में वहाँ न खत भेज पाती,न खबर ही
छलकता यौवन का मधुकोश
तुम तककहाँ ,कैसे ,किस तरह पहुँचाऊँ
अपने छोटे से जीवन की बड़ी कथाएँ
लिखकर इस भुवन में ,कहाँ- कैसे धरूँ
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