साॅंझ के टले सपना
सॅंाचा बना...
मधुर पीर का !
यों थिरकती आई
वो तितली,
रंगीन और
रूप-निराली !
दल-दल से
सटी रही वो...
रंगों की प्यासी !
रंग-रंगों की रम्यता,
इन दिनों की
हर्ष-हॅंसी में धन्यता !
औ ! चाह रहा, उसे
इन दलों की शय्या में
जी भर सुलाना...
पर उड गयी वो,
और किसी के हाथों
रंग जमने केलिए.....
डा० टी० पी० शाजू
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