वीर सावरकर
डाक्टर सुधा सिन्हा
स्वातंत्र्य का था जो दीवाना,
ज्वाला बनकर जिसे जलना,
बंधन तोड़ने की चाह में,
हर पल संघर्षों में पलना।
कालापानी की काली रातें,
मन को डिगा न पाईं थीं,
लोहे की उन जंजीरों में भी,
आज़ादी की धुन गाईं थीं।
कलम बनी थी उसकी शक्ति,
विचार बने थे उसकी ढाल,
अन्याय के विरुद्ध अडा खड़ा था,
सीना ताने, निडर, बेहाल।
राष्ट्रभक्ति की ज्वाला लेकर,
हर दिल में आग जगाई थी,
वीर सावरकर नाम है उसका,
आज़ादी की राह दिखाई थी।
त्याग, तपस्या, बलिदान की,
एक अमर कहानी है,
भारत माँ के उस सपूत की,
गाथा बड़ी सुहानी है।
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