आया सावन झूम के
बदरिया बरसे धरती चूम के,
कि आया सावन कैसे झूम के।
धरती हरियाली रंगने लगी,
फिजायें भी तो मचलने लगीं ,
मलिका बहार निखरी निखरी,
दिल की बगिया भी खिलने लगी।
भौंरें मडराये घूम घूम के ,
कि आया सावन कैसे झूम के।
झरनों में झर झर होने लगीं,
नदियां भी कल कल करने लगीं,
नौका बेसुध सी होने लगी ,
ताली दे दे के थिरकने लगी।
पतवार पे सज के बन टूम के ,
कि आया सावन कैसे झूम के।
आंधी तूफान ढम ढम करते ,
संगी बन के बारात चलते ,
पीपल के पत्ते गोल गोल ,
गाते वे भी मुंह खोल खोल।
दिशायें नाचें लगा ठूमके,
कि आया सावन कैसे झूम के।
प्रोफेसर डॉक्टर सुधा सिन्हा
पटना ,बिहार
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY