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अनमोल हैं ये अश्क़ इन्हें आब दीजिये।
जागी हुई आँखों को कोई ख्वाब दीजिये।।
जो साथ न दे पाये कहीं पीछे रह गये
कुछ उनकी मुश्किलों का भी जवाब दीजिये।।
अब अनसुनी न हो किसी मज़लूम की चीखें
कुछ बाँटिये मसर्र्तें सवाब लीजिये ।।
मेहनतकशों की देह का महका है पसीना
खुशबू का ऐसी लुत्फ़ भी जनाब लीजिये।।
ग़म पी के जी रहे जो ज़माने के दौर में
उनके लिए किया है क्या हिसाब दीजिये ।।
किसने है क्या किया ये ख़ुदा देख रहा है
रब को न बेचने का इन्तख़ाब कीजिये ।।
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डॉ रंजना वर्मा
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