मनहरण घनाक्षरी 16+15 वर्ण
राम राम जपते हैं, राम जी को ठगते हैं।
कैसा ये विधान प्रभु, कैसी विधि माया है।
धर्म कर्म से विहीन, तिलक ललाट पर।
मन से कुटिल और, कामी, क्रोधी, काया है।
तन मन धन जन, सबका है साथ लिये।
साधते हैं निज स्वार्थ, स्वामिभक्ति छाया है।
शोषण कुसंग और, मदिरा का पान करें।
काम ही के नाम पर, लूट मची भाया है।
डॉ० प्रवीण कुमार श्रीवास्तव 'प्रेम'
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