निर्वासन
— नन्दलाल भारती
फरवरी की रातें ज्ञानेंद्र को कभी अच्छी नहीं लगीं।
उम्र के इस पड़ाव पर भी जब पछुआ हवा नीम की सूखी डालियों से टकराती, उनके भीतर कोई पुराना दरवाज़ा चरमराने लगता। बरामदे की आरामकुर्सी पर बैठे वे आँगन की ओर देखते रहते—वही आँगन जहाँ कभी दो नन्हे पैरों की धमाचौकड़ी गूँजती थी और जौहर देवी तुलसी पर जल चढ़ाते हुए बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती थीं। उसी घर की हर ईंट में ज्ञानेंद्र के संघर्ष का पसीना गड़ा था।
फिर भी फरवरी आते ही घर उन्हें अपना नहीं लगता था।
एक शाम जौहर देवी ने पूछा, “फिर वही रात याद आ रही है?”
ज्ञानेंद्र ने उत्तर नहीं दिया। उन्होंने मुट्ठी भर मिट्टी उठाई, देर तक देखते रहे और फिर वहीं गिरा दी।
“कुछ बातें,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “जितनी भीतर दबी रहें, उतना ही अच्छा है।”
जौहर देवी समझ गईं। उस रात का नाम लेना भी जैसे पुराने घाव पर उँगली रखना था।
गाँव से शहर तक लोग ज्ञानेंद्र का सम्मान करते थे। वे किसी बड़े पद पर नहीं रहे, न राजनीतिक पहचान थी, लेकिन किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई, किसी परिवार का विवाद या किसी जरूरतमंद की समस्या हो—वे बिना स्वार्थ खड़े मिलते।
लोग कहते, “ज्ञानेंद्र जी, आपने अपने लिए किया ही क्या?”
वे हँसकर कहते, “जो अपने लिए ही जी ले, उसका जीवन कितना बड़ा होगा? असली सुख तो तब है, जब आपकी वजह से किसी और के जीवन में उजाला पहुँचे।”
उन्होंने यह बात केवल कही नहीं थी, जिया था।
ज्ञानेंद्र का जन्म अभावों में हुआ था। कई बार एक समय की रोटी जुटाना कठिन होता। मगर उन्होंने गरीबी को भाग्य मानने से इनकार किया। दिन में मजदूरी और रात में पढ़ाई करते हुए उन्होंने शिक्षा पूरी की। वर्षों के संघर्ष के बाद निजी कंपनी में नौकरी मिली। वह नौकरी उनके लिए केवल रोजगार नहीं, पहली बड़ी जीत थी।
विवाह के बाद जौहर देवी उनके साथ खड़ी रहीं। दोनों ने एक-एक ईंट जोड़कर घर बनाया। सुविधाएँ बढ़ीं, लेकिन आदतें नहीं बदलीं। ज्ञानेंद्र खर्च लिखते और जौहर देवी पुराने कपड़ों से झोले सिलतीं। वे जानते थे कि बचत बुढ़ापे के लिए नहीं, भविष्य की सुरक्षा है।
फिर दो बेटे हुए—अभय और अखण्ड।
ज्ञानेंद्र ने तय किया कि उनके बच्चों को वह संघर्ष नहीं करना पड़ेगा जो उन्होंने किया था। उन्होंने बैंक से ऋण लिया, भविष्य निधि का पैसा समय से पहले निकाला, अतिरिक्त काम किया और वर्षों तक छुट्टियाँ तक नहीं लीं।
उन्होंने अपने छोटे भाई के बच्चों की पढ़ाई का भार भी उठा लिया।
जौहर देवी ने पूछा, “इतनी जिम्मेदारी क्यों उठा रहे हो?”
ज्ञानेंद्र मुस्कराए, “परिवार केवल खून से नहीं बनता, जिम्मेदारियों से भी बनता है। आज मैं सक्षम हूँ तो कल ये बच्चे भी किसी और का सहारा बनेंगे।”
समय ने उन्हें एक और सीख दी थी। जिन भतीजों की फीस उन्होंने भरी थी, वे बड़े होकर अपने-अपने शहरों में बस गए। त्योहार पर फोन कर लेते, कभी-कभार हाल पूछ लेते। ज्ञानेंद्र इसे भी जीवन की स्वाभाविक गति मानते। वे किसी से हिसाब नहीं रखते थे। उन्हें विश्वास था कि सहायता का अर्थ लौटकर कुछ पाना नहीं होता। शायद इसी कारण उन्होंने अपने बेटों से भी कभी अपने त्याग की कीमत नहीं माँगी। उनकी अपेक्षा केवल इतनी थी कि घर में बातचीत बनी रहे और उन्हें अपने ही बच्चों के बीच अपनी जगह तलाशनी न पड़े।
अभाव पीछे छूटते गए। अभय अच्छी नौकरी में चला गया और अखण्ड भी अपने पैरों पर खड़ा हो गया। ज्ञानेंद्र ने सोचा—अब कठिन सफर समाप्त हुआ।
उन्हें कहाँ पता था कि सबसे कठिन अध्याय अभी बाकी है।
सेवानिवृत्ति के दिन सहकर्मियों ने सम्मान किया। माला पहनाई, प्रशस्ति-पत्र दिया।
“अब आराम कीजिए,” सबने कहा।
ज्ञानेंद्र मुस्कराए। उन्हें लगा, अब परिवार के बीच शांति से जीवन बीतेगा।
लेकिन वेतन बंद होने के साथ जिम्मेदारियाँ बंद नहीं हुईं। पेंशन जैसी सुविधा नहीं थी। कुछ बचत थी, भविष्य निधि का थोड़ा पैसा था, और सबसे बड़ी पूँजी थी—दोनों बेटे अपने पैरों पर खड़े थे। उन्होंने अपनी आर्थिक चिंता बच्चों से कभी साझा नहीं की। वे नहीं चाहते थे कि उनके बेटे यह समझें कि पिता अब सहारे की तलाश में है।
अभय की नौकरी शहर में थी। विवाह के बाद उसका आना-जाना कम हो गया। फोन पर पूछता, “पिताजी, सब ठीक है?”
ज्ञानेंद्र हमेशा कहते, “हाँ बेटा, अपना और बहू का ध्यान रखना।”
उसका “जल्दी आऊँगा” धीरे-धीरे महीनों में बदल गया।
जौहर देवी कभी-कभी कैलेंडर पर निशान लगातीं, फिर स्वयं मिटा देतीं। ज्ञानेंद्र सब देखते, पर कुछ नहीं कहते।
अखण्ड का स्वभाव अलग था। आत्मविश्वासी, सफल और अपनी दुनिया में मग्न। धीरे-धीरे आत्मविश्वास में अहंकार घुलने लगा। सलाह उसे हस्तक्षेप लगती और सहमति कमजोरी।
एक दिन ज्ञानेंद्र ने पूछा, “अखण्ड, अब नौकरी भी स्थिर है। अपने जीवन के बारे में भी सोच।”
“सोच रहा हूँ।”
“हमें भी बता दिया कर।”
“बताने लायक होगा तो बता दूँगा।”
ज्ञानेंद्र चुप हो गए।
कुछ दिनों बाद एक परिचित ने रिश्ता बताया। लड़की शिक्षित थी, अच्छे परिवार से थी। ज्ञानेंद्र ने साफ कहा, “हमें दहेज नहीं चाहिए। जाति हमारे लिए बाधा नहीं। लड़की शिक्षित और संस्कारी हो, दोनों एक-दूसरे को समझें—बस।”
शाम को उन्होंने अखण्ड से बात की।
“एक परिवार ने तुम्हारे लिए रिश्ता बताया है।”
अखण्ड का चेहरा निर्विकार रहा। “मैंने कब कहा था कि आप मेरे लिए रिश्ते देखें?”
“कहा तो नहीं था बेटा, लेकिन सोचा—”
“सोचना बंद कर दीजिए।”
जौहर देवी ने समझाना चाहा, “बेटा, बात तो सुन ले।”
अखण्ड ने कहा, “मेरी जिंदगी है। निर्णय भी मैं ही लूँगा।”
दरवाजा बंद हो गया।
ज्ञानेंद्र देर तक बैठे रहे। फिर धीमे से बोले, “शायद हमारी चिंता भी अब उसे बोझ लगने लगी है।”
फिर भी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी। जब-जब कोई रिश्ता आता, वे अखण्ड से कहते, “देख ले। पसंद न आए तो बात यहीं खत्म।”
हर बार उत्तर आता, “कृपया मेरे निजी जीवन में दखल मत दीजिए।”
ज्ञानेंद्र बहस कर सकते थे, लेकिन बेटे से जीतना नहीं चाहते थे। उन्हें लगता था—रिश्ते तर्क से नहीं, धैर्य से बचते हैं।
समय बीतता गया। अभय का आना औपचारिक होता गया। त्योहारों पर दो दिन रुकता, मोबाइल और दफ्तर के कामों में व्यस्त रहता और लौट जाता। जौहर देवी उसके लिए पकवान बनातीं। वह कहता, “माँ, इतना सब मत बनाया करो। अब ये सब खाने की आदत नहीं रही।”
वह मुस्करातीं, मगर उसके जाने के बाद वही पकवान पड़ोसियों में बाँट देतीं।
अखण्ड घर में रहता भी तो जैसे मेहमान। एक शाम जौहर देवी ने पूछा, “बेटा, खाना यहीं खा लोगे?”
“बाहर खा लूँगा। मेरा इंतजार मत किया करो।”
उस रात जौहर देवी ने भी ठीक से भोजन नहीं किया।
ज्ञानेंद्र ने पहली बार महसूस किया कि प्रतीक्षा भी आदमी को भूखा कर देती है।
एक शाम पुराने सहकर्मी रामप्रसाद अपनी पत्नी के साथ आए। उन्होंने कहा, “एक परिवार है। लड़की एम.ए. है और कॉलेज में पढ़ाती है। केवल परिचय करा दीजिए। आगे निर्णय बच्चों का रहेगा।”
ज्ञानेंद्र ने कहा, “निर्णय अखण्ड का ही होगा।”
रविवार को परिवार आया। बातचीत शिक्षा, परिवार और बच्चों की पसंद पर होती रही। ज्ञानेंद्र बार-बार कहते रहे, “बच्चों की सहमति सबसे महत्वपूर्ण है।”
अखण्ड कमरे में आया। उसने औपचारिक नमस्कार तक नहीं किया।
“मुझे स्पष्ट बात करनी है,” उसने कहा।
ज्ञानेंद्र ने उसकी ओर देखा।
“मैं विवाह करना चाहता हूँ या नहीं, यह मेरा निर्णय है। आगे मेरी अनुमति के बिना किसी को इस घर मत बुलाइए।”
अतिथियों के चेहरे उतर गए।
अखण्ड आगे बोला, “आप लोग मेरी जिंदगी में जरूरत से ज्यादा दखल देते हैं।”
वह कमरे से चला गया।
ज्ञानेंद्र ने हाथ जोड़कर कहा, “क्षमा कीजिएगा... बच्चों के विचार अब हमसे अलग हैं।”
लड़की के पिता ने उनके कंधे पर हाथ रखा, “क्षमा मत माँगिए। आपकी विनम्रता बता रही है कि गलती आपकी नहीं है।”
उनके जाने के बाद घर का सन्नाटा कई दिनों तक नहीं टूटा।
रात को जौहर देवी रोते हुए बोलीं, “हमने आखिर माँगा ही क्या था? न दहेज, न जाति, न धन... फिर भी हम अपने ही बेटे के सामने अपराधी क्यों बन गए?”
ज्ञानेंद्र के पास कोई उत्तर नहीं था।
उस दिन उन्होंने तय कर लिया कि अब अखण्ड के विवाह की चर्चा वे स्वयं कभी नहीं करेंगे।
लेकिन पिता का मन आदेश से कहाँ चलता है?
किसी मित्र के बेटे की शादी होती, किसी घर में शहनाई बजती, किसी परिचित की बहू आती—ज्ञानेंद्र कुछ क्षण खो जाते। जौहर देवी उनकी वह चुप मुस्कान पढ़ लेतीं।
फिर भी उन्होंने अपना वचन निभाया।
एक दिन एक और परिवार अखण्ड के लिए प्रस्ताव लेकर आया। ज्ञानेंद्र ने उन्हें दरवाजे से ही विनम्रता से लौटा दिया।
“क्षमा कीजिए। अब मैं अपने बेटे के विवाह की चर्चा किसी से नहीं करता।”
“क्यों? कोई विशेष बात?”
ज्ञानेंद्र ने मुस्कराने की कोशिश की, “हर बात का उत्तर शब्दों में नहीं दिया जा सकता।”
जौहर देवी ने पूछा, “आपने ठीक नहीं किया। शायद इस बार...”
“नहीं जौहर। अब नहीं।”
कुछ देर बाद उन्होंने कहा, “पिता होने का अधिकार यदि बेटे को बोझ लगने लगे, तो चुप हो जाना ही बेहतर है।”
दिन बीतते गए। घर में बातचीत कम होती गई। ज्ञानेंद्र ने अखण्ड के कमरे तक जाना, उसके आने-जाने का समय पूछना और उसकी पसंद का खाना बनवाना लगभग छोड़ दिया। यह दूरी नाराजगी की नहीं थी; यह उस पिता की दूरी थी जो बेटे के आत्मसम्मान की रक्षा करते-करते स्वयं अपने ही घर में अजनबी हो रहा था।
फरवरी शुरू हो चुकी थी।
एक दिन गाँव के बुजुर्ग हरिराम आए। बोले, “ज्ञानेंद्र, अब आराम करना चाहिए। सारी जिम्मेदारियाँ पूरी हो गईं।”
ज्ञानेंद्र फीके स्वर में हँसे, “जिम्मेदारियाँ उम्र देखकर कहाँ जाती हैं, हरिराम? वे तो साँस के साथ ही जाती हैं।”
हरिराम उनकी आँखों में देखते रह गए।
फरवरी की चौदह तारीख थी। दिन भर मौसम साफ रहा। शाम होते ही ठंडी हवा चलने लगी।
जौहर देवी ने दरवाजा बंद करते हुए कहा, “आज जाने क्यों मन बहुत घबरा रहा है।”
रात के नौ बजे। फिर दस।
अखण्ड अभी तक नहीं लौटा था।
ज्ञानेंद्र बरामदे में बैठे सड़क की ओर देखते रहे।
अचानक गाड़ी रुकने की आवाज आई।
दरवाजे की घंटी बजी।
ज्ञानेंद्र ने कुंडी खोली।
सामने गाँव के दो सम्मानित व्यक्ति खड़े थे। उनके साथ अखण्ड भी था।
“ज्ञानेंद्र जी,” एक वृद्ध ने संकोच से कहा, “रात में कष्ट दिया। बात ऐसी थी कि आपको बताए बिना जाना ठीक नहीं लगा।”
अखण्ड बिना कुछ बोले भीतर चला गया।
वृद्ध ने कहा, “आज जिस तरह अखण्ड ने एक परिवार के सामने आप लोगों के बारे में बातें कहीं... हमें बहुत दुःख हुआ।”
ज्ञानेंद्र चुप रहे।
“विवाह की बात पर किसी ने दबाव नहीं डाला था। केवल परिचय था। लेकिन अखण्ड ने कहा—‘मेरे माता-पिता को मेरी जिंदगी में दखल देने की आदत है। वे अपने निर्णय मुझ पर थोपना चाहते हैं। भविष्य में उनसे कोई बात मत कीजिए। मुझे अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीनी है।’”
ज्ञानेंद्र की आँखें झुक गईं।
वृद्ध ने धीमे स्वर में कहा, “बात विवाह की नहीं थी। बात उस सम्मान की थी, जो माता-पिता का होता है। इसलिए सोचा, आपको सच्चाई बता देना हमारा कर्तव्य है।”
दोनों चले गए।
जौहर देवी चौखट से टिककर खड़ी थीं। ज्ञानेंद्र चौकी पर बैठे रहे। दोनों के बीच कोई शब्द नहीं था।
लगभग ग्यारह बजे अखण्ड बाहर आया।
“खाना बचा है?”
ज्ञानेंद्र ने पहली बार उसकी ओर सीधे देखा।
“अखण्ड...”
“जी?”
“आज के बाद मैं तेरे विवाह की चर्चा कभी नहीं करूँगा।”
अखण्ड चुप रहा।
“तू विवाह कर, मत कर... अपनी पसंद से कर... या अकेला रह। यह तेरा अधिकार है।”
कुछ क्षण रुककर ज्ञानेंद्र बोले, “लेकिन एक बात याद रखना—पिता का प्रेम बंधन नहीं होता। उसे बंधन समझ लेने की भूल मत करना।”
अखण्ड अपने कमरे में चला गया।
दरवाजा बंद होने की आवाज देर तक गूँजती रही।
उस रात ज्ञानेंद्र नहीं सोए। सुबह होने से पहले वे आँगन में आ गए। नीम के नीचे बैठकर उन्होंने मुट्ठी भर मिट्टी उठाई।
उन्हें याद आया—इसी मिट्टी पर अभय ने चलना सीखा था। इसी पर अखण्ड ने पहली बार अपना नाम लिखा था। इन्हीं बच्चों के भविष्य के लिए उन्होंने ऋण लिया, अपनी इच्छाएँ टालीं और अपने भाई के बच्चों तक की पढ़ाई का भार उठाया।
उन्होंने सोचा था—एक दिन यही बच्चे उनका सहारा बनेंगे।
आज पहली बार उन्हें लगा—संतान का भविष्य बनाया जा सकता है, लेकिन उसका संस्कार खरीदा नहीं जा सकता।
दिन बीतते गए।
घर वही रहा। अभय आता, औपचारिक बातें करता और लौट जाता। अखण्ड उसी घर में रहता, पर उसका संसार अलग था।
ज्ञानेंद्र ने अपेक्षाएँ कम कर दीं। वे गाँव के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने लगे, कभी पुस्तकालय जाते और किसी निर्धन छात्र की फीस भर देते।
एक शाम जौहर देवी ने पूछा, “क्या अब दुख नहीं होता?”
ज्ञानेंद्र मुस्कराए, “दुख तो है। लेकिन उसे घर में कैद कर दूँ तो वह सबको तोड़ देगा। इसलिए उसे अपने भीतर रहने देता हूँ।”
सूरज डूब रहा था। आँगन में लंबी परछाइयाँ फैल गई थीं।
ज्ञानेंद्र ने धीमे स्वर में कहा, “जौहर... जानती हो, निर्वासन क्या होता है?”
जौहर देवी ने उनकी ओर देखा।
“लोग समझते हैं, घर छोड़ देना निर्वासन है।”
उन्होंने मिट्टी की ओर देखते हुए कहा, “नहीं... सबसे बड़ा निर्वासन तब होता है, जब आदमी अपने ही घर में अपने होने का अधिकार खो दे।”
जौहर देवी की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने ज्ञानेंद्र का हाथ थाम लिया।
दोनों देर तक चुप बैठे रहे।
आँगन में हवा चल रही थी। नीम की सूखी पत्तियाँ धीरे-धीरे जमीन पर गिर रही थीं।
ज्ञानेंद्र ने एक पत्ती उठाई और हथेली पर रख ली।
“देखो... पेड़ ने इसे गिराया नहीं है। समय ने इसे शाख से अलग कर दिया है।”
जौहर देवी ने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया।
घर अब भी उनका था...
लेकिन रिश्ते कहीं और चले गए थे।
घर एक दिन में नहीं टूटते। पहले संवाद निर्वासित होते हैं, फिर विश्वास, फिर सम्मान... और अंत में रिश्ते। दीवारें खड़ी रहती हैं, छत सलामत रहती है, लेकिन घर अपने लोगों से खाली हो जाता है।
ज्ञानेंद्र ने हथेली की मिट्टी धीरे से आँगन में बिखेर दी।
मिट्टी अपनी जगह लौट गई।
पर उनका मन...
शायद कभी लौटकर नहीं आया।
—समाप्त—
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