माँ, माटी और पहचान
लेखक : नन्दलाल भारती
बरसात अभी-अभी थमी थी।
खेतों की भीगी माटी की सोंधी गंध हवा में घुली हुई थी। दूर खेतों में धान की नन्हें -नन्हें पौधे सिर उठाकर जैसे आसमान से कह रहे थे —
"हम अभी जीवित हैं।"
चौकी गांव की जमीन में उर्वरा शक्ति बाकी हैl माटी का सोंधापन गांव की दास्तान बयां कर रहा था l
बाहर से देखने पर चौकी जितना शांत दिखाई देता था, भीतर से उतना ही विभाजित था। गाँव की बस्ती भी कई हिस्सों में बँटी हुई थी। पूरब में ठाकुरों का टोला, दक्षिण में महाब्राह्मणों का टोला और पश्चिम में गाँव की सीमा से लगी दलित बस्ती, जहां दलितों को करवट लेने तक की गुंजाइस नहीं थी l
लोग कहते थे कि यह केवल रहने की व्यवस्था है, लेकिन हर बच्चा जानता था कि यह केवल रास्तों और घरों का बँटवारा नहीं था—यह पहचान का भी बँटवारा था।
गाँव के आखिरी छोर पर दलित बस्ती में माटी और खपरैल से बना एक छोटा-सा घर था। घर के सामने नीम का पेड़ था और पीछे आधा बीघा खेत—वही खेत, जो वर्षों से बारिश के भरोसे पेट भरने के लिए अन्न देता आया था।
इसी घर में रहते थे फलेश्वर और उनकी पत्नी सुखेश्वरी।
फलेश्वर की उम्र लगभग साठ वर्ष थी और सुखेश्वरी पचपन के आसपास की थीं। चेहरे पर समय की अनगिनत रेखाएँ थीं, मगर आँखों में अटूट विश्वास था।
दोनों खेतिहर मजदूर थे।
उनका बड़ा बेटा था—कलमेश्वर।
फलेश्वर और सुखेश्वरी अक्सर बेटे से कहा करते थे—
"बेटवा, गरीब होना पाप नहीं है। लेकिन अपनी आत्मा बेच देना सबसे बड़ा पाप है।"
कलमेश्वर हर बार मुस्करा देता, लेकिन माता-पिता की यह बात उसके भीतर कहीं गहरे उतरती चली जाती।
बचपन से ही कलमेश्वर पढ़ने में तेज था।
गाँव के सरकारी विद्यालय में पढ़ते-पढ़ते उसने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। पढ़ाई के लिए उसे कई बार गाँव और समाज की उपेक्षा का सामना करना पड़ा, लेकिन उसके माता-पिता ने हिम्मत नहीं हारने दी।
सुखेश्वरी अक्सर कहतीं—
"बेटा, पढ़-लिखकर इतना बड़ा जरूर बनना कि कोई तुम्हें तुम्हारी गरीबी से नहीं, लोग तुम्हारे कर्म से पहचाने।"
आगे की पढ़ाई और नौकरी के लिए कलमेश्वर शहर चला गया।
शहर ने उसे डिग्री दी, नौकरी दी और बड़े लोगों के बीच बैठना सिखाया। उसका पहनावा बदला, बोलने का अंदाज बदला, जीवन जीने का तरीका बदला।
लेकिन एक चीज नहीं बदली—
अपनी माँ, अपने पिता और अपनी माटी के प्रति उसका प्रेम।
दुनिया की कोई तरक्की ऐसी नहीं थी, जो कलमेश्वर से उसके गाँव की पहचान छीन सके।
अब वह एक बड़ी कंपनी में जूनियर अधिकारी था।
उसके पास नौकरी थी, सम्मान था और परिवार को आगे बढ़ाने का सपना था।
उसका एक ही जुनून था—
अपने परिवार को तरक्की के रास्ते पर ले जाना और अपने सद्कर्मों से अपनी पहचान बनाना।
उधर गाँव में सुखेश्वरी हर सुबह आँगन लीपती थीं।
कलमेश्वर के नौकरी में आने के बाद पिता फलेश्वर अपने खेतों की देखभाल करते और अधिकतर घर के तख्त पर बैठकर दिन गुजारते थे। शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता था।
सुखेश्वरी हर आने-जाने वाले डाकिए से एक ही सवाल पूछतीं—
"डाकिया बाबू, मेरे बेटवा की कोई चिट्ठी आई है क्या?"
पोस्टमैन मुस्कराकर कहता—
"काकी, अभी पाँच दिन पहले ही तो कलमेश्वर की चिट्ठी, मनीऑर्डर आया था। दे दिया था न?"
सुखेश्वरी हँस देतीं—
"दिए थे बाबू... माँ हूँ न! बेटवा परदेस में है। मन तो रोज उसी का इंतजार करता है।"
फिर गर्व से कहतीं—
"मेरा कलमेश्वर हमें कैसे भूल सकता है? वह केवल माँ-बाप के लिए नहीं, अपने छोटे भाई और उसके परिवार के लिए भी पिता की तरह खड़ा है।
बेटवा आज का श्रवणकुमार है। कलमेश्वर पूरे परिवार को अपनी पीठ पर ढो रहा है। वह कहता है—'मेरी पहचान मेरे माँ-बाप हैं और मेरे गाँव की माटी है।'"
सुखेश्वरी का विश्वास किसी मंदिर के दीपक जैसा था—धीमा, मगर कभी बुझने वाला नहीं।
लगभग एक महीने बाद एक पत्र आया।
पत्र में माँ-बाप को चरण-स्पर्श के साथ लिखा था—
"माँ और बाबूजी, मेरा भोपाल से गुजरात ट्रांसफर हो गया है। यहाँ नई जिम्मेदारी मिली है। आप दोनों चिंता मत करना। मैं जल्दी ही गाँव आऊँगा।"
पत्र पढ़ते हुए सुखेश्वरी की आँखें भर आईं।
उसने पत्र सीने से लगा लिया।
गुजरात पहुँचकर कलमेश्वर ने नई जिम्मेदारी संभाल ली।
एक दिन जनरल मैनेजर ने कलमेश्वर सहज भाव से पूछा—
"कलमेश्वर जी, आपका जन्मस्थान कहाँ है?"
सवाल साधारण था।
लेकिन कुछ क्षणों के लिए कलमेश्वर चुप हो गया।
उसने गर्व से कहा—
"उत्तर प्रदेश का एक छोटा-सा गाँव-चौकी ।"
"कौन-सा जिला?"
कलमेश्वर ने इस बार बिना झिझक कहा—
"आज़मगढ़।"
कमरे में बैठे कुछ लोग मुस्करा दिए।
किसी ने टिप्पणी की—
"आज़मगढ़? वह तो बहुत खतरनाक इलाका है।"
दूसरे ने कहा—
"वहीं से तो बड़े-बड़े अपराधियों और आतंकवादियों के नाम सुनाई देते हैं।"
कलमेश्वर चुप रहा।
तभी जनरल मैनेजर ने गंभीर स्वर में कहा—
"बस कीजिए। एक सड़ी हुई मछली पूरे तालाब को गंदा नहीं कर सकती।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
लेखक : नन्दलाल भारती
बरसात अभी-अभी थमी थी।
खेतों की भीगी माटी की सोंधी गंध हवा में घुली हुई थी। दूर खेतों में धान की नन्हें -नन्हें पौधे सिर उठाकर जैसे आसमान से कह रहे थे —
"हम अभी जीवित हैं।"
चौकी गांव की जमीन में उर्वरा शक्ति बाकी हैl माटी का सोंधापन गांव की दास्तान बयां कर रहा था l
बाहर से देखने पर चौकी जितना शांत दिखाई देता था, भीतर से उतना ही विभाजित था। गाँव की बस्ती भी कई हिस्सों में बँटी हुई थी। पूरब में ठाकुरों का टोला, दक्षिण में महाब्राह्मणों का टोला और पश्चिम में गाँव की सीमा से लगी दलित बस्ती, जहां दलितों को करवट लेने तक की गुंजाइस नहीं थी l
लोग कहते थे कि यह केवल रहने की व्यवस्था है, लेकिन हर बच्चा जानता था कि यह केवल रास्तों और घरों का बँटवारा नहीं था—यह पहचान का भी बँटवारा था।
गाँव के आखिरी छोर पर दलित बस्ती में माटी और खपरैल से बना एक छोटा-सा घर था। घर के सामने नीम का पेड़ था और पीछे आधा बीघा खेत—वही खेत, जो वर्षों से बारिश के भरोसे पेट भरने के लिए अन्न देता आया था।
इसी घर में रहते थे फलेश्वर और उनकी पत्नी सुखेश्वरी।
फलेश्वर की उम्र लगभग साठ वर्ष थी और सुखेश्वरी पचपन के आसपास की थीं। चेहरे पर समय की अनगिनत रेखाएँ थीं, मगर आँखों में अटूट विश्वास था।
दोनों खेतिहर मजदूर थे।
उनका बड़ा बेटा था—कलमेश्वर।
फलेश्वर और सुखेश्वरी अक्सर बेटे से कहा करते थे—
"बेटवा, गरीब होना पाप नहीं है। लेकिन अपनी आत्मा बेच देना सबसे बड़ा पाप है।"
कलमेश्वर हर बार मुस्करा देता, लेकिन माता-पिता की यह बात उसके भीतर कहीं गहरे उतरती चली जाती।
बचपन से ही कलमेश्वर पढ़ने में तेज था।
गाँव के सरकारी विद्यालय में पढ़ते-पढ़ते उसने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। पढ़ाई के लिए उसे कई बार गाँव और समाज की उपेक्षा का सामना करना पड़ा, लेकिन उसके माता-पिता ने हिम्मत नहीं हारने दी।
सुखेश्वरी अक्सर कहतीं—
"बेटा, पढ़-लिखकर इतना बड़ा जरूर बनना कि कोई तुम्हें तुम्हारी गरीबी से नहीं, लोग तुम्हारे कर्म से पहचाने।"
आगे की पढ़ाई और नौकरी के लिए कलमेश्वर शहर चला गया।
शहर ने उसे डिग्री दी, नौकरी दी और बड़े लोगों के बीच बैठना सिखाया। उसका पहनावा बदला, बोलने का अंदाज बदला, जीवन जीने का तरीका बदला।
लेकिन एक चीज नहीं बदली—
अपनी माँ, अपने पिता और अपनी माटी के प्रति उसका प्रेम।
दुनिया की कोई तरक्की ऐसी नहीं थी, जो कलमेश्वर से उसके गाँव की पहचान छीन सके।
अब वह एक बड़ी कंपनी में जूनियर अधिकारी था।
उसके पास नौकरी थी, सम्मान था और परिवार को आगे बढ़ाने का सपना था।
उसका एक ही जुनून था—
अपने परिवार को तरक्की के रास्ते पर ले जाना और अपने सद्कर्मों से अपनी पहचान बनाना।
उधर गाँव में सुखेश्वरी हर सुबह आँगन लीपती थीं।
कलमेश्वर के नौकरी में आने के बाद पिता फलेश्वर अपने खेतों की देखभाल करते और अधिकतर घर के तख्त पर बैठकर दिन गुजारते थे। शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता था।
सुखेश्वरी हर आने-जाने वाले डाकिए से एक ही सवाल पूछतीं—
"डाकिया बाबू, मेरे बेटवा की कोई चिट्ठी आई है क्या?"
पोस्टमैन मुस्कराकर कहता—
"काकी, अभी पाँच दिन पहले ही तो कलमेश्वर की चिट्ठी, मनीऑर्डर आया था। दे दिया था न?"
सुखेश्वरी हँस देतीं—
"दिए थे बाबू... माँ हूँ न! बेटवा परदेस में है। मन तो रोज उसी का इंतजार करता है।"
फिर गर्व से कहतीं—
"मेरा कलमेश्वर हमें कैसे भूल सकता है? वह केवल माँ-बाप के लिए नहीं, अपने छोटे भाई और उसके परिवार के लिए भी पिता की तरह खड़ा है।
बेटवा आज का श्रवणकुमार है। कलमेश्वर पूरे परिवार को अपनी पीठ पर ढो रहा है। वह कहता है—'मेरी पहचान मेरे माँ-बाप हैं और मेरे गाँव की माटी है।'"
सुखेश्वरी का विश्वास किसी मंदिर के दीपक जैसा था—धीमा, मगर कभी बुझने वाला नहीं।
लगभग एक महीने बाद एक पत्र आया।
पत्र में माँ-बाप को चरण-स्पर्श के साथ लिखा था—
"माँ और बाबूजी, मेरा भोपाल से गुजरात ट्रांसफर हो गया है। यहाँ नई जिम्मेदारी मिली है। आप दोनों चिंता मत करना। मैं जल्दी ही गाँव आऊँगा।"
पत्र पढ़ते हुए सुखेश्वरी की आँखें भर आईं।
उसने पत्र सीने से लगा लिया।
गुजरात पहुँचकर कलमेश्वर ने नई जिम्मेदारी संभाल ली।
एक दिन जनरल मैनेजर ने कलमेश्वर सहज भाव से पूछा—
"कलमेश्वर जी, आपका जन्मस्थान कहाँ है?"
सवाल साधारण था।
लेकिन कुछ क्षणों के लिए कलमेश्वर चुप हो गया।
उसने गर्व से कहा—
"उत्तर प्रदेश का एक छोटा-सा गाँव-चौकी ।"
"कौन-सा जिला?"
कलमेश्वर ने इस बार बिना झिझक कहा—
"आज़मगढ़।"
कमरे में बैठे कुछ लोग मुस्करा दिए।
किसी ने टिप्पणी की—
"आज़मगढ़? वह तो बहुत खतरनाक इलाका है।"
दूसरे ने कहा—
"वहीं से तो बड़े-बड़े अपराधियों और आतंकवादियों के नाम सुनाई देते हैं।"
कलमेश्वर चुप रहा।
तभी जनरल मैनेजर ने गंभीर स्वर में कहा—
"बस कीजिए। एक सड़ी हुई मछली पूरे तालाब को गंदा नहीं कर सकती।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
उन्होंने आगे कहा—
"आज़मगढ़ केवल अपराधियों के लिए नहीं जाना जाता। यह आध्यात्म, साहित्य और संस्कृति की धरती है। इस जिले ने अनेक साहित्यकार, सामाजिक चिंतक, राजनेता और आध्यात्मिक व्यक्तित्व दिए हैं। अयोध्या सिंह उपाध्याय,राहुल सांकृत्यायन जैसी महान विभूतियां इसी धरती से जुड़ी रही हैं। यहाँ की मिट्टी बहुत उपजाऊ है।"
तभी किसी कर्मचारी ने कहा—
"साहब , जमीन पर कुछ खास लोगों का कब्जा भी है। बहुत से दलित भूमिहीन हैं। कई जगह दबंग लोग जमीन के आवंटन तक नहीं होने देते। जातिवाद और भेदभाव भी बड़ी समस्या है।"
दूसरे कर्मचारी ने कहा—
"जातिवाद और भेदभाव देश के माथे पर बदनुमा दाग हैं। लेकिन जाति और धर्म के ठेकेदार शायद यह देखने को तैयार नहीं कि दुनिया हमारे ऊपर थू-थू कर रही है।"
कलमेश्वर से रहा नहीं गया।
उसने कहा— साहब मैं सबसे पहले भारतीय हूँ, भले ही ढोंगियों की बनाई जातिव्यवस्था के अनुसार दलित हूँ l
साहब "एक परंपरा बनने में सौ साल लगते हैं तो उसे मिटने में शायद पाँच सौ साल लग जाएँ। लेकिन परिवर्तन असंभव नहीं है। एक दिन ऐसा आएगा, जब इंसान की पहचान जाति से नहीं, उसके कर्म से होगी। और शायद वह समय भी आए, जब अंतरजातीय विवाह सामान्य बात हों।"
जनरल मैनेजर ने मुस्कराकर पूछा—
"कलमेश्वर जी, आपने अपने गाँव और आज़मगढ़ के बारे में इतनी बातें कहीं। क्या आप साहित्य भी पढ़ते-लिखते हैं?"
कलमेश्वर ने विनम्रता से कहा—
"जी, थोड़ा-बहुत लिखता हूँ। कुछ वर्ष पहले एक अखबार ने मेरी प्रकाशित और अप्रकाशित पुस्तकों एवं ई-पुस्तकों सहित कुल सत्रह पुस्तकों का उल्लेख किया था।"
कमरे में तालियाँ बज उठीं।
कलमेश्वर का सिर आत्मसम्मान से ऊँचा हो गया।
उसे अचानक अपने माता-पिता की आवाज सुनाई देने लगी—
"शाबाश बेटा! तूने अपनी पहचान नहीं छिपाई। पहचान छिपाने से आदमी बड़ा नहीं बनता।"
उस रात उसने माँ-बाप को पत्र लिखा—
"बाबूजी और माँजी, मैं गुजरात में अच्छी जगह आ गया हूँ। दफ्तर के सभी लोग बहुत अच्छे हैं। मेरी पत्नी सुलेखेश्वरी बच्चों की पढ़ाई के कारण भोपाल में ही रहेगी। मैं महीने-दो महीने में आता-जाता रहूँगा। आप दोनों किसी बात की चिंता मत करना। शेष सब कुशल-मंगल है।
गाँव में कलमेश्वर का पत्र पढ़कर सुखेश्वरी की आँखें चमक उठीं।
बाबूजी ने छोटे बेटे परमेश्वर से पत्र लिखवाया—
"बेटा, जल्दी कब आएगा रे? तेरे बाबूजी कहते हैं—बच्चों को आँख भर देखे महीनों हो गए। समय मिले तो बच्चों के साथ जल्दी आ जाना।"
लेकिन इसी पत्र में एक दूसरी खबर भी थी।
"इधर खेत पर कुछ लोगों की निगाह है। सेजबहादुर के पट्टीदारों ने खेत के एक हिस्से पर कब्जा करना शुरू कर दिया है। पश्चिमी हिस्से में उपरबनसु राम के बेटे भी कब्जा करने लगे हैं। घर की खाली जमीन पर अग्निकुमार की गिद्ध जैसी निगाहें गड़ी हुई हैं।"
कलमेश्वर ने उत्तर दिया—
"किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करना है। केवल कानूनी कार्रवाई करना है। कुछ लोग हमें झगड़े में उलझाकर परिवार की तरक्की रोकना चाहते हैं। मैं पैसे भेज रहा हूँ। भाई परमेश्वर, तुम तहसील और जिला कार्यालय में पैमाइश के लिए आवेदन लगा देना। सरकारी कागज में जो जमीन पिताजी नाम है, उसे कोई जबरदस्ती नहीं छीन सकता। समझदारी से काम करना। चिंता मत करना।"
परमेश्वर ने बड़े भाई की सलाह मानी और तहसील और जिला कार्यालय में आवेदन कर दिया।
एक गोधूलि बेला में सुखेश्वरी ने फलेश्वर से कहा—
"कहो जी... ये गिद्ध जैसी निगाह वाले लोग कहीं हमारे सपनों की जमीन तो नहीं छीन लेंगे?"
कहते-कहते उनकी साँस भारी हो गई।
फलेश्वर ने उन्हें संभालने की कोशिश की—
"कुछ नहीं होगा। कलमेश्वर सब देख लेगा।"
लेकिन सुखेश्वरी का मन शायद आने वाले संकट को महसूस कर चुका था।
कुछ ही दिनों बाद वह इस दुनिया से चली गईं।
माँ की मृत्यु की खबर सुनते ही कलमेश्वर परिवार सहित गाँव पहुँचा।
क्रिया-कर्म पूरा हुआ।
जब शहर लौटने का समय आया, तो पिता की आँखों में अकेलापन था।
कलमेश्वर ने घर की चौखट को देखा।
नीम का पेड़ अब भी खड़ा था।
गाँव की पोखरी सिकुड़कर गंदे नाले जैसी हो चुकी थी।
लेकिन माँ-बाप के हाथों बनाया वह घर अब भी शान से खड़ा था।
आँगन लीपने की जिम्मेदारी अब परमेश्वर की पत्नी दीपेश्वरी ने संभाल ली थी।
कलमेश्वर की आँखें बार-बार भर आतीं।
उसे लगता—माँ कहीं गई ही नहीं है।
रात को वह पत्नी सुलेखेश्वरी के साथ बैठा था।
सुलेखेश्वरी ने पूछा—
"नए दफ्तर में लोग आपके साथ सम्मान से व्यवहार करते हैं?"
कलमेश्वर ने कहा—
"हाँ।"
फिर उसने पूछा—
"क्या आपने वहाँ अपनी पूरी पहचान बताई?"
कलमेश्वर की जुबान कुछ क्षणों के लिए रुक गई।
सुलेखेश्वरी उसकी आँखों में देखते हुए बोली—
"जिस माटी ने तुम्हें चलना सिखाया, उसी का नाम लेने में अगर शर्म आने लगे तो समझ लेना कि सफलता बहुत महँगी पड़ गई।"
कलमेश्वर ने पत्नी का हाथ पकड़कर कहा—
"मुझे माँ, माटी और अपनी पहचान पर नाज है।"
माँ को गुजरे अभी एक साल भी नहीं हुआ था कि एक दिन खबर आई—
"पिताजी गिर पड़े हैं।"
कलमेश्वर तुरंत गाँव पहुँचा।
फलेश्वर की कमर और घुटने में गंभीर चोट आई थी। ऑपरेशन हुआ, लेकिन वे फिर चल नहीं पाए।
एक सुबह कलमेश्वर अपने छोटे भाई परमेश्वर के साथ खेत देखने गया।
खेत के लगभग चौथाई हिस्से पर कब्जा हो चुका था।
सरकारी दस्तावेजों में पूरा खेत अब भी फलेश्वर के नाम दर्ज था।
जबरदस्ती कब्जा किए बैठे लोग हँसते हुए बोले—
"शहर वाले बाबू, गाँव की जमीन बचाने आए हो? अब गाँव पुराने तरीके से नहीं चलता।"
कलमेश्वर ने उस क्षण महसूस किया कि यह लड़ाई केवल आधे बीघे खेत की नहीं है।
यह उसकी माँ की इज्जत, पिता की विरासत और उसकी अपनी पहचान की लड़ाई है।
उसने झुककर एक मुट्ठी मिट्टी उठाया ।
उस मिट्टी में माँ-बाप के पसीने की गंध थी।
उसमें माँ-बाप के सपने थे।
और उसी मिट्टी में जैसे उसकी अपनी पहचान भी दबी हुई थी।
उसने मन ही मन संकल्प लिया—
"अब मैं केवल इस जमीन को नहीं बचाऊँगा। मैं उस सोच से भी लड़ूँगा, जो इंसान की पहचान उसकी जाति, गरीबी और जन्म से तय करती है।"
अगली सुबह की पहली किरण अभी खेतों पर पूरी तरह नहीं उतरी थी।
रात की नमी मेड़ों पर चमक रही थी।
कलमेश्वर देर तक उसी खेत की मेड़ पर खड़ा रहा, जहाँ उसके माता पिता ने पसीना बहाया था ।
उसे बचपन की बात याद आई।
पिता कहा करते थे—
"आज़मगढ़ केवल अपराधियों के लिए नहीं जाना जाता। यह आध्यात्म, साहित्य और संस्कृति की धरती है। इस जिले ने अनेक साहित्यकार, सामाजिक चिंतक, राजनेता और आध्यात्मिक व्यक्तित्व दिए हैं। अयोध्या सिंह उपाध्याय,राहुल सांकृत्यायन जैसी महान विभूतियां इसी धरती से जुड़ी रही हैं। यहाँ की मिट्टी बहुत उपजाऊ है।"
तभी किसी कर्मचारी ने कहा—
"साहब , जमीन पर कुछ खास लोगों का कब्जा भी है। बहुत से दलित भूमिहीन हैं। कई जगह दबंग लोग जमीन के आवंटन तक नहीं होने देते। जातिवाद और भेदभाव भी बड़ी समस्या है।"
दूसरे कर्मचारी ने कहा—
"जातिवाद और भेदभाव देश के माथे पर बदनुमा दाग हैं। लेकिन जाति और धर्म के ठेकेदार शायद यह देखने को तैयार नहीं कि दुनिया हमारे ऊपर थू-थू कर रही है।"
कलमेश्वर से रहा नहीं गया।
उसने कहा— साहब मैं सबसे पहले भारतीय हूँ, भले ही ढोंगियों की बनाई जातिव्यवस्था के अनुसार दलित हूँ l
साहब "एक परंपरा बनने में सौ साल लगते हैं तो उसे मिटने में शायद पाँच सौ साल लग जाएँ। लेकिन परिवर्तन असंभव नहीं है। एक दिन ऐसा आएगा, जब इंसान की पहचान जाति से नहीं, उसके कर्म से होगी। और शायद वह समय भी आए, जब अंतरजातीय विवाह सामान्य बात हों।"
जनरल मैनेजर ने मुस्कराकर पूछा—
"कलमेश्वर जी, आपने अपने गाँव और आज़मगढ़ के बारे में इतनी बातें कहीं। क्या आप साहित्य भी पढ़ते-लिखते हैं?"
कलमेश्वर ने विनम्रता से कहा—
"जी, थोड़ा-बहुत लिखता हूँ। कुछ वर्ष पहले एक अखबार ने मेरी प्रकाशित और अप्रकाशित पुस्तकों एवं ई-पुस्तकों सहित कुल सत्रह पुस्तकों का उल्लेख किया था।"
कमरे में तालियाँ बज उठीं।
कलमेश्वर का सिर आत्मसम्मान से ऊँचा हो गया।
उसे अचानक अपने माता-पिता की आवाज सुनाई देने लगी—
"शाबाश बेटा! तूने अपनी पहचान नहीं छिपाई। पहचान छिपाने से आदमी बड़ा नहीं बनता।"
उस रात उसने माँ-बाप को पत्र लिखा—
"बाबूजी और माँजी, मैं गुजरात में अच्छी जगह आ गया हूँ। दफ्तर के सभी लोग बहुत अच्छे हैं। मेरी पत्नी सुलेखेश्वरी बच्चों की पढ़ाई के कारण भोपाल में ही रहेगी। मैं महीने-दो महीने में आता-जाता रहूँगा। आप दोनों किसी बात की चिंता मत करना। शेष सब कुशल-मंगल है।
गाँव में कलमेश्वर का पत्र पढ़कर सुखेश्वरी की आँखें चमक उठीं।
बाबूजी ने छोटे बेटे परमेश्वर से पत्र लिखवाया—
"बेटा, जल्दी कब आएगा रे? तेरे बाबूजी कहते हैं—बच्चों को आँख भर देखे महीनों हो गए। समय मिले तो बच्चों के साथ जल्दी आ जाना।"
लेकिन इसी पत्र में एक दूसरी खबर भी थी।
"इधर खेत पर कुछ लोगों की निगाह है। सेजबहादुर के पट्टीदारों ने खेत के एक हिस्से पर कब्जा करना शुरू कर दिया है। पश्चिमी हिस्से में उपरबनसु राम के बेटे भी कब्जा करने लगे हैं। घर की खाली जमीन पर अग्निकुमार की गिद्ध जैसी निगाहें गड़ी हुई हैं।"
कलमेश्वर ने उत्तर दिया—
"किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करना है। केवल कानूनी कार्रवाई करना है। कुछ लोग हमें झगड़े में उलझाकर परिवार की तरक्की रोकना चाहते हैं। मैं पैसे भेज रहा हूँ। भाई परमेश्वर, तुम तहसील और जिला कार्यालय में पैमाइश के लिए आवेदन लगा देना। सरकारी कागज में जो जमीन पिताजी नाम है, उसे कोई जबरदस्ती नहीं छीन सकता। समझदारी से काम करना। चिंता मत करना।"
परमेश्वर ने बड़े भाई की सलाह मानी और तहसील और जिला कार्यालय में आवेदन कर दिया।
एक गोधूलि बेला में सुखेश्वरी ने फलेश्वर से कहा—
"कहो जी... ये गिद्ध जैसी निगाह वाले लोग कहीं हमारे सपनों की जमीन तो नहीं छीन लेंगे?"
कहते-कहते उनकी साँस भारी हो गई।
फलेश्वर ने उन्हें संभालने की कोशिश की—
"कुछ नहीं होगा। कलमेश्वर सब देख लेगा।"
लेकिन सुखेश्वरी का मन शायद आने वाले संकट को महसूस कर चुका था।
कुछ ही दिनों बाद वह इस दुनिया से चली गईं।
माँ की मृत्यु की खबर सुनते ही कलमेश्वर परिवार सहित गाँव पहुँचा।
क्रिया-कर्म पूरा हुआ।
जब शहर लौटने का समय आया, तो पिता की आँखों में अकेलापन था।
कलमेश्वर ने घर की चौखट को देखा।
नीम का पेड़ अब भी खड़ा था।
गाँव की पोखरी सिकुड़कर गंदे नाले जैसी हो चुकी थी।
लेकिन माँ-बाप के हाथों बनाया वह घर अब भी शान से खड़ा था।
आँगन लीपने की जिम्मेदारी अब परमेश्वर की पत्नी दीपेश्वरी ने संभाल ली थी।
कलमेश्वर की आँखें बार-बार भर आतीं।
उसे लगता—माँ कहीं गई ही नहीं है।
रात को वह पत्नी सुलेखेश्वरी के साथ बैठा था।
सुलेखेश्वरी ने पूछा—
"नए दफ्तर में लोग आपके साथ सम्मान से व्यवहार करते हैं?"
कलमेश्वर ने कहा—
"हाँ।"
फिर उसने पूछा—
"क्या आपने वहाँ अपनी पूरी पहचान बताई?"
कलमेश्वर की जुबान कुछ क्षणों के लिए रुक गई।
सुलेखेश्वरी उसकी आँखों में देखते हुए बोली—
"जिस माटी ने तुम्हें चलना सिखाया, उसी का नाम लेने में अगर शर्म आने लगे तो समझ लेना कि सफलता बहुत महँगी पड़ गई।"
कलमेश्वर ने पत्नी का हाथ पकड़कर कहा—
"मुझे माँ, माटी और अपनी पहचान पर नाज है।"
माँ को गुजरे अभी एक साल भी नहीं हुआ था कि एक दिन खबर आई—
"पिताजी गिर पड़े हैं।"
कलमेश्वर तुरंत गाँव पहुँचा।
फलेश्वर की कमर और घुटने में गंभीर चोट आई थी। ऑपरेशन हुआ, लेकिन वे फिर चल नहीं पाए।
एक सुबह कलमेश्वर अपने छोटे भाई परमेश्वर के साथ खेत देखने गया।
खेत के लगभग चौथाई हिस्से पर कब्जा हो चुका था।
सरकारी दस्तावेजों में पूरा खेत अब भी फलेश्वर के नाम दर्ज था।
जबरदस्ती कब्जा किए बैठे लोग हँसते हुए बोले—
"शहर वाले बाबू, गाँव की जमीन बचाने आए हो? अब गाँव पुराने तरीके से नहीं चलता।"
कलमेश्वर ने उस क्षण महसूस किया कि यह लड़ाई केवल आधे बीघे खेत की नहीं है।
यह उसकी माँ की इज्जत, पिता की विरासत और उसकी अपनी पहचान की लड़ाई है।
उसने झुककर एक मुट्ठी मिट्टी उठाया ।
उस मिट्टी में माँ-बाप के पसीने की गंध थी।
उसमें माँ-बाप के सपने थे।
और उसी मिट्टी में जैसे उसकी अपनी पहचान भी दबी हुई थी।
उसने मन ही मन संकल्प लिया—
"अब मैं केवल इस जमीन को नहीं बचाऊँगा। मैं उस सोच से भी लड़ूँगा, जो इंसान की पहचान उसकी जाति, गरीबी और जन्म से तय करती है।"
अगली सुबह की पहली किरण अभी खेतों पर पूरी तरह नहीं उतरी थी।
रात की नमी मेड़ों पर चमक रही थी।
कलमेश्वर देर तक उसी खेत की मेड़ पर खड़ा रहा, जहाँ उसके माता पिता ने पसीना बहाया था ।
उसे बचपन की बात याद आई।
पिता कहा करते थे—
"बेटा, जमीन का टुकड़ा छोटा हो सकता है, लेकिन उसका सम्मान कभी छोटा मत होने देना। आदमी अपनी पहचान धन से नहीं, अपनी जड़ों से पाता है।"
आज उसे उन शब्दों का अर्थ समझ में आ रहा था।
घर लौटकर उसने पिता से पूछा—
"बाबूजी, खेत में कब्जा देखकर मन बहुत दुखी हुआ।"
फलेश्वर ने गहरी साँस ली।
"बेटा, नीयत आज नहीं बदली। तुम जब पढ़ना शुरू किए थे, तभी से हम अपने हिस्से के सम्मान के लिए लड़ रहे हैं।"
कलमेश्वर ने पिता का हाथ पकड़ लिया।
"बाबूजी, अब आप चिंता मत कीजिए।"
शाम तक गाँव के कुछ बुजुर्ग घर आए।
किसी ने कहा—
"बेटा, समझौता कर लो।"
दूसरे ने कहा—
"गाँव-परिवार से उलझना ठीक नहीं।"
कलमेश्वर सब सुनता रहा।
फिर शांत स्वर में बोला—
"अगर अन्याय का पहला कदम स्वीकार कर लिया जाए, तो अगला कदम पूरा घर निगल जाता है।"
कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया।
अगली सुबह कलमेश्वर पुराने प्राथमिक विद्यालय पहुँचा।
मड़ई में आज भी स्कूल चल रहा था।
दीवार पर लिखा था—
"शासकीय प्राथमिक पाठशाला"
कलमेश्वर को याद आया कि कभी यही विद्यालय 'हरिजन प्राथमिक पाठशाला' के नाम से जाना जाता था, जहां से मैंने पाँचवी तक की पढ़ाई किया था l
वहीं उसे अपने पुराने गुरूजी श्यामचरण मिले।
गुरुजी ने गौर से देखकर और पूछे —
"पहचाना मुझे?"
कलमेश्वर झुककर प्रणाम कर बोला—
"गुरुजी, आपको कैसे भूल सकता हूँ?"
गुरुजी मुस्कराए—
"अफसर बन गए हो, लेकिन हमारी आँखों में आज भी वही पुराना लड़का-कलमेश्वर दिखाई देता है।"
दोनों कुछ देर विद्यालय को देखते रहे।
फिर कलमेश्वर गुरुजी को प्रणाम कर घर लौट आया।
पिता खटिया पर बैठे उसका इंतजार कर रहे थे।
उन्होंने कहा—
"बेटा, जानता हो तेरी माँ आखिरी समय क्या कह रही थी?"
कलमेश्वर की आँखें भर आईं।
"नहीं बाबूजी।"
फलेश्वर ने कहा—
"वह कह रही थी—'हम गरीब हैं, इसलिए लोग हमारी जमीन छीन सकते हैं, हमारा सम्मान नहीं। सम्मान तभी जाएगा, जब हमारा बेटा अपनी पहचान भूल जाएगा।'"
कलमेश्वर ने पिता का हाथ पकड़ लिया।
"बाबूजी, अब ऐसा नहीं होगा।"
अगले दिन कलमेश्वर तहसील पहुँचा।
पुराने कागज निकाले गए।
नक्शे देखे गए।
कर्मचारियों ने पहले टालमटोल की।
एक बाबू ने धीमे स्वर में कहा—
"काम जल्दी कराना है तो... कुछ व्यवस्था करनी पड़ेगी।"
कलमेश्वर ने उसकी आँखों में देखकर कहा—
"व्यवस्था बदलने की जरूरत है, भ्रष्टाचार का हिस्सा बनने की नहीं।"
कमरे में बैठे लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
गाँव लौटते समय कलमेश्वर ने देखा कि कई खेत बंजर पड़े हैं।
युवा शहरों की ओर जा चुके थे।
बुजुर्ग और महिलाएँ ही खेती संभाल रहे थे।
उसने सोचा—
"जिस मिट्टी ने लाखों लोगों का पेट भरा, आज वही अपने बच्चों के बिना अकेली खड़ी है।"
धीरे-धीरे उसने गाँव के युवाओं को संगठित करना शुरू किया।
किसी ने बेरोजगारी की बात की।
किसी ने शिक्षा की।
किसी ने जातिगत भेदभाव की।
कलमेश्वर ने महसूस किया—
समस्याएँ अलग-अलग हैं, लेकिन दर्द एक ही है—सम्मान का।
उसने युवाओं की बैठक बुलाई।
कहा—
"हमारी सबसे बड़ी गरीबी केवल पैसा नहीं, हमारा बँटवारा है। जब तक हम जाति, टोले और ऊँच-नीच में बँटे रहेंगे, कोई भी हमारा अधिकार छीन सकता है।"
कुछ लोगों ने तालियाँ बजाईं।
कुछ लोग नाराज हुए।
लेकिन बदलाव की पहली आहट सुनाई दे चुकी थी।
यह बात उन लोगों को पसंद नहीं आई, जिनका प्रभाव डर और विभाजन पर टिका हुआ था।
एक रात फलेश्वर के दरवाजे पर पत्थर फेंके गए।
दीवार पर लिखा था—
" नेतागिरी बंद करो। गांव की मुखिया गिरी नहीं चलेगी l
सुबह गाँव में खबर फैल गई।
फलेश्वर तख्त पर बैठे-बैठे गुस्से में बहुत कुछ कहते रहे।
कलमेश्वर ने पानी डालकर दीवार पर लिखे शब्द मिटा दिए।
उसने पूछा—
"बाबूजी, डर नहीं लगता?"
फलेश्वर मुस्कराए।
"जिसने भूख देखी हो, अपमान सहा हो और गरीबी तथा जातिवाद की आग में जीवन बिताया हो... उसे धमकियों से डर नहीं लगता बेटा।"
कुछ दिनों बाद राजस्व विभाग की टीम गाँव पहुँची।
नाप-जोख हुई।
पुराने अभिलेखों से स्पष्ट हो गया कि खेत पर अवैध कब्जा किया गया था।
अवैध कब्जा हटाया गया।
जब राजस्व टीम ने घर की घरोही की नाप-जोख शुरू की तो अग्निकुमार का जबरिया कब्जा भी सामने आ गया।
अग्निकुमार ने फलेश्वर के पैर पकड़ लिए।
लेकिन फलेश्वर ने उसे उठाते हुए कहा—
"कानून अपना काम करेगा। किसी से दुश्मनी नहीं चाहिए।"
कलमेश्वर पिता को देखता रह गया।
उसने समझा—न्याय का अर्थ बदला लेना नहीं, अधिकार वापस पाना है।
लेकिन कलमेश्वर जानता था—
यह जीत अंत नहीं, शुरुआत है।
जमीन वापस मिल सकती है, लेकिन समाज की सोच बदलना कहीं अधिक कठिन है।
उस शाम वह अकेला खेत में गया।
डूबते सूरज की लालिमा मिट्टी पर बिखरी हुई थी।
उसने झुककर एक मुट्ठी मिट्टी उठाई।
इस बार उसे लगा, जैसे मिट्टी उससे कह रही हो—
"पहचान केवल जन्म से नहीं बनती। अपने लोगों के साथ खड़े होने से बनती है।"
उसी क्षण उसने निर्णय लिया—
वह गाँव के युवाओं को संगठित करेगा।
उन्हें शिक्षा, कौशल और समान अवसर के लिए प्रेरित करेगा।
उसका उद्देश्य स्पष्ट था—
आने वाली पीढ़ी को अपनी पहचान छिपाने की जरूरत न पड़े।
बरसात का मौसम विदा होने लगा था।
खेतों में धान की बालियाँ हवा के साथ झूम रही थीं।
कलमेश्वर ने पंचायत भवन के एक खाली कमरे को पुस्तकालय में बदलने का निर्णय लिया।
कमरा साफ कराया गया।
टूटी अलमारियों की मरम्मत हुई।
शहर से उसने अपनी पुस्तकें भेजीं।
मित्रों से ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रेरक पुस्तकों का सहयोग माँगा।
धीरे-धीरे किताबें आने लगीं।
और देखते-ही-देखते वहाँ एक छोटा-सा जनपुस्तकालय तैयार हो गया।
उद्घाटन के दिन कलमेश्वर ने अपने पिता को ट्राईसाइकिल पर बैठाकर पुस्तकालय तक पहुँचाया।
उसने कहा—
"बाबूजी, इस पुस्तकालय का उद्घाटन आप करेंगे।"
फलेश्वर चौंक गए।
"मैं?"
उन्होंने अपने हाथों को देखते हुए कहा—
"मैं तो अपना नाम भी ठीक से नहीं लिख पाता। मैं पुस्तकालय का उद्घाटन कैसे करूँगा?"
कलमेश्वर मुस्कराया।
"जिसने मुझे जीवन पढ़ाया, उससे बड़ा विद्वान मेरे लिए कोई नहीं है, बाबूजी।"
फलेश्वर की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने दरवाजे की चौखट पर हल्दी और चावल छिड़के।
भगवान बुद्ध और डॉ. भीमराव आंबेडकर के चित्रों के सामने अगरबत्ती जलाई।
फिर मिट्टी को माथे से लगाया और कहा—
"यह घर ज्ञान का है। यहाँ कोई ऊँचा-नीचा नहीं होगा। किताबों को दोस्त बनाओ, ज्ञान हासिल करो और तरक्की करो। मेरी ओर से सभी को मंगलकामनाएँ।"
तालियाँ गूँज उठीं।
धीरे-धीरे गाँव के बच्चे शाम को वहाँ आने लगे।
कोई कविता पढ़ता।
कोई कहानी।
कोई प्रेरक पुस्तक पढ़ता।
कोई कौशल सीखता।
कोई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता।
युवा और बुजुर्ग भी डॉ. भीमराव आंबेडकर, कबीर, प्रेमचंद, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और भारतीय संविधान को पढ़ने लगे।
पहली बार अलग-अलग बस्तियों के बच्चे और युवक एक ही चटाई पर बैठकर पढ़ रहे थे।
यह दृश्य गाँव के लिए नया था।
कुछ लोगों को यह प्रयास अच्छा नहीं लगा।
कुछ दबंग लोगों ने कलमेश्वर से कहा—
"तुम बच्चों को बराबरी सिखा रहे हो। इससे व्यवस्था बिगड़ जाएगी।"
कलमेश्वर ने विनम्रता से उत्तर दिया—
"जो व्यवस्था इंसान को इंसान से छोटा बना दे, उसका बिगड़ना ही समाज का बनना है।"
लेकिन परिवर्तन का रास्ता आसान नहीं था।
कई अड़चनें खड़ी की गईं।
एक रात पुस्तकालय का ताला तोड़ दिया गया।
कई किताबें फाड़ दी गईं।
सुबह बच्चे रो रहे थे।
कलमेश्वर कुछ देर तक फटी हुई किताबों को देखता रहा।
उसके भीतर आग जल रही थी, लेकिन चेहरे पर शांति थी।
उसने बच्चों से कहा—
"जिस विचार से लोग डरते हैं, सबसे पहले उसी पर हमला करते हैं। इसका मतलब है कि किताबें हार नहीं रही हैं... वे जीत रही हैं।"
उस दिन गाँव के युवाओं ने मिलकर पुस्तकालय फिर व्यवस्थित किया।
शहर से और किताबें आईं।
इस बार पहले से भी अधिक।
इसी बीच जिला प्रशासन ने गाँव में "सामुदायिक शिक्षा एवं सामाजिक समरसता" विषय पर एक कार्यक्रम आयोजित किया।
कलमेश्वर को मुख्य वक्ता बनने का निमंत्रण मिला।
कार्यक्रम में अधिकारी, शिक्षक, ग्रामीण और बड़ी संख्या में युवा उपस्थित थे।
कलमेश्वर ने मंच पर पहुँचकर कहा—
"आज मैं किसी अधिकारी के रूप में नहीं, एक खेतिहर मजदूर के बेटे के रूप में बोल रहा हूँ।
मैं उस माँ-बाप का बेटा हूँ, जिन्होंने अभाव में रहकर मुझे पढ़ाया। मैं इसी मिट्टी का बेटा हूँ, जिसे कभी मेरी पहचान छोटा करने के लिए इस्तेमाल किया गया।
एक समय था, जब मैं अपने गाँव का नाम लेने से हिचकता था। आज मैं गर्व से कहता हूँ—मेरी सबसे बड़ी डिग्री मेरे माँ-बाप हैं और मेरी सबसे बड़ी पहचान मेरी माटी है।"
तालियों की गूँज पूरे मैदान में फैल गई।
माँ सुखेश्वरी इस दुनिया में नहीं थीं।
मंच के सामने ट्राईसाइकिल पर बैठे पिता फलेश्वर गमछे से अपनी आँखें पोंछ रहे थे।
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद एक छोटा-सा लड़का कलमेश्वर के पास आया।
उसने संकोच से पूछा—
"भैया... क्या मैं भी आपकी तरह बड़ा आदमी बन सकता हूँ?"
कलमेश्वर घुटनों के बल बैठ गया।
उसने बच्चे के कंधे पर हाथ रखा।
और कहा—
"बड़ा आदमी बनने की कोशिश मत करना। अच्छा इंसान बनना। बड़ा आदमी तो समाज बना देता है, लेकिन अच्छा इंसान केवल संस्कार बनाते हैं।"
पास बैठे फलेश्वर मुस्कराए।
उन्हें लगा जैसे सुखेश्वरी की आवाज फिर सुनाई दे रही है।
समय बीतता गया।
पुस्तकालय अब अध्ययन केंद्र बन चुका था।
कई बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हुए।
लड़कियों ने भी सफलता के झंडे गाड़े।
कुछ युवाओं को रोजगार मिला कुछ ने स्वरोजगार शुरू किया ।
गाँव के लोगों में संवाद बढ़ा।
बच्चे एक साथ खेलने लगे।
धीरे-धीरे टोले की दीवारें कमजोर पड़ने लगीं।
गाँव में एक नई हवा चलने लगी।
यह बदलाव केवल विकास का नहीं था।
यह विश्वास का बदलाव था।
एक शाम फलेश्वर ट्राईसाइकिल पर बैठे डूबते सूरज को देख रहे थे।
कलमेश्वर उनके पास जाकर बैठ गया।
फलेश्वर ने अंगूठे से मिट्टी खोदी।
एक मुट्ठी माटी उठाकर,उन्होंने पूछा—
"बेटा, याद है... बचपन में तू इस मिट्टी से खिलौने बनाया करता था?"
कलमेश्वर मुस्कराया—
"हाँ बाबूजी।"
फलेश्वर ने कहा—
"आज बेटा तुमने इसी मिट्टी से इंसान बनाने का काम शुरू किया है।"
दोनों कुछ क्षण मौन रहे।
फिर फलेश्वर बोले—
"तेरी माँ तो स्वर्गवासी हो चुकी है। जब मैं नहीं रहूँगा, तब भी इस घर को मत छोड़ना। घर केवल दीवारों से नहीं, यादों से बनता है। और आदमी की पहचान उसके कपड़ों, पद या शहर से नहीं... उसकी जड़ों से होती है।"
कलमेश्वर कुछ बोल नहीं पाया।
उसने पिता के चरण छुए।
कुछ वर्ष बाद फलेश्वर भी इस दुनिया से विदा हो गए।
उनकी अंतिम इच्छा थी—
"मेरी चिता की राख खेत की मिट्टी में भी मिला देना। मैं उसी मिट्टी में मिलना चाहता हूँ, जिसने मुझे और मेरे परिवार को संभाला।"
कलमेश्वर ने पिता की अंतिम इच्छा पूरी की।
खेत की मेड़ पर खड़े होकर उसने मिट्टी को माथे से लगाया।
उसकी आँखें बंद थीं।
उसे लगा—
माँ और पिता कहीं गए नहीं हैं।
वे इसी माटी में हैं।
हर पौधे में हैं।
हर बच्चे की मुस्कान में हैं।
और उस पुस्तकालय की हर किताब के पन्ने में हैं, जो किसी मनुष्य को उसकी वास्तविक पहचान से परिचित कराती है।
कलमेश्वर अब समझ चुका था—
माँ-बाप जन्म देते हैं।
माटी जड़ देती है।
संस्कार जीवन को दिशा देते हैं।
और पहचान वही पाता है, जो अपनी जड़ों, अपने माँ-बाप और अपनी माटी का सम्मान करना जानता है।
वह खेत की मेड़ पर खड़ा था।
सूरज डूब रहा था।
दूर गाँव के पुस्तकालय की खिड़की से रोशनी बाहर आ रही थी।
कुछ बच्चे अभी भी पढ़ रहे थे।
कलमेश्वर ने उस रोशनी को देखा और मुस्करा दिया।
उसे लगा, माँ का दीपक अब भी जल रहा है।
जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि ऊँचा पद, बड़ा घर या प्रसिद्धि नहीं है।
सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि मनुष्य अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और सफलता की ऊँचाइयों पर पहुँचकर उन हाथों को न भूले, जिन्होंने उसे चलना सिखाया।
माँ-बाप का त्याग,
माटी का ऋण,
मातृभूमि का सम्मान
और अपनी पहचान पर गर्व—
यही एक संवेदनशील और सभ्य समाज की वास्तविक नींव है।
क्योंकि आदमी कितना भी बड़ा हो जाए,
उसकी असली ऊँचाई उसकी जड़ों से ही तय होती है।
आज उसे उन शब्दों का अर्थ समझ में आ रहा था।
घर लौटकर उसने पिता से पूछा—
"बाबूजी, खेत में कब्जा देखकर मन बहुत दुखी हुआ।"
फलेश्वर ने गहरी साँस ली।
"बेटा, नीयत आज नहीं बदली। तुम जब पढ़ना शुरू किए थे, तभी से हम अपने हिस्से के सम्मान के लिए लड़ रहे हैं।"
कलमेश्वर ने पिता का हाथ पकड़ लिया।
"बाबूजी, अब आप चिंता मत कीजिए।"
शाम तक गाँव के कुछ बुजुर्ग घर आए।
किसी ने कहा—
"बेटा, समझौता कर लो।"
दूसरे ने कहा—
"गाँव-परिवार से उलझना ठीक नहीं।"
कलमेश्वर सब सुनता रहा।
फिर शांत स्वर में बोला—
"अगर अन्याय का पहला कदम स्वीकार कर लिया जाए, तो अगला कदम पूरा घर निगल जाता है।"
कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया।
अगली सुबह कलमेश्वर पुराने प्राथमिक विद्यालय पहुँचा।
मड़ई में आज भी स्कूल चल रहा था।
दीवार पर लिखा था—
"शासकीय प्राथमिक पाठशाला"
कलमेश्वर को याद आया कि कभी यही विद्यालय 'हरिजन प्राथमिक पाठशाला' के नाम से जाना जाता था, जहां से मैंने पाँचवी तक की पढ़ाई किया था l
वहीं उसे अपने पुराने गुरूजी श्यामचरण मिले।
गुरुजी ने गौर से देखकर और पूछे —
"पहचाना मुझे?"
कलमेश्वर झुककर प्रणाम कर बोला—
"गुरुजी, आपको कैसे भूल सकता हूँ?"
गुरुजी मुस्कराए—
"अफसर बन गए हो, लेकिन हमारी आँखों में आज भी वही पुराना लड़का-कलमेश्वर दिखाई देता है।"
दोनों कुछ देर विद्यालय को देखते रहे।
फिर कलमेश्वर गुरुजी को प्रणाम कर घर लौट आया।
पिता खटिया पर बैठे उसका इंतजार कर रहे थे।
उन्होंने कहा—
"बेटा, जानता हो तेरी माँ आखिरी समय क्या कह रही थी?"
कलमेश्वर की आँखें भर आईं।
"नहीं बाबूजी।"
फलेश्वर ने कहा—
"वह कह रही थी—'हम गरीब हैं, इसलिए लोग हमारी जमीन छीन सकते हैं, हमारा सम्मान नहीं। सम्मान तभी जाएगा, जब हमारा बेटा अपनी पहचान भूल जाएगा।'"
कलमेश्वर ने पिता का हाथ पकड़ लिया।
"बाबूजी, अब ऐसा नहीं होगा।"
अगले दिन कलमेश्वर तहसील पहुँचा।
पुराने कागज निकाले गए।
नक्शे देखे गए।
कर्मचारियों ने पहले टालमटोल की।
एक बाबू ने धीमे स्वर में कहा—
"काम जल्दी कराना है तो... कुछ व्यवस्था करनी पड़ेगी।"
कलमेश्वर ने उसकी आँखों में देखकर कहा—
"व्यवस्था बदलने की जरूरत है, भ्रष्टाचार का हिस्सा बनने की नहीं।"
कमरे में बैठे लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
गाँव लौटते समय कलमेश्वर ने देखा कि कई खेत बंजर पड़े हैं।
युवा शहरों की ओर जा चुके थे।
बुजुर्ग और महिलाएँ ही खेती संभाल रहे थे।
उसने सोचा—
"जिस मिट्टी ने लाखों लोगों का पेट भरा, आज वही अपने बच्चों के बिना अकेली खड़ी है।"
धीरे-धीरे उसने गाँव के युवाओं को संगठित करना शुरू किया।
किसी ने बेरोजगारी की बात की।
किसी ने शिक्षा की।
किसी ने जातिगत भेदभाव की।
कलमेश्वर ने महसूस किया—
समस्याएँ अलग-अलग हैं, लेकिन दर्द एक ही है—सम्मान का।
उसने युवाओं की बैठक बुलाई।
कहा—
"हमारी सबसे बड़ी गरीबी केवल पैसा नहीं, हमारा बँटवारा है। जब तक हम जाति, टोले और ऊँच-नीच में बँटे रहेंगे, कोई भी हमारा अधिकार छीन सकता है।"
कुछ लोगों ने तालियाँ बजाईं।
कुछ लोग नाराज हुए।
लेकिन बदलाव की पहली आहट सुनाई दे चुकी थी।
यह बात उन लोगों को पसंद नहीं आई, जिनका प्रभाव डर और विभाजन पर टिका हुआ था।
एक रात फलेश्वर के दरवाजे पर पत्थर फेंके गए।
दीवार पर लिखा था—
" नेतागिरी बंद करो। गांव की मुखिया गिरी नहीं चलेगी l
सुबह गाँव में खबर फैल गई।
फलेश्वर तख्त पर बैठे-बैठे गुस्से में बहुत कुछ कहते रहे।
कलमेश्वर ने पानी डालकर दीवार पर लिखे शब्द मिटा दिए।
उसने पूछा—
"बाबूजी, डर नहीं लगता?"
फलेश्वर मुस्कराए।
"जिसने भूख देखी हो, अपमान सहा हो और गरीबी तथा जातिवाद की आग में जीवन बिताया हो... उसे धमकियों से डर नहीं लगता बेटा।"
कुछ दिनों बाद राजस्व विभाग की टीम गाँव पहुँची।
नाप-जोख हुई।
पुराने अभिलेखों से स्पष्ट हो गया कि खेत पर अवैध कब्जा किया गया था।
अवैध कब्जा हटाया गया।
जब राजस्व टीम ने घर की घरोही की नाप-जोख शुरू की तो अग्निकुमार का जबरिया कब्जा भी सामने आ गया।
अग्निकुमार ने फलेश्वर के पैर पकड़ लिए।
लेकिन फलेश्वर ने उसे उठाते हुए कहा—
"कानून अपना काम करेगा। किसी से दुश्मनी नहीं चाहिए।"
कलमेश्वर पिता को देखता रह गया।
उसने समझा—न्याय का अर्थ बदला लेना नहीं, अधिकार वापस पाना है।
लेकिन कलमेश्वर जानता था—
यह जीत अंत नहीं, शुरुआत है।
जमीन वापस मिल सकती है, लेकिन समाज की सोच बदलना कहीं अधिक कठिन है।
उस शाम वह अकेला खेत में गया।
डूबते सूरज की लालिमा मिट्टी पर बिखरी हुई थी।
उसने झुककर एक मुट्ठी मिट्टी उठाई।
इस बार उसे लगा, जैसे मिट्टी उससे कह रही हो—
"पहचान केवल जन्म से नहीं बनती। अपने लोगों के साथ खड़े होने से बनती है।"
उसी क्षण उसने निर्णय लिया—
वह गाँव के युवाओं को संगठित करेगा।
उन्हें शिक्षा, कौशल और समान अवसर के लिए प्रेरित करेगा।
उसका उद्देश्य स्पष्ट था—
आने वाली पीढ़ी को अपनी पहचान छिपाने की जरूरत न पड़े।
बरसात का मौसम विदा होने लगा था।
खेतों में धान की बालियाँ हवा के साथ झूम रही थीं।
कलमेश्वर ने पंचायत भवन के एक खाली कमरे को पुस्तकालय में बदलने का निर्णय लिया।
कमरा साफ कराया गया।
टूटी अलमारियों की मरम्मत हुई।
शहर से उसने अपनी पुस्तकें भेजीं।
मित्रों से ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रेरक पुस्तकों का सहयोग माँगा।
धीरे-धीरे किताबें आने लगीं।
और देखते-ही-देखते वहाँ एक छोटा-सा जनपुस्तकालय तैयार हो गया।
उद्घाटन के दिन कलमेश्वर ने अपने पिता को ट्राईसाइकिल पर बैठाकर पुस्तकालय तक पहुँचाया।
उसने कहा—
"बाबूजी, इस पुस्तकालय का उद्घाटन आप करेंगे।"
फलेश्वर चौंक गए।
"मैं?"
उन्होंने अपने हाथों को देखते हुए कहा—
"मैं तो अपना नाम भी ठीक से नहीं लिख पाता। मैं पुस्तकालय का उद्घाटन कैसे करूँगा?"
कलमेश्वर मुस्कराया।
"जिसने मुझे जीवन पढ़ाया, उससे बड़ा विद्वान मेरे लिए कोई नहीं है, बाबूजी।"
फलेश्वर की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने दरवाजे की चौखट पर हल्दी और चावल छिड़के।
भगवान बुद्ध और डॉ. भीमराव आंबेडकर के चित्रों के सामने अगरबत्ती जलाई।
फिर मिट्टी को माथे से लगाया और कहा—
"यह घर ज्ञान का है। यहाँ कोई ऊँचा-नीचा नहीं होगा। किताबों को दोस्त बनाओ, ज्ञान हासिल करो और तरक्की करो। मेरी ओर से सभी को मंगलकामनाएँ।"
तालियाँ गूँज उठीं।
धीरे-धीरे गाँव के बच्चे शाम को वहाँ आने लगे।
कोई कविता पढ़ता।
कोई कहानी।
कोई प्रेरक पुस्तक पढ़ता।
कोई कौशल सीखता।
कोई प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता।
युवा और बुजुर्ग भी डॉ. भीमराव आंबेडकर, कबीर, प्रेमचंद, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और भारतीय संविधान को पढ़ने लगे।
पहली बार अलग-अलग बस्तियों के बच्चे और युवक एक ही चटाई पर बैठकर पढ़ रहे थे।
यह दृश्य गाँव के लिए नया था।
कुछ लोगों को यह प्रयास अच्छा नहीं लगा।
कुछ दबंग लोगों ने कलमेश्वर से कहा—
"तुम बच्चों को बराबरी सिखा रहे हो। इससे व्यवस्था बिगड़ जाएगी।"
कलमेश्वर ने विनम्रता से उत्तर दिया—
"जो व्यवस्था इंसान को इंसान से छोटा बना दे, उसका बिगड़ना ही समाज का बनना है।"
लेकिन परिवर्तन का रास्ता आसान नहीं था।
कई अड़चनें खड़ी की गईं।
एक रात पुस्तकालय का ताला तोड़ दिया गया।
कई किताबें फाड़ दी गईं।
सुबह बच्चे रो रहे थे।
कलमेश्वर कुछ देर तक फटी हुई किताबों को देखता रहा।
उसके भीतर आग जल रही थी, लेकिन चेहरे पर शांति थी।
उसने बच्चों से कहा—
"जिस विचार से लोग डरते हैं, सबसे पहले उसी पर हमला करते हैं। इसका मतलब है कि किताबें हार नहीं रही हैं... वे जीत रही हैं।"
उस दिन गाँव के युवाओं ने मिलकर पुस्तकालय फिर व्यवस्थित किया।
शहर से और किताबें आईं।
इस बार पहले से भी अधिक।
इसी बीच जिला प्रशासन ने गाँव में "सामुदायिक शिक्षा एवं सामाजिक समरसता" विषय पर एक कार्यक्रम आयोजित किया।
कलमेश्वर को मुख्य वक्ता बनने का निमंत्रण मिला।
कार्यक्रम में अधिकारी, शिक्षक, ग्रामीण और बड़ी संख्या में युवा उपस्थित थे।
कलमेश्वर ने मंच पर पहुँचकर कहा—
"आज मैं किसी अधिकारी के रूप में नहीं, एक खेतिहर मजदूर के बेटे के रूप में बोल रहा हूँ।
मैं उस माँ-बाप का बेटा हूँ, जिन्होंने अभाव में रहकर मुझे पढ़ाया। मैं इसी मिट्टी का बेटा हूँ, जिसे कभी मेरी पहचान छोटा करने के लिए इस्तेमाल किया गया।
एक समय था, जब मैं अपने गाँव का नाम लेने से हिचकता था। आज मैं गर्व से कहता हूँ—मेरी सबसे बड़ी डिग्री मेरे माँ-बाप हैं और मेरी सबसे बड़ी पहचान मेरी माटी है।"
तालियों की गूँज पूरे मैदान में फैल गई।
माँ सुखेश्वरी इस दुनिया में नहीं थीं।
मंच के सामने ट्राईसाइकिल पर बैठे पिता फलेश्वर गमछे से अपनी आँखें पोंछ रहे थे।
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद एक छोटा-सा लड़का कलमेश्वर के पास आया।
उसने संकोच से पूछा—
"भैया... क्या मैं भी आपकी तरह बड़ा आदमी बन सकता हूँ?"
कलमेश्वर घुटनों के बल बैठ गया।
उसने बच्चे के कंधे पर हाथ रखा।
और कहा—
"बड़ा आदमी बनने की कोशिश मत करना। अच्छा इंसान बनना। बड़ा आदमी तो समाज बना देता है, लेकिन अच्छा इंसान केवल संस्कार बनाते हैं।"
पास बैठे फलेश्वर मुस्कराए।
उन्हें लगा जैसे सुखेश्वरी की आवाज फिर सुनाई दे रही है।
समय बीतता गया।
पुस्तकालय अब अध्ययन केंद्र बन चुका था।
कई बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हुए।
लड़कियों ने भी सफलता के झंडे गाड़े।
कुछ युवाओं को रोजगार मिला कुछ ने स्वरोजगार शुरू किया ।
गाँव के लोगों में संवाद बढ़ा।
बच्चे एक साथ खेलने लगे।
धीरे-धीरे टोले की दीवारें कमजोर पड़ने लगीं।
गाँव में एक नई हवा चलने लगी।
यह बदलाव केवल विकास का नहीं था।
यह विश्वास का बदलाव था।
एक शाम फलेश्वर ट्राईसाइकिल पर बैठे डूबते सूरज को देख रहे थे।
कलमेश्वर उनके पास जाकर बैठ गया।
फलेश्वर ने अंगूठे से मिट्टी खोदी।
एक मुट्ठी माटी उठाकर,उन्होंने पूछा—
"बेटा, याद है... बचपन में तू इस मिट्टी से खिलौने बनाया करता था?"
कलमेश्वर मुस्कराया—
"हाँ बाबूजी।"
फलेश्वर ने कहा—
"आज बेटा तुमने इसी मिट्टी से इंसान बनाने का काम शुरू किया है।"
दोनों कुछ क्षण मौन रहे।
फिर फलेश्वर बोले—
"तेरी माँ तो स्वर्गवासी हो चुकी है। जब मैं नहीं रहूँगा, तब भी इस घर को मत छोड़ना। घर केवल दीवारों से नहीं, यादों से बनता है। और आदमी की पहचान उसके कपड़ों, पद या शहर से नहीं... उसकी जड़ों से होती है।"
कलमेश्वर कुछ बोल नहीं पाया।
उसने पिता के चरण छुए।
कुछ वर्ष बाद फलेश्वर भी इस दुनिया से विदा हो गए।
उनकी अंतिम इच्छा थी—
"मेरी चिता की राख खेत की मिट्टी में भी मिला देना। मैं उसी मिट्टी में मिलना चाहता हूँ, जिसने मुझे और मेरे परिवार को संभाला।"
कलमेश्वर ने पिता की अंतिम इच्छा पूरी की।
खेत की मेड़ पर खड़े होकर उसने मिट्टी को माथे से लगाया।
उसकी आँखें बंद थीं।
उसे लगा—
माँ और पिता कहीं गए नहीं हैं।
वे इसी माटी में हैं।
हर पौधे में हैं।
हर बच्चे की मुस्कान में हैं।
और उस पुस्तकालय की हर किताब के पन्ने में हैं, जो किसी मनुष्य को उसकी वास्तविक पहचान से परिचित कराती है।
कलमेश्वर अब समझ चुका था—
माँ-बाप जन्म देते हैं।
माटी जड़ देती है।
संस्कार जीवन को दिशा देते हैं।
और पहचान वही पाता है, जो अपनी जड़ों, अपने माँ-बाप और अपनी माटी का सम्मान करना जानता है।
वह खेत की मेड़ पर खड़ा था।
सूरज डूब रहा था।
दूर गाँव के पुस्तकालय की खिड़की से रोशनी बाहर आ रही थी।
कुछ बच्चे अभी भी पढ़ रहे थे।
कलमेश्वर ने उस रोशनी को देखा और मुस्करा दिया।
उसे लगा, माँ का दीपक अब भी जल रहा है।
जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि ऊँचा पद, बड़ा घर या प्रसिद्धि नहीं है।
सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि मनुष्य अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और सफलता की ऊँचाइयों पर पहुँचकर उन हाथों को न भूले, जिन्होंने उसे चलना सिखाया।
माँ-बाप का त्याग,
माटी का ऋण,
मातृभूमि का सम्मान
और अपनी पहचान पर गर्व—
यही एक संवेदनशील और सभ्य समाज की वास्तविक नींव है।
क्योंकि आदमी कितना भी बड़ा हो जाए,
उसकी असली ऊँचाई उसकी जड़ों से ही तय होती है।
नन्दलाल भारती
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