लघुकथा: कर्जदार
माफ़ करना भाई, मेरी गलती थी पर अफ़सोस नहीं है मुझे अपनी गलती l अपने परिवार के साथ तुम्हें और तुम्हारे परिवार को पीठ पर लादे रहा l माँ -बाप की तरह तुम्हारा और तुम्हारे अपनों का अपना बनाया और तुम्हारे सपनों को साकार करने में तन-मन और धन का त्याग किया l तुम्हारे सपनों के रंग भी उभरे, जमाने के देखने लायक, तुम्हारी पहचान उभरी, मुझे गुमान भी हुआ l
तुम्हारी तरक्की को देखकर, मैं बावरा समझा मैं अपने मकसद में सफल हो गया,तुम्हारी तरक्की पर मुझे उतनी ही खुशी है जितना एक माँ-बाप को अपने बच्चों की तरक्की पर होती है l
अफ़सोस मुफ्त की तरक्की के मद में तुमने गदहे की तरह दुलती मेरे ही मुंह पर मार दिया l मैं शर्मिंदा तो नहीं हूँ अपनी गलती पर खुश तो बहुत हूँ इसलिए कि किसी जन्म का तुम्हारा क़र्ज़ मुझ पर उधार था शायद अब उतर गया होगा l भाई इस जन्म में और किसी कर्ज का कोई भार मेरे उपर मत चढ़ा देना l मेरे मृत-देह को कन्धा देकर कर्जदार मत बना l हाँ, हों सके तो माफ कर देना l
नन्दलाल भारती
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