कहानी:वो आई थी/नन्दलाल भारती
भारतीय संस्कृति के अनुसार रक्षाबन्धन का त्योहार श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह त्योहार भाई-बहन को स्नेह की डोर में बांधता है। इस दिन बहन अपने भाई के मस्तक पर टीका लगाकर रक्षा का बन्धन बांधती है, जिसे राखी के नाम से दुनिया में जाना जाता है l
दंतकथाओं की बात की जाये तो नन्द के नंदलाला ने रक्षाबंधन की शुरुआत किया था l मान्यताओं के अनुसार रक्षाबंधन की शुरुआत द्रौपदी ने कृष्ण की उंगली पर अपनी साड़ी का टुकड़ा बांधा था तब से रक्षाबंधन भाई-बहन के त्यौहार के रूप में मनाया जाता हैl
एक और कथा के अनुसार देवी लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधकर उनसे विष्णु को वापस मांगने का वचन लिया था? क्या सच क्या झूठ इस मुद्दे पर बहस नहीं फिलहाल l कथाओं की सच्चाई की तहकीकात कोई आशय नहीं है l
बौद्ध परंपरा में रक्षाबंधन का उल्लेख सीधे “हिन्दू रक्षाबंधन” के रूप में नहीं मिलता, लेकिन एक कथा है जो बौद्ध धम्म में “रक्षा सूत्र” या “परित्त सूत्र” के रूप में जानी जाती है, और इसी से कुछ लोग रक्षाबंधन की ऐतिहासिक अथवा धार्मिक शुरुआत को जोड़ते हैं।
यह भी माना जाता है कि कुछ भारतीय नारियों अपने पति और साम्राज्य की रक्षाबंधन करने के लिए कुछ आक्रमकारी राजाओं को भी रक्षा सूत्र बांध कर रक्षा का वचन लिया था l खैर आज के राजनितिक एवं धार्मिक पाखंडवाद की बाढ़ से से जितना दूर रहा जाये, जीवन और सकून के लिए ठीक होगा l
क्या कहा गया गया नहीं सच तो आज भी है कि श्रावण माह की पूर्णिमा यानि अगस्त माह के किसी खास दिन आज भी बहनें अपने भाईयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करती हैंl सदियों बाद भी आज भी भाई-बहन के प्यार की पवित्रता बची हुई है l
हाँ तो मैं बात कर रहा रक्षाबंधन की l आज रक्षाबंधन का ही त्यौहार थाl मैं दिन भर इंतजार करता रहा l रक्षाबंधन भाई-बहन के खून की रिश्ते और प्यार के बचपन के सोंधेपन में डूब कर आनंदित होने का दिन होता है l जीवन में एक नई उमंग उत्साह का पवित्र रिश्ता और दिन तो मानता हूँ रक्षाबंधन के इस पवित्र त्यौहार को l
पौराणिक लोक कथाओं के अतिरिक्त बात की जाये तो राजा टीपू सुल्तान, जो राजा अपने साम्राज्य की चिंता न कर तथाकथित शूद्र माँ-बहनों और बेटियों को स्तन ढंकने का अधिकार दिया, दूसरे गोरे अंग्रेज जिन्होंने ने दासीप्रथा पर नकेल कसा और तीसरा हमारे देश का संविधान जिसने संवैधानिक रूप से क्या नर क्या नारी सबको समानता का अधिकार, आज इस पावन त्यौहार के दिन हर भारतीय नारी को इन्हें श्रद्धा के साथ याद करना तो बनता है !
इस त्यौहार की शुरुआत भले ही कैसे से हुई हो पर इस दिन अपनी बहनों के निश्छल स्नेह का सुख जरूर मिलता हूँ l
आज वही पवित्र दिवस था, मेरी खुशियाँ और बढ़ जाती है, जब मेरी किसी भी बहन का रक्षा सूत्र मिल जाता है l मैं अपनी बड़ी बहन से छोटा हूँ, बाकी आधा दर्जन भाई बहनों में दूसरे क्रम का हूँ l
मेरी बड़ी बहन पढ़ी लिखी तो नहीं है,बचपन में ब्याह-गौना हो गया था lगाँव में अपने परिवार के साथ हंसी-खुशी रहने की कोशिश तो करती रहती है पर दुःख से परेशान रहती है परन्तु उसे रिश्ता निभाना बहुत अच्छे से आता हैl कुछ बहनों की राखी तो रक्षाबंधन से पहले आ जाती थी,कभी-कभी तो त्यौहार के दिन कोरियर से मिल जाती थी पर आज किसी की नहीं आयी l
हाँ राखी के सप्ताह भर पहले नारायण सेवा संस्थान से हम दोनों पति-पत्नी के लिए राखी तो आ गयी l मैं अपनी बहनों और उनकी व्यस्तता के बारे में सोच रहा था l इसी बीच बबिता मुख्य दरवाज़े से आयी और मुझसे पूछी अंकलजी आंटी कहीं गयी हैं क्या?
अरे नहीं रे बबिता, कहाँ जायेंगे?
तुरंत दूसरा सवाल दाग दी,राखी बंध गयी अंकलजी जी l
हाँ बंध गई मैं ख़ुशी से बोला था, छोटी रिया बड़ी जिम्मेदारी निभा कर चली गयी l हाथ में एक राखी चाँदी की थी जो बिटिया ने भेजा था और दूसरी भी खूबसूरत और उद्देश्यपरक थी l
राखी की बधाई अंकल जी, आंटी घर में हैं ना l
देविका घर में है मैंने बताया l बबिता आज बहुत खुश थी, मैं कुछ बोलता l
उससे पहले बोली, उपर होगी आंटीजी, मैं मिल आती हूँ l
हाँ उपर........मैं बोला, बबिता तुमने मुझे बातों में उलझा दिया, तुमको भी रक्षाबंधन की बहुत -बहुत बधाई शुभकामनायें l
वह इतनी खुश थी की जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ने लगी, मेरे टैब पर निर्गुण मंद-मंद चल रहा था l ताऊजी को बहुत पसंद था, वे गाते थे, पर जब उदास होते थे तो निर्गुण में खो थे सब कुछ भूल कर l
बबिता पिछले दरवाजे से पत्नी से मिलकर चली गयी मुझे मालूम ही नहीं चला l पत्नी टेरेस गार्डेन की देखरेख कर नीचे आयी तो मैंने पूछा देविका वो आयी थी?
कौन? उसका कोई नाम तो होगा देविका जरा आज स्माइल करते हुए बोली थी l
मैं बात आगे बढ़ाने से पहले बोल दिया-बबिता!
वो कोई और नहीं बबिता थी, अपने भाई के घर राखी बाँधने जा रही थी, कितनी खुश थी बबिता रक्षाबंधन के दिनl बेचारी घरों में झाड़ू-पोंछा लगाकर, बच्चों को पढ़ा लिखा रही है, किराये के कमरे में रहती हैl
पति के अथाह प्यार में बेचारी जवानी गंवा कर अधेड़ उम्र में घिसौनी कर रही है, नालायक, पति दसों साल पहले छोड़कर किसी पराई के साथ भाग गयाl भौजाई है कि फूटी आँख नहीं देखना चाहती l बबिता की हिम्मत देखो, आज भी छलिया के नाम का सिंधुर मांग में रोज सजाती है l
वाकई बहादुर महिला हैं बबिता मैंने बोला था l
देविका बोली जानते हो?
नहीं......भाग्यवान जानकर क्या करना l बबिता खुश हैं,खुश रहे l मैंने भी खुश होते हुए कहा था l
देवेश साहब, वो बबिता है l वैसे भी आज नारी भारी है,अबला नहीं है देविका तनिक व्यंगात्मक ढंग से बोली थी l
मैं अब निरुत्तर था!
दोस्तों इस कहानी में बस इतना ही!
नन्दलाल भारती
09/08/2025
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