Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

विकास के आँकड़े ?

 
आलेख :विकास के आँकड़े मुस्कराते हैं, बस्तियाँ सवाल करती हैंl
— नन्दलाल भारती
कवि, कथाकार एवं सामाजिक चिंतक
******
कहते हैं कि देश के विकास की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री की होती है और गाँव के विकास की जिम्मेदारी ग्राम प्रधान की। बात बिल्कुल सही है। प्रधानमंत्री देश की विकास यात्रा का नेतृत्व करते हैं और ग्राम प्रधान गाँव की स्थानीय विकास प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन विडंबना देखिए कि विकास की चर्चा में आँकड़े अक्सर इतनी ऊँची छलाँग लगाते हैं कि गाँव की धरती पर खड़े अभाव उन्हें दिखाई ही नहीं देते। सरकारी प्रस्तुतियों में विकास की रफ्तार तेज है, योजनाओं की फेहरिस्त लंबी है, उपलब्धियों के पन्ने रंगीन हैं; मगर अनेक दलित और आदिवासी बस्तियों में आज भी बुनियादी सुविधाओं की प्रतीक्षा इतनी लंबी है कि प्रतीक्षा भी मानो एक स्थायी सरकारी योजना बन गई हो।
विकास के दफ्तर में सब कुछ दुरुस्त दिखाई देता है। फाइलों में सड़क बन चुकी है, योजना में आवास स्वीकृत हो चुका है, रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं और सामाजिक समरसता का वातावरण भी तैयार है। लेकिन बस्ती में पहुँचिए तो कोई परिवार छत की प्रतीक्षा में है, किसी का बच्चा संसाधनों के अभाव में पढ़ाई से जूझ रहा है, कोई मजदूर काम की तलाश में भटक रहा है और कोई भूमिहीन परिवार ग्राम समाज की जमीन के होते हुए भी अपने सिर पर छत के लिए आश्वस्त नहीं है। ऐसा लगता है जैसे विकास ने कागज पर अपना घर बना लिया हो, मगर जरूरतमंदों की बस्ती तक पहुँचने का रास्ता भूल गया हो।
और फिर नारा सुनाई देता है—‘सबका साथ, सबका विकास।’ नारा सुंदर है, उद्देश्य भी स्वागतयोग्य है। मगर सवाल है कि क्या सबका विकास केवल नारा बोल देने से हो जाता है? क्या दलितों और आदिवासियों की पीढ़ियों से चली आ रही वंचना भाषण की कुछ पंक्तियों से समाप्त हो जाती है? क्या भूमिहीन परिवारों को जमीन, बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, युवाओं को रोजगार और बेघर लोगों को सुरक्षित आवास केवल आश्वासनों की वर्षा से मिल जाएगा? यदि ऐसा होता, तो देश में योजनाओं से अधिक भाषण और अधिकारों से अधिक घोषणाएँ ही पर्याप्त होतीं।
विडंबना यह भी है कि जब विकास की उपलब्धियाँ गिनाई जाती हैं, तब बड़ी-बड़ी संख्याएँ सामने रख दी जाती हैं; लेकिन जब पूछा जाता है कि किस बस्ती में कितने परिवार अब भी आवासहीन हैं, कितने पात्र भूमिहीन परिवारों को वैधानिक अधिकार मिले, कितने बच्चे शिक्षा से वंचित हैं और कितने श्रमिकों को नियमित आजीविका मिली, तब जवाबदेही का रास्ता कुछ संकरा पड़ता दिखाई देता है। आँकड़े जरूरी हैं, लेकिन आँकड़ों का उद्देश्य वास्तविकता को समझना होना चाहिए, वास्तविकता पर पर्दा डालना नहींl
देश की सरकार हो या ग्राम पंचायत, विकास का मूल्यांकन केवल खर्च की गई राशि और पूर्ण घोषित कार्यों से नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन में आए बदलाव से होना चाहिए। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में राष्ट्रीय नीतियों की सफलता और ग्राम प्रधान के नेतृत्व में स्थानीय विकास की सफलता का वास्तविक परीक्षण उस परिवार की स्थिति से भी होना चाहिए, जिसके पास आज तक सुरक्षित आवास नहीं है; उस बच्चे से भी, जिसे बराबरी का शैक्षिक अवसर नहीं मिला; उस मजदूर से भी, जिसकी मेहनत के बावजूद गरीबी उसका पीछा नहीं छोड़ती।
यह भी जरूरी है कि हर असफलता का दोष किसी एक पद या व्यक्ति पर डालकर समस्या को सरल न बना दिया जाए। भूमि, शिक्षा, रोजगार, आवास और सामाजिक न्याय की जिम्मेदारियाँ कई सरकारी स्तरों तथा विभागों में बँटी हैं। लेकिन जिम्मेदारियों का बँटवारा जवाबदेही से बचने का सुविधाजनक बहाना नहीं बनना चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि किस योजना की जिम्मेदारी किसकी है, किस स्तर पर बाधा है और समाधान की समयसीमा क्या है।
ग्राम समाज की जमीन : अधिकार कहाँ है?
गाँव में सार्वजनिक भूमि मौजूद हो और उसी गाँव का भूमिहीन परिवार आवास के लिए असुरक्षित जीवन जी रहा हो, तो यह केवल आर्थिक विषमता नहीं, नीति और प्रशासन के सामने खड़ा गंभीर सवाल भी है। हर ग्राम समाज की जमीन आवंटन के लिए उपलब्ध नहीं होती, उसके कानूनी उपयोग और संरक्षण के नियम हैं। लेकिन जहाँ कानून पात्र परिवारों को आवासीय पट्टा या अन्य वैध सुविधा देने की अनुमति देता है, वहाँ प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध क्यों न हो?
सार्वजनिक भूमि पर प्रभावशाली कब्जे की शिकायतों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। गरीब परिवार की पात्रता और उसके दावे का निपटारा बिना भेदभाव किया जाना चाहिए। जमीन के अधिकार का प्रश्न किसी समुदाय पर उपकार करने का प्रश्न नहीं, बल्कि कानून और न्याय का प्रश्न है।
जिस व्यवस्था में कमजोर व्यक्ति को अपना अधिकार पाने के लिए बार-बार दरवाजा खटखटाना पड़े, जबकि प्रभावशाली व्यक्ति की आवाज बिना दस्तक सुनी जाती हो, वहाँ सामाजिक न्याय के दावे की समीक्षा आवश्यक है।
सामाजिक समरसता : तस्वीरों से आगे, व्यवहार तक-
सामाजिक समरसता के आयोजन, मंच, भाषण और सामूहिक तस्वीरें अपने स्थान पर हैं; लेकिन समरसता की असली परीक्षा रोजमर्रा के व्यवहार में होती है। क्या प्रत्येक बस्ती को समान सुविधाएँ मिलती हैं? क्या हर बच्चे को बराबरी का सम्मान मिलता है? क्या सार्वजनिक संसाधनों तक सभी की समान पहुँच है? क्या किसी व्यक्ति को उसकी जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण अपमानित नहीं होना पड़ता?
यदि समरसता केवल समारोहों में दिखाई दे और सामाजिक जीवन में भेदभाव बना रहे, तो तस्वीर भले सुंदर हो, समाज की वास्तविक तस्वीर अधूरी ही रहेगी।
समरसता का अर्थ कमजोर को शक्तिशाली की कृपा पर छोड़ देना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण तैयार करना है जहाँ हर नागरिक अपने अधिकारों के साथ खड़ा हो सके। संविधान की समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व की भावना को ग्रामसभा, विद्यालय, पंचायत और सामाजिक व्यवहार में उतारना होगा।
नारा नहीं, जवाब चाहिए-
‘सबका साथ, सबका विकास’ तभी सार्थक होगा, जब विकास की गिनती में वे लोग भी दिखाई देंगे जो अब तक हाशिये पर खड़े रहे हैं। दलितों और आदिवासियों का विकास किसी राजनीतिक नारे की कृपा नहीं, उनका संवैधानिक अधिकार और लोकतांत्रिक न्याय का अनिवार्य हिस्सा है।
अब ग्राम पंचायतों में बस्तीवार विकास का लेखा-जोखा सार्वजनिक होना चाहिए। आवासहीन परिवारों, पात्र भूमिहीनों, विद्यालय से बाहर बच्चों, रोजगार की जरूरत वाले श्रमिकों और बुनियादी सुविधाओं से वंचित बस्तियों की वास्तविक स्थिति सामने आनी चाहिए। ग्रामसभा में प्रश्न पूछे जाएँ, योजनाओं का सामाजिक अंकेक्षण हो और संबंधित अधिकारियों तथा जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी तय हो।
प्रधानमंत्री से लेकर ग्राम प्रधान तक विकास का दावा करने वालों को यह समझना होगा कि विकास की असली कसौटी मंच पर चमकता आँकड़ा नहीं, उस नागरिक का जीवन है जिसके पास अभी भी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।
क्योंकि विकास का विज्ञापन जितना चमकदार होगा, जवाबदेही का आईना भी उतना ही साफ होना चाहिए।
और जब तक किसी दलित या आदिवासी बस्ती का बच्चा शिक्षा, किसी भूमिहीन परिवार का सदस्य सम्मानजनक आवास और किसी श्रमिक को रोजगार के लिए विवश संघर्ष करना पड़ रहा है, तब तक विकास के दावों के सामने प्रश्न खड़े होते रहेंगे। 
दलित -आदिवासी उत्पीड़न, भेदभाव,अत्याचार, शोषण,गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, भूमिहीनता आदि चीखती -चिल्लाती समस्याओं पर चाँदी के चमकीले कफ़न को डालकर विकास का नारा देना विकास नहीं कहा जा सकता l 
नारा सबका हो, तो विकास भी सबका हो; आँकड़े पूरे हों, तो अधिकार भी पूरे हों। गाँव की अंतिम बस्ती तक विकास पहुँचना ही लोकतंत्र की असली उपलब्धि है।
*****




Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ