अखंड भारत से खंडित समाज तक : वर्णव्यवस्था की भूमिका
— नन्दलाल भारती
कवि, कथाकार एवं सामाजिक चिंतक
सभ्यता का गौरव और समाज का अंतर्विरोध-
भारत की सभ्यता का इतिहास ज्ञान, दर्शन, श्रम, कला, कृषि, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की लंबी यात्रा है। इस धरती ने अनेक विचारधाराओं, धार्मिक परंपराओं और जीवन-पद्धतियों को जन्म दिया। यहाँ विविध भाषाओं, समुदायों और संस्कृतियों ने मिलकर समाज का निर्माण किया। लेकिन इसी इतिहास में सामाजिक ऊँच-नीच, जातिगत भेदभाव और मानवीय गरिमा के हनन की ऐसी गाथाएँ भी मौजूद हैं, जिनसे आँखें चुराकर किसी गौरवशाली अतीत की संपूर्ण तस्वीर नहीं बनाई जा सकती।
जब हम अखंड भारत से खंडित समाज तक की यात्रा पर विचार करते हैं, तब एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—क्या कोई समाज बाहरी रूप से समृद्ध और सांस्कृतिक रूप से विकसित होते हुए भी भीतर से असमानताओं में बँट सकता है? इतिहास बताता है कि ऐसा संभव है। राजनीतिक सीमाएँ बदल सकती हैं, राजवंश उठते और गिरते हैं, अर्थव्यवस्थाएँ समृद्धि तथा संकट के दौर से गुजरती हैं; लेकिन समाज की आंतरिक संरचना भी उसकी सामूहिक शक्ति और कमजोरियों को प्रभावित करती है।
भारतीय संदर्भ में वर्णव्यवस्था और उससे जुड़ी जन्म आधारित जातिगत श्रेणियों की भूमिका का अध्ययन इसी दृष्टि से आवश्यक है। यह अध्ययन किसी समुदाय को सामूहिक रूप से दोषी ठहराने का प्रयास नहीं, बल्कि उन विचारों, संस्थाओं और व्यवहारों की पड़ताल है, जिन्होंने मनुष्य को मनुष्य से अलग किया। इतिहास की उपयोगिता तभी है, जब वह हमारे गौरव के साथ हमारी कमजोरियों को भी उजागर करे और भविष्य के लिए न्यायपूर्ण रास्ता सुझाए।
वर्ण की अवधारणा और जातिगत पदानुक्रम-
प्राचीन भारतीय साहित्य में वर्ण की अवधारणा के विभिन्न रूप मिलते हैं। समय के साथ सामाजिक जीवन में जातियों, पेशों, स्थानीय परंपराओं और सत्ता-संबंधों ने जटिल स्वरूप ग्रहण किया। वर्ण और जाति को हर काल में एक ही, अपरिवर्तित व्यवस्था मानना उचित नहीं होगा। भारतीय समाज में इनकी संरचना क्षेत्र, समय और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदलती रही। फिर भी अनेक ऐतिहासिक संदर्भों में जन्म आधारित ऊँच-नीच और सामाजिक निषेधों ने लोगों के अधिकारों तथा अवसरों को प्रभावित किया।
समस्या तब गहरी हुई, जब सामाजिक पहचान को व्यक्ति की योग्यता, सम्मान और अधिकारों से ऊपर रख दिया गया। जन्म के आधार पर किसी को श्रेष्ठ और किसी को हीन मानने की प्रवृत्ति ने मनुष्य की स्वतंत्र पहचान को सीमित किया। ज्ञान, धार्मिक कर्मकांड, सामाजिक प्रतिष्ठा, आजीविका और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी पर असमान नियंत्रण ने सामाजिक दूरी को बढ़ाया।
किसी भी व्यवस्था की परीक्षा इस बात से होनी चाहिए कि वह मनुष्य को कितनी स्वतंत्रता देती है और उसकी प्रतिभा को कितना विकसित होने देती है। यदि किसी बच्चे के लिए आगे बढ़ने के रास्ते उसके जन्म से तय होने लगें, तो समाज उसकी संभावनाओं के साथ अन्याय करता है। यदि किसी व्यक्ति के श्रम को आवश्यक मानते हुए भी उसे सम्मान न दिया जाए, तो यह सामाजिक नैतिकता का विरोधाभास है।
समाज की एकता केवल इस घोषणा से नहीं बनती कि सभी लोग एक ही देश में रहते हैं। एकता तब बनती है, जब सभी को उस देश में सम्मानपूर्वक जीने, सीखने, काम करने और निर्णय लेने का वास्तविक अवसर मिले।
श्रम करने वाले हाथ और सम्मान का सवाल-
भारत की ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था का निर्माण अनेक समुदायों के श्रम से हुआ। कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प, वस्त्र निर्माण, धातुकर्म, निर्माण कार्य, परिवहन और अन्य व्यवसायों ने जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा किया। किसानों, कारीगरों, श्रमिकों और सेवा प्रदान करने वाले समुदायों के योगदान के बिना सभ्यता का विकास संभव नहीं था।
इसके बावजूद सामाजिक जीवन के अनेक हिस्सों में श्रम करने वाले समुदायों को बराबरी का सम्मान नहीं मिला। कुछ कामों को ऊँचा और कुछ को नीचा मानने की मानसिकता ने श्रम के मूल्यांकन को जन्म और जातिगत पहचान से जोड़ दिया। यह विडंबना थी कि समाज जिन सेवाओं पर निर्भर था, उन्हीं सेवाओं से जुड़े लोगों को कभी-कभी सामाजिक दूरी और अपमान का सामना करना पड़ता था।
श्रम का अपमान केवल श्रमिक का अपमान नहीं होता; वह उस व्यवस्था की नैतिक विफलता भी है, जो उसके श्रम से लाभ उठाती है। जिस हाथ से खेत में अन्न पैदा होता है, जिस कौशल से औजार और वस्तुएँ बनती हैं और जिस मेहनत से घर तथा नगर निर्मित होते हैं, वह हाथ सम्मान का अधिकारी है।
किसी समाज की समृद्धि का मूल्यांकन केवल महलों, मंदिरों, व्यापारिक संपदा या राजकीय वैभव से नहीं किया जा सकता। यह भी देखना पड़ता है कि उस समृद्धि के निर्माण में लगे लोगों को कितना हिस्सा, कितना अधिकार और कितना सम्मान मिला। यदि उत्पादन में योगदान देने वाले बड़े समुदायों के पास संसाधनों और निर्णयों पर सीमित नियंत्रण रहा, तो आर्थिक विकास के साथ सामाजिक न्याय का प्रश्न भी अनिवार्य रूप से उठेगा।
ज्ञान पर पहरा : विकास की संभावनाओं का संकुचन-
ज्ञान मनुष्य को प्रश्न करने, विवेक विकसित करने और परिस्थितियों को बदलने की शक्ति देता है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति अपनी सीमाओं को पहचानता है और उनसे आगे बढ़ने का रास्ता खोजता है। इसलिए किसी समुदाय को शिक्षा से दूर रखना केवल वर्तमान अवसरों को सीमित करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की संभावनाओं को भी प्रभावित करना है।
भारतीय इतिहास में शिक्षा तक पहुँच के स्वरूप समय और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग रहे। फिर भी सामाजिक बहिष्कार और जन्म आधारित भेदभाव ने अनेक समुदायों की शैक्षिक उन्नति में बाधाएँ उत्पन्न कीं। जब ज्ञान पर किसी विशेष समूह का एकाधिकार स्थापित करने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तब समाज की सामूहिक बौद्धिक क्षमता प्रभावित होती है।
एक प्रतिभाशाली बच्चा यदि सामाजिक अपमान, संसाधनों की कमी या संस्थागत भेदभाव के कारण अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाता, तो नुकसान केवल उसके परिवार का नहीं होता। समाज एक संभावित शिक्षक, वैज्ञानिक, लेखक, प्रशासक या सामाजिक चिंतक खो देता है। इसी कारण समान शिक्षा का प्रश्न सामाजिक न्याय के साथ-साथ राष्ट्रीय विकास का भी प्रश्न है।
इतिहास में संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे विचारकों तथा समाज सुधारकों के संघर्षों ने ज्ञान, गरिमा और समानता के संबंध को नई शक्ति दी। इनका संदेश था कि मनुष्य की क्षमता को जन्म की सीमाओं में कैद नहीं किया जाना चाहिए।
किसी राष्ट्र की वास्तविक उन्नति तब होती है, जब उसकी प्रतिभा को सामाजिक पहचान की बेड़ियों से मुक्त होने का अवसर मिलता है।
सामाजिक विभाजन और राजनीतिक एकता:
भारत का इतिहास अनेक राजवंशों, राज्यों, साम्राज्यों और क्षेत्रीय शक्तियों से निर्मित हुआ है। विभिन्न कालखंडों में राजनीतिक एकीकरण के प्रयास हुए, तो अनेक बार सत्ता का विखंडन भी हुआ। इसलिए प्राचीन और मध्यकालीन भारत की राजनीतिक स्थिति को किसी एक अखंड राष्ट्र की स्थिर और निरंतर तस्वीर के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक जटिलता को अनदेखा करना होगा।
राजनीतिक विखंडन के कारणों में उत्तराधिकार संघर्ष, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा, सैन्य शक्ति, आर्थिक हित, प्रशासनिक समस्याएँ और बाहरी आक्रमण जैसी अनेक परिस्थितियाँ शामिल रही हैं। यह दावा करना कि भारत के राजनीतिक विखंडन का एकमात्र कारण वर्णव्यवस्था थी, इतिहास को अत्यधिक सरल बना देना होगा। लेकिन यह प्रश्न विचारणीय अवश्य है कि सामाजिक विभाजन और पारस्परिक अविश्वास किसी समाज की सामूहिक शक्ति को किस सीमा तक प्रभावित करते हैं।
जब लोगों को समान सामाजिक सम्मान नहीं मिलता, तब साझा हितों की भावना कमजोर पड़ सकती है। यदि किसी व्यक्ति को अपने ही समाज में अपमान और बहिष्कार का अनुभव होता है, तो उससे केवल निष्ठा और एकजुटता की अपेक्षा करना पर्याप्त नहीं है। मजबूत सामाजिक एकता के लिए न्याय, विश्वास और पारस्परिक सम्मान आवश्यक हैं।
राष्ट्र केवल भूगोल का नाम नहीं है। वह उन लोगों के साझा जीवन का नाम है, जो एक-दूसरे के अधिकारों और गरिमा को स्वीकार करते हैं। राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि एक स्वस्थ लोकतंत्र की परस्पर पूरक आवश्यकताएँ हैं।
आर्थिक विषमता और ऐतिहासिक वंचना-
आर्थिक असमानता को समझने के लिए धन की मात्रा से आगे देखना आवश्यक है। भूमि, शिक्षा, पूँजी, रोजगार, सामाजिक संपर्क और संस्थागत अवसरों तक पहुँच भी आर्थिक स्थिति को निर्धारित करती है। जिन समुदायों को लंबे समय तक इन संसाधनों से वंचित रखा गया, उनके लिए आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक गतिशीलता हासिल करना अधिक कठिन हो सकता है।
भूमिहीनता का अर्थ केवल अपनी जमीन का न होना नहीं है; यह उत्पादन के साधनों और आर्थिक निर्णयों पर सीमित नियंत्रण का भी संकेत हो सकता है। शिक्षा की कमी व्यक्ति को रोजगार के कम विकल्पों तक सीमित कर सकती है। सामाजिक भेदभाव बाजार, आवास, पेशे और कार्यस्थल पर अवसरों को प्रभावित कर सकता है। इस प्रकार ऐतिहासिक वंचना कई बार पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपना प्रभाव छोड़ती है।
भारत की आर्थिक स्थिति में राजनीतिक सत्ता, औपनिवेशिक शासन, व्यापारिक परिवर्तन, तकनीकी विकास और विभिन्न आर्थिक नीतियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए आर्थिक पतन या समृद्धि का पूरा उत्तर केवल वर्णव्यवस्था में खोजना उचित नहीं होगा। फिर भी यह स्वीकार करना जरूरी है कि व्यापक आबादी को समान अवसरों से दूर रखने वाली सामाजिक संरचनाएँ किसी राष्ट्र की संपूर्ण क्षमता के विकास में बाधा बन सकती हैं।
यदि समाज के एक हिस्से को आगे बढ़ने के लिए अनेक पीढ़ियों का संघर्ष करना पड़े और दूसरे हिस्से को पहले से उपलब्ध संसाधनों का लाभ मिले, तो केवल वर्तमान उपलब्धियों की तुलना करके न्याय का निर्णय नहीं किया जा सकता। न्यायपूर्ण विकास के लिए ऐतिहासिक परिस्थितियों और वर्तमान अवसरों, दोनों का मूल्यांकन आवश्यक है।
आधुनिक भारत और संविधान की चुनौती-
स्वतंत्र भारत के संविधान ने जन्म आधारित ऊँच-नीच के विरुद्ध समान नागरिकता का आदर्श प्रस्तुत किया। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 निर्दिष्ट आधारों पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है।
इन प्रावधानों ने भारत को एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक दिशा दी। आरक्षण, शैक्षिक अवसरों का विस्तार और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध कानून ऐतिहासिक वंचना को कम करने के प्रयासों का हिस्सा हैं। लेकिन संवैधानिक आदर्शों को सामाजिक व्यवहार में बदलने का काम अभी भी अधूरा है।
जातिगत अपमान, सामाजिक बहिष्कार, विवाह संबंधी प्रतिबंध और संस्थागत भेदभाव की घटनाएँ यह बताती हैं कि कानून के साथ सामाजिक चेतना का परिवर्तन भी आवश्यक है। संविधान किसी नागरिक को समानता का अधिकार देता है, लेकिन समाज को उस अधिकार के सम्मान का संस्कार स्वयं विकसित करना होगा।
समानता का अर्थ यह नहीं कि इतिहास में सभी की परिस्थितियाँ एक जैसी थीं। इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति को उसके जन्म के कारण अवसरों से वंचित न किया जाए और ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए उचित कदम उठाए जाएँ। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, निष्पक्ष रोजगार, आर्थिक सुरक्षा और संस्थानों में पारदर्शिता इसी दिशा के आवश्यक आधार हैं।
अखंडता का अर्थ समानता
अखंड भारत से खंडित समाज तक की अवधारणा हमें एक गहरी सीख देती है। राजनीतिक सीमाओं का बदलना और सामाजिक संरचनाओं का बदलना अलग-अलग ऐतिहासिक प्रक्रियाएँ हैं। फिर भी किसी समाज की आंतरिक एकता उसकी न्यायप्रियता से गहराई से जुड़ी होती है। जिस समाज में मनुष्य की पहचान जन्मगत श्रेष्ठता और हीनता के पैमानों पर तय होती है, वहाँ एकता का दावा तभी सार्थक हो सकता है, जब उन पैमानों को चुनौती दी जाए।
वर्णव्यवस्था और जातिगत भेदभाव की आलोचना किसी समुदाय के प्रति घृणा का आह्वान नहीं है। यह उन व्यवस्थागत अन्यायों की समीक्षा है, जिन्होंने अनेक लोगों की स्वतंत्रता, सम्मान और अवसरों को सीमित किया। सामाजिक परिवर्तन का उद्देश्य दोषारोपण की विरासत को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि समान अधिकारों पर आधारित भविष्य का निर्माण करना होना चाहिए।
भारत की शक्ति उसकी विविधता में है, लेकिन विविधता तभी उत्सव बनती है, जब उसके भीतर समान गरिमा सुरक्षित हो। श्रम का सम्मान, शिक्षा की समान पहुँच, सामाजिक न्याय और बंधुत्व किसी राष्ट्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक मजबूती के आधार हैं।
प्रश्न यह नहीं कि हमारा अतीत कितना महान था; प्रश्न यह है कि उस अतीत से हमने समानता का कितना सबक सीखा। प्रश्न यह भी है कि क्या हम आज भी जन्म के आधार पर मनुष्यों को बाँटकर राष्ट्रीय एकता की अपेक्षा कर सकते हैं? क्या किसी राष्ट्र का गौरव उन लोगों की पीड़ा को अनदेखा करके सुरक्षित रह सकता है, जिनके श्रम से उसकी सभ्यता आगे बढ़ी?
इतिहास हमें पीछे लौटने के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान को बेहतर बनाने के लिए पुकारता है। अखंडता का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब देश की भौगोलिक सीमाओं के साथ उसके नागरिकों के बीच सम्मान, अधिकार और अवसरों की समानता भी मजबूत होगी।
जिस दिन मनुष्य की पहचान उसकी जाति से नहीं, उसकी मानवीय गरिमा से होगी; जिस दिन श्रम को हीनता नहीं, सृजन का सम्मान मिलेगा; और जिस दिन संविधान की समानता समाज के व्यवहार में दिखाई देगी, उसी दिन भारत की एकता केवल मानचित्र पर नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन में भी साकार होगी।
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