Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

वर्णवाद के साये में रचनाकार

 

साहित्य का टूटा दर्पण : वर्णवाद के साये में रचनाकार
— नन्दलाल भारती

साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। वह दर्पण जिसमें समाज की सुंदरता भी दिखाई देती है और उसकी कुरूपता भी। साहित्य मनुष्य को उसकी सामाजिक पहचान से ऊपर उठाकर उसकी मनुष्यता से जोड़ने का काम करता है। वह अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाता है, शोषित की पीड़ा को शब्द देता है और सत्ता से सवाल पूछने का साहस पैदा करता है। लेकिन जब इसी साहित्यिक संसार में सामाजिक वर्चस्व, वर्णवादी मानसिकता, अवसरों की असमानता और संस्थागत पक्षपात के सवाल उठने लगें, तब यह पूछना जरूरी हो जाता है कि साहित्य का वह दर्पण कितना निर्मल और कितना लोकतांत्रिक रह गया है?
आज अनेक रचनाकारों के अनुभव और शिकायतें साहित्य जगत की ऐसी तस्वीर सामने रखते हैं, जिसमें प्रतिभा के साथ सामाजिक पहचान, संपर्क, गुट और संस्थागत पहुँच भी निर्णायक दिखाई दे सकती है। यह स्थिति किसी जाति-विशेष के प्रत्येक व्यक्ति को दोषी ठहराने का आधार नहीं है। असली सवाल उस वर्णवादी मानसिकता और संस्थागत वर्चस्व का है, जो जन्म और सामाजिक पहचान के आधार पर अवसरों, सम्मान और स्वीकार्यता में असमानता पैदा कर सकता है।
यही वह बिंदु है जहाँ साहित्य का दर्पण दरकने लगता है।
साहित्य समाज से अलग नहीं:
साहित्यकार उसी समाज से आता है जिसमें जाति, वर्ग, क्षेत्र, भाषा, धर्म, आर्थिक असमानता और सामाजिक वर्चस्व मौजूद हैं। इसलिए यह अपेक्षा करना कि समाज में मौजूद पूर्वाग्रह साहित्यिक संस्थाओं में कभी प्रवेश नहीं करेंगे, व्यावहारिक नहीं है।
साहित्य की विशेषता यह होनी चाहिए कि वह इन पूर्वाग्रहों को पहचानकर उनका प्रतिरोध करे। लेकिन यदि सामाजिक भेदभाव साहित्यिक संस्थाओं के भीतर ही पुनरुत्पादित होने लगे, तो साहित्य की आत्मा पर प्रश्न खड़ा होता है।
किसी लेखक की रचना प्रकाशित हो या न हो, किसी मंच पर उसे बुलाया जाए या नहीं, किसी पुरस्कार के लिए उसका नाम आए या नहीं—इन निर्णयों का आधार उसकी रचनात्मक गुणवत्ता होनी चाहिए। जब निर्णयों में सामाजिक पहचान, व्यक्तिगत निकटता या समूहगत संबंध अनावश्यक प्रभाव डालने लगते हैं, तब साहित्यिक लोकतंत्र कमजोर होता है।
प्रतिभा के सामने जातीय पहचान क्यों?
एक लेखक अपनी रचना लेकर साहित्य के संसार में प्रवेश करता है। उसके पास शब्द हैं, संवेदना है, अनुभव है, कल्पना है और समाज को देखने की अपनी दृष्टि है।
लेकिन यदि उसकी रचना पढ़ने से पहले उसकी जाति पूछी जाए, तो साहित्य की कसौटी बदल जाती है।
दलित और आदिवासी रचनाकारों ने भारतीय साहित्य को ऐसे अनुभव दिए हैं जिन्हें लंबे समय तक मुख्यधारा के विमर्श में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। उन्होंने भूख, भूमि, श्रम, अपमान, विस्थापन, सामाजिक बहिष्कार, जंगल, जल, जमीन और गरिमा के सवालों को साहित्य के केंद्र में लाया।
फिर भी कभी-कभी यह अनुभव सामने आता है कि वंचित समुदायों से आने वाले रचनाकारों को पहले उनकी सामाजिक पहचान के आधार पर देखा जाता है और बाद में लेखक के रूप में।
यह दृष्टिकोण साहित्य की व्यापकता को सीमित करता है।
किसी दलित लेखक की रचना केवल दलितों के लिए नहीं होती और किसी आदिवासी लेखक का साहित्य केवल आदिवासी समाज तक सीमित नहीं होता। उनका अनुभव मानव अनुभव का हिस्सा है। साहित्य का काम अनुभव को जातीय खांचे में बंद करना नहीं, बल्कि उसे व्यापक मानवीय संवेदना में रूपांतरित करना है।
छात्रों की आत्महत्या और संस्थागत संवेदनशीलता:
शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या की घटनाएँ समाज को भीतर तक झकझोरती हैं। प्रत्येक घटना के कारण अलग हो सकते हैं—शैक्षणिक दबाव, आर्थिक संकट, पारिवारिक परिस्थितियाँ, मानसिक तनाव, अकेलापन या संस्थागत वातावरण। इसलिए हर घटना को केवल एक कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा।
लेकिन जहाँ विद्यार्थी भेदभाव, अपमान, सामाजिक बहिष्कार या संस्थागत असंवेदनशीलता की शिकायत करते हैं, वहाँ उन शिकायतों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
विश्वविद्यालय ज्ञान का केंद्र है। वहाँ विद्यार्थी अपनी पहचान के कारण अपमानित या असुरक्षित महसूस करे, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं रह जाती; यह संस्थागत संस्कृति पर सवाल बन जाती है।
साहित्य और शिक्षा दोनों का उद्देश्य मनुष्य की चेतना को विस्तृत करना है। यदि शिक्षा का वातावरण ही किसी विद्यार्थी को यह अनुभव कराए कि उसकी सामाजिक पहचान उसके भविष्य पर भारी पड़ सकती है, तो हमें अपनी व्यवस्था पर आत्मचिंतन करना होगा।
मूल्यांकन में धांधली का प्रश्न:
साहित्य हो या शिक्षा, मूल्यांकन किसी व्यक्ति के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। इसलिए मूल्यांकन प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह होनी चाहिए।
किसी रचना की आलोचना करना साहित्यिक अधिकार है। खराब रचना को अस्वीकार करना भी संपादकीय स्वतंत्रता का हिस्सा है। लेकिन आलोचना और पूर्वाग्रह में अंतर है।
यदि किसी रचना का मूल्यांकन उसकी गुणवत्ता के बजाय लेखक की सामाजिक पहचान, व्यक्तिगत संबंध या समूहगत निकटता से प्रभावित होता है, तो यह साहित्यिक न्याय के विरुद्ध है।
इसीलिए साहित्यिक पत्रिकाओं, शोध संस्थानों, प्रतियोगिताओं, पुरस्कारों और सम्मानों में चयन की प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है।
प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि पुरस्कार किसे मिला। प्रश्न यह होना चाहिए कि पुरस्कार तक पहुँचने की प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष थी।
सरकारी दफ्तर की सी.आर. से साहित्यिक प्रतिष्ठा तक:
सरकारी सेवा में वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट—सी.आर.—कर्मचारी के कैरियर को प्रभावित कर सकती है। यदि किसी कर्मचारी को व्यक्तिगत द्वेष, पूर्वाग्रह या अनुचित कारण से खराब मूल्यांकन मिलता है, तो उसका असर उसकी पदोन्नति पर पड़ सकता है।
साहित्य में ऐसी कोई औपचारिक सी.आर. नहीं होती, लेकिन एक अनौपचारिक व्यवस्था जरूर बन सकती है।
-किसे बार-बार मंच मिलता है?
-किसकी पुस्तक पर विमर्श होता है?
-किसे निर्णायक मंडल में बुलाया जाता है?
-किसे संस्थाओं की समितियों में जगह मिलती है?
-किसकी रचना पर आलोचक लिखते हैं?
-किसे लगातार पुरस्कारों के लिए नामांकित किया जाता है?
ये प्रश्न साहित्यिक प्रतिष्ठा की उस अनौपचारिक व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं जो किसी लेखक की पहचान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यदि किसी रचनाकार को लगातार अवसरों से बाहर रखा जाए और उसे यह महसूस हो कि उसकी सामाजिक पहचान उसके साहित्य से बड़ी हो गई है, तो साहित्यिक संस्थाओं को उस शिकायत को गंभीरता से देखना चाहिए।
प्रमोशन केवल सरकारी दफ्तरों में नहीं रुकता:
साहित्य में प्रमोशन का कोई सरकारी पदक्रम नहीं होता, लेकिन साहित्यिक उन्नति की अपनी सीढ़ियाँ होती हैं।
पहले प्रकाशन, फिर मंच, फिर चर्चा, फिर आलोचना, फिर पुरस्कार, फिर संस्थागत पद—यह पूरी प्रक्रिया किसी लेखक की सार्वजनिक साहित्यिक पहचान बनाती है।
यदि इन सीढ़ियों पर किसी सामाजिक समूह का अनावश्यक वर्चस्व हो और दूसरे समूहों के लिए रास्ते लगातार संकरे रहें, तो साहित्य में असमानता पैदा होना स्वाभाविक है।
किसी रचनाकार को केवल इसलिए अवसरों से वंचित करना कि वह किसी विशेष सामाजिक पृष्ठभूमि से आता है, साहित्य की मूल भावना के विरुद्ध है।
साहित्यिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व:
साहित्यिक संस्थाएँ केवल कार्यक्रम आयोजित करने वाली संस्थाएँ नहीं हैं। वे साहित्य की दिशा, प्राथमिकता और प्रतिष्ठा को प्रभावित करती हैं।
राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं से लेकर स्थानीय साहित्यिक संगठनों तक यदि निर्णयकारी पदों पर सामाजिक विविधता का अभाव दिखाई देता है, तो प्रतिनिधित्व का प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
यह किसी व्यक्ति की योग्यता को नकारने का प्रश्न नहीं है। योग्य व्यक्ति किसी भी सामाजिक पृष्ठभूमि से हो सकता है।
मुद्दा यह है कि क्या निर्णय लेने वाली संस्थाओं में समाज की विविधता दिखाई देती है?
यदि साहित्य समाज के हर वर्ग की आवाज बनना चाहता है तो साहित्यिक संस्थाओं को भी समाज की विविधता को प्रतिबिंबित करना होगा।
सम्मान और पुरस्कार किसी की बपौती नहीं:
सरकारी सम्मान और साहित्यिक पुरस्कार रचनाकार के लिए केवल प्रमाणपत्र नहीं होते। वे उसकी साहित्यिक पहचान को व्यापक बनाते हैं और उसके योगदान को सार्वजनिक मान्यता देते हैं।
इसीलिए पुरस्कारों की प्रक्रिया में पारदर्शिता आवश्यक है।
यदि लगातार यह धारणा बनती रहे कि सम्मान और पुरस्कार किसी विशेष सामाजिक या साहित्यिक समूह के आसपास घूमते हैं, तो संस्थाओं की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
समाधान किसी एक समूह को हटाकर दूसरे समूह को स्थापित करना नहीं है। समाधान है—ऐसी निष्पक्ष व्यवस्था बनाना जिसमें किसी समूह को स्थायी विशेषाधिकार न मिले।
निर्णायक मंडलों में विविधता हो, चयन के मानदंड स्पष्ट हों, नामांकन प्रक्रिया पारदर्शी हो और उत्कृष्टता की कसौटी सबके लिए समान हो—यही साहित्यिक लोकतंत्र का रास्ता है।
दलित-आदिवासी साहित्यकारों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार:
दलित और आदिवासी साहित्य भारतीय साहित्य की महत्वपूर्ण धाराएँ हैं। उन्होंने साहित्य को नई भाषा, नए अनुभव और नए प्रतिरोध दिए हैं।
चिंता तब पैदा होती है जब किसी रचनाकार को केवल उसकी सामाजिक पहचान के आधार पर सीमित कर दिया जाता है।
किसी दलित लेखक को केवल ‘दलित लेखक’ कहकर उसकी रचना को व्यापक साहित्य से अलग कर देना भी एक प्रकार का वर्गीकरण है। इसी प्रकार आदिवासी लेखक को केवल आदिवासी जीवन तक सीमित समझना भी उसके रचनात्मक विस्तार को कम करता है।
पहचान को नकारना समाधान नहीं है; लेकिन पहचान को ही रचना का अंतिम परिचय बना देना भी उचित नहीं।
लेखक को उसकी पहचान सहित स्वीकार किया जाए, लेकिन उसकी रचना का मूल्यांकन साहित्यिक गुणवत्ता और मानवीय सरोकारों के आधार पर हो।
घुटन केवल लेखक की नहीं, साहित्य की है:
जब कोई लेखक लगातार उपेक्षा महसूस करता है, तो उसकी पीड़ा केवल व्यक्तिगत नहीं रहती। उसकी रचनात्मक ऊर्जा प्रभावित हो सकती है।
जब किसी विद्यार्थी को लगता है कि उसकी सामाजिक पहचान उसके भविष्य की बाधा बन रही है, तो शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठता है।
जब किसी रचनाकार को मंच, पुरस्कार और संस्थागत अवसरों से बार-बार बाहर रहने का अनुभव होता है, तो साहित्यिक लोकतंत्र की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
इसलिए यह केवल किसी लेखक की शिकायत नहीं है। यह साहित्य के भविष्य का प्रश्न है।
समाधान क्या है?
साहित्य में वर्णवादी मानसिकता या किसी भी प्रकार के संस्थागत भेदभाव से मुकाबला केवल नारों से नहीं होगा। इसके लिए ठोस संस्थागत कदम आवश्यक हैं।
साहित्यिक संस्थाओं में चयन प्रक्रिया अधिक पारदर्शी हो। पदों और समितियों में विविध सामाजिक एवं क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व बढ़े। पुरस्कारों के मानदंड सार्वजनिक किए जाएँ। निर्णायक मंडलों में विविधता हो। पत्रिकाओं में रचनाओं के चयन की स्पष्ट संपादकीय नीति हो।
नए और कम चर्चित रचनाकारों के लिए खुले मंच बनाए जाएँ। विश्वविद्यालयों और
शोध संस्थानों में भेदभाव संबंधी शिकायतों के लिए प्रभावी और निष्पक्ष व्यवस्था हो।
सबसे महत्वपूर्ण—साहित्यिक आलोचना को व्यक्ति की सामाजिक पहचान से मुक्त होकर उसकी रचना पर केंद्रित होना चाहिए।
दर्पण को फिर से निर्मल करना होगा:
साहित्य का दर्पण टूट गया है—यह निष्कर्ष अंतिम सत्य नहीं, बल्कि हमारे सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न है। इस दर्पण को फिर से जोड़ा जा सकता है।
लेकिन इसके लिए आत्मालोचना आवश्यक है।
साहित्यिक संस्थाओं को अपने भीतर देखना होगा।
किसे मंच मिला और किसे नहीं?
किसकी रचना पढ़ी गई और किसकी अनदेखी हुई?
किसे सम्मान मिला और किसकी प्रतिभा उपेक्षित रह गई?
किसकी आवाज मुख्यधारा बनी और किसकी आवाज हाशिये पर धकेल दी गई?
इन प्रश्नों से बचना साहित्य के हित में नहीं है।
साहित्य किसी वर्ण, वर्ग, जाति या समूह की निजी संपत्ति नहीं। साहित्य उन सभी मनुष्यों का साझा संसार है जो अपने समय को समझना, उसकी विसंगतियों को उजागर करना और बेहतर समाज की कल्पना करना चाहते हैं।
आवश्यकता किसी एक समूह के विरुद्ध खड़े होने की नहीं, बल्कि वर्चस्व की हर उस मानसिकता के विरुद्ध खड़े होने की है जो मनुष्य को उसकी रचना से पहले उसकी पहचान में बाँध देती है।
साहित्य का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब प्रतिभा को परिचय की जरूरत न पड़े, रचना को सिफारिश की जरूरत न पड़े और सम्मान को किसी सामाजिक वंशावली की जरूरत न पड़े।
किसी छोटे गाँव का अनाम कवि भी उतनी ही गरिमा से सुना जाए जितनी किसी स्थापित साहित्यकार की आवाज सुनी जाती है; जब दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक, स्त्री, श्रमिक और हाशिये के समुदायों की रचनात्मक आवाजें साहित्य के केंद्र में सम्मानपूर्वक उपस्थित हों; जब साहित्यिक संस्थाएँ समाज की विविधता का प्रतिबिंब बनें—तभी साहित्य का दर्पण सचमुच समाज का दर्पण कहलाएगा।
दर्पण में दरारें दिखाई दे रही हैं तो दर्पण को दोष देने के बजाय उन दरारों के कारणों को पहचानना होगा।
साहित्य को बंद दरवाजों का संसार नहीं, खुली खिड़कियों का संसार बनाना होगा।
क्योंकि—
कलम की कोई जाति नहीं होती,
शब्दों का कोई वर्ण नहीं होता,
सृजन की कोई वंशावली नहीं होती।
साहित्य की असली पहचान केवल इतनी है कि वह मनुष्य के पक्ष में खड़ा हो।
और जिस दिन साहित्यिक संसार में रचनाकार की पहचान उसकी जाति से पहले उसकी रचना से होने लगेगी, उस दिन टूटा हुआ दर्पण फिर से जुड़ने लगेगा।
nlbharatiauthor@gmail.com 

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ