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बदनसीब पिता

 

बदनसीब पिता

ठाकुरेश्वर-नमस्कार ब्रहमेश्वर कैसे हो? घर-परिवार में सब ठीक है?

हाँ ठाकुरेश्वर सब ठीक है बोले ही थे कि उनके गीली पलकें झर उठी थी l 

ठाकुरेश्वर बोले-अरे बड़े भइया क्या हो गया?

मैं मर गया l ये शरीर जिंदा लाश भर है ब्रहमेश्वर बोले l

ठाकुरेश्वर- बाप रे ऎसा क्या गुनाह हो गया?

मैं एक  "बदनसीब पिता" हूँ, दिल में गहरे ज़ख्म और मूक दर्द लिए बस जीये जा रहा हूँ l यह जीवन मुझे नर्क का दुःख लगने लगा है, पर आत्महत्या कर अपने माँ-बाप और जीवन को बदनाम नहीं करना चाहता,पर  यह विश्वास टूट भी सकता है l

ब्रहमेश्वर बोले -ऎसा गुनाह क्यों?

ठाकुरेश्वर-बच्चों और परिवार पर अपना सर्वस्व निछावर करने, और अच्छा भविष्य देने के लाख प्रयास किया पर एक अच्छा पिता नहीं बन सका,अपने बच्चों को संस्कार नहीं दे पाया, जिसका दुःख मुझे अब खाये जा रहा हैl

यह दुःख कभी भी  मेरे प्राण पर भारी हो सकता है, जिस उम्र के पड़ाव पर मुझे अपनी औलाद से सुरक्षा, संरक्षण,प्यार और सम्मान की जरूरत थी,वहीं अपमान और नर्क का दुःख भोगते हुए बस मुर्दा की तरह जी रहा हूँ l

ब्रहमेश्वर बोले-तुम्हारा जीवन पूरे गांव के नजीर है, तुम खुद को बदनसीब कह कर पश्चाताप कर रहे हो?

ठाकुरेश्वर बोले- मेरा दुःख सिर्फ प्यार न मिलना नहीं है,बल्कि अपनी ही औलाद द्वारा बोले जा रहे-झूठ-फरेब,मिथ्या-दुराचारण के कारण,आत्मपीड़ित बदनसीब पिता हो गया हूँl

मेरी बीमारियां नहीं शायद औलाद से मिला दुःख, जीवन के किसी मोड़ पर मुझे सदा के लिए एक दिन खामोश कर दे,इससे बड़ा एक पिता के लिए और क्या दुःख होगा?

मैं  बच्चों को नहीं समझ पाया,एक अच्छा पिता नहीं बन पाया, मैं दुःखी ही नहीं शर्मिंदा भी हूँ l

ब्रहमेश्वर बोले-तुम समाज के लिए नजीर हो जो ठाकुरेश्वर माता-पिता के सपनों के लिए जीया हो,अपने परिवार के साथ संयुक्त परिवार के सपनों के कैनवास में रंग भरा हो.....तुम तो समाज के लिए नजीर हो,तुम्हारे जैसा भलामानुष बदनसीब पिता कैसे हो सकता है? 

ठाकुरेश्वर बोले- जब मैं अपनी औलादों की नजरों में अच्छा पिता नहीं बन सका तो कैसे मान लूं......सच,बदनसीब पिता हूँ, यह अपराधबोध ही मेरा प्रायश्चित है....ब्रहमेश्वरl

नन्दलाल भारती

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