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पौत्रसुख

 
पौत्रसुख/ नन्दलाल भारती
दामोदरदास और उर्मिला के दिलोदिमाग़ और परिवार में बरसों से एक ही सपना पल रहा था कि बड़े बेटे अभिनव का ब्याह किसी सभ्य और संस्कारी बिटिया से हो जाती,खानदान की बड़ी बहू,परिवार का मान बढ़ाती , घर -परिवार को संभालती बुजुर्गों की सेवा करती,परिवार के सदस्यों को मान-सम्मान करती और आँगन में पोते-पोती की किलकारियाँ गूंजती तब दिल को कितना सकून मिलता ।
दादा-दादी "दामोदरदास और उर्मिला" के मन में यही सबसे बड़ा सपना था—
पौत्रसुख का,बुढ़ऊ, बुढ़िया कहते;
जब पोते की किलकारी इस घर में गूँजेगी, तब समझेंगे कि हमारी जिंदगी सफल हो गयी।”इसी विश्वास और उम्मीद में बड़े बेटे अभिनव की शादी बड़े अरमानों से की गयी।
दूर शहर से रिश्ता आया था। लड़की पामरी को पढ़ी-लिखी, संस्कारी बताया गया । यही तो इस परिवार को चाहिए था, दहेज लेना और देना इनकी नजरों मे बड़ा गुनाह था l पामरी शक्ल-सुरत से देखने में शरीर से सुंदर थी, परन्तु उसके दिल में कितना लोभ, लालच और विष भरा था किसी को कोई अंदाजा नहीं था l
किसी ने यह कभी नहीं सोचा था कि सुलक्षणा बहू के सपने में जो बहू आ रही है, वह एक शोहदे बाप की फर्जी डिग्री वाली साइको है । माँ -बाप झूठे -फरेबी है, पामरी माँ -बाप की सोची समझी साजिश की स्क्रिप्ट पर ड्रामा खेल रही है l
अभिनव और पामरी की शादी के पंद्रह दिन बाद उस घर की खुशियों पर पामरी ने ग्रहण लगना शुरू कर दिया l दामोदरदास और उर्मिला के सपनों मे भूचाल आने लगा l
बहू पामरी ने अभिनव को इस तरह अपने और अपने बाप के चक्रव्यूह में फँसा लिया कि पूरा परिवार लाचार,बेबस होकर देखता रह गया।
दहेज के झूठे मुकदमों की धमकी, पुलिस की मिलीभगत,अभिनव के बाप के कत्ल की धमकी और सभ्य-संस्कारी परिवार की बहन -बेटियों को सड़क पर खड़ी कर अपमानित करने तक की धमकी शुरू हो गयी l
शोहदा परिवार और उस परिवार की बेटी पामरी यह सब अभिनव को माँ -बाप, घर -परिवार से नाता तोड़ने और कमासूत अभिनव पर अपना एकाधिकार स्थापित करने के लिए कर रहे थे l
शोहदे सास-ससुर और साइको पत्नी पामरी के चंगुल मे फंस कर सम्मानित एवं संस्कारी परिवार का बेटा माँ -बाप और परिवार से अनभिज्ञ तो हो गया जबकि उसे साइको पामरी और शोहदे परिवार से मुक्त होना था l
माँ -बाप की बात अभिनव ने नहीं माना, अपने ही माँ -बाप पर अपना घर तोड़ने का इल्जाम लगाने लगा l शोहदा परिवार ने ना जाने ऎसा कौन सा जादू कर दिया था कि माँ -माँ -बाप के समझाने पर आग -बबुला हो जाता l

अभिनव गुस्से में लाल हो जाता-कहता पामरी मेरी धर्मपत्नी है,मैं उसके साथ मैं आत्महत्या कर लूंगा l बेचारे बेबस माँ बाप कुछ ना कर सके कमासूत बेटा एकदम से पराया हो गया lअब क्या पामरी और शोहदा परिवार अभिनव का बैंक एटीएम,फोन अपने कब्जे में कर लिया l
अभिनव के माँ -बाप या परिवार के लोग अभिनव को फोन लगाए तो पामरी के पास भी फ़ोन की घंटी बजती l वह चुपचाप फोन पर पूरी सुनती, उस दिन अभिनव की खैर नहीं होती l ऐसी थी डायन पामरी l
अभिनव जिल्ल्त की ज़िन्दगी जी रहा था, घर का काम चूल्हा -चौका, दस घंटे की नौकरी करता,तनख्वाह पामरी जबरिया छिन लेती l अभिनव पत्नी उत्पीड़न का शिकार हो गया। माँ-बाप बेटवा से मिलने को लालायित रहते पर पामरी के सख्त पहरे मे मुश्किल थाl
शोहदे परिवार का दमाद अभिनव डायन पत्नी की जेल में सश्रम सजा भुगत रहा था, उसकी कमाई शोहदे परिवार की जेब में जा रही थी,लाखों कमाने वाला अभिनव तंगहाल रहने लगा था l लेकिन अभिनव की माँ - बाप और परिवार से नफ़रत कम नहीं हुई थी l ना जाने शोहदा परिवार ने ऎसा कौन सा काला जादू अभिनव पर करवा दिया था l
अभिनव के माँ बेटा की रो - रोकर आँखे हो गयी l बाप बीमार रहने लगे पर अभिनव को ना माँ - बाप की, ना भाई-बहन की याद आयी l mबेबस आंसू बहा रहे थे l शादी के पांच साल बाद उड़ती खबर आई कि पोता हुआ है।
दामोदरदास और उर्मिला" की आँखों में खुशी के आँसू थे। परिवार के सभी सदस्य बहुत खुश थे,परिवार में उत्सव भी मना था उन्हें लग रहा था अब सब ठीक हो जाएगाl
लेकिन उन्हें क्या मालूम था कि यह पोता देवेन्द्र उनके जीवन का सबसे बड़ा सुख नहीं, बल्कि सबसे बड़ी पीड़ा बनने वाला है।

ब्याह की बात जब शुरू क्या हुई थी, तब पामरी का शोहदा बाप, जादूगर माँ अपनी बेटी को लेकर दामोदरदास के घर गोधूलि बेला में आ धमके थेl पामरी की माँ ने घर को अंदर-बाहर से देखा और बेटी के साथ माँ -बाप दामोदरदास के घर मे जम गए थे ल पामरी ने वीडियो भी बना डाले,शोहदा परिवार इतना खुश था कि दामोदरदास का परिवार अनमोल खजाना मिल गया था l
घर में प्रवेश करने के तुरंत बाद इन बहुरुपियों ने ना जाने कौन सा ऎसा जादू कर दिया था कि घर -परिवार के लोग ही नहीं आसपड़ोस के लोग भी सम्मोहित हो गए l बिना किसी औपचारिकता और पूर्व जान-पहचान के यह शोहदा परिवार दामोदरदास के घर जैसे जबरिया अतिथि बन गया l
दामोदरदास के परिवार ने स्वागत सत्कार भी किया, न जाने शोहदे परिवार ने कौन विद्या का उपयोग कि पूरा परिवार और आस पड़ोस के लोग भी भर्मित हो गए थे और सबने बहुमत से साइको पामरी को अभिनव की पत्नी के रूप में स्वीकार भी लिया l

अभिनव दामोदर परिवार का पहला इंजिनियर और कमासूत बेटा था l अभिनव के बिना देखे सिर्फ फोन पर पामेरी ने पति और उसके माँ-बाप अभिनव को दमाद बना लिया l
साइको पामरी अपने आँचल का पल्लू पकड़ सभी का पांव छू कर सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद भी ले लिया, सबने सहर्ष गले लगाया भी l यह ना जाने कैसे चमत्कार हो गया था l
किसी को क्या मालूम था कि संस्कारी कुलबहू के यौवन में पामेरी चुड़ैल है, उसका बाप शोहदा माँ जादूगरनी है l
ब्याह के बाद फेरे पूरे होते ही दुल्हन के माँ- बाप ने दुल्हन और दूल्हा को लेकर अपने घर चले गया , किसी को पता ही नहीं चला जो शामियाना से दूर था, जब दूल्हे की तलाश होने लगी तब पता चला था l

शोहदे परिवार ने दूल्हा अभिनव को अपने घर ले जाकर तांत्रिक क्रियाओं के माध्यम से माइंडवाश करवाया, इसकी भनक तक भी बरातियों को नहीं लगी l तांत्रिक क्रियाओ के बाद अभिनव के कमर में ताबीज पहनाई गयी, इसके के तुरंत बाद से अभिनव अपने माँ-बाप और परिवार का विरोधी बनने लगा l
बारात की वापसी के बाद जब असलियत का पता चला तो दामोदरदास की दुनिया लूट गयी थी, यह परिवार शोहदे परिवार की ठगी का शिकार हो गया था, परिवार मे कुलक्षणा बहू आ गयी थी l
महीना भर भी पामेरी ससुराल में मे रही होगी l दिन भर अपने कमरे से बाहर नहीं निकलती थी l सास उर्मिला तीनों वक्त की रसोई बनाती, अगर पामेरी दो रोटी बना दी तो कमर और कलाई में दर्द का बहाना बनाकर बिस्तर पर पड़ जाती थीl बेचारी उर्मिला पलंग पर खाना पानी देती कहते हैं ना लाजु मरै, ढीठू जीएं,पामेरी में लाज हया कोसों दूर थी, ऐसे संस्कार उसके माँ - बाप ने दिए थे l
कुलक्षणा पामेरी ने पंद्रह दिनों में घर के एक - एक सामान और कोने- कोने की वीडियो बनाती मायके भेजती,जिस दिन कीचेन में खड़ी हो गयी,कीचेन की वीडियो बनाती और कहती मुझे यहां से ले चलो, यह ससुराल नहीं जेल हैl
तीनों टाइम खाना बनाना - बर्तन धोना और कपड़ा साफ करना सब सास के जिम्मे थाl बहू का कोई सुख नहीं था, बहू ने अपने हाथ से एक गिलास कभी पानी भी नहीं दी l
पामेरी खानदान की बड़ी बहू थी, सभी के आँखों की तारा थी,शोहदे बाप की बेटी साइको और कुलक्षणा थी, अच्छाई मे बुराई निकालती,ससुराल को बदनाम करना उसका शौक था l
बहू पामेरी ने दामोदर के तीन पीढ़ियों की पूरी कुंडली बना डाली और गाँव से लेकर शहर तक की प्रॉपर्टी की सूची बना ली l
अभिनव पंद्रह दिन बाद परदेस नौकरी पर चला गया l पति के परदेस जाते ही पामरी रौद्र धारण करने लगी, घर में अकेली उर्मिला,दामोदरदास भी ड्यूटी ज्वाइन कर लिए l
पामेरी ने ससुराल में बिना किसी को बताये अपने बाप को बुला ली,शोहदा बाप दुधारु गाय की तरह हांक ले गयाl l
बिना दहेज़ की शादी दामोदरदास ने इंजिनियर बेटा अभिनव का ब्याह सिर्फ कहने को प्रतिष्ठित बाप की बेटी को सुलक्षणा समझकर ब्याह किये थे पर क्या खोटी किस्मत, बहू शोहदे माँ -बाप की बेटी साइको निकली l
सासु पर ससुराल वालों पर हजारों इल्जाम लगाकर मायके रवाना हो गयी l पामेरी, अभिनव के खर्चे पर माँ -बाप और बहनों के साथ अभिनव के पास पहुंच गयी l
अभिनव के क्वार्टर पर पहुंच कर वहां तांत्रिक क्रियाये हुई और ताबीज अभिनव को पहनाई गयी l दमाद के घर कुछ दिन लुत्फ़ उठाकर माँ-बाप अपने शहर वापस आ गएl
अभिनव ने माँ -बाप और परिवार से एकदम से सम्पर्क करना बंद कर दिया परन्तु उसके माँ -बाप और परिवार के लोग सम्पर्क बनाये रखने की कोशिश करते l अभिनव दुश्मन की तरह बात करता, माँ - बाप के खिलाफ आग उगलता l घर -आना जाना बंद कर दिया, वह ससुराल का होकर रह गया था l
माँ-बाप का मन कहाँ मानता है, अभिनव की चिंता लगी रहती l साल भर बाद अभिनव की माँ छोटे बेटे वैभव और बेटी शिल्पा के साथ अभिनव से मिलने गयी, पर अभिनव ने पहचानने से मना कर दिया, माँ,भाई और बहन को धक्का मार कर बाहर कर दियाl
साइको पत्नी और शोहदे सास-ससुर के टार्चर से अभिनव मानसिक रूप से भ्रमित हो गया था , उसके कुछ महीने बाद अभिनव से मिलने के लिए दामोदरदास और उर्मिला फिर गए पर कोई सुधार नहीं हुआ l
बड़ा दमाद अभिनव सास -ससुर की मदद बड़े बेटे की तरह करने लगा था , साले -सालियों की पढ़ाई-लिखाई -शादी -ब्याह सब कुछ शोहदे ससुर ने जबरिया अभिनव की पीठ पर लाद दिया था l अभिनव की कमाई से सास -ससुर का आलीशान घर भी बन गया l
अभिनव को न माँ -बाप की फिक्र न भाई -बहन के पढ़ाई-लिखाई की, दामोदरदास लोन लेकर बच्चों को पढ़ा लिखा रहे थे l
दामोदरदास को विश्वास था कि अभिनव एक दिन जरूर चेतेगा पर दूर -दूर तक कोई उम्मीद नजर आ रही थी l साइको पामेरी अभिनव के दिल दिमाग़ पर कब्जा करने के लिए पुलिस को भी शामिल करने लगी l
पामेरी कभी -कभी घर से भाग जाती, कभी जहर खाने का बहाना करती, कभी नस काट लेती l दहेज के केस में पूरे परिवार को जेल भेजवाने की धमकी देती, शिल्पा को उठवा लेने की धमकी, साइको पामेरी का बाप दामोदरदास के कत्ल की धमकी देता l

अभिनव साइको पामेरी और उसके शोहदे बाप के इशारे पर नाचने को मजबूर था l
पामेरी और अभिनव के ब्याह के सात साल बाद बेटा देवेन्द्र पैदा हुआ,पर दुर्भाग्यवश कंस नाना की जेल में, जिसकी भारी कीमत साइको पामेरी के बाप ने वसूला था l
शोहदे बाप ने विवाहिता बेटी को अपने ही पति के बच्चे को पैदा करने के किराये की कोख वाली माँ बन गयी l
पौत्र देवेन्द्र के पैदा होने की खबर दामोदरदास को नहीं दी गयी,इस बच्चे को पामेरी ने कभी अपना दूध नहीं पिलायी और नहीं डायपर बदली, अभिनव ही देवेन्द्र की माँ और बाप दोनों था l
मान्यता के अनुसार भारतीय संस्कृति में पौत्र सुख वृद्धावस्था का सबसे बड़ा आशीर्वाद, वंश वृद्धि और असीम संतोष का प्रतीक है। पौत्र सुख बुढ़ापे में भावनात्मक सहारा, परिवार की निरंतरता और अगली पीढ़ी को देखकर मिलने वाला आनंद है परन्तु इस सुख को साइको पामेरी और उसके शोहदे माँ-बाप ने छिन लिया था l
जबरिया वसूली के लिए पामेरी के शोहदे बाप ने देवेन्द्र को उसके दादा -दादी और परिवार के लोगों दूर रखते थे,मिलने की कोई इजाजत नहीं थी l देवेन्द्र बड़ा होने लगा, वह अपने दादा-दादी, चाचा और बुआ के बारे में पूछने लगा, जिसकी सजा पामेरी देवेन्द्र पर लात -घुसे बरसा कर देती l
अपना खून तो अपने को पुकारता है lदेवेन्द्र स्कूल जाने लगा ग्रैंडफादर डे के अवसर पर अपने दोस्तों के ग्रैंडफादर को देखता तब वह अभिनव से अपने दादा -दादी चाचा और बुआ से मिलने की ज़िद करता, चोरी -छिपे देवेन्द्र की बात अभिनव अपने माँ -बाप से करवा देता l
देवेन्द्र जब फोन पर बात करता तब अपने घर दादा को बुलाता, देवेन्द्र सात साल का हो गया, एक दिन बात करते- करते देवेन्द्र रोते हुए बोला दादाजी मेरे घर आ जाओ, आपकी, बहुत याद आती है l
पोते का रोना दामोदरदास को बर्दास्त नहीं हुआ,वे देवेन्द्र से मिलने हजारों किलोमीटर दूर जा पहुंचे l दादा को पाकर देवेन्द्र बहुत खुश हुआ और अभिनव भी l पामेरी पर तो जैसे वज्रपात हो गया था l
पामेरी कहती अभिनव सिर्फ मेरा है, देवेन्द्र मेरा बेटा है, किसी का कोई अधिकार नहीं है, जबकि पामेरी एक अच्छी माँ भी नहीं बन पायी पति पर एकाधिकार कायम रखने के लिए माँ होने का स्वांग करती l
वह दामोदरदास को देखकर कुपित तो बहुत हुई थी उसे दादा और पौत्र का मिलन तनिक भी नहीं पसंद आया l वह देवेन्द्र को दामोदरदास से दूर करने का खूब प्रयास करती पर देवेन्द्र कहाँ मानने वाला था l
पामेरी देवेन्द्र को मारती, अभिनव मना करता तो अभिनव के साथ बदमिजाजी करतीl एक दिन तो अति हो गयी,पामेरी ने अभिनव के साथ -मारपीट शुरू कर दी, अभिनव बुरी तरह घायल हो गया, जिस अभिनव के टुकड़े पर पामेरी ऐश कर रही थी, उसके मायके के लोग परजीवी की तरह पल रहे थे, उसी अभिनव के साथ साइको मारपीट करने से तनिक भी परहेज नहीं करती थी, यह खबर आसपड़ोस तक थी l
दामोदरदास बेआबरू होकर वापस हो लिए, परन्तु अभिनव साइको पामेरी से चोरी -छिपे देवेन्द्र की दादा-दादी से बात करवा ही देता l
धीरे -धीरे देवेन्द्र आठ साल का हो गया। कंस नाना की जेल में पैदा हुए देवेन्द्र को
दादा-दादी की गोद नसीब नहीं हुई,और नहीं दादा - दादी को पौत्र का सुख मिला l
बेचारा आठ साल का देवेन्द्र हो गया था l उसे पामेरी ने परिवार के सदस्यों से मिलने तक नहीं देती थी l दादी के हाथ का बना हुआ खाना कैसे खा पाता, कंस नाना की जेल साइको पामेरी जैसी जेलर की कड़ी निगरानी में l
एक दिन अभिनव ने देवेन्द्र की बात दादी दादा से करवाया, देवेन्द्र रो- रोकर दादा-दादी को अपने घर बुलाने लगा l
फोन के उस पार से मासूम देवेन्द्र की भराई आवाज से उर्मिला की आँखे बरसने लगी तब दामोदरदास ने पत्नी उर्मिला से पूछे क्या हुआ?
उर्मिला बोली देवेन्द्र कह रहा था -दादी… बहुत जोर की भूख लगी है l
दादी का कलेजा मुंह में अटक गया वह फोन थामे सिसक-सिसक कर बहा रही थीl
दामोदरदास बोले -उर्मिला बात करो l
वह आंसू पोंछते हुए बोली —देवेन्द्र बेटा हम तो बहुत दूर हैं l कैसे खाना दूं बेटवा l हम है बेबस कैसे क्या करें?
बेटा मम्मी से बोलो खाना बना दे l
मासूम देवेन्द्र बोला—“मम्मी सोये -सोये मोबाइल देखती रहती है, या बात करती है l मम्मी ऑनलाइन आर्डर कर खाना मंगवाती है l
पापा बनाएंगे तब खा लूंगा दादी , पापा ऑफिस का काम कर रहे है l मम्मी सो रही है l
दिन के बारह बजे तक सो रही है,दादी के हाथ से फोन नीचे गिर गया l
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे l वह रोते हुए बोलीं—“हे विधाता…तुमने कैसी नसीब बना दिया l
ना पोता को दादा -दादी की गोद नसीब हुई ना कोई सुख मिला,
ना हम बूढ़े बुढ़िया को पोता को खेलाने का सुख मिला, ना ठुमक-ठुमक पोता को चलते हुए देखने का सुख मिला l ना अपने हाथ से बचवा के मुंह में निवाला डालने का सुख l
हे विधाता तुमने कैसे शोहदे माँ -बाप की डायन बेटी को हमारे कुल की बहू बना दिये, जो अपने ही पति और पुत्र पर अत्याचार कर रही है l
उधर फोन के उस पार सुदूर भूखा देवेन्द्र चुपचाप था। फोन के इस पार
दादा-दादी की सूनी चौखट पर पौत्रसुख का सपना दम तोड़ रहा थाl
पौत्रसुख तो तब मिलता है जब संस्कारी माँ -बाप की बिटिया मायके से अपने साथ ससुराल में प्रेम, संस्कार, त्याग और अपनेपन की संजीवनी लेकर आती है l
पौत्र सुख परिवार की पूर्णता और जीवन के उत्तरार्ध का सबसे मधुर अनुभव है
सच कहा है कभी-कभी संतान का जन्म भी सुख नहीं देता,यदि घर-परिवार में संस्कारों की जगह स्वार्थ और लालच की घुसपैठ हो जाये तो
पोता पैदा होना भी “पौत्रसुख” नहीं दे पाता l
— नन्द लाल भारती
इंदौर (मध्य प्रदेश)
Emai:nlbharatiauthor@ gmail.com



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