लघुकथा :पानी के बदले वोट
— नन्दलाल भारती
"सत्यदेव, ये ड्रम और टंकियाँ सब खाली पड़ी हैं। पानी नहीं मिल रहा क्या?" ब्राह्मदत्त ने आँगन में रखे सूखे बर्तनों को देखकर पूछा।
"हाँ भाई, सात दिन हो गए। पानी का एक टैंकर तक नहीं आया। डिब्बाबंद पानी से किसी तरह गुज़ारा कर रहे हैं।" सत्यदेव ने थकी आवाज़ में कहा।
"बाप रे! इतना बड़ा जल संकट? पार्षद से शिकायत नहीं की?"
किया था । बीस मई को,फिर अट्ठाइस मई को पत्नी ने फोन पर हाथ जोड़कर सुबह और दोपहर में पानी की गुहार लगाई।
जवाब मिला—'बस, टैंकर पहुँच ही रहा है।' आज तेरह जून हो गई, टैंकर का कहीं अतापता नहीं।"
सत्यदेव का स्वर तल्ख हो गया।
"बड़े साहब के घर के अंदर-बाहर और सड़क धुल रही है और यहाँ लोग पीने के पानी की बूंद-बूंद को तरस रहे हैं।भाई,पानी की कमी से ज्यादा पीड़ादायी कुप्रबंधन है l सामने वाली गली में देखो एक दो घरों में एक दिन छोड़कर पार्षद टैंकर पहुँच ही आता है। आज भी आया हुआ है l
"आग लगे ऐसी नेतागिरी को!" ब्राह्मदत्त झुंझलाकर बोला।
"नीचे से ऊपर तक सभी फेंकू गांजा पीकर बेखबर पड़े हैं। ब्राह्मदत्त गहरी साँस लिया, फिर बोला, "चलो, टेरेस गार्डेन दिखाओ l"
कुछ नहीं बचा है सब सुलग चुका है l
"क्यों, क्या हुआ?" ब्राह्मदत्त पूछा l
अरे मत छत पर चलो "देखोगे तो आँखें नम हो जाएँगी।"
ब्राह्मदत्त माना नहीं...दोनों सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर पहुँचे।
ब्राह्मदत्त ठिठक गया।
जहाँ कभी हरियाली लहलहाती थी, फल सब्जियाँ लगे रहते थी वहीं अब सूखे गमलों की कतारें खड़ी थी। पौधों की टहनियाँ सूख कर चटक रही थीं।
सत्यदेव ने सूखे पौधों को देखते हुए कहा—
"कई सालों से खरीदकर टैंकर का पानी पिलाकर इन्हें जिंदा रखा था।इस साल प्राइवेट टैंकर भी नहीं मिल रहे lइस साल एक भी पौधा नहीं बचा पाया। ड्रैगन फ्रूट, पैशन फ्रूट, अमरूद, अनार, नींबू... और मौसमी सब्जियाँ भी। सब पानी के अभाव में सुलग गए।"
उसकी आँखें भीग गईं।
ब्राह्मदत्त ने दुःखी होकर कहा—
"यह तो सिर्फ तुम्हारा नहीं, पर्यावरण का भी बड़ा नुकसान है।"
कुछ क्षण दोनों चुप रहे।
फिर सत्यदेव ने धीमे स्वर में कहा—
"लेकिन एक बड़ा अपराध होने से बच गया।"
"कैसा अपराध?" ब्राह्मदत्त ने आश्चर्य से पूछा।
सत्यदेव हल्की मुस्कान के साथ बोला—
"पानी के बदले वोट बेचने का अपराध।"
ब्राह्मदत्त कुछ क्षण उसे देखता रहा।
छत पर सूखे पौधे खड़े थे, लेकिन सत्यदेव का स्वाभिमान अब भी हरा l
नन्दलाल भारती
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