Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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पहचान

 
पहचान
सरकारी पुस्तकालय का सभागार खचाखच भरा हुआ था। कविता पाठ देर तक चला, क्योंकि कवि अधिक थे और श्रोता कम।
विशेष आकर्षण थीं विदेश से आई एक प्रवासी भारतीय कवयित्री। कार्यक्रम का संचालन एक सेवानिवृत्त हिंदी अधिकारी कर रहे थे, जो लगभग हर साहित्यिक मंच के स्थायी संचालक माने जाते थे।
दोपहर में शुरू हुआ कार्यक्रम रात तक खिंच गया। समापन के बाद चाय का दौर चला। अधिकांश लोग जा चुके थे। प्रवासी कवयित्री एक सोफे पर बैठी थीं। संचालक महोदय उनके बगल में विराजमान थे। वहीं खड़े-खड़े चाय पी रहे कवि जगताप जल्दी निकलना चाहते थे।
"अरे कविवर! खड़े-खड़े क्यों पी रहे हैं? आइए, बैठिए," कवयित्री ने मुस्कराकर कहा।
जगताप संकोच से उनके बगल वाले सोफे पर बैठ गए।
"कहाँ से हैं आप?" कवयित्री ने पूछा।
"आज़मगढ़ से।"
कवयित्री का चेहरा खिल उठा।
"अच्छा! मैं मूलतः बलिया की हूँ। शादी के बाद विदेश चली गई, लेकिन अपनी माटी का मोह आज भी नहीं छूटा। आपकी कविता मुझे बहुत अच्छी लगी।"
जगताप धन्यवाद कह पाते, उससे पहले संचालक महोदय ने बात बीच में ही काट दी—
"मैडम, ये जगताप हैं... अम्बेडकर को मानने वाले हैं।"
क्षणभर के लिए वातावरण में अजीब-सी चुप्पी छा गई।
जगताप मुस्कराए और सहज स्वर में बोले—
"जी मैडम, पंडितजी ने सही कहा। मैं दलित हूँ और डॉ. अम्बेडकर के विचारों को मानता हूँ।"
कवयित्री ने एक पल के लिए जगताप को देखा, फिर मुस्कराकर बोलीं—
"अच्छा! आपके पास विजिटिंग कार्ड है?"
"जी।"
जगताप ने अपना कार्ड उन्हें दे दिया।
कार्ड देखते हुए कवयित्री बोलीं—
"लेखन की पहचान उसकी संवेदना और गुणवत्ता से होती है, जाति से नहीं। आप अच्छा लिखते हैं, लिखते रहिए।"
जगताप के चेहरे पर हल्की मुस्कान फैल गई।
उधर संचालक महोदय को चाय अचानक कुछ फीकी लगने लगी।
नन्दलाल भारती 



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