Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

पगड़ी और पांव

 

पगड़ी और पांव
जाड़े की भोर थी,मुर्गा बोल रहे थे l कोहरा की धुंध थी l पूरब में लालिमा उभरने लगी थी। कुत्ते तेज ठंड की वजह से पुआलों की ढेर में पड़े हुए थे पर बेखबर नहीं थे, किसी के आने जाने की आहट पाकर पुआल की ढेर में से ही भौंकने लगते थे l
गांव अलसाया हुआ था लोग ओलाव ताप रहे थे ,परन्तु ऊँची कद -काठी का वाला सोनू गौतम निकल पड़ा था दौड़ने के लिए l
पैरों में घिसे हुए जूते, बदन पर पसीने से भीगी टी-शर्ट और आंखों में फौजी बनने का सपना लिए वह दौड़ते हुए हर सुबह अपने दादा की बातें याद करता-
बेटा “सीमा पर गोली से डरने वाला सैनिक नहीं होता … और समाज में अपमान से डरने वाला सच्चा इंसान भी नहीं होता ।”
सोनू के दादा सेना में मेजर थे, जिनका नाम ही अब शेष था l वे देश की सीमा पर दुश्मनों से कई जंग भी लड़े थे, वे अपनी बहादुरी की कहानियाँ बड़े शान से सुनाते थे, लेकिन वे भी जातीय की दीवारों के आगे हार गए थे। यही दर्द सोनू की नसों में आग बनकर दौड़ रहा था।
उस सुबह भी वह दौड़ रहा था।
गांव के ठाकुरों का पुरवा पार करते समय उसकी नजर गांव के ठाकुर कलकू के आंवले के पेड़ के नीचे गिरे फलों पर पड़ी तो वह दौड़ते-दौड़ते सहजता से दो फल उठा लिए।
बस…क्या गांव का सदियों पुराना जातिवादी बारूद फट पड़ा।
“पकड़ो! पकड़ो! चोर भागने न पाए l
सेना से रिटायर्ड बूढ़ा ठाकुर कलकू चीख रहा था-रुक चमारिया रुक । ठाकुर के दोनों जवान बेटे टोनी और कोनी लाठी लेकर सोनू के पीछे दौड़ पड़े।
सोनू जान बचाकर भाग रहा था, लेकिन उसके पीछे सिर्फ तीन आदमी नहीं दौड़ रहे थेl सोनू के पीछे सदियों की पुरानी जातीय घृणा, सामंती अहंकार और दलितों को इंसान न मानने वाली मानसिकता दौड़ रही थी।
कुछ ही देर में सोनू उनकी पकड़ में आ गया फिर उस पर बरसने लगी लाठियाँ
गांव की पगडंडी पर उसकी चीखें गूंज रही थी पर कोई सुनने वाला नहीं था l
दो आंवलों की कीमत उसके शरीर से बहते खून से वसूली जा रही थी।
दूर खेत से यह दृश्य देखकर लालूराम की आत्मा कांप उठी— वह चिल्लाया
“अरे मत मारो! जानवर नहीं इंसान है…फ़ौजी का पोता है जान ले लोगे क्या? छोड़ दो... छोड़ दो चिल्लाते हुए लालूराम तो दौड़ लगा दिया लेकिन उस दिन गांव की इंसानियत जैसे मर गयी थी।
लालूराम हांफते पहुँचा दोनों हाथों से लाठियाँ रोकते हुए बोला-कलकू बाबू ये क्या कर रहे हो? सोनू को जान से मार कर दोगे क्या? ऎसा कौन सा अपराध कर दिया है l
कलकू बोला- चोर को सजा तो मिलेगी l
लालूराम बोला -चोर क्या कह रहे कलकू बाबू?सोनू चोर कैसे हो गया?
टोनी बोला -आवला तोड़ कर भाग रहा था l
लालूराम-कहाँ है आवला सोनू?
सोनू दो आवला पॉकेट से निकाल कर लालूराम के हाथ पर रखते हुए बोला जमीन पर गिरे थे मैंने तोड़ा नहीं है l
लालूराम बोला -कलकू बाबू, इतना भी नहीं पहचानते,सोनू फ़ौजी का पोता है, सेना में भर्ती होने की तैयारी कर रहा है क्यों एक निरपराध की जान लेने पर तुले हो l
कलकू और उसके दोनों बेटे टोनी और कोनी सोनू को लाठी के भरोसे ले जाने लगे l
कोनी बोला -चोर को उसी आंवले के पेड़ से बांधकर मारेंगे तब कभी चोरी नहीं करेगा l
कलकू बोला-चोर उच्चक्को को गोली मार देना चाहिए l
सोनू बोला-बाबा मैंने को चोरी नहीं किया है l झूठा इल्जाम क्यों लगा रहे हो l
बड़ी विनती के बाद लालूराम ने ठाकुर के चंगुल से सोनू को मुक्त करा तो लिया,पर देख लेने की धमकी उसे भी मिल गयी l
सोनू का बाप सुखदास परदेस गया था l सोनू की माँ मनसादेवी, बेटे के शरीर से बहता हुआ खून देखकर शेरनी की तरह दहाड़ती हुई सोनू का हाथ पकड़कर पुलिस चौकी पहुंची, वहां से उसे भद्दी -भद्दी गालियां देकर भगा दिया गया l
दूसरे दिन पचीस किलोमीटर दूर वह सोनू को लेकर पुलिस थाना पहुंची,दरोगाजी नहीं कह कर वहां से भी भगा दिया गया पर वह हार नहीं मानी, लगातार सप्ताह भर पुलिस थाना का चक्कर लगायी कोई सुनवाई नहीं रोज एक ही बहाना दरोगाजी नहीं है l
आख़िरकार सप्ताह भर बाद दरोगाजी मिल गए, वे भी रिपोर्ट लिखने से मनाकर दिया और गंदी -गंदी ने गालियां देकर भगा दिए l
मनसादेवी पुलिसकर्मियों और दरोगा के रवैये से और दुर्व्यवहार से निराश होकर कोतवाली पहुंची वहां भी कोई सुनवाई नहीं हुई l पुलिस चौकी, थाना और कोतवाली आते जाते महीना भर बीत गया, थक हार कर वह डिस्ट्रिक्ट हेडक्वार्टर एस पी ऑफिस पहुंची, वहां भी उसके साथ अच्छा व्यवहार तो नहीं हुआ l
एस पी में भी मनसादेवी की सुनवाई नहीं हुई तो वह एसपी ऑफिस के सामने सोनू के साथ धरने पर बैठ गयी अंत झल्ला कर एसपी ने एफआई आर का आदेश दरोगा को फोन पर दिया l
एसपी ने दरोगा को आदेश तो दिया पर दरोगा अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था, मनसादेवी एफआईआर दर्ज करवाने के लिए बहुत धक्के खायी, गालियां सुनी, जातिवादी अपमान सही,जनता के सामने बेइज्जती सहनी पड़ी l
लम्बे संघर्ष के बाद एफआईआर दर्ज हुई पर कार्रवाई के नाम पर दरोगा मनसा देवी को पुलिस थाना बुलाता डांटता -फटकारता, भद्दी -भद्दी गालियां देता और सुलह का दबाव बनाता l दरोगा ने ठाकुर कलकू और उसके बेटों-टोनी और कोनी को कभी थाने नहीं बुलाया उल्टे ठाकुर की हवेली खुद हाजिरी लगाता l
हर बार धमकाता और कहता तेरा बेटा दिन दहाड़े चोरी करता है, जानती हो इस एफआई आर का क्या असर पड़ेगा l तू चमार होने का कानूनी फायदा उठा रही है l
मनसा कहती -दरोगा जानती हूँ दिन दहाड़े गोली मार दी जाएगी l मनसा सवाल करती दरोगा आपका बेटा होता तो क्या करते?
दरोगा बगले झाँकने लगता l
मनसादेवी कहती-दरोगाजी जमीन पर गिरा सिर्फ दो आवला का उठाना कोई मर्डर है क्या? करा लो सीआईडी जाँच अगर मेरा बेटा दिन दहाड़े ठाकुर के घर में डकैती किया है या जबरदस्ती ठाकुर की बेटी की मांग भर दिया है,साबित हो गया तो मेरे बेटे को फांसी पर चढ़ा देना और अगर नहीं साबित हुआ तो दरोगागिरि छोड़ देना l
मनसा की बात सुनकर दरोगा मनसादेवी को सैकड़ो गालियां देकर ठाकुर के घर पहुँचा,वहां कुछ सौदेबाजी हुई l गवाह लालूराम और सोनू को गोली मारने की धमकी आ गयी l
सप्ताह भर बाद दरोगा ने फिर माँ -बेटे को पुलिस थाना बुलाया और सुलहनामा पेश करने का का दबाव बनाने लगा l
मनसा अडिग थी, दरोगा थर्ड डिग्री पर आ गया l मनसा का खून अब उबल गया वह दरोगा की टेबल पर चूड़ियों वाले हाथ से दरोगा की टेबल पर जोरदार मुक्का मारी और बोली- दरोगा हिम्मत है तो कर दो एनकाउंटर l
कहो तो थाने में आकर दरोगा को जान मारने की धमकी देने के अपराध में कौन -कौन धाराएं लगेगी वह भी बता दूं l
मैं पढ़ी-लिखी हूँ, स्वर्गीय मेजर की पुत्र हूँ l बीएनएस की और धाराओं को जोड़ो l मैं जानती हूँ तुमने कमजोर धाराएं लगाया है l सुप्रीमकोर्ट तक लडूंगा, सजा जरूर मिलेगी, ठाकुर को और दरोगा को भी,संविधान और न्याय व्यवस्था पर भरोसा है l
दरोगा अब तो मेरे बारे जान गए हो, कार्रवाई होगी की नहीं?
दरोगा बोला -चमारिन अभी हवालात में डाल दूंगा l
मनसा बोली -मैं एनकाउंटर से नहीं डरती, तो तुम्हारे जेल से डरूंगी कर लो अपनी शौक पूरी l दरोगा दरोगा दाँत पीसकर रह गया l मनसा की दरोगा से बातचीत की रिकॉर्डिंग ठाकुर के पास पहुंच गयी l
ठाकुर कलकू-दोनों बेटों और गांव के ठाकुरों के साथ मनसा के घर पहुंचे, ठाकुरों की भीड़ देखकर पूरी दलित बस्ती में खलबली मच गयी और पूरी बस्ती के लोग इकट्ठा हो गए l
ठाकुर कलकू बोला -मनसा बिटिया अभी मामला कोर्ट नहीं पहुँचा है l
मनसा -जानती हूँ पर मामला कोर्ट में आज नहीं तो कल जरूर पहुंचेगा l ठाकुर क़ानून के हाथ लम्बे होते हैं l एक गर्दन तक जरूर पहुंचेगा
पगड़ी उतार कर मनसा के पैर पर रख दिए l अब मनसा का पांव था और ठाकुर की पगड़ी l ठाकुर गिड़गिड़ाते हुए बोला -मनसा बिटिया मेरे बेटों का भविष्य बचा लो, दोनों की सरकारी नौकरी की जॉइनिंग का लेटर आया है, अगर जेल हो गयी तो दोनों का जीवन बर्बाद हो जायेगा और मेरी बुढ़ौती भी l
मनसा बोली - ठाकुर साहब, तुम भी सेना में थे,मेरे ससुर के सहायक थे,ये कैसे भूल गये l ससुरजी ठाकुर तुम दोनों एक थाली में खाते थे l याद है कि भूल गए l सोनू सिर्फ दो आवला जमीन पर से उठाया था l इसके बदले गोली मारने की धमकी l
टोनी बोला-तोड़ा था l
मनसा बोली-झूठ मत बोलो,चलो मान लेती हूँ तोड़ा,जिसकी इतनी बड़ी सजा, हत्या करने की धमकी भी l
गांव की दलित बस्ती में उस सुबह अजीब सन्नाटा था।
जिस पगड़ी को उसने जीवन भर अपनी इज्जत समझा, अपनी जाति और अपने अहंकार का ताज समझा, वही पगड़ी मनसादेवी के पैरों में पड़ी थी।
टोनी और कोनी सिर झुकाए खड़े थे।
उनकी आंखों में पहली बार सामन्तवादी सत्ता नहीं, शर्म थी, हया थी लज्जा थी ।
मनसा देवी की आंखों में आग भी थी और पानी भी।
वह चाहती तो बदला ले सकती थी।
वह चाहती तो उन्हीं लोगों को उसी कानून के नीचे कुचल सकती थी, जिनके लिए दलित हमेशा कुचलने की चीज रहे हैं ।
लेकिन उसी क्षण उसके भीतर कहीं उसके फौजी ससुर की आवाज गूंजी—
“न्याय बदले से बड़ा होता है।”
मनसा ने कांपते हाथों से ठाकुर कलकू की पगड़ी उठाई और वापस उसके सिर पर रख दी।
“ठाकुर साहब…
आज मैं आपको नहीं, इस गांव को माफ कर रही हूँ।
लेकिन याद रखना,
दलित की चुप्पी को कमजोरी समझने का जमाना खत्म हो चुका है।
अब हमारे बच्चे संविधान पढ़ते हैं, थाने के चक्कर काटते हैं, अदालत तक लड़ते हैं… और जरूरत पड़ी तो इतिहास भी बदलने की ताकत रखते हैं ।
पूरा गांव खामोश था।
टोनी और कोनी सोनू के पैरों पर झुक गए—
“भईया… गलती हो गई…”
सोनू ने दोनों को उठाकर गले लगा लिया।
उस क्षण पहली बार गांव में जाति छोटी और इंसानियत बड़ी दिखाई दी।
लेकिन ठाकुर कलकू, दलित मनसा के पांव पर अपनी पगड़ी के सदमें को बर्दास्त नहीं कर पाया l
जिस व्यवस्था को वह जीवन भर अपना साम्राज्य समझता रहा, वह उसकी आंखों के सामने टूट रही थी।
कलकू को पहली बार एहसास हुआ कि डर अब दलित बस्ती में नहीं, ठाकुरों के आंगन में उतर चुकी है।
कहते हैं, उस घटना के बाद ठाकुर कलकू अक्सर गांव की गलियों में बड़बड़ाते हुए दिखाई दिया और आखिर में वह पागल हो गया l
“दो आंवले इतने भारी कैसे हो गए…?”
और गांव के लोग नहीं जानते थे कि वे दो आंवले नहीं थे, बल्कि सदियों से दबे हुए न्याय, स्वाभिमान और संविधान के दो जागते हुए बीज थे।
नन्दलाल भारती
05/05/2026
इंदौर /मध्य प्रदेश

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ