मौत को तमाशा ना बनाना
— नन्दलाल भारती
मौत को तमाशा ना बनाना,
जनाजे को दिखावे की वस्तु ना बनाना।
माटी चूमते हुए जवान के मुँह से निकला—
मैं माटी का हूँ,
माटी की सुरक्षा मेरा स्वाभिमान है,
शहीदी सौभाग्य है।
आसमान झुक गया,
मेघ बरस गया,
धरती की छाती पर
एक और इतिहास लिख गया।
वह गिरा तो तिरंगा
और ऊँचा हो गया,
एक घर का चिराग बुझा,
देश का माथा रोशन हो गया।
माँ की आँखों में समंदर था,
पिता का सीना पत्थर था,
पत्नी के सूने माथे पर
वक्त का गहरा खंजर था।
किसी ने कहा—
वह वीरगति को प्राप्त हुआ,
किसी ने कहा—
देश पर कुर्बान हुआ।
पर उस माँ से पूछो,
जिसकी गोद उजड़ गई,
उस जीवनसंगिनी से पूछो,
जिसकी दुनिया बिखर गई।
शहादत पर गर्व करना,
मगर उसके दर्द को भी पहचानना;
मौत को तमाशा ना बनाना,
जनाजे को दिखावे की वस्तु ना बनाना।
उसके लहू से सींची माटी
हमसे कुछ सवाल करती है—
क्या केवल नारे लगाने से
देशभक्ति पूरी होती है?
क्या तिरंगे को सलामी देकर
कर्तव्य पूरे हो जाते हैं?
क्या शहीदों के नाम पर
सिर्फ भाषण दिए जाते हैं?
नहीं!
शहीद का सम्मान तभी है,
जब देश का ईमान सही है,
जब मेहनतकश को न्याय मिले,
जब हर निर्बल को अधिकार मिले।
जब भूख से कोई बच्चा न रोए,
जब नफरत में इंसान न खोए,
जब जाति-धर्म से ऊपर उठकर
हर दिल में इंसानियत होए।
वह माटी का था,
माटी के लिए मिट गया,
हम माटी के हैं—
क्या हमारा फर्ज यहीं खत्म हो गया?
उसने सीमा पर पहरा दिया,
हम अपने भीतर पहरा दें,
नफरत, भ्रष्टाचार और अन्याय के विरुद्ध
सच का दीपक गहरा दें।
देश केवल नक्शे का नाम नहीं,
देश जनता की साँसों में बसता है;
शहीद केवल इतिहास नहीं,
उसका सपना हमारे भविष्य में हँसता है।
उसकी अर्थी पर फूल चढ़ाना,
मगर उसके परिवार को मत भूल जाना।
उसकी तस्वीर पर दीप जलाना,
मगर उसके बच्चों का भविष्य भी सँवारना।
उसकी शहादत को उत्सव बनाना,
पर पीड़ा को प्रदर्शन मत बनाना।
उसके बलिदान को शीश नवाना,
पर जनाजे को दिखावे की वस्तु ना बनाना।
माटी पुकार रही है—
माटी पुकार रही है—
मेरे बेटों का मान रखो,
तिरंगे की आन रखो,
शहीदों के सपनों का
अपने भीतर सम्मान रखो।
मौत को तमाशा ना बनाना,
शहादत को व्यापार ना बनाना,
जिस माटी के लिए प्राण दिए उसने,
उस माटी को शर्मसार ना करना।
वह माटी का था,
माटी में मिल गया—
मगर उसका स्वाभिमान
हमारे माथे पर तिलक बन गया।
शहीद मरकर भी अमर है,
उसका बलिदान महान है।
माटी उसकी माँ थी,
माटी ही उसका अभिमान है।
दो क्षण का मौन)
शहीद को सलाम करो,
उसकी शहादत का मान करो—
तमाशा नहीं, संकल्प बनाओ,
भारत को बेहतर देश बनाओ।
— नन्दलाल भारती
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY