मानवीय समता के बिना भौतिक विकास अर्थहीन:
(जातिवाद, गरीबी, शिक्षा, चिकित्सा, बेरोजगारी और महंगाई के बीच समान समाज की अनिवार्य पुकार)
— नन्दलाल भारती
MA(Sociology)LLb.(Hons)PGD. HRD
कवि, कथाकार एवं सामाजिक चिंतक
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विकास की परिभाषा क्या है? क्या ऊँची इमारतें विकास हैं?क्या चमचमाती सड़कें विकास हैं?क्या बड़े-बड़े उद्योग, महानगरों का विस्तार, डिजिटल तकनीक और बढ़ता बाजार ही विकास का अंतिम प्रमाण हैं?निश्चित रूप से ये विकास के महत्वपूर्ण संकेतक हैं, लेकिन विकास का अंतिम सत्य इनमें नहीं, मनुष्य के जीवन में छिपा है।
यदि किसी देश में इमारतें ऊँची होती जाएँ, लेकिन गरीब की झोपड़ी में भूख बनी रहे; अस्पताल अत्याधुनिक होते जाएँ, लेकिन गरीब मरीज इलाज के लिए दर-दर भटके; विद्यालयों की संख्या बढ़े, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कुछ लोगों की आर्थिक क्षमता तक सीमित रहे; युवा डिग्रियाँ लेकर रोजगार की तलाश में भटकते रहें; महंगाई परिवार की रसोई पर लगातार दबाव बढ़ाती रहे और जाति के नाम पर मनुष्य की सामाजिक प्रतिष्ठा तय होती रहे—तो हमें यह प्रश्न पूछना ही होगा कि आखिर यह विकास किसके लिए है?
विकास तब सार्थक होता है जब वह मनुष्य को अधिक स्वतंत्र, अधिक सुरक्षित, अधिक सम्मानित और अधिक समान बनाता है।इसीलिए आज विकास के विमर्श के केंद्र में एक मूल प्रश्न स्थापित करने की आवश्यकता है—
क्या भौतिक विकास के साथ मानवीय समता भी बढ़ रही है?
यदि उत्तर नकारात्मक है, तो विकास की दिशा पर पुनर्विचार आवश्यक है।
विकास की चमक और असमानता का अँधेरा:
हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि विकास के चमकदार दृश्यों के साथ असमानता की गहरी छाया भी दिखाई देती है।
एक ओर आधुनिक सुविधाओं से युक्त जीवन है, दूसरी ओर बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करता जीवन। एक ओर महँगे विद्यालयों और निजी विश्वविद्यालयों में अवसरों की बहुलता है, दूसरी ओर ऐसे बच्चे हैं जिनके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आज भी चुनौती है। एक ओर अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ हैं, दूसरी ओर बीमारी के सामने आर्थिक रूप से कमजोर परिवार असहाय हो जाते हैं।
इस विरोधाभास को केवल आर्थिक अंतर कहकर टाल देना समस्या की गंभीरता को कम करके देखना होगा।क्योंकि आर्थिक असमानता जब शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सम्मान और अवसरों की असमानता में बदल जाती है, तब वह पूरे समाज की संरचना को प्रभावित करती है।विकास की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं कि ऊपर कितना बढ़ा, बल्कि यह है कि नीचे खड़े व्यक्ति को ऊपर उठने के कितने अवसर मिले।
जाति : जन्म से चिपका हुआ असमानता का बोझ-
आधुनिक भारत ने संविधान के माध्यम से समानता और सामाजिक न्याय का मार्ग चुना। लेकिन सामाजिक जीवन में जाति आधारित भेदभाव और ऊँच-नीच की मानसिकता अनेक रूपों में आज भी दिखाई देती है।
जातिवाद केवल किसी व्यक्ति के प्रति प्रत्यक्ष भेदभाव का नाम नहीं है। यह वह मानसिकता भी है जो मनुष्य की क्षमता, प्रतिष्ठा और सामाजिक स्वीकार्यता को उसके जन्म से जोड़ देती है।
किसी बच्चे की प्रतिभा उसकी जाति नहीं बताती।
किसी श्रमिक का पसीना उसकी जाति नहीं बताता।
किसी वैज्ञानिक का ज्ञान उसकी जाति नहीं बताता।
किसी लेखक की संवेदना उसकी जाति नहीं बताती।
फिर मनुष्य की सामाजिक कीमत जन्म से क्यों निर्धारित हो?मनुष्य पैदा होता है—जाति नहीं। जाति सामाजिक संरचना है; मनुष्यता सार्वभौमिक सत्य।
जातिविहीन समाज का अर्थ यह नहीं कि इतिहास में मौजूद जातिगत वास्तविकताओं को नकार दिया जाए। इसका अर्थ यह है कि जन्म आधारित ऊँच-नीच को भविष्य के समाज की नियति न बनने दिया जाए।
हमें ऐसी सामाजिक चेतना विकसित करनी होगी जहाँ किसी व्यक्ति की पहचान उसके जन्म से पहले उसकी मनुष्यता से हो।
गरीबी : केवल आय की कमी नहीं-
गरीबी को अक्सर खाली जेब से मापा जाता है, जबकि गरीबी वास्तव में अवसरों की कमी का भी नाम है।
गरीबी का बच्चा यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रहता है तो उसकी अगली पीढ़ी भी सीमित अवसरों में फँस सकती है। परिवार में गंभीर बीमारी आ जाए तो वर्षों की बचत समाप्त हो सकती है। रोजगार न मिले तो शिक्षा का निवेश अधूरा पड़ सकता है। महंगाई बढ़े तो परिवार को भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य के बीच चुनाव करना पड़ सकता है।
इसलिए गरीबी के विरुद्ध संघर्ष केवल आर्थिक सहायता देने से पूरा नहीं होगा।
गरीबी को तोड़ने के लिए समान शिक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, कौशल, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक अवसरों की आवश्यकता है।
गरीब व्यक्ति को हमेशा सहायता पाने वाला व्यक्ति बनाकर रखना समाधान नहीं है। उसे वह अवसर देना होगा जिससे वह अपनी क्षमता के बल पर आगे बढ़ सके।
गरीबी का स्थायी उपचार दया नहीं, अवसर हैl
समान शिक्षा : समान भविष्य की पहली शर्त-
शिक्षा समाज की सबसे शक्तिशाली परिवर्तनकारी शक्ति है। लेकिन यदि शिक्षा स्वयं असमान हो जाए तो वह सामाजिक समानता का माध्यम बनने के बजाय असमानता को आगे बढ़ाने का साधन भी बन सकती है।
आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि कितने बच्चे विद्यालय जा रहे हैं। प्रश्न यह है कि वे किस स्तर की शिक्षा पा रहे हैं।
क्या गाँव के बच्चे और महानगर के बच्चे समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकारी हैं?
क्या गरीब परिवार के बच्चे को भी वही वैज्ञानिक दृष्टि, वही पुस्तकालय, वही प्रयोगशाला, वही डिजिटल संसाधन और वही अवसर मिलना चाहिए जो आर्थिक रूप से सक्षम परिवार के बच्चे को उपलब्ध हैं?
उत्तर स्पष्ट है—हाँ।
शिक्षा में आर्थिक और सामाजिक विभाजन जितना गहरा होगा, अवसरों की खाई उतनी ही चौड़ी होगी।इसलिए आवश्यकता ऐसी शिक्षा व्यवस्था की है जिसमें विद्यालय की गुणवत्ता बच्चे के परिवार की आर्थिक क्षमता से निर्धारित न हो।
हर बच्चे को ऐसी शिक्षा मिले जो उसे केवल परीक्षा पास करना न सिखाए, बल्कि प्रश्न करना, तर्क करना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना, संविधान को समझना, विविधता का सम्मान करना और अन्य मनुष्यों की गरिमा स्वीकार करना सिखाए।
समान शिक्षा केवल शिक्षा नीति का प्रश्न नहीं; यह सामाजिक न्याय का प्रश्न है।
चिकित्सा : जीवन बचाने का अधिकार-
शिक्षा के बाद सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक आवश्यकता स्वास्थ्य है।
बीमारी गरीब और अमीर में अंतर नहीं करती, लेकिन इलाज की सुविधा आर्थिक असमानता से प्रभावित हो सकती है।
किसी संपन्न परिवार के लिए महँगा इलाज आर्थिक चुनौती हो सकता है; लेकिन गरीब परिवार के लिए वही इलाज जीवन और आर्थिक विनाश के बीच का प्रश्न बन सकता है।बीमारी केवल शरीर को प्रभावित नहीं करती। वह परिवार की अर्थव्यवस्था, बच्चों की शिक्षा और भविष्य की योजनाओं को भी प्रभावित कर सकती है।
स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल अस्पतालों की संख्या से नहीं, बल्कि नागरिक की वास्तविक पहुँच, उपचार की गुणवत्ता, दवाओं की उपलब्धता और आर्थिक सुरक्षा से भी परखा जाना चाहिए।
ग्रामीण भारत में मजबूत प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था, पर्याप्त चिकित्सा कर्मी, जाँच सुविधाएँ और आवश्यक दवाएँ उपलब्ध हों। सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों को ऐसा बनाया जाए कि गरीब नागरिक वहाँ उपचार कराने में हीनता महसूस न करे।
समान चिकित्सा सुविधा किसी पर उपकार नहीं; मानवीय गरिमा और जीवन की सुरक्षा का प्रश्न हैl
बेरोजगारी : डिग्री और अवसर के बीच बढ़ती दूरी
भारत का युवा केवल संख्या नहीं है; वह देश की ऊर्जा, आकांक्षा और भविष्य है।
लेकिन जब शिक्षित युवा वर्षों तक रोजगार की प्रतीक्षा करता है, परीक्षाओं और परिणामों के चक्र में उलझा रहता है या अपनी योग्यता से बहुत कम अवसर स्वीकार करने को विवश होता है, तब समस्या केवल व्यक्ति की नहीं रहती—वह समाज के भविष्य का प्रश्न बन जाती है।
रोजगार का अर्थ केवल नौकरी नहीं है। सम्मानजनक मजदूरी, सुरक्षित कार्यस्थल, सामाजिक सुरक्षा और आगे बढ़ने की संभावना भी रोजगार की गुणवत्ता का हिस्सा हैं।
ग्रामीण और छोटे शहरों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना, कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना, पारंपरिक कौशल को आधुनिक बाजार से जोड़ना, छोटे उद्यमों को अवसर देना और युवाओं को बाजार की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप कौशल उपलब्ध कराना आवश्यक है।
युवा को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार सृजित करने में सक्षम नागरिक बनाने की दिशा में भी सोचना होगा।
महंगाई : रसोई से भविष्य तक-
महंगाई का सबसे तीखा असर सीमित आय वाले परिवारों पर पड़ता है।
आय सीमित हो और भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास तथा परिवहन पर खर्च लगातार बढ़ता जाए, तो परिवार के सामने विकल्प सीमित होते जाते हैं।कई बार परिवार बच्चों की शिक्षा पर खर्च घटाता है। कई बार स्वास्थ्य संबंधी जरूरत टलती है। कभी पोषण प्रभावित होता है।महंगाई को केवल आर्थिक आँकड़े के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। उसके सामाजिक प्रभाव को भी समझना होगा।जब किसी परिवार की आय का बड़ा हिस्सा केवल जीवन चलाने में खर्च हो जाए, तो उसके सपनों के लिए क्या बचता है?
विकास की नीति का उद्देश्य ऐसी अर्थव्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें उत्पादन और बाजार की वृद्धि के साथ आम नागरिक की क्रय-क्षमता, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा भी मजबूत हो।
असमान शिक्षा, असमान चिकित्सा और असमान अवसर—एक ही समस्या की अलग तस्वीरें
जातिवाद, गरीबी, शिक्षा की असमानता, स्वास्थ्य की असमानता, बेरोजगारी और महंगाई को अलग-अलग समस्याओं की तरह देखने से उनकी जड़ तक पहुँचना कठिन होगा।
इनके बीच गहरा संबंध है।
गरीबी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से दूर कर सकती है।
शिक्षा की कमी रोजगार के अवसर सीमित कर सकती है।
बेरोजगारी गरीबी को बढ़ा सकती है।
गरीबी गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा तक पहुँच बाधित कर सकती है।
बीमारी परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर कर सकती है।
महंगाई कमजोर आय वाले परिवार की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करने की क्षमता कम कर सकती है।
और सामाजिक भेदभाव इन अवसरों की खाई को और गहरा कर सकता है।
इसलिए समाधान भी समग्र होना चाहिए।
समान अवसरों की ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनानी होगी जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार एक-दूसरे से जुड़े हुए अधिकार और अवसर बनें।
जाति से ऊपर उठे समाज की आवश्यकता-
जातिविहीन समाज का सपना केवल नारा नहीं है। यह सामाजिक लोकतंत्र की दिशा में एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है।
कानून भेदभाव पर रोक लगा सकता है, लेकिन सामाजिक चेतना को बदलने के लिए परिवार, विद्यालय और समाज को भी भूमिका निभानी होगी।
बच्चों को सिखाना होगा कि कोई जन्म से श्रेष्ठ या हीन नहीं होता।
विद्यालयों में विविधता के सम्मान को व्यवहारिक शिक्षा का हिस्सा बनाना होगा। सार्वजनिक संस्थानों में समान नागरिकता की भावना मजबूत करनी होगी। सामाजिक संवाद बढ़ाना होगा।
जाति की जगह मनुष्यता को सामाजिक संबंधों का आधार बनाना होगा।
विविधता रहे, पहचानें रहें, संस्कृतियाँ रहें—लेकिन ऊँच-नीच न रहे।
यही जातिविहीन समाज की मूल भावना हो सकती है।
विकास का पैमाना बदलना होगा-
अब समय आ गया है कि हम विकास की परिभाषा को व्यापक करें।
विकास का अर्थ केवल यह नहीं कि कितनी सड़कें बनीं। यह भी है कि उन सड़कों से कितने लोगों को अवसर मिला। सबका साथ सबका विकास सिर्फ नारा देने से विकास नहीं होता l
विकास केवल कितने अस्पताल बने, यह नहीं; यह भी कि गरीब मरीज को उनमें गुणवत्तापूर्ण इलाज मिला या नहीं।
विकास केवल कितने विद्यालय खुले, यह नहीं; यह भी कि वहाँ पढ़ने वाले बच्चे भविष्य के समान अवसरों तक पहुँच सके या नहीं।
विकास केवल रोजगार के आँकड़े नहीं; यह भी कि रोजगार कितना सुरक्षित, सम्मानजनक और टिकाऊ है।
और विकास केवल आर्थिक वृद्धि नहीं; विकास सामाजिक गरिमा, न्याय और समान अवसरों का विस्तार भी है।
समानता का अर्थ सबको एक जैसा बनाना नहीं-
समता का अर्थ यह नहीं कि समाज की विविधता समाप्त कर दी जाए।
समानता का अर्थ है—हर व्यक्ति को समान मानवीय गरिमा मिले और अपनी क्षमता विकसित करने का न्यायपूर्ण अवसर मिले।
जिसे अधिक आवश्यकता है, उसे अधिक सहायता देना असमानता नहीं, बल्कि अवसर की वास्तविक समानता की दिशा में कदम हो सकता है।
इसलिए समानता का सही अर्थ समझना होगा।
समानता का मतलब सबको एक जैसा परिणाम देना नहीं; समानता का अर्थ है कि किसी व्यक्ति का जन्म उसके अवसरों की सीमा तय न करे।
यही विचार सामाजिक न्याय को मानवीय आधार प्रदान करता है।
अब केवल विकास नहीं, समतामूलक विकास चाहिए
हमें विकास चाहिए—लेकिन ऐसा विकास जो समाज को जोड़ता हो।
हमें उद्योग चाहिए—लेकिन ऐसा उद्योग जो रोजगार और सम्मान पैदा करे।
हमें तकनीक चाहिए—लेकिन ऐसी तकनीक जो अवसरों की खाई कम करे।
हमें शिक्षा चाहिए—लेकिन ऐसी शिक्षा जो अमीर-गरीब के बीच भविष्य की दीवार न खड़ी करे।
हमें चिकित्सा चाहिए—लेकिन ऐसी चिकित्सा जो नागरिक की जेब देखकर जीवन का मूल्य निर्धारित न करे।
हमें आर्थिक वृद्धि चाहिए—लेकिन ऐसी वृद्धि जिसका लाभ समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँचे।
और सबसे बढ़कर—
हमें ऐसा समाज चाहिए जहाँ मनुष्य की कीमत उसकी जाति, संपत्ति या सामाजिक हैसियत से नहीं, उसकी मनुष्यता से तय हो।
अब समय है निर्णायक सामाजिक संकल्प का:
यह परिवर्तन केवल सरकार से माँगने का विषय नहीं है। सरकार की नीतियाँ आवश्यक हैं, लेकिन सामाजिक चेतना के बिना कोई नीति स्थायी परिवर्तन नहीं ला सकती।
परिवार को बदलना होगा।
विद्यालय को बदलना होगा।
सामाजिक व्यवहार को बदलना होगा।
भेदभाव की भाषा को बदलना होगा।
अवसरों की संरचना को बदलना होगा।
और सबसे पहले—मनुष्य को मनुष्य की तरह देखने की दृष्टि बदलनी होगी।
आइए, हम यह स्वीकार करें कि भूख और अपमान के बीच कोई विकास महान नहीं हो सकता।
आइए, हम यह सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़ें कि किसी बच्चे का भविष्य उसके माता-पिता की आर्थिक स्थिति से तय न हो।
आइए, हम ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था की माँग करें जहाँ गरीब का जीवन भी उतना ही मूल्यवान समझा जाए जितना किसी संपन्न व्यक्ति का।
आइए, हम ऐसी रोजगार व्यवस्था की दिशा में बढ़ें जिसमें युवा की ऊर्जा बेरोजगारी की प्रतीक्षा में नष्ट न हो।
आइए, हम ऐसी सामाजिक चेतना विकसित करें जिसमें जाति परिचय हो सकती है, लेकिन श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं।
और आइए, हम अपने समय का सबसे बड़ा सामाजिक संकल्प लें—
समान शिक्षा के लिए,
समान चिकित्सा के लिए,
समान अवसरों के लिए,
सम्मानजनक रोजगार के लिए,
गरीबी के उन्मूलन के लिए,
महंगाई के बोझ को कम करने वाली संवेदनशील व्यवस्था के लिए,
और जाति आधारित ऊँच-नीच से मुक्त मानवीय समाज के लिए।
क्योंकि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता। राष्ट्र उसके नागरिकों के जीवन से बनता है।
इमारतें राष्ट्र की ऊँचाई दिखा सकती हैं, लेकिन मनुष्य की गरिमा उसकी वास्तविक ऊँचाई तय करती है।
सड़कें दूरी घटा सकती हैं, लेकिन समानता सामाजिक दूरी घटाती है।
विद्यालय ज्ञान दे सकते हैं, लेकिन समान शिक्षा अवसरों की दीवारें तोड़ती है।
अस्पताल जीवन बचा सकते हैं, लेकिन समान चिकित्सा सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करती है।
और कानून अधिकार दे सकता है, लेकिन मानवीय चेतना ही समाज को बराबरी से जीना सिखाती है। हमें केवल विकसित भारत नहीं, समतामूलक भारत बनाना होगा।
ऐसा भारत जहाँ किसी बच्चे से यह न पूछा जाए कि वह किस जाति का है, बल्कि यह पूछा जाए कि वह क्या बनना चाहता है।
ऐसा भारत जहाँ गरीब होना अपराध न हो, बेरोजगार होना अभिशाप न हो और बीमारी परिवार को आर्थिक विनाश की ओर न धकेले।
ऐसा भारत जहाँ शिक्षा अवसर का दरवाजा हो, चिकित्सा जीवन की सुरक्षा हो, रोजगार आत्मसम्मान का आधार हो और मनुष्यता सबसे बड़ी पहचान हो।
भौतिक विकास हमें साधन दे सकता है; मानवीय समता ही उन साधनों को सार्थक बनाती है।
इसलिए आज आवश्यकता केवल विकास की गति बढ़ाने की नहीं है—विकास की दिशा को मानवीय बनाने की है।
क्योंकि—
**जहाँ अवसर बराबर नहीं, वहाँ विकास अधूरा है।
जहाँ सम्मान बराबर नहीं, वहाँ लोकतंत्र अधूरा है।
जहाँ शिक्षा बराबर नहीं, वहाँ भविष्य बराबर नहीं।
जहाँ चिकित्सा सबकी पहुँच में नहीं, वहाँ जीवन सुरक्षित नहीं।
और जहाँ मनुष्य मनुष्य से ऊँचा-नीचा है, वहाँ सभ्यता अभी अधूरी है।**
आइए—विकास को ऊँचाई दें, लेकिन उसके साथ मनुष्यता को भी गहराई दें।
आइए—ऐसा समाज बनाएँ जहाँ जन्म नहीं, कर्म और मनुष्यता पहचान बने।
आइए—समान शिक्षा, समान चिकित्सा और समान अवसरों के आधार पर जातिविहीन, समतामूलक और मानवीय भारत के निर्माण का संकल्प लें।
यही सच्चा विकास है।
यही सामाजिक न्याय है।
यही मानवीय सभ्यता की अगली मंजिल है।
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