कहानी :मालकिन/नन्दलाल भारती
रामदास और रामदुलारी मामूली खेतिहर थे,पेट-पर्दा बड़ी मुश्किलों से चल रहा था,उनकी उम्मीदें बड़े बेटे भीमदास पर टिकी हुई थीl यह अभावग्रस्त परिवार पीढ़ियों से उद्धार की बाट जोह रहा था l जयदास,दूसरा बेटा अभी जूनियर हाई स्कूल में ही पढ़ रहा थाl जयदास को सहारे की जरूरत थी,यह काम भीमदास ही कर सकता था l
भीमदास बीए की परीक्षा पास भी नहीं कर पाया था कि उसके पिता रामदास ने बड़े उछाह के साथ उसका का ब्याह उर्मिला से कर दिया l
रामदास के परिवार के लिए अभी दो जुन की रोटी,अच्छे कपड़े,पक्के घर की आस सिर्फ सपना था, हकीकत तो अभी बहुत दूर भविष्य गर्भ में छिपी हुई थी,सच तो किसी को मालूम भी तो न था l भविष्य आदमी कहाँ पढ़ पाता है ?
उर्मिला का आगमन रामदास के घर-परिवार के लिए शुभकारी हुआl उर्मिला बहुत पढ़ी-लिखी तो नहीं थी पर अक्षर ज्ञान उसे था l अफसर बाप और गृहनीति में निपुण माँ -बाप की बेटी थी उर्मिला l
रामदुलारी ने बड़ी बहू उर्मिला को घर में पांव रखते ही मालिकाना का जिम्मा सौंप दिया था l बड़ी बहू उर्मिला को मालिकाना की ताली-कुंजी सौंप कर रामदुलारी मचिया पर बैठकर हुक्की गुड़गुड़ाने की जगह रामदास के साथ खेतीबारी के पैतृक उद्यम में जुट गयी l
रामदुलारी ने गृहनीति का मूलमंत्र उर्मिला को दे दी थी, जो एक पहेली जैसा था, जिसे उर्मिला को सुलझाना था l रामदुलारी ने उर्मिला को गले लगाकर कहीं थी,उर्मिला बेटी तू इस परिवार की मर्यादा है, इसका ख्याल रखना l
उर्मिला मेरी सासु माँ ने मालकिन के काँटों का ताज मुझे दिया थाl घर में न दरवाजा था, ना कोई ताला-कुंजी,दो कमरे का घर था, जिसमें हवा-पानी और रोशनी बरोबर आती जाती थी l
मैं तुम्हें ग्यारह घर के मांटी के महल की कुंजी सौंप रही हूँl इस महल में कुठुली-कुंडा और दीवाल में एक खुफिया जगह भी है, जहां हीरे-मोती, जवाहरात, रूपये पैसे रखे जा सकते हैं, पर कहीं कुछ नहीं है,सिर्फ सीजन में कुठूलियां भरती है, कुंडे में गुड़ भरता है, बाकी समय में कुठुली-कुंडा सब खाली रहता है,अब ये सब तुम्हारे हवाले है,हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है l
उर्मिला के कुशल-प्रबंधन में परिवार की गाड़ी धीरे-धीरे गति पकड़ने लगी, जिस घर में खाने के लिए अनाज की कमी हो जाया करती थी, उसी घर के अनाज के खाली कुठुली में अनाज और कुंडे में गुड़ भी रहने लगाl रामदास के रुतबे में बदलाव आने लगा,वे अब सुबह शाम मचिया पर बैठकर हुक्का गुड़गुड़ाने लगेl दरवाज़े पर दो चार लोगों की मजलिस भी जमने लगी l
उर्मिला अपने परिवार के लिए ही नहीं पूरे गांव की औरतों के लिए नजीर बन गयी थी l गांव के लोग उर्मिला जैसी बहू की मन्नत करने लगे थे l उर्मिला के हाथ में परिवार के सत्ता की बागडोर आते ही, वह बहुत जिम्मेदार हो गयी थी l उर्मिला जिम्मेदारी के बोझ से दबी होकर भी गर्वान्वित महसूस कर रही थी l
पति भीमदास की पढ़ाई में उर्मिला कभी बाधक नहीं बनीl भीमदास बीए की फाइनल परीक्षा पास हो गया l घर परिवार ही नहीं पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ पड़ी l भीमदास अपनी खानदान का पहला बीए पास लड़का थाl रामदास के खानदान के इस गर्व में पूरा गांव शामिल था l
गांव की यही ख़ूबसूरती तो दुनिया को रिझाती थी l गांव के एक व्यक्ति का सुख-दुःख पूरे गांव का दुःख-सुख होता था l गांव के किसी एक की बहन-बेटी पूरे गांव की बहन-बेटी होती थीl बदलते युग में पछुवाई, देश के सुदूर गांवों की विशुद्ध आहो-हवा को दूषित करने लगी है l
भीमदास बीए पास कर नौकरी की तलाश देश की राजधानी पहुंच गया l वहां उसे बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा l एक सरकार का कार्यकाल खत्म हो गया दूसरी सरकारी आ गयी पर भीमदास से सरकारी नौकरी कोसों दूर थी l
भीमदास किसी काम को कभी छोटा नहीं समझा,काम किया पैसा कमाया,खुद की खुराकी चलाया l पिताजी को हर महीने सौ रूपये ही सही मनिआर्डर किया l गाँव में उर्मिला मालकिन होने की पूरी जिम्मेदारी निभा रही थी,उसके गहने पलहना बाजार की के साहूकार की तिजोरी में ऐसे गए कि फिर कभी लौटे नहीं l
जिम्मेदारी के बीच उर्मिला और भीमदास दो बच्चों के माँ-बाप बन गए l जयदास का ब्याह भंवरीदेवी से पूरे धूम-धड़ाके से कर रामदास ने अपना फर्ज़ पूरा कर मानो गंगा नहा लिया l
लम्बी बेरोजगारी के बाद भीमदास को मल्टीनेशनल कम्पनी में नौकरी मिल गयी l भीमदास को सरकारी नौकरी नहीं मिलने का मलाल तो था l इस एमएनसी नौकरी में कमी थी तो पेंशन की बाकी रिटायरमेंट तक सरकारी सुविधाओं से अच्छी सुविधाएं यहां थी l
रामदास और रामदुलारी को पोते-पोती के भविष्य की चिंता सताने लगी तो वे उर्मिला को पोते-पोती,दीक्षा और परीक्षित के साथ शहर भेज दिए l दीक्षा और परीक्षित शहर के स्कूल में पढ़ने लगे l शहर में उर्मिला तीसरे बेटे दीक्षित को जन्म दे दिया l शहर से गांव तक की मालकिन उर्मिला ही थी,जो जिम्मेदारी से निभा रही थी l
जयदास की घरवाली भंवरी को उर्मिला ने छोटी बहन बना ली थी l गांव की माटी के महलनुमा घर के सामने पक्का घर,घर बाउंड्री पर बड़ा सा लोहे का सुनहरे रंग का फाटक लग गया l रामदास चाहरदिवारी के अंदर जामुन के पेड़ के नीचे सुबह-शाम जमींदारों जैसे ठाट के साथ हुक्का गुड़गुड़ाते, मन ही मन अघाते नहीं थकते l
उर्मिला को भंवरी और जयदास के दोनों बच्चों शुम्हंकार और रिया के पढ़ाई लिखाई की फ़िक्र सताने लगी lशुम्हंकर उम्र में दीक्षित से चार साल बड़ा थाl दीक्षित पहली कक्षा में और शुम्हंकार भी पहली में ही l जयदास ने अपने बेटे शुम्हंकार को भाई-भौजाई के पास शहर में पढ़ने के लिए पहुँचा दिया l
भाई-भौजाई भीमदास और उर्मिला ने शुम्हंकार को ही नहीं उसके माँ-बाप,बहन की अपने बच्चों की तरह देखभाल किया, बच्चों को पढ़ाया लिखाया, बच्चे कामयाब भी हुए l इस बीच रामदास और रामदुलारी पंचतत्त्व में विलीन हो गए l
दीक्षा के हाथ पीले कर,साल भर बाद भीमदास ने परीक्षित की शादी तथाकथित नगर सेठ-सेठानी की बेटी अभिलाषा के साथ बिना एक रूपये लिए ब्याह कर दियाl अभिलाषा के आते ही परिवार में भूकम्प आ गया,सप्ताह भर में बड़े-बड़े इल्जाम लगाकर अपने कुलबधु होने के धर्म को कलंकित कर वापस बाप के घर और बाप के घर से परीक्षित के पास शहर फिर ससुराल की तरफ मुड़कर नहीं देखी और नहीं परीक्षित को देखने दी l बाद में अभिलाषा के तथाकथित नगर सेठ-सेठानी पिता-माता की असलियत सामने आ गयी वे एक बहुरुपिये ठग निकले l
ठग की बेटी ने हाई प्रोफेशनली एडिकेटेड परीक्षित का ऐसा माइंडवाश कर दिया कि वह भी विरोधी बन गया, इसका भरपूर फायदा बहुरुपिये ठग उठा रहे थेl परीक्षित माँ-बाप को ही दोषी मानने का अपराध कर रहा था l परीक्षित की शादी के कई साल बीत गए, एक बेटे का बाप भी बन गया पर परिवार की याद न आयी l
अभिलाषा को ससुराल के मालिकाना से कोई लगाव नहीं था,उसे मायके के मलिकाने की फ़िक्र थी,उसे फिक्र थी भेड़-बकरियो जैसे बहनों-भाई और बहुरुपिये माँ-बाप कीl अभिलाषा परीक्षित के साथ मारपीट भी करने से परहेज न करती थी उसके माँ-बाप भी परीक्षित के माँ-बाप को तरह-तरह की धमकी के साथ उसको टार्चर कर कामधेनु की तरह दूह रहे थे l
परीक्षित कसाई के खूंटे पर बधी गाय की तरह सास-ससुर और अभिलाषा का जुल्म सह रहा था परन्तु माँ-बाप के साथ खड़ा नहीं हो रहा थाl शुम्हंकार भी उड़ान भरने लगा था, उसका भी ब्याह भीमदास और उर्मिला ने बड़ी धूमधाम से किया l शुम्हंकार के ब्याह में भरपूर दहेज़ भी मिला, दहेज देखकर भंवरी की आँख उलट गयी l
रिया के ब्याह में तो भीमदास ने बुढ़ापे के सहारे की रकम भी खर्च करने में कोई
कोतहाई नहीं बरता l रिया की डोली उठते ही भंवरी पूरे गाँव में कूद-कूद कर कहने लगी कि शुम्हंकार की शादी में दहेज नहीं मिलता तो बेटवा का ब्याह नहीं होताl शुम्हंकार को नौकरी नही मिलती तो रिया की शादी नहीं हो पाती l अब भंवरी ही नहीं जयदास को भी अभिमान आ गया, जयदास और भंवरी ने अब एक ताला-कुंजी के दो हिस्से कर लिए l
बड़ी बहू अभिलाषा की रिश्ते के प्रति बेवफाई और दग़ाबाजी से मर्माहत भीमदास बोला- उर्मिला कोई अपना नहीं हुआ l
उर्मिला बूढ़ी आँखों के आंसू सम्हालते हुए बोली-दीक्षित ने मालिक की जिम्मेदारी संभाल लिया है, तुम चिंता छोड़ो, सेहत का ख्याल रखो, सब अच्छा होगा l
भीमदास बोला-हाँ उर्मिला जानता हूँ, मुझे विश्वास है हमारे परिवार को एक सुयोग्य नई मालकिन जरूर मिलेगी l
नन्दलाल भारती
05/10/2025
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