कविता :मैं मय नहीं हूँ
कविता — नन्दलाल भारती
मैं मय नहीं हूँ,
माटी का पुतला,
प्रकृति की कृति हूँ,
क्षिति, जल, पावक, समीर, गगन का
अनमोल संगीत हूँ।
वीणा का तार हूँ,
प्रकृति का विस्तार हूँ,
सृष्टि के आँगन में
गूँजता जीवन का राग हूँ।
यही मेरी साँस है,
यही मेरा जीवन है,
इसी मिट्टी से जन्मा हूँ,
इसी मिट्टी में मिल जाना है,
इसके सिवा मेरा
और क्या ठिकाना है!
सच, मैं मय नहीं हूँ,
न मद का कोई संसार हूँ,
मैं समय का पुत्र हूँ,
सृष्टि के प्रवाह का
एक छोटा-सा आकार हूँ।
ईश्वर का निवास कहो,
या चेतना का उजास,
ब्रह्मांड का अंश हूँ मैं,
प्रकृति की धड़कन का
एक जीवंत एहसास हूँ मैं।
हवा के स्पर्श में,
नदियों के कलरव में,
पत्तों की सरसराहट में,
और उगते सूरज की आहट में,
मुझे अपना अस्तित्व मिलता है।
माटी की गंध में
मेरे पुरखों की स्मृतियाँ हैं,
बीजों की कोख में
आने वाले कल की संभावनाएँ हैं,
धरती के हर कण में
जीवन की अनकही कथाएँ हैं।
फिर किस बात का अहंकार,
किस बात का अभिमान?
जिस देह पर इतना नाज़ है,
वह भी प्रकृति की अमानत है,
मेरा होना भी
समय का एक पड़ाव है।
मैं माटी का पुतला,
प्रकृति की कृति हूँ,
पंचतत्त्व की स्वर-लहरी,
इस विराट सृष्टि की
एक छोटी-सी अभिव्यक्ति हूँ।
मैं अकेला कहाँ हूँ,
मेरे भीतर पूरा संसार है,
प्रकृति से मेरा जन्म है,
प्रकृति से ही मेरा प्यार है!
— नन्दलाल भारती
1/11/2026
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY