मैं भारत का हूँ l
मैं शुद्ध भारत का हूँ,
जातिवाद का बीज बोने वालों
कान खोलकर सुन लो
मैं तुमसे ज्यादा भारतीय हूँ
मैं तुमसे पहले से इस पवित्र माटी में जन्मा हूँ l
इसी भूमि ने मेरे श्रम से सोना उगला है
देश की माटी का रंग मेरे रग-रग में है
मैं भर्म की नहीं श्रम की खाता हूँ l
मैं भारत की माटी का हूँ
मैं भारत में जीता हूँ
मैं भारत की गाता और बजाता हूँ।
तुम मुझे अछूत कहते हो
तुम्हारी आदमियत विरोधी समझ से
मैं टूटा नहीं बिखरा नहीं
अपनी माटी को लहू से सींचा हूँ
मजबूत और मजबूत हुआ हूँ।
याद रखो वह दिन भी आएगा
जब मैं मालिक बनूंगा
कोई मुझे रोक नहीं पाएगा
और
ये दुनिया मेरे साथ होगी l
नन्दलाल भारती
21/04/2026
कविता :मैं जरूर उठूंगा
मैं जरूर उठूंगा, दुनिया जानेगी
तुम झूठे कल्पना लोक की रचना कर
स्वर्ग नरक की अवधारणा रचकर
मुझे दानव और तुम देव बनकर
तुम मुझे इतिहास से गायब कर सकते हो
पाखंडो से, झूठी-झूठी बातों का पहाड़ बनाकर
माटी के कणों की तरह
मैं फिर भी अपनी मिटी हस्ती पा लूंगा ।
मैं जानता हूँ मेरी उपस्थिति तुम्हें कचोटती है l
क्योंकि मैं आज भी जिंदा हूँ
तुम्हारे सदियों के दमन का विष पीकर l
मुझे विश्वास है, मैं जरूर उठूंगा
दुनिया जानेगी, पहचानेगी l
नन्दलाल भारती
कविता :कौन से विष वृक्ष हैं?
ये कौन से विष वृक्ष रोपे हैं
विदेशी नस्ल के नुमाइंदो ने
भारत भूमि पर जिन वृक्षों पर,
शूद्र-अशूद्र, छूत -अछूत की
फसल उगती है l
हाड़ फोड़ते भूमिहीन, हाशिये के लोग
विकास की बाट जोह रही भीड़
जातीय नफ़रत का शिकार लगती है
दुनिया देख रही है l
जातीय नफ़रत को ये दुनिया
मानवता के माथे पर
बदनुमा दाग कह रही है
जातीय नफ़रत के बीज बोने वालों की
मोटी चमड़ी पर कहाँ?
कोई फर्क पड़ रहा है?
नन्दलाल भारती
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