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Dr. Srimati Tara Singh
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“महावर”

 

“महावर”
बरसात की पहली फुहार के साथ ही गाँव की मिट्टी में एक अजीब-सी गंध घुल जाती थी—भीगी धरती की सोंधी खुशबू और खेतों में पसीना बहाते मजदूरों की पीड़ा का नमक। तेज बारिस में धान रोपती,कजरी गाती मज़दूर महिलाएं, उपर से पानी, पानी में बैठे बिया (धान की नर्सरी) उखाड़ते, सिर पर बिया का बोझ लादे रोपाई वाले खेत पहुंचाते मज़दूरl दूर-दूर तक फैले धान के खेत, मानो हरी चादर ओढ़े हुए हों, लेकिन उस हरियाली के नीचे दबे थे अनगिनत दुख,घाव और कराहें।
सुबह का सूरज जैसे ही क्षितिज से झांकता, गाँव के दलित बस्तियों में हलचल मच जाती थी । औरतें अपने बच्चों को लेटा छोड़, सिर पर टोकरी और हाथों में हिम्मत लिए खेतों की ओर निकल पड़तीं।
औरतें पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर वे भी धान की नर्सरी उखाड़तीं, कीचड़ में धँसकर रोपाई करतीं—दिन भर, बिना रुके, बिना थके… या यूँ कहें कि थकने का हक़ भी नहीं था।
उसी गाँव में रहती थी जमुनादेवी—एक गरीब दलित स्त्री, जिसके जीवन में संघर्ष ही संघर्ष भरा था। उसके लिए “महावर” सिर्फ एक रंग नहीं, बल्कि एक सपना था—एक ऐसा सपना जो उसने कभी देखा ही नहीं था। जहाँ बाकी औरतें त्यौहारों और मांगलिक अवसरों पर अपने पैरों में लाल महावर सजाती थीं, वहीं जमुना के पैर हमेशा कीचड़, घाव और फफोलों से सजे रहते थे।
जमुनादेवी का पति जगतराम ठाकुर चन्द्रनाथ का हरवाह था—एक ऐसा बंधन, जो पीढ़ियों से चला आ रहा था, जिसमें श्रम था, लेकिन सम्मान नहीं; जीवन था, लेकिन अधिकार नहीं।
धान की रोपाई अपने चरम पर थी। खेतों में पानी भरा था और उसी पानी में दिन-रात खड़े रहने से मजदूरों के पैर सड़ने -गलने लगे थे। जमुनादेवी के पैरों की हालत तो और भी बदतर थी—घुटनों से नीचे तक मवाद रिसता था, जैसे हर घाव उसकी मजबूरी का बयान कर रहा हो।
एक दिन, जब दर्द असहनीय हो गया, तो उसने अपने स्थान पर दूसरी मजदूरन भेज दी। लेकिन भूख और जिम्मेदारी उसे चैन से बैठने नहीं देती थी। घर में अनाज का एक दाना भी नहीं था। मजबूरी में उसने अपने सड़े हुए पैरों पर अलता पोत लिया—दवा के तौर पर, और शायद अनजाने में वही “महावर” बन गया।
टूटे हुए चप्पलों को रस्सी से बांधकर, उस पर कपड़ा लपेटकर, वह चल पड़ी ठाकुर की हवेली की ओर—अपनी मेहनत की मजदूरी लेने…
उसे क्या पता था कि उसके पैरों का वह अलता, हवेली के अहंकार में आग लगा देगा।
गरीबी क्या -क्या रंग दिखाती है?कहाँ -कहाँ बेइज्जती करवाती है? यह दर्द तो गरीबी से जूझ रहा आदमी ही समझता है l
जमुनादेवी ठाकुर के खेत में धान रोपने नहीं गयी, उसे अपने तन के कष्ट से एक दिन की मज़दूरी के नुकसान का दुःख था l
जमीन पर पैर पड़ नहीं रहे थे l दर्द से कराह रही थी l पंजे से मवाद निकल रहा था l घर में बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे l
दोपहर तक वह सड़े हुए बदन की खुजलाहट से तड़पती रही, फिर नीम की पत्ती उबाल कर घाव धोयी -नहायी l जमुनादेवी ने पैर के पंजो पर गाढ़ा अलता पोत कर कुछ देर बैठी अपनी नसीब पर रोती-बिलखती रही l
माँ का पांव पकड़कर बड़ा बेटा चमन, वही बगल में बैठकर पूछा -माई बहुत दर्द हो रहा है?
नहीं बचवा l दर्द से मज़दूर डरेगा तो जीयेगा कैसे? ब्राह्मणवादी व्यवस्था में l मझधार में फंसी नैया जब तक किनारे नहीं लगेगी तब तक दर्द तो ढोना ही पड़ेगा बेटवा जमुनादेवी बोली l
चमन बोला-मईया मैं नैया किनारे लाऊंगा l
जमुनादेवी बोली - पढ़-लिख लो बेटवा l सारा भंवजाल तो तुम्हारे माथे है l हे भगवान कहते हुए वह उठी और मज़दूरी लेने के लिए काँपते पैरो पर बांस के डंडे के सहारे हवेली की ओर चल पड़ी l
जमुनादेवी जैसे ही ठाकुर की हवेली के फाटक पर पहुंची लबरुआ ठाकुर का शेरनुमा पालतू कुत्ता भौकने लगा ल
लबरुआ की भौं-भौं से ठाकुर चन्द्रनाथ का बेटा कुटिलनाथ जो पूरे गांव का कुख्यात बदमाश था,जिसे हवेली वाले सुन्ना बाबू के नाम से बुलाते थे lवही लाठी लेकर फाटक की ओर दौड़ा l वहां तो जमुनादेवी थी l
कुटिलनाथ बोला-अबे लबरुआ महरिन को नहीं पहचानता lलबरुआ पूँछ हिला रहा था l कुटिलनाथ जमुनादेवी का नख से शीश तक. मुआयना किया फिर वही से चिल्लाया -हवेली वालों सावधान महरिन जमुनादेवी पधार रही हैं l
काश जीवन में ऎसा दिन भी आता जमुनादेवी बोली l
कुटिलनाथ पूछा -क्या बोली महरिनिया?
जुमनादेवी बोली -क्या बोलूंगी? बोलने लायक हूँ क्या?
कुटिलनाथ बोला -अब कैसे बनोगी? पांव में महावर, हाथ में मेहंदी गद्देदार सैंडिल अब किस दिन की इंतजार है l हवेली का राजकुवर जय -जय कर रहा है l
जमुनादेवी बोली - गरीबी का चीरहरण कर रहे हो l तुम्हारी अंखिया फूट गयी है क्या?सड़े हुए पांव पर अलता लगायी हूँ l
जमुनादेवी की बात सुनकर कर बीता भर के ठाकुर के लौंडे के अंदर से जमींदारी का रूआबी ज्वालामुखी फूट पड़ा l वह लाठी हवा में घुमाते हुए चिल्लाया चमाइन तेरी इतनी हिम्मत l
इस हवेली में कई ज़ालिम थे l चन्द्रनाथ के बाप पुंजनिहोरी तो अगर मज़दूर देरी से हवेली पहुंचता तो पेड़ में बांधकर लाठी से मारता था l
चन्द्रनाथ का भाई बरखनाथ तो मेड़ पर चलती हुई मज़दूर बस्ती के लोगों को चाहे स्त्री हो या बच्चा,चोरी का झूठा इल्जाम लगाकर लातमुक्का बरसा देता था l ऎसा ही कमीना था रबीनानाथ जो जमुनादेवी के बेटवा चमन को मेड़ पर घास काटने के जुर्म बहुत मारा थाl चमन की रीढ़ की हड्डी बोल गयी थी, पसलियां हिल गयी थी l
खैर चंद्रनाथ कोई शरीफ नहीं था बस वह लात मुक्का नहीं जबान चलाता था कई बार तो झूठे चोरी के इल्जाम में जमुनादेवी को बेइज्जत कर चुका था l
हवेली वाले इतने शातिर थे कि हवेली में चोरी की झूठी रिपोर्ट बस्ती के नवजवानों के खिलाफ पुलिस थाने लिखवा देते,पुलिस उन्हें उठा ले जाती,पुलिस पानी पी-पी कर इन नवजवानों की हड्डीयां चटकाते फिर दो चार दिन बाद खुद छुड़वा देते l इतने ज़ालिम थे, ये जमींदार लोग l वैसे गांव के सभी जमींदार एक जैसे थे,, उनका जमीर गिर चुका था l
जमुनादेवी बोली -क्या कर लोगे, लाठी से मारोगे ? पुलिस में रिपोर्ट करोगे कर दो, मैं अब नहीं डरती सुन्ना ठाकुर l
तुम ठकुराइन के पेट से पैदा हुए हो पर जीवन मैंने दिया है l मैं अपना दूध ना पिलाती तो आज तुम लाठी नहीं भांजता, हड्डीयां गल चुकी होती l अपनी माँ से पूछ लेना l
तुम और तुम्हारी हवेली मेरे परिवार का कर्ज सात जन्म तक नहीं उतार पाओगे l मेरी और मेरे पति के दर्द पर ये हवेली खड़ी है, जिस दिन दर्द का पहाड़ हिलेगा हवेली भरभरा कर गिर पड़ेगी l
कुटिलनाथ बोला-चमारिन धमकी दे रही हो l अरे हवेली वालों... सुनो... सुनो जमुनादेवी धमकी दे रही है l
जमुनादेवी बोली -परमात्मा से डरा करो l बड़े -बड़े राजा महराजा माटी में मिल गयी l जिन गोरे अंग्रेजों के राज में सूरज नहीं डूबता वह खत्म हो गया l ये काली ठकुरायी कितने दिन चलेगी कहते हुए जमुनादेवी महिलाओ के दालान के सामने नीम तक आ गयी l
कुटिलनाथ बोला -अब आगे नहीं बढ़ना, जहाँ हो वही खड़ी हो जाओ जमुनादेवी अब और गुनाह बर्दास्त नहीं l कुटिलनाथ की दहाड़ सुनकर बड़ी ठकुराइन दालान में आ गयीं और बोली छोटे सुन्नाबाबू क्यों हवेली सिर पर उठा रहे हो l
कुटिलनाथ बोला - दादी माँ मैं नहीं ये जमुना हवेली में आतंक मचा रही है,सामने तो देखो -चप्पल, महावर मेंहदी l अरे दिखाओ दिखाओ दादी माँ को महावर कितनी अच्छी रची है?
बूढ़ी ठकुराइन माथा ठोंकते हुए बोली -जमुना चप्पल, महावर,मेंहदी ये सब क्या है?तुमको पता है हवेली में तुम लोगों को जूता -चप्पल पहनकर आना मना है l
जमुनादेवी ने आंसू आँचल में पोंछते हुए बोली क्यों -ठकुराइन हम लोग आदमी नहीं होते, हमारा दुःख -दर्द, दुःख -दर्द नहीं होता क्या? ठकुराइन हम गुलाम नहीं हैं l मेहनत मजदूरी करते हैं, पसीने की रोटी खाते हैं l हवेली से खैरात नहीं मिलती है l मज़दूरी लेने आयी हूँ बस...जिन लोगों का जमीर मर गया हो वे लोग मज़दूरों का दुःख-दर्द नहीं समझते l
इतनी में बड़ी मालकिन बीच दरवाज़े में खड़ी होकर बोली जमुनादेवी तेरी इतनी हिम्मत हवेली में जबान लड़ा रही हो l
जमुनादेवी बोली -ठकुराइन ये भी दिन बीत जायेगा l दस दिन की, दो आदमी की मज़दूरी बाकी है दे दो, और हाँ आदमी के खाने लायक अनाज देना, कंकड पत्थर, भूसा -गांठ मत मिला देना l एक बात और ईमानदारी के तराजू पर तौलना कहते हुए जमुनादेवी कराहते डंडे के सहारे दालान के दरवाज़े पर बैठ गयीं l
बड़ी मालकिन ने मज़दूरी तौल दी l जमुना देवी रक्त के आंसू पीते हुए गठरी सिर पर लादे वापस आयी, दर्द में कराहती हुई बेचारी कुटी -पीसी, चूल्हा फूंकी तब जाकर बच्चों के पेट में रोटी गयीं l
जमुनादेवी उस दिन हवेली से लौटी तो उसके कदम पहले से भी ज्यादा भारी थे। आँखों में आँसू थे, लेकिन उनमें एक अजीब-सी दृढ़ता थी—जैसे भीतर कहीं एक चिंगारी सुलग उठी हो।
वह रात भर सो नहीं पायी । दर्द सिर्फ पैरों में नहीं था, आत्मा तक उतर गया था।उसकी आत्मा कॉप गयी थी उसने आसमान की ओर देखा और शिकायत भरे लहजे में धीमे स्वर में बोली —
“हे परमेश्वर … अगर मेरे श्रम में सच्चाई है, तो इस अन्याय का अंत अब तो कर दो … इस हवेली का घमंड कब टूटेगा… सत्यानाश कब होगा…?
समय कभी एक-सा नहीं रहता।बरस डर बरस बीतते गए। मौसम बदले, पीढ़ियाँ बदलीं। वही गाँव, वही खेत-खलिहान , लेकिन अब हवा में घुल रही थी —बदलाव की लहर ।
जमुनादेवी और जगतराम इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों चमन और गुलशन को एक विरासत दी—शिक्षा की, आत्मसम्मान की और संघर्ष की।
दोनों बेटे पढ़-लिख गए थे l चमन ने शहर जाकर नौकरी कर लिया और गुलशन बिज़नेस दोनों भाईयों की मेहनत और माँ-बाप का आशीर्वाद रंग लाया l गाँव की तस्वीर बदलने लगी। जहाँ कभी ठाकुरों की हवेली सत्ता का प्रतीक हुआ करती थी, अब वही हवेलीयां जर्जर खंडहर में बदल चुकी थी।
लोग कहते थे—
“यह उसी जमुना का श्राप है… जिसने अपने घावों पर महावर लगाया था।”
एक दिन, उसी हवेली के सामने से गुजरते हुए चमन ठहर कर हवेली को निहारा उसकी आँखे सजल हो गयी । उसने उस टूटी दीवार को देखा और मन ही मन माँ को नमन किया। उस की आँखे बरस रही थी पर ना बदले की भावना थी ना शिकायत और , न गुस्सा—बस था तो एक गहरा संतुलन ।
चमन माँ को याद करते हुए धीरे से कहा—
“माँ… तुम्हारी ‘महावर’ आज रंग ला चुकी है।”तुम्हारी विरासत जगमगा रही है l
गाँव के बुजुर्ग जमुनादेवी की कहानी को सुनाते नहीं थकते । जब भी कोई अन्याय, अत्याचार, शोषण होता है, तो वे कहते हैं;
“समय सबसे बड़ा न्यायकर्ता है… और श्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता।” जिन अंग्रेजों के राज में सूरज नहीं डूबता था वह खत्म हो l
हवेली का घमंड मिट गया, जमींदारी का नाम दफन हो गया,लेकिन जमुनादेवी का संघर्ष अमर हो गया।
और आज भी, उस गाँव की माटी में “श्रमेव जयते”की मौन शंखनाद होती रहती है—चमन और गुलशन की तरक्की देखकर गांव वाले कहते हैं एक थी -जमुनादेवी जिसकी महावर अमर हो गयी l
नन्दलाल भारती
30/04/2026 

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