मुट्ठी भर समय
नन्दलाल भारती
बूढ़े पिता रोज शाम दरवाजे पर बैठकर बेटे की राह देखते थे। बेटा उसी शहर में रहता था, लेकिन उसके पास पिता के लिए समय नहीं था।
एक दिन पिता अचानक बीमार पड़े। पड़ोसी उन्हें अस्पताल ले गए। डॉक्टर ने कहा, “इलाज संभव है, बस अपनों का साथ चाहिए।”
बेटे को खबर मिली। उसने फोन पर पूछा, “कितना खर्च आएगा?”
पिता ने कमजोर आवाज में कहा, “पैसे नहीं बेटा… बस थोड़ी देर मेरे पास बैठ जाना।”
बेटा अस्पताल पहुँचा। पिता ने काँपता हाथ उसके हाथ में रख दिया।
“बेटा, याद है? बचपन में जब तुम चलना सीख रहे थे, तुम्हारी उँगली मैंने थामी थी।”
बेटे की आँखें भर आईं। उसने पिता का हाथ अपने दोनों हाथों में कसकर पकड़ लिया।
“बाबूजी, अब से उँगली थामने की मेरी बारी।”
बाबूजी मुस्करा दिए।
उस दिन बेटे को समझ आया—रिश्तों की असली पूँजी बैंक में नहीं, अपनों के साथ बिताए समय में जमा होती है।
नन्दलाल भारती
nlbharatiauthor@gmail. com
24/09/2026
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