लघुकथा:खुला बटुआ
अंकलजी पंद्रह दिन की नहीं आएगी बीस दिन की लेना पड़ेगाl
क्यों बेटा....?
अंकलजी दस-दस टेबलेट का पत्ता है, हम काटकर नहीं दे सकते, वैसे ये आपकी दवाइयां तो परमानेंट चलेगी,क्या दिक्क़त है?सेल्समेन मालिक की तरफ देखकर बोला l
बेटा अभी तुम नहीं समझोगे l
दवाई की ट्रे बिलिंग ऑपरेटर के पास पहुंच गयी l बिलिंग ऑपरेटर ने बिल और दवाई केशियर के पास सरका दी गयी l
केशियर ने आवाज़ दिया ब्राह्मशेवर l
जी.....ब्राह्मशेवरजी बोले l
तीन हजार दीजिए केशियर बोला l
तीन हजार..... ब्राह्मशेवर उदास और मधिम आवाज़ में बोलेl
ब्राह्मशेवरजी पांच-पांच सौ के चार नोट थमाते हुए बोले बस इतना है, बूढी काया और खुला बटुआ अपनी-अपनी मौन कथा कह रहे थे l
नन्दलाल भारती
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