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Dr. Srimati Tara Singh
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खलनायक

 

कहानी: खलनायक/नन्दलाल भारती

जातिवादी समाज का सबसे बड़ा अपराध सिर्फ़ वही अन्याय नहीं है,कि जो खुलेआम किया जाता है, बल्कि वह ख़ामोशी भी है, जो अन्याय देखकर भी तटस्थ बनी रहती है।

 यही ख़ामोशी जातिवाद के डरावने चेहरे को और अधिक मजबूत करती है।

जातिवादी द्रोणाचार्य नरेन्द्रराम जैसे ना जाने कितने छात्रों और कर्मचारियों का भविष्य और जीवन बर्बाद कर रहे हैं l ऐसी ढाठी अनगूंज रह जाती है l

खलनायकों के बीच नरेन्द्रराम जैसे लोग अपने कमजोर पंखो पर बुलंद विश्वास के बल पर मूक सितारा बनने लगते है,

तो ऐसे मूक नायकों के पर कतरे जाने लगते हैं, छोटी कौम के कारण इन्हें अपमान और उत्पीड़न सहना पड़ता है।

छोटी कौम के कारण बड़ी योग्यताएं, मेहनत,समर्पण, ईमानदारी सब कुछ सवालों के घेरे में आ जाता है,आदमियत के दुश्मनों की भौहें तन जाती हैं।

नौकरी की शुरुआत से ही नरेन्द्रराम के विरुद्ध घृणित मानसिकता के द्रोणाचार्य के रूप में बैठे ऑफिसर षड्यंत्र रचने लगे थे l

नरेन्द्रराम को प्रमोशन से वंचित किया जाता रहा , जबकि संस्थान में उससे कम योग्य बहुत बड़े-बड़े आफिसर थे, ऐसे लोग नरेन्द्रराम जैसे उच्चशिक्षित, प्रोफेशनली शिक्षित, 

काम के प्रति ईमानदार और अनुभवी के साथ अत्याचार कर रहे थे, नरेंद्र का भविष्य तय कर रहे थे प्रमोशन के रास्ते बंद करने में जूटे हुए थे l

नरेन्द्र कहता  हम भी आदमी हैं -यह कहना,हिन्दू धर्म की व्यवस्था में गुनाह हो गया है, मेरी सी आर ख़राब लिखी जा रही है,

मुझे अपमानित किया जा रहा है,प्रमोशन रोकने के रास्ते तैयार किये जा रहे ताकि मैं जहाँ से शुरू किया था, उससे आगे नहीं बढ़ सकूं l मूस मोटैइहै  लोढ़ा होइहै की कहावत चरितार्थ करूं।

मौका मिले तो हम भी आसमान नाप सकते हैं, सवाल तो अनुत्तरित था पर जातिवादियों के दमन का दम दम्भ भर रहा था l

नौकरी के प्रारम्भ से रिटायरमेंट के आखिरी वर्ष तक नरेन्द्रराम की सेवा पुस्तिका में झूठे आरोप दर्ज कर,

उसकी नौकरी को और कठिन बनाया जाता रहा श, ताकि नौकरी छोड़ दें। संघर्षरत नरेन्द्र था कि काम को पूजा समझकर शिद्द्त से कर रहा  था l

नरेन्द्रराम के भविष्य के खलनायकों की करतूतें उसे  तोड़ती नहीं , बल्कि मज़बूत बना रही  थी l 

नरेन्द्र व्यक्तित्व के गुर निखार सीखता और पीड़ा को कविता कहानी के रूप में लिपिबद्ध करता ताकि उसका भोगा हुआ यथार्थ सभ्य समाज के लिए आईना बन  सके l


नरेन्द्रराम, खेतिहर किसान माँ -बाप लक्ष्मीना और सुखीराम का पुत्र जन्मजात संघर्षरत था, पैदा होने के बाद भयंकर बीमारी की चपेट में आ गया था, उससे बड़ी बीमारी जाति उसके जीवन से जुड़ गयी थी l

नरेन्द्र के माँ-बाप उसकी जिंदगी के लिए दर-दर भटके, पत्थरों की मूर्तियों के सामने माथा पटके थे, मन्नते करते थे, 

वैसे ही वे जातिवाद की महामारी की विरासत में सौंपी असमानता और गरीबी की आग में सुलग रहे थे,अब नरेन्द्र की बीमारी से उनका जीवन दुःख के पहाड़ के नीचे दब गया था l

नरेन्द्र जब पैदा हुआ था तब छः दिन परिवार में उत्सव जैसा जश्न मना था, छः दिन सुखीराम के घर में सोहर की स्वर लहरियां खूब गूंजी थी l

 छठवें दिन छठ पूजी हुई थीl लक्ष्मीना और सुखीराम के अभावग्रस्त जीवन की ज्योति नरेन्द्र था l

किसी भविष्य बांचने वाले ने सुखीराम के बड़े भाई भगतराम को बताया था कि तुम्हारा भतीजा तुम्हारे परिवार में शिक्षा की ज्योति जलायेगा, परिवार में तरक्की लाएगा l

वही नरेंद्र किसी एक नई बीमारी की वजह से कब्र के करीब पहुंच रहा था l

नरेन्द्र के माता-पिता का नाम भले ही लक्ष्मीना और सुखीराम था पर उनके जीवन में ना लक्ष्मी थी ना कोई सुख, वैभव बस संघर्ष ही संघर्ष था l

जीवन के लिए जरुरी वस्तुओं का अभाव था,उपर से जातीय भेदभाव-शोषित-उत्पीड़ित जीवन के अलावा और कुछ न थाl

माँ-पिता की दुआओं का असर हुआ नरेंद्र बरसों की बीमारी से उबर गया, लक्ष्मीना और सुखीराम के सपने फिर से जी उठे थे l

नरेन्द्र बचपन से जिद्दी था परन्तु समझ और बुद्धि से होशियार था l नरेन्द्र के भविष्य के पन्नो में क्या छिपा था किसी को पता न था?

नरेंद्र होश संभालते ही माँ-बाप को तकलीफ से उबरने के बारे में गुनने-धुनने लगा था वह पिता के कामों में हाथ भी बंटाता था l 

माता-पिता ने अपने सामर्थ्य के अनुसार परवरिश किया था l नरेंद्र को पढ़ाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ा l

अभावग्रस्त जीवन में सुविधाओं के बारे में सोचना मुंगेरलाल के सपने जैसा ही होता है l 

नरेन्द्र के माता-पिता रोटी,कपड़ा और छाँव के लिए संघर्ष कर रहे थे l गरीबी और सामाजिक उत्पीड़न ने जीवन की गाड़ी दलदल में ढकेल दिया था l

नरेन्द्र के माता-पिता के लिए स्कूल की, फीस देना, कॉपी-किताब खरीदना दिन में तारे गिनना होता था l भला हो आज़ाद देश के संविधान का प्राइमरी स्कूल में कोई फीस नहीं लगती थी  l

छठवीं से आठवीं कक्षा तक सरकारी मान्यता की बाट जोह रहें जूनियर हाई स्कूल की फीस एक रूपये महीने थी पर हर महीने एक रूपये फीस चुकाना बहुत मुश्किल होता था l

नौवीं कक्षा में पहुंचने पर सरकारी छात्रवृति मिलने लगी थी,बीए तक की पढ़ाई के लिए स्कालरशिप तिनके का सहारा बन गयी थी l

वह एक जमाना था जब दलित युवा का बीए पास कर लेना पूरी बस्ती के लिए सम्मान की बात होती थी l

माँ-बाप को लगता था कि बेटवा के हाथ बीए की डिग्री आते ही बढ़िया नौकरी मिल जाएगी, कलेक्टर बन जायेगा, इसी सपने में नरेन्द्र के माता-पिता भी जी रहे थे l

अशिक्षित मासूम माता-पिता को कहां पता था कि सब कुछ इतना आसान नहीं है,सरकारी नौकरी पाने के लिए घुस लगता है,

कुछ माँ-बाप जिनके पास खेतीबारी की जमीन होती थी बेंचकर घूसखोरों का मुंह भरते थे l

नसीब वालों को नौकरी मिल भी जाती थी, कई पढ़े-लिखे नवजवान थक हारकर गले में फंदा डाल लेते थे ऐसा भी समय नरेन्द्र ने इस देश ने देखा l

नरेन्द्र ने सरकारी नौकरी के लिए भी कोशिश किया पर नाकामयाब रहा l

नरेन्द्र के भूमिहीन माँ-बाप के पास एक माटी के घर के अलावा कोई दूसरी चल-अचल सम्पति न थी l

 आख़िरकार नरेन्द्र को नौकरी की तलाश में गांव छोड़ना पड़ा पर नरेन्द्र ने नौकरी के साथ शिक्षा का पीछा नहीं छोड़ा l 

शहर में उसे बेरोजगारी ने भूखे पेट सोने तक को मज़बूर किया पर हारा नहीं l

बरसों की लम्बी बेरोजगारी के के बाद नरेंद्र की नसीब ने करवट लिया, उसे देश की बड़ी सहकारी कंपनी में नौकरी तो मिल गयी पर यहां नौकरी करना नरेन्द्र के लिए अग्नि परीक्षा से कम नहीं था  l

कंपनी में कुछ रूढ़िवादी अफसर किस्म के लोग कहते, यह विभाग तुम्हारे लोगों के लिए नहीं है, तुम गलत जगह आ गए हो l 

नरेंद्र बचपन से जिद्दी स्वभाव का था, उसने खुद पर विश्वास कर वादा कर लिया कि वह इसी कंपनी में नौकरी करेगा और अफसर भी बनेगा l

क्षेत्र प्रमुख, जे. रुजेंद्र कुमार जिसके अधीनस्थ नरेन्द्र कंपनी में काम कर रहा था,

इसी जातिवादी ने नोकरी की शुरुआत से नरेन्द्रराम की सी. आर. उसकी कर्तव्यनिष्ठा, और वफादारी के बिल्कुल विपरीत  लिखना शुरू कर दिया था। 

 जे. रुजेंद्र कुमार देखने में भद्र पुरुष थे, शालिन स्वभाव, मूंछ के नीचे मुस्कराने वाले अहिंसक पथ के अनुगामी भी, 

पर दिल से उतने ही हिंसक थे ख़ासकर दलित नरेन्द्रराम के लिए l

जे. रुजेंद्र कुमार, यह कारनामा अपने सामन्तवादी गॉड फादर मि.एस. विनय प्रताप, जो कंपनी में बड़े पद पर थे, उनको खुश करने के लिए कर रहे थे,

वे दलित विरोधी थे,वे नरेंद्र को चमारिया कहकर भी अपमानित कर चुके थे। वैसे इस कम्पनी में दलित गिने-चुने थे, उसमें से एक था अभागा नरेंद्र।


नरेंद्र साम्यवादी विचारधारा के लोगों को पसंद नहीं आ रहा था, जिसका नतीजा हुआ साल भर के अंदर नरेन्द्र को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया l

कुछ महीनों के और संघर्ष के बाद नरेन्द्र की वापसी हुई पर सी. आर. ख़राब लिखने का काला कारनामा बंद नहीं हुआl

तीन सामन्तवादी बड़े अधिकारी -मि.एस.विनय प्रताप, मि. एस. देशेन्द्र प्रताप और मि. अवधू प्रताप जो नरेन्द्र के खिलाफ थे और

जे. रुजेंद्र कुमार इन्हीं तीनों के इशारे पर 

नरेन्द्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर तरक्की की सीढ़ियाँ दनादन चढ़ रहे थेl 

नरेन्द्र की नौकरी बची हुई थी बस योग्यता एवं अनुभव के अनुसार प्रमोशन नहीं हो रहा था, जबकि नरेन्द्र के साथ के उच्चवर्णिक कर्मचारी अधिकारी बन गए थे l

मि.एस.विनय प्रताप, मि. एस. देशेन्द्र प्रताप और मि. अवधू प्रताप जो नरेन्द्र के खिलाफ थे इन्हीं तीनों की वजह से नरेन्द्र नौकरी में पिछड़ता जा रहा था, 

जे. रुजेंद्र कुमार इन्हीं को खुश करने के लिए नरेन्द्र की उड़ान के पर कतर रहे थे पर नरेन्द्र कंपनी के प्रति वफादार था ।

नौकरी के साथ उच्च शिक्षा की ओर रुख कर लिया, वह समझ गया था कि ये बबूल की छाया जैसे सामन्तवादी उसका प्रमोशन नहीं होने देंगेl 

ये लोग इतने शातिर मिजाज़ थे कि प्रमोशन तो होने नहीं दे रहे थेl उपर से 

कामचोर बता कर कंपनी में बदनाम भी कर रहे थे, जबकि नरेन्द्र एक उच्च शिक्षित,कुशल कर्मचारी था, ईमानदारी, लगन, मेहनत और निष्ठा के साथ नौकरी कर रहा था,

वह पंद्रह मिनट से आधा घंटा पहले दफ्तर पहुंचता और दफ्तर काम पूरा कर अक्सर देर से वापस  घर लौटता । 

नरेन्द्र कंपनी के प्रांतीय कार्यालय में अकेला स्नात्तकोत्तर,विधि स्नातक,मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में डिग्रीधारी अनुभवी और निपुण होकर भी प्रमोशन से दूर था, प्रताड़ित था।

नरेन्द्र तारीफ के काबिल था,कर्तव्यनिष्ठा के दुश्मन दबी जुबान मानते भी थे परन्तु ये लोमड़ी के स्वभाव वाले सामन्तवादी नरेन्द्र की प्रशंसा को व्यक्तिगत बेइज्जती समझते थेl

स्नातक  जे. रुजेंद्र कुमार कुछ ही बरसों में उच्च श्रेणी के अफसर बनकर देश के प्रधान दफ्तर में बड़ा अफसर बनकर ज्वाइन कर लिये  l 

जे. रुजेंद्र कुमार के स्थान पर अब क्षेत्र प्रमुख पहाड़ी बिल्ली के स्वभाव वाले मि. जुआर दुआरिका प्रसाद आ गए l

ए साहब भी ग्रेजुएट थे परन्तु जातीय योग्यता की दृष्टि से सर्वोत्तम थे, 

अब प्रांतीय प्रमुख एस.अवधू प्रताप थे, एस.अवधू प्रताप ज्वाइन करते ही नरेन्द्रराम को सख्त लहजे में कह दिया था कि ;

तुमको बड़ा अफसर बनने का इतना ही शौक है तो गले में बड़े अफसर की पट्टी डाल लोl ये सज्जन इतनी गिरी हुई सामन्तवादी विचारधारा के थे कि दलित इन्हें फूटी आंख नहीं भाते थे।

नरेन्द्र ने अपनी प्रतिज्ञा की गाँठ को और कस कर बांध लिया था l नरेन्द्र ने कभी न किसी कर्मचारी का अपमान किया न अफसर का इस बात को सभी मानते थे,

परन्तु पहाड़ी बिल्ली के स्वभाव वाले जुआर दुआरिका प्रसाद सार्वजनिक रूप से छोटे लोग कह कर अपमानित भी कर देते थे l

जुआर दुआरिका प्रसाद को अपमानित करने में तनिक लाज भी नहीं आती थी l शोषित वर्ग का नरेन्द्र, उच्च शिक्षित, 

कंपनी के प्रति वफादार और उच्च पद के योग्य होकर भी उत्पीड़न का शिकार हो रहा था प्रमोशन से दूर हाशिये पर पड़ा था l

नरेन्द्र शायद कंपनी में अकेला ऐसा कर्मचारी था जिसके प्रमोशन के खिलाफ  मि.एस.विनय प्रताप, मि. एस. देशेन्द्र प्रताप और एस.अवधू प्रताप और जे. रुजेंद्र कुमार जैसे बड़े -बडे 

अधिकारी मोर्चा संभाले हुए थे,अब तो जुआर दुआरिका प्रसाद भी शामिल हो गए थे। दलित होने की सजा नरेंद्र को ख़राब सी. आर. लिखकर दे रहे थे l

एक कहावत हैं -हीना रंग लाती है पत्थर पर घिस जाने के बाद, ऐसा ही कुछ हुआ नरेन्द्र के साथ हुआ और वह अफसर  बन गया ,

पर एक साजिश के तहत इन शोषित वर्ग के जातीय दुश्मनों ने हिटलर के स्वभाव वाले  निरोध कुमार सोहू के अधीनस्थ  दण्ड स्वरूप, स्टेट से बाहर ट्रान्सफर करवा दिया l

भारत की जातिव्यवस्था दुनिया की एक सबसे बुरी सामाजिक व्यवस्था है,वैसे ही दुनिया के सात सबसे बुरे लोग-एडोल्फ हिटलर, 

जोसेफ स्टालिन, माओत्से तुंग, पोल पॉट, और इदी अमीन थे वैसे ही कम्पनी में एक निरोध कुमार सोहू थे।

नरेंद्रराम के भविष्य के परोक्ष रूप से वैसे तीन खलनायक थे-जे. रुजेंद्र कुमार, जुआर दुआरिका प्रसाद और निरोध कुमार थे,

जो सिर्फ नरेन्द्रराम के दलित होने के कारण अपनी कलम की ताकत से भविष्य बर्बाद किये थे l इनमें एक और हिटलर के रूप में -निरोध कुमार आ गये थे।

नरेन्द्र एक कर्मयोगी था इस दण्ड को नसीब मान लिया,और जल्दी कारखाने के हजारों कर्मचारी के बीच ,

अपनी वफादारी से जगह  बना लिया  l अदने नरेन्द्र को वफादारी की बदौलत अब नई पहचान बन  रही थीl

नरेन्द्र की नई पहचान से निरोध कुमार   का इगो हर्ट होने लगा,इससे  निरोध साहब इतने खफा हो गए कि नरेन्द्र के अच्छे से अच्छा किये गए कामो  में गलतियां  निकालते, और लोगों के सामने बेइज्जत  करते, 

नरेन्द्र की बड़ी-बड़ी डिग्रीयों को निरोध कुमार फर्ज़ी कहते , इतना अपमान और सजा शायद पुलिस कस्टडी में नहीं मिलता  हो l

तेली जाति के निरोध कुमार के अपमान,अत्याचार की जानकारी नरेन्द्र राम ने कारखाने  के, इंचार्ज 

के साथ साझा कर दिया पर, समस्या के समाधान के बदले डेमोशन के साथ ट्रांसफर का आदेश।

नरेन्द्रराम निरोध कुमार की आँखों की किरकिरी तो पहले से था,अब ये महाशय अपने चम्मचो के सामने को नरेन्द्र को बातों की थर्ड डिग्री देने लगे थे l 

निरोध कुमार ने   सामन्तवादी अफसरों को भीपीछे छोड़ दिए  l

निरोध कुमार ने नरेन्द्रराम की सी. आर. में "वेरी लेज़ी ऑफिसर " लिखकर कलम तोड़ दिया था, जैसे जज मौत की सजा के बाद शायद कलम तोड़ देते हैं l

 इस ओबीसी वर्ग के आफिसर  की हरकत से सामंतवादियों तक होश उड़ गए थेl

नरेन्द्र के व्यावसायिक जीवन में फिर कभी प्रमोशन नहीं हुआ l नरेन्द्र उत्पीड़न को संयम,सब्र,उच्च शिक्षा और ज्ञान की बदौलत विरोधियों की छाती पर,

 नये अवतार के रूप कलम का खूंटा गाड़ कर नई दुनिया में प्रवेश कर गया और बन गया कलम का सिपाही---नरेन्द्र भारतीय l

 "नरेन्द्र भारतीय" को शिक्षा,कौशल और ज्ञान की दुनिया ने अलंकृत कर नायक बना दिया था जिस नायक को कभी एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी के,

नरेंद्र अपने काम की वजह से हजारों कर्मचारियों वाले कारखाने में  तनिक सम्मान पाने लगा था पर मि.निरोध कुमार, उसे फर्जी डिग्री वाला,वेरी लेजी आफिसर कह कर अपमानित कर रहे थे। 

असल में ये  नरेन्द्र के भविष्य के ही खलनायक नहीं थे, कंपनी की प्रतिष्ठा पर काला धब्बा थे l

अंततः दलित वर्ग का नरेंद्र उप प्रबंधक के पद पर कंपनी की पूरी वफादारी, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठ सेवा की इस यात्रा से मुक्त तो हो गया परन्तु जातिवादियों के पत्थर दिलों पर छाप छोड़ दिया l

नरेन्द्र उच्च शिक्षित, अनुभवी और होकर भी रिटायरमेंट तक योग्यता अनुसार प्रमोशन से वंचित किया जाता रहा, अपमानित किया जाता रहा,

परन्तु कंपनी से सम्मान सहित रिटायर हुआ था। नरेंद्रराम से नरेन्द्र भारतीय तक की यात्रा संघर्षपूर्ण,कष्टकारी रही l

 कलमकारी ने उसे वह सम्मान दिला दी जिसे कोई  जातिवादी अफ़सर या धार्मिक जातिवादी कभी छीन नहीं सकता था।

यह कहानी खलनायक सिर्फ़ एक व्यक्ति के संघर्ष की दास्तान नहीं है, बल्कि यह उस शक्ति की गवाही है जो अन्याय सहकर भी टूटती नहीं, बल्कि और धारदार बन जाती है।

मि. जे. रुजेंद्र कुमार,और मि. जुआर दुआरिका प्रसाद जैसे जातिवादी अफसरों ने दलित नरेंद्रराम की  सी.आर. ख़राब लिखकर 

प्रमोशन के रास्ते बंद करने की पूरी कोशिश किए थे परन्तु उम्मीद थी l

निरोध कुमार के हस्ताक्षर से "नरेन्द्रराम" की सेवा पुस्तिका में लिखी गयी वह एक पंक्ति—“Very lazy officer”नरेन्द्रराम के जीवन  की खूनी  लकीर बन गई ।

बत्तीस वर्षो की  लम्बी सेवा,ईमानदारी, कम्पनी के प्रति समर्पण, और निष्ठा  —सब उस एक वाक्य में दफन हो गया था।

नरेन्द्रराम ने कंपनी की प्रतिष्ठा को देखते हुए न कोई आंदोलन खड़ा किया,नहीं

अदालत का दरवाज़ा खटखटाया।उसने अपनी पीड़ा को शब्दों में ढालकर काग़ज़ पर उतारा ।

कलम के सिपाही की कलम आवाज़ बन गई,शब्द उसकी लड़ाई बने और संवेदना नरेन्द्र भारतीय  के अस्त्र बन गए।

नरेन्द्रराम से नरेन्द्र भारतीय की कविताएं, कहानियाँ पत्र-पत्रिकाओं, और इंटरनेट की दुनिया में जगह बनाने लगीं,उसे मान-सम्मान मिलने लगा। 

नरेंद्र भारतीय की पीड़ा अब केवल उसकी पीड़ा नहीं रही—वह हज़ारों वंचितों की आवाज़ बन गई,

जब उसकी कलम ने व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर किया,

जाति, सत्ता और स्वार्थ के गठजोड़ को नंगा कियाl इंसानियत को कुसुमित किया l

समय के साथ उसी निरोध कुमार—

जिसके एक हस्ताक्षर ने नरेन्द्रराम के पदोन्नति के सपनों को Very lazy officer” लिखकर रौद दिया था, वही अन्यायपूर्ण टिप्पणी नरेन्द्रराम से  नरेंद्र भारतीय बने के कलम की स्याही बन गई थी, 

नरेन्द्रराम  भले ही बड़ा अधिकारी नहीं बन पाया पर  नरेन्द्र भारतीय के नाम से जाना पहचाना गया,नायक बना,उसको मिला सम्मान, पहचान और आत्मगौरव । 

बड़ा अफसर, निरोध कुमार  कर्तव्यनिष्ठा और मानवता की छाती पर जातिवाद के नफरत  की  स्याही से  Very lazy officer  लिखकर   बन गया खलनायक l

नन्दलाल भारती 

इंदौर 




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