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कलयुग की डायन

 

कलयुग की डायन

 तीन दशक बाद अचानक एक दिन दोनों दोस्तों, दीनानाथ और धुरंधर  की मुलाक़ात बस स्टैंड की चाय की दुकान पर हो गयी l बूढ़ी काया आँखों पर चश्मा पर स्कूल  की पुरानी दोस्ती अभी भी बरकरार थी l दीनानाथ ने बिना किसी हिकिचाहट के धुरंधर का हाथ पकड़कर बोला,अरे बूढ़ा धुरंधर तू कहां से आ रहा रे l

अबे दीनवा तू कहां जवान है, बस क्या दोनों भरत मिलाप के बाद चाय  लेकर स्टूल पर बैठ गए l दोनों के बीच घर-परिवार, खेती-गृहस्थी को लेकर लम्बी बातचीत हुई l घंटो तक,दुःख -सुख  के बाद दीनानाथ  पूछा धुरंधर बेटवा का व्याह कर दिया?

धुरंधर बड़े उछाह से बोला हाँ दोस्त l बहू क्या मुझे तो भगवान मिल गयी है l

धुरंधर पूछा तुम्हारे बेटे का भी तो ब्याह हो गया होगा पोता-पोती खेल रहे होंगे?

दीनाथ बोला हॉं दोस्त हो गयी है, इतना कहना था कि दीनानाथ की आँखों से आंसू झाँकने  लगे l

धुरंधर  पूछा -  क्या हुआ बहू नहीं रही?ऐसा क्या हो गया था?

दीनानाथ बोला-काश ऐसा हो गया होता l

धुरंधर-कोर्ट कचहरी का मामला हो गया है क्या?

दीनानाथ-नहीं l बहू पुलिस,कोर्ट-कचहरी के खौफ की तलवार  बेटवा की छाती पर रखकर लूट कर माँ-बाप के लिए घर बनवा दी, बहन की शादी करवा दी, भाई को अपने पास रखकर ऊँची पढ़ाई  करवा दी l आठ साल में पहली बार घर आयी थी,जीना-हराम कर दी थी, पुलिस थाने की धमकी देकर मायके भाग रही थी l बिना दहेज की  शादी के बदले बहू नहीं कलयुग की डायन मिल गयी है दोस्त l

धुरंधर बोला-भरपूर दहेज के साथ हमें तो सुलक्षणा  मिली है l

इतने मे बस घर्रघराती हुई आकर ख़डी हो गयीl दीनानाथ बस मे सवार होते हुए बोला दोस्त हमारी बिगड़ी भगवान बनाए तुम्हारी भगवान बहू  तुम्हें  मुबारक, कुछ ही सेकेण्ड में बस धूल और धुंआ उगलती हुई सरपट दौड़ पड़ी दीनानाथ सब्जी का थैला लटकाये चल पड़ा अपने घर की ओरl

नन्दलाल भारती







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