कटोरी भर दाल
राजेश्वर ग्वालियर से बुंदेलखंड एक्सप्रेस से बनारस के लिए यात्रा शुरू किया था l तब यह कहावत प्रचलन में थी कि" भारतीय रेल कभी समय पर पहुंची है की आज पहुंचेगी?
सच था, ग्वालियर से बनारस की यात्रा दूसरे दिन सूरज के डूबने के बाद यानि काफी विलम्ब से ट्रेन बनारस पहुंची थी l उत्तर प्रदेश परिवहन की बस बनारस सत्तर किलोमीटर की यात्रा निर्धारित समय से पहले राजेश्वर को गांव से पंद्रह किलोमीटर दूर टाउनएरिया के बस स्टॉप पर उतार दी थी,वह भी निर्धारित समय से पहले l
टाउनएरिया से राजेश्वर को ईक्का या जीप की सवारी करना था l संयोग से एक जीप मिल गयी थी, कंडक्टर जीप के अंदर बिठाने की कोशिश तो किया परन्तु जीप में पैर रखने की जगह नहीं थीl
आखिरकार जीप की पंद्रह किलोमीटर की यात्रा लटक कर करना पड़ा थाl राजेश्वर ही नहीं चार -छः और लोग लटके हुए थे l जीप के अंदर तो भेड़ -बकरियों की तरह लोग भरे हुए थे l जाड़े की रात थी,रात का अंधेरा पसर रहा था l सभी जल्दी घर पहुंचना चाहते थे l यह यात्रा खतरे से खाली तो नहीं पर जीप का करिअर पकड़ कर डरावनी यात्रा पूरी तो हो गयी l
सकुशल राजेश्वर अपने घर पहुंच गया l राजेश्वर को देखकर उसके माँ और बाप दोनों रो पड़े थे l पांच साल दिल्ली में बेरोजगारी का यातनापूर्ण जीवन जी कर राजेश्वर दिल्ली से ग्वालियर पहुँचा था l
गॉव से दिल्ली और फिर ग्वालियर में एक पब्लिक सेक्टर की कम्पनी में अस्थायी बाबू की नौकरी मिल गयी थी l ग्वालियर में राजेश्वर के माथे से बेरोजगारी का दाग आंशिक रूप से धुला था l गांव से दिल्ली और दिल्ली से ग्वालियर तक नौकरी की तलाश बहुत पीड़ादायी थी l
राजेश्वर के माता-पिता रजवन्ति और राजधन सिर्फ नाम के धनी थे, उनके पास जमीन भी नहीं थी कि राजेश्वर आधुनिक तरीके से व्यावसायिक खेती करता l गरीबी और भूमिहीनता से जूझने वाले समाज के लिए मजदूरी के अलावा गांव में और कुछ नहीं बचा था l
हाँ पढ़े-लिखे नवजवान तो ज्यादातर दिल्ली या बम्बई नौकरी की तलाश में भागते थे l दिल्ली में कोई मंडी या कोई प्लास्टिक की मशीन चलाने लगता था, या कोई और जोखिमपूर्ण काम में लग जाता l गांव के कई लड़के तो जान भी गंवा चुके थे l
राजेश्वर का ऎसा कोई इरादा तो नहीं था पर परदेस में भूख से मरने के बजाय, पेट भरने के इंतजाम के लिए राजेश्वर को भी जिल्ल्त की नौकरी भी करना पड़ा था l
राजेश्वर की इच्छा तो बिजनेस करने की थी, शुरुआत भी किया पर पूँजी नहीं होने के कारण बिजनेस का इरादा छोड़कर शहर भागना पड़ा था l
राजेश्वर की माँ ने गांव से दिल्ली के किराया के गांव की ठकुराइन से सौ रूपये किराये-भाड़े के लिए सूद पर लाकर दी थी l
बेरोजगार युवक को झुग्गियों में किराये पर रहने की औकात नहीं होती थी, कई लोग मिलकर झुग्गी किराये पर लेते थे वरना फुटपाथ l
राजेश्वर नसीब वाला निकला उसके रहने की अस्थायी व्यवस्था हो गयी, खुराकी तो हर हालत में देना होता था l
बेरोजगार युवक क्या करें?अनजान शहर,पराये लोग,जाने पहचाने लोग भी मुंह फेर लेते थे l राजेश्वर ने डिग्री खूंटी पर टांग कर, मेहनत मजदूरी, ईट-गारा, सब्जी मंडी में, आलपिन की फैक्ट्री में काम किया, पापी पेट का सवाल जो था l
राजेश्वर को दिल्ली रास नहीं, ग्वालियर पहुँचा, अच्छा ये हुआ कि ग्वालियर में राजेश्वर का कोई दूर-दूर तक जानने-पहचानने वाला नहीं था l कुदरत का खेल देखो राजेश्वर ग्वालियर में अस्थायी क्लर्क की नौकरी मिल गयी l आफिस के कैंपस में एक खाली कमरे में रहने की जगह भी,अब सोने पर सुहागा l
पांच दिल्ली में रोजगार की तलाश में वनवास काटा, साल भर ग्वालियर में अस्थायी नौकरी कर हंसी-खुशी गांव गया था, पर यहां अफसरों के बीच राजेश्वर की जाति के बारे में कानाफुंसी शुरू हो गयी थी l राजेश्वर कौन क्या कह रहा पर ध्यान न देकर काम पर ध्यान दिया, कुछ लोग काम के प्रति ईमानदारी और कंपनी के समर्पण को देखकर राजेश्वर के साथ थे,तो कुछ जातिवादी खिलाफ, इसलिए इस अस्थायी नौकरी पर तलवार लटकी हुई थी l
छः साल के बाद राजेश्वर गांव वापस गया था, उसके माँ-बाप, भाई-बहन और गांव के बिरादरी के सभी लोग बहुत खुश थे पर सामीनाथ बाबा और कोहालाल बाबा तो बहुत खुश थे l
राजेश्वर की माँ इतने उछाह में थी कि सोच रही थी बेटवा को छप्पन भोग खिला दूँ, राजेश्वर की छोटी बहन चूल्हे में कंडे सुलगाकर खाना बनाने में जुट गईl चाय का कोई रिवाज़ गावों में नहीं था,चाय बाजार-हाट तक चाय सीमित थी l
राजेश्वर की माँ उठी, एक छोटी सी कटोरी लेकर अपने ही घर के पिछले हिस्से में जेठजी की पुत्रबहू द्वेषलता रहती थीl द्वेषलता के पति ब्रजकुमार का लालन-पालन,ब्याह-गौना सब कुछ राजेश्वर के माता-पिता ने ही किया था l वही द्वेषलता अपने तीन बच्चों के साथ उसी घर में एक तरफ अलग रहती थी, मकान एक था पर घर द्वेषलता ने दो बनवा दिए थे l
राजेश्वर की माँ कटोरी लेकर द्वेषलता के पहुंची और बोली- बड़ी बहू एक कटोरी दाल उधार दे दे,अभी-अभी राजेश्वर ग्वालियर से आया हैl
द्वेषलता बोली- अरे बुढ़ घोघनी माई दाल मांगने आयी हो, दाल खाये तो महीनों हो गए l
राजेश्वर की बूढ़ी माँ के आँखों में आंसू बर्फ के पर गर्म-गर्म गोले जैसे उभरने लगे थे, पर वह आँसुओं की ज्वाला को पलकों के बीच रोकते हुए बोली-द्वेषलता,तू ही तो आज सुबह कह रही थी अरहर की दाल इतनी महंगी हो गयी है कि कल एक किलो दाल खरीदने आँख निकल गयी थी l
हे भगवान इतनी महंगाई की किलो भर दाल खरीदने में किडनी मुंह में आ जाये l राजेश्वर की माँ बोली -द्वेषलता नहीं देना है तो मत दे, पर सांझ की बेला में झूठ तो मत बोल l
राजेश्वर को उसकी माँ और बड़ी भौजाई द्वेषलता की बातचीत मुझे साफ-साफ सुनायी पड़ रही थीl ये बातें तो राजेश्वर के कानों में सुई की तरह चुभ रही थी, और हाँ बेचैनी तो बहुत हो रहीं थी l
बूढ़ी माँ की आँखों से सुलगते बर्फ के गोले जमीन पर गिर रहे थेl राजेश्वर माँ की आत्म-पीड़ा को समझ चुका थाl
वह बोला-माई अरहर की दाल नहीं खाना है, रोज ढाबे का खाना पड़ता है l माँ तू तो बस अपने हाथ कि एक लिटी बनाकर कंडे की आग में सेंक दो, हरे लहसुन, हरी धनिया और हरे मिर्च की चटनी देविका पीस देगीl देविका भरा मिर्च हो तो एक चटनी में पीस देना l माँ,आज तो मैं पेट भर लिटी चटनी खाऊंगा और कुछ नहीं l
राजेश्वर छोटी बहन देविका से बोला-हल्का सा नमक डालकर सील बट्टे से अपने हाथों से देविका तुम पीसो देखना, इस चटनी लिट्टी के आगे छप्पनभोग फेल हो जायेगा l
राजेश्वर माँ थी कि मानने वाली थी, वह चूल्हा चौका में लग गयी,जो भी व्यंजन बना सकती थी बना डाली, हाँ अरहर की दाल छोड़कर l
राजेश्वर अपनी छोटी सी जिंदगी में एक वो बीते हुए दिन थे,जब न स्कूल की फीस देने के पैसे थे,ना ना ढंग के कपड़े-लते के इंतजाम के कोई पुख्ता जरिया l हर छोटी मोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसके माँ-बाप को संघर्ष करना पड़ता था l
राजेश्वर बहुत बड़ी-बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा-जातिवादी अफसरों ने अस्थायी नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया l
राजेश्वर ने इस अत्याचार से भी उबरा, लम्बे संघर्ष के बाद नौकरी स्थायी तो हो गयी, पर जातिवादी लोग दुश्मनी निभाने के लिए द्रोणाचार्य के रास्ते पर चल पड़ेl एक द्रोणाचार्य ने एक एकलव्य का अंगूठा काटा था परन्तु बदले हुए युग में हर क्षेत्र में हर क्षेत्र में साइलेंटकरिअर किलर द्रोणाचार्य सक्रिय हैं,ऐसे ही कई द्रोणाचार्यों ने राजेश्वर की कॉन्फिडेंसियल रिपोर्ट ख़राब लिखकर राजेश्वर के प्रमोशन रोकने बहुत प्रयास किये और सफल भी हुए l
गैर हिन्दू चपरासी रकीस ने राजेश्वर को चाय-पानी देने से मना किया,जातिसूचक शब्दों से खुद और दूसरे सवर्णों से अपमानित कराने का खूब षणयंत्र किया, ऐसे जातिवादियों के बीच राजेश्वर को टिके रहने के बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा पर अंततः राजेश्वर की शिक्षा,ज्ञान,अनुभव और संस्थान के प्रति वफादारी ने उसे मैनेजर की कुर्सी तक पहुँचा दिया,जातिवादी षणयंत्र रचते रहे पर राजेश्वर के संघर्ष से पत्थर पर दूब तो जम गयी l
जिस राजेश्वर की माँ को कटोरी भर दाल उधार नहीं मिली l राजेश्वर रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ा l उसी राजेश्वर और उसकी पत्नी गीतेश्वरी के संघर्ष से
शहर से गांव तक उसके परिवार में तरक्की के के कदम पड़ चुके थे l राजेश्वर के पुत्र -पुत्री और भाई,भतीजे सभी तरक्की की राह पकड़ लिए थे l
राजेश्वर ने अपने माँ -बाप की इच्छाओं को अपनी कमाई से पूरा किया l शहर में भी एक छोटा सा आशियाना बना लिया l घर के सामने दो कारें खड़ी थी, एक दिन वो था जब सेकंडहैंड साइकिल खरीदने के लिए राजेश्वर को बहुत जोड़-तोड़ करना पड़ा थाl
राजेश्वर के जीवन की स्टोरी उसके मानसिक चित्र-पटल पर चल रही थी, इसी बीच उसकी जीवन संगिनी गीतेश्वरी आ गयी l
राजेश्वर को एहसास तक नहीं हुआ था, काफ़ी समय बीत चुका था l राजेश्वर की आँखों सकून था, इसी सकून में खोया हुआ था l
गीतेश्वरी ने जब जमीन पर पैर पटकी तब पायल की छन-छन से राजेश्वर की आँखे खुल गयी l
राजेश्वर बोला - गीतेश्वरी तुम!
गीतेश्वरी बोली-जी ! किस यादगार लम्हों में डूबे हुए थे कि मेरे आने कई भनक नहीं लगी?
राजेश्वर बोला-गीतेश्वरी माँ बाप ने सामंतवादियों के शोषण के शिकार होकर हमें पढ़ाया-लिखाया l हम उच्च शिक्षित होकर भी इन्हीं सामंतवादियों के अत्याचार-उत्पीड़न के शिकार दफ्तर में हुए देखा जाये तो अभी कुछ नहीं बदला है, शोषक समाज आज भी सक्रिय है l
गीतेश्वरी बोली-सुनोजी वो दिन लद गएl आधुनिक युग में दुनिया छोटी हो हैl बदलाव आ रहा हैl शोषक समाज बदल रहा है l
राजेश्वर बोले-हाँ देवी जी,देखना ये है कि हमारा लूटा हुआ आत्मसम्मान,सूद सहित शोषक समाज कब लौटाता है? शोषित,मरे हुए सपनों का बोझ उठाये जी रहे हैं l
गीतेश्वरी बोली-बीते दिनों को भूल जाओ l आधुनिक युग का युवा समता की क्रांति जरूर लाएंगे l
राजेश्वर बोले-बदलते युग में समता की क्रांति आएगी l माँ के आंसू,पिता के पांव की बिवाइनों का दुःख,भोगा हुआ यथार्थ कैसे भूल जाऊँ? वो भी दिन कैसे भूल जाऊँ जब कटोरी भर दाल उधार नहीं मिली, माँ रोयी थी,सुलगती दास्तांन तो शोषक ने ही तो दयनीय स्थिति बनायी है l
गीतेश्वरी-शोषकों को देखो उन्हें कौन पूछ रहा है,हवेलियों में सियारिन फेंकर रही है,हर अति का नतीजा बुरा होता है, जिसने कटोरी भर उधार दाल नहीं दी, उनका हाल देखो, कंडे से आंसू पोंछ ही है l अपना हाल देखो, क्या कमी है, हाँ यहां तक पहुंचने में बहुत दुःख, यातना सहे पर परिवार सोने की तरह चमक तो रहा है l
राजेश्वर बोले-हाँ गीतेश्वरी, परिश्रम और संघर्ष के साथ शिक्षा जरूरी है तरक्की के लिए l
गीतेश्वरी बोली-शिक्षित होकर परिश्रम और संघर्ष कर,सम्मानजनक जीवन जीया जा सकता है,शिक्षित युवा पीढ़ी जगह बना रही है l जातीय दीवारें दरक रही हैं..... लो चाय पीओ l
राजेश्वर बोले- काश वो दिन जल्दी आ जाता जब मानवता राष्ट्रीयधर्म और संविधान राष्ट्रीय धर्मग्रन्थ हो जाता,राष्ट्रीय सम्पदा पर सबका बरोबर का हक हो जाता तब ना होता शोषण -उत्पीड़न,ना होती अशिक्षा, हर हाथ को मिलता काम,ना गरीबी होती, ना डंसता कटोरी भर दाल के बहाने का दर्द l
सच में, सामाजिक विषमता,भूमिहीनता,बेरोजगारी,गरी
नन्दलाल भारती
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY