इंकलाब
सामाजिक समरसता-समता,
कि क्रांति अपनी जमीं पर चाहता हूँ,l
सदभाव हो,दिल की बात हो
धार्मिक अति नहीं,
क्या केशरिया,क्या हरा, क्या नीला क्या कोई और ?
एकरसता का साथ हो
इंसान हूँ, इंसानियत का हाथ चाहता हूँ l
अपना भी तो फर्ज़ बनता है
हक़ से जो रहे वंचित अब तक,
हाशिये पर पड़े ललचाई आँखों से रहे ताकते
उन्हीं आँखों में ख्वाब सजाना चाहता हूँ l
धर्म की अफीम चाटे जो बेसुध पड़े हैं
उन्हें जगाये और बताएं
बंटे रहेंगे धर्म-धर्म, जाति-जाति जाति में
अधिकार नहीं मिलेगा इस जहाँ में
सुन लो यही याद दिलाना चाहता हूँ l
बहन-बेटियों की इज्जत से,
ना हो खिलवाड़ कोई,
ऐसी अपनी जहाँ देखना चाहता हूँ l
अपनी माटी,अपना विधान,अपना प्राण है
आवे मुश्किल जब कोई,संग हो सब कोई ,
ऐसी जहाँ बनते देखना चाहता हूँ l
संघे शक्ति का मंत्र पढ़े सब मिलकर
मिले सबको बराबर अधिकार,
ऎसा सुराज चाहता हूँ l
सत्ता के मद में डुबे हो जो,
उन्हें अपनी मुहर की कीमत
बताना चाहता हूँ l
अपनी आज़ादी में जिस इंकलाब का,
अहम किरदार रहा अपनी जहाँ वालों
उसी किरदार को........शोषितों की,
आवाज़ बनाना चाहता हूँ l
कलमकारों का हथियार है कलम
अपनी जहाँ जानती है, अच्छी तरह
कलम आदमियत की बयार बने
ऎसा कलमकार बनना चाहता हूँ l
ना अनपढ़ होवे कोई,ना भूखा सोये
हर हाथ को मिले काम,दुनिया में बढ़े मान
अपनी माटी पर गर्व करे , हर इंसान
ऎसा इंकलाब चाहता हूँ...............
नन्दलाल भारती
19/02/2026
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