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ईंट-भट्ठा मजदूरों की मुक्ति और विकास

 

आलेख :

ईंट-भट्ठा मजदूरों की मुक्ति और विकास

शोषण से सम्मान, असुरक्षा से आत्मनिर्भरता और अभाव से अवसर तक

— नन्दलाल भारती

कवि, कथाकार एवं सामाजिक चिंतक 

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भारत के विकास की कहानी केवल महानगरों की ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और चमकते बाजारों की कहानी नहीं है। इस कहानी के पीछे मिट्टी से उठती वह दुनिया भी है, जहाँ हजारों परिवार अपने हाथों से ईंटें गढ़ते हैं। उन्हीं ईंटों से हमारे घर बनते हैं, विद्यालयों की दीवारें खड़ी होती हैं, अस्पतालों का निर्माण होता है और शहरों का विस्तार होता है। लेकिन एक विडंबना हमारे सामने आज भी खड़ी है—जिन हाथों से दूसरों के घर बनते हैं, उन्हीं हाथों के अपने घर अभाव, असुरक्षा और कर्ज से घिरे रहते हैं।

ईंट-भट्ठा मजदूर भारतीय श्रम-जगत के उन मेहनतकश लोगों में हैं जिनका श्रम हमारे आसपास दिखाई तो देता है, लेकिन उनका जीवन अक्सर हमारी दृष्टि से ओझल रहता है। वे मिट्टी खोदते हैं, उसे गूँथते हैं, साँचे में भरते हैं, कच्ची ईंटों को सुखाते हैं, उन्हें ढोते हैं और फिर आग की भट्ठी में पकाकर मजबूत ईंट का रूप देते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में उनका शरीर, समय और स्वास्थ्य खपता है।

इनमें बड़ी संख्या गरीब, भूमिहीन, ग्रामीण और प्रवासी परिवारों की होती है। रोजगार की कमी, छोटी अथवा शून्य कृषि जोत, ऋण, सामाजिक असुरक्षा और स्थानीय स्तर पर सीमित आजीविका के कारण अनेक परिवार मौसमी रूप से ईंट-भट्ठों की ओर जाते हैं। कई परिवारों के लिए यह रोजगार विकल्प नहीं, बल्कि जीवित रहने की मजबूरी बन जाता है।

यही कारण है कि ईंट-भट्ठा मजदूरों की मुक्ति और विकास को केवल मजदूरी बढ़ाने का प्रश्न मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह प्रश्न है—श्रम-अधिकार का, मानवीय गरिमा का, स्वास्थ्य का, शिक्षा का, सामाजिक सुरक्षा का, ऋण-मुक्ति का और ऐसी स्थायी आजीविका का जो मजदूर को बार-बार शोषण के उसी चक्र में लौटने से बचा सके।

धुएँ के पीछे छिपा हुआ जीवन- सुबह का अँधेरा अभी पूरी तरह छँटा नहीं है। भट्ठे के आसपास बनी अस्थायी झोपड़ियों में हलचल शुरू हो जाती है। किसी परिवार का पुरुष मिट्टी तैयार करने निकलता है, महिला ईंट ढालने में लग जाती है, कोई किशोरी पानी भरती है और छोटे बच्चे माँ के आसपास घूमते रहते हैं।

दिन चढ़ता है।

धूप तेज होती है।

मिट्टी शरीर से चिपकती है।

सिर पर ईंटों का बोझ बढ़ता जाता है।

और शाम तक शरीर थककर चूर हो जाता है।

अगले दिन फिर वही क्रम।

यह किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि ईंट-भट्ठों के आसपास बसे अनेक श्रमिक परिवारों की प्रतिनिधि तस्वीर है।

इन मजदूरों का जीवन हमें एक असहज प्रश्न पूछता है—

क्या विकास की इमारत उस श्रमिक की जिंदगी से अलग हो सकती है जिसने उसकी ईंटें बनाई हैं?

यदि किसी शहर की इमारत मजबूत है लेकिन उसके निर्माण में लगे मजदूर का जीवन असुरक्षित है, तो हमें अपने विकास की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा।

मजदूर या ऋणग्रस्त श्रमिक?-ईंट-भट्ठों में मजदूरों को कई बार अग्रिम राशि देकर काम पर लाने की व्यवस्था देखने को मिलती है। गरीब परिवार के लिए यह राशि तत्काल राहत बनकर आती है। किसी को बीमारी के इलाज के लिए पैसे चाहिए, किसी को बेटी की शादी के लिए, किसी को पुराने कर्ज का भुगतान करना है और किसी को घर चलाने के लिए।

ठेकेदार या भट्ठा संचालक से मिली अग्रिम राशि उस समय वरदान जैसी लगती है।

लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब इस राशि का हिसाब अस्पष्ट हो, कटौती की शर्तें स्पष्ट न हों और मजदूर की कार्यस्थल छोड़ने की स्वतंत्रता सीमित हो जाए।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने भारत के ईंट-भट्ठा क्षेत्र में ऐसे श्रमिकों की स्थिति पर अध्ययन किया है और ऋण तथा अग्रिम भुगतान से उत्पन्न निर्भरता तथा बंधुआ श्रम जैसी परिस्थितियों के जोखिम को रेखांकित किया है।

एक प्रतिनिधि परिस्थिति की कल्पना कीजिए-मान लीजिए रामलाल नाम का एक भूमिहीन मजदूर गाँव में काम न मिलने के कारण परिवार सहित भट्ठे पर जाता है। उसे अग्रिम धन मिलता है। वह इसे अपने परिवार की तत्काल जरूरतों में खर्च कर देता है। भट्ठे पर काम शुरू होता है। महीनों तक पति-पत्नी ईंट बनाते हैं। लेकिन जब मजदूरी और अग्रिम का हिसाब किया जाता है तो उसे लगता है कि उसकी अपेक्षा के अनुसार बचत नहीं हुई।

अब वह लौटना चाहता है।

लेकिन उससे कहा जाता है—पहले हिसाब पूरा करो।

यहीं मजदूरी और कर्ज के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

काम करने की स्वतंत्रता यदि कर्ज के कारण समाप्त हो जाए तो रोजगार शोषण में बदल सकता है।

कैदी जैसा जीवन क्यों?-“कैदी जैसा जीवन” एक गंभीर अभिव्यक्ति है। इसे हर ईंट-भट्ठे पर लागू करना उचित नहीं होगा। अनेक भट्ठों पर श्रमिक सामान्य रोजगार संबंधों में काम करते हैं। लेकिन जहाँ मजदूर को जबरन रोका जाए, उसकी मजदूरी का हिसाब पारदर्शी न हो, ऋण के कारण वह काम छोड़ न सके, आवागमन पर अनुचित नियंत्रण हो या उसके श्रम की शर्तें उसकी इच्छा के विरुद्ध तय हों, वहाँ स्थिति गंभीर हो जाती है।

भारत में बंधुआ मजदूरी कानूनी रूप से समाप्त की जा चुकी है। फिर भी सरकार के श्रम मंत्रालय ने समय-समय पर बंधुआ मजदूरी के मामलों की पहचान, मुक्ति और पुनर्वास के लिए राज्यों को दिशा-निर्देश दिए हैं। ईंट-भट्ठों जैसे क्षेत्रों में निरीक्षण और श्रमिकों की पहचान को भी महत्वपूर्ण माना गया हैl 

इसलिए कानून होना पर्याप्त नहीं है-कानून का भय शोषण करने वाले तक पहुँचे और कानून का भरोसा मजदूर तक पहुँचे—यही सुशासन की कसौटी है।

मजदूरी का सही हिसाब—शोषण रोकने की पहली शर्त-ईंट-भट्ठा मजदूरों की स्थिति सुधारने का सबसे बुनियादी उपाय है—मजदूरी व्यवस्था में पारदर्शिता।

मजदूर को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए—

- उसने कितनी ईंटें बनाई हैं;

- प्रति हजार ईंट भुगतान कितना है;

- कुल मजदूरी कितनी बनी;

- कितना अग्रिम लिया गया;

- कितनी कटौती हुई;

- कितना भुगतान किया गया;

- कितना शेष है।

यह पूरा हिसाब लिखित रूप में मजदूर को उसकी समझ की भाषा में दिया जाना चाहिए।डिजिटल भुगतान उपयोगी है, लेकिन केवल बैंक खाते में पैसा भेज देना पर्याप्त नहीं। मजदूर को भुगतान का स्पष्ट विवरण भी मिलना चाहिए।जिस श्रमिक को अपनी मजदूरी का हिसाब मालूम नहीं, वह अपने श्रम का पूरा अधिकार कैसे माँग सकेगा?

महिलाओं का श्रम : दोहरी जिम्मेदारी, आधा दिखाई देने वाला अधिकार-ईंट-भट्ठे की अर्थव्यवस्था में महिलाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे ईंट बनाने, ढोने, सुखाने और अन्य कार्यों में पुरुषों के साथ श्रम करती हैं। इसके अलावा बच्चों की देखभाल, खाना बनाने और घरेलू काम की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर होती है।अर्थात महिला मजदूर अक्सर दोहरा श्रम करती है—एक मजदूरी के लिए और दूसरा परिवार के लिए।

गर्भावस्था के दौरान भी गरीबी और रोजगार की मजबूरी उन्हें काम करने के लिए बाध्य कर सकती है। श्रम मंत्रालय ने ईंट-भट्ठों में महिला श्रमिकों के स्वास्थ्य और पोषण की जाँच से जुड़े कार्यक्रमों का उल्लेख किया है।

लेकिन स्वास्थ्य शिविर से समस्या का पूरा समाधान नहीं होगा।

महिला श्रमिकों के लिए आवश्यक हैं—सुरक्षित कार्यस्थल, मातृत्व सुरक्षा, स्वच्छ पानी, शौचालय, पोषण, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, बच्चों की देखभाल और समान काम के लिए उचित मजदूरी।यदि महिला स्वस्थ और आर्थिक रूप से सुरक्षित होगी, तभी परिवार की सामाजिक स्थिति भी मजबूत होगी।

बच्चों का भविष्य ईंटों के बीच नहीं-ईंट-भट्ठा मजदूरों के बच्चों का प्रश्न सबसे अधिक संवेदनशील है।मजदूर परिवार जब एक जिले से दूसरे जिले अथवा एक राज्य से दूसरे राज्य जाता है तो बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। स्कूल बदलता है, भाषा बदलती है, वातावरण बदलता है और कई बार पढ़ाई पूरी तरह छूट जाती है।

कुछ बच्चे परिवार के साथ श्रमस्थल पर रहते हैं। गरीबी, निगरानी का अभाव और शैक्षणिक व्यवस्था से दूरी उन्हें बाल श्रम के जोखिम की ओर धकेल सकती है।

यह केवल बाल अधिकार का प्रश्न नहीं है; यह भारत के भविष्य का प्रश्न है।

एक बच्चा यदि लगातार विद्यालय से बाहर रहता है तो उसकी अगली पीढ़ी भी असुरक्षा में फँस सकती है।

मजदूर परिवार जब एक जिले से दूसरे जिले अथवा एक राज्य से दूसरे राज्य जाता है तो बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। स्कूल बदलता है, भाषा बदलती है, वातावरण बदलता है और कई बार पढ़ाई पूरी तरह छूट जाती है।

इसलिए प्रवासी मजदूरों के बच्चों के लिए ऐसी शिक्षा व्यवस्था आवश्यक है जो स्थान बदलने पर भी उनकी पढ़ाई को न टूटने दे।

मौसमी विद्यालय, आवासीय विद्यालय, स्थानीय स्कूलों में सरल प्रवेश, पोर्टेबल शैक्षणिक रिकॉर्ड और राज्यों के बीच शिक्षा विभागों का समन्वय इस दिशा में उपयोगी हो सकते हैं।

ईंट-भट्ठे पर बच्चे का हाथ ईंट नहीं, किताब उठाए—यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

बरसात : जब भट्ठा बंद होता है, तब क्या?-ईंट-भट्ठा मजदूरों की समस्या का सबसे महत्वपूर्ण और अक्सर उपेक्षित पक्ष है—मौसमी बेरोजगारी।

बरसात शुरू होते ही अनेक ईंट-भट्ठों का काम रुक जाता है। कच्ची ईंटें तैयार करना और उन्हें सुखाना कठिन हो जाता है। मजदूरों की आय अचानक बंद हो सकती है।

लेकिन भूख नहीं रुकती।

बच्चों की जरूरतें नहीं रुकतीं।

बीमारी नहीं रुकती।

घर का खर्च नहीं रुकता।

यही वह समय है जब परिवार फिर से कर्ज लेने के लिए मजबूर हो सकता है।

इसलिए बरसात को ईंट-भट्ठा मजदूरों के लिए “बेरोजगारी का मौसम” नहीं, “गारंटीकृत वैकल्पिक रोजगार का मौसम” बनाना होगा।

मनरेगा को मौसमी रोजगार सुरक्षा से जोड़ना होगा-महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में मांग के आधार पर कम-से-कम 100 दिनों के मजदूरी रोजगार की कानूनी गारंटी देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह योजना गरीब परिवारों के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है।ईंट-भट्ठा मजदूरों के संदर्भ में इसका अधिक प्रभावी उपयोग किया जा सकता है।

ग्राम पंचायतों को पहले से पता होना चाहिए कि गाँव के कितने परिवार ईंट-भट्ठों पर मौसमी रोजगार के लिए बाहर जाते हैं और किस अवधि में लौटते हैं।

बरसात से पहले ही रोजगार कार्यों की योजना तैयार हो।

तालाब, जल-संरक्षण, नाला निर्माण, खेत-पथ, वृक्षारोपण, भूमि विकास और ग्रामीण परिसंपत्ति निर्माण जैसे कार्य उस अवधि में शुरू किए जाएँ जब भट्ठे बंद हों।

तब मजदूर के सामने यह विकल्प होगा—

भट्ठा बंद हुआ, लेकिन रोजगार नहीं।

यही आर्थिक सुरक्षा उसे नए कर्ज से बचा सकती है।

100 दिन से आगे—वर्षभर की आजीविका

लेकिन केवल 100 दिन का रोजगार भी अंतिम समाधान नहीं है।

ईंट-भट्ठा मजदूरों के लिए बहु-स्रोत आजीविका मॉडल विकसित करना होगा।

उदाहरण के लिए—

भट्ठे के मौसम में ईंट निर्माण।

बरसात में मनरेगा।

साथ में पशुपालन।

महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूह आधारित गतिविधियाँ।

युवाओं के लिए कौशल प्रशिक्षण।

स्थानीय स्तर पर निर्माण-कौशल, बिजली, प्लंबिंग, वेल्डिंग, ड्राइविंग, मशीन संचालन, खाद्य प्रसंस्करण आदि रोजगार।

इस तरह परिवार की आय किसी एक मौसम या एक ठेकेदार पर निर्भर नहीं रहेगी।

मनरेगा के अंतर्गत कौशल विकास से जुड़ी UNNATI जैसी पहलें भी ग्रामीण परिवारों को आंशिक रोजगार से आगे स्थायी आजीविका की दिशा में ले जाने का प्रयास करती हैं।

स्वास्थ्य : मजदूर के शरीर की भी कीमत है-ईंट-भट्ठे में काम कठिन शारीरिक श्रम से जुड़ा है। धूल, धुआँ, गर्मी, भारी वजन उठाना, लंबे समय तक झुककर काम करना और पर्याप्त विश्राम का अभाव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैंlलेकिन गरीब मजदूर अक्सर बीमारी को भी मजदूरी के नुकसान के रूप में देखता है।

मज़दूर सोचता है—

“आज काम नहीं किया तो आज की मजदूरी चली जाएगी।”

इसलिए बीमारी के बावजूद काम करता रहता है।

यह स्थिति बदलनी होगी।

ईंट-भट्ठा क्षेत्रों में नियमित स्वास्थ्य शिविर, प्राथमिक उपचार, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण, पोषण, आँखों और श्वसन संबंधी जाँच, दुर्घटना उपचार तथा निकटतम अस्पताल से आपातकालीन संपर्क व्यवस्था होनी चाहिए।

स्वच्छ पेयजल और शौचालय जैसी सुविधाएँ स्वास्थ्य का मूल आधार हैं।

स्वास्थ्य सुविधा मजदूर पर एहसान नहीं, सुरक्षित श्रम का अधिकार है।

सामाजिक सुरक्षा का अधिकार-ईंट-भट्ठा मजदूर असंगठित क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करना जरूरी है।ई-श्रम जैसी श्रमिक पहचान व्यवस्था, पेंशन योजनाएँ, स्वास्थ्य सुरक्षा, दुर्घटना बीमा, राशन की पोर्टेबिलिटी और अन्य सरकारी योजनाओं से श्रमिकों को जोड़ना चाहिए।प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन जैसी योजनाओं में ईंट-भट्ठा मजदूरों और ग्रामीण भूमिहीन मजदूरों जैसे असंगठित श्रमिकों को पात्र श्रेणियों में शामिल किया गया है, निर्धारित शर्तों के अधीन।लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिस व्यक्ति को योजना के बारे में पता ही नहीं, वह उसका लाभ कैसे लेगा?इसलिए भट्ठों पर ही पंजीकरण और सहायता शिविर लगाए जाने चाहिए।

श्रमिक को योजना के कार्यालय तक दौड़ाने के बजाय सरकारी व्यवस्था को श्रमिक तक पहुँचना चाहिए।

प्रवासी मजदूर : अधिकार स्थान से नहीं, व्यक्ति से जुड़े हों-ईंट-भट्ठा मजदूरों का बड़ा हिस्सा मौसमी प्रवासी होता है। एक राज्य से दूसरे राज्य जाना उसकी रोजगार यात्रा का हिस्सा बन जाता है,लेकिन स्थान बदलते ही राशन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की समस्याएँ सामने आ जाती हैं।

एक मजदूर उत्तर प्रदेश से बिहार जाए या बिहार से पंजाब, उसकी पहचान और सामाजिक सुरक्षा समाप्त नहीं होनी चाहिए।श्रमिक का अधिकार उसके गाँव की सीमा में बंद नहीं होना चाहिए।

अंतरराज्यीय श्रमिकों के लिए राज्यों के श्रम विभागों के बीच समन्वय, पंजीकरण, हेल्पलाइन, कानूनी सहायता और सामाजिक सुरक्षा की पोर्टेबिलिटी को मजबूत करना आवश्यक है।

आवास : अपना घर, अपनी सुरक्षा-ईंट-भट्ठे पर अस्थायी झोपड़ी में रहने वाला परिवार जब गाँव लौटता है तो कई बार उसके पास सुरक्षित आवास नहीं होता।

भूमिहीन और अत्यंत गरीब परिवारों के लिए आवासीय भूमि तथा पक्का घर केवल सुविधा नहीं, सामाजिक सुरक्षा की बुनियादी शर्त है।

जिस परिवार के पास अपना घर है, वह संकट के समय भी कुछ हद तक सुरक्षित रहता है।

इसलिए ईंट-भट्ठा मजदूरों के पुनर्वास की योजना में आवास को प्रमुख स्थान मिलना चाहिए।

मुक्ति के बाद पुनर्वास जरूरी-मान लीजिए किसी श्रमिक की पहचान बंधुआ श्रम की स्थिति में होती है और उसे मुक्त करा लिया जाता है।

क्या समस्या समाप्त हो गई?-

नहीं।

यदि मज़दूर गाँव लौटकर फिर बेरोजगार है, यदि उसके पास भोजन का साधन नहीं है, यदि बच्चों की पढ़ाई नहीं है और बीमारी के लिए पैसे नहीं हैं, तो कुछ महीनों बाद वह किसी दूसरे ठेकेदार से फिर अग्रिम ले सकता है।

इसलिए मुक्ति और पुनर्वास को अलग-अलग नहीं किया जा सकता।

मुक्ति के साथ होना चाहिए—

- तत्काल आर्थिक सहायता,

- सुरक्षित आवास,

- रोजगार,

- कौशल प्रशिक्षण,

- बच्चों की शिक्षा,

- राशन,

- स्वास्थ्य सुरक्षा,

- बैंकिंग सुविधा,

- संस्थागत ऋण,

- कानूनी सहायता और

- आजीविका परिसंपत्ति।

तभी मुक्ति सम्भव होगी।

श्रमिकों को कर्ज नहीं, सस्ता संस्थागत ऋण चाहिए

गरीबी में सबसे महँगा पैसा वही होता है जो मजबूरी में लिया जाता है।

जब बैंक से ऋण नहीं मिलता तो मजदूर स्थानीय साहूकार या ठेकेदार से अग्रिम लेता है। यही अग्रिम कई बार उसकी स्वतंत्रता सीमित कर देता है।इसलिए गरीब श्रमिक परिवारों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना होगा।

जन-धन खाते, बचत, स्वयं सहायता समूह, कम ब्याज वाले संस्थागत ऋण और वित्तीय साक्षरता से परिवार को आकस्मिक जरूरतों के लिए ठेकेदार पर निर्भरता कम होगी।

आर्थिक स्वतंत्रता, श्रम की स्वतंत्रता की महत्वपूर्ण शर्त है।

कौशल : भूमिहीन हाथों में नई जमीन-जिस व्यक्ति के पास कृषि भूमि नहीं है, उसके हाथ में कौशल एक प्रकार की नई उत्पादक संपत्ति है।

यदि ईंट-भट्ठे का मजदूर बिजली का काम सीखता है, तो वह केवल ईंट-भट्ठे तक सीमित नहीं रहता।

यदि वह प्लंबिंग सीखता है, तो उसके सामने नए रोजगार खुलते हैं।

यदि युवा ड्राइविंग, मशीन संचालन या निर्माण तकनीक सीखता है, तो वह अधिक आय वाले काम में जा सकता है।

महिलाएँ खाद्य प्रसंस्करण, सिलाई, पैकेजिंग, पशुपालन,मुर्गी पालन, मत्स्य पालन लघु उद्यम और डिजिटल सेवाओं से जुड़ सकती हैं।

इसलिए कौशल विकास को केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र तक सीमित नहीं रखना चाहिए।

प्रशिक्षण → रोजगार → आय → बचत → निवेश → आत्मनिर्भरता

यही पूरी श्रृंखला बनानी होगी।

ग्राम पंचायत की भूमिका-ईंट-भट्ठा मजदूरों की वास्तविक स्थिति गाँव में सबसे अच्छी तरह समझी जा सकती है।

हर ग्राम पंचायत में ऐसे परिवारों का सामाजिक-आर्थिक मानचित्र बनाया जा सकता है—

- कितने परिवार ईंट-भट्ठों पर जाते हैं?

- कितने भूमिहीन हैं?

- कितनों के पास अपना घर नहीं?

- कितने बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है?

- कितने परिवार मनरेगा से जुड़े हैं?

- कितने परिवार सामाजिक सुरक्षा से बाहर हैं?

- कितने युवाओं को कौशल प्रशिक्षण चाहिए?

इसके आधार पर “ईंट-भट्ठा श्रमिक परिवार विकास योजना” जैसी स्थानीय कार्ययोजना बनाई जा सकती है।

ग्रामसभा इसकी निगरानी करे और सामाजिक लेखा-परीक्षा के माध्यम से पारदर्शिता सुनिश्चित करे।

समाज और उपभोक्ता की भी जिम्मेदारी-हम अक्सर सस्ती ईंट चाहते हैं, लेकिन यह नहीं पूछते कि उस ईंट की वास्तविक सामाजिक कीमत क्या है।

यदि ईंट की कीमत कम करने के लिए मजदूर की मजदूरी दबाई जाती है, स्वास्थ्य की अनदेखी होती है या श्रम-अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो वह सस्ती ईंट वास्तव में समाज के कमजोर व्यक्ति से वसूली गई कीमत है।

हमें ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें—

ईंट सस्ती होने से पहले श्रमिक का जीवन सस्ता न हो।

भवन की गुणवत्ता केवल सीमेंट और सरिया से नहीं, बल्कि उसके निर्माण में लगे श्रमिक के सम्मान से भी तय होती है।

समाधान की समग्र दिशा-ईंट-भट्ठा मजदूरों के विकास के लिए एक समेकित राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता है। उसके प्रमुख आधार हो सकते हैं—

1. शोषण से मुक्ति:बंधुआ अथवा जबरन श्रम की पहचान, त्वरित मुक्ति और कानूनी कार्रवाई।

2. पारदर्शी मजदूरी:उत्पादन, भुगतान, अग्रिम और कटौती का लिखित एवं डिजिटल रिकॉर्ड।

3. बरसात में रोजगार:भट्ठे बंद होने की अवधि में मनरेगा और अन्य स्थानीय रोजगार की पूर्व-व्यवस्था।

4. वर्षभर आजीविका:पशुपालन, लघु उद्योग, ग्रामीण उद्यम और कौशल आधारित रोजगार।

5. स्वास्थ्य सुरक्षा:नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, स्वच्छ पानी, शौचालय, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और दुर्घटना सुरक्षा।

6. शिक्षा:प्रवासी बच्चों के लिए पोर्टेबल और निरंतर शिक्षा व्यवस्था।

7. सामाजिक सुरक्षा:ई-श्रम, पेंशन, बीमा, राशन और अन्य योजनाओं तक वास्तविक पहुँच।

8. आर्थिक पुनर्वास:संस्थागत ऋण, बचत, स्वयं सहायता समूह और आजीविका परिसंपत्तियाँ।

9. महिला सशक्तीकरण:समान मजदूरी, मातृत्व सुरक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक निर्णयों में भागीदारी।

10. प्रशासनिक जवाबदेही:श्रम विभाग, पंचायत, पुलिस, शिक्षा और स्वास्थ्य विभागों के बीच समन्वित कार्रवाई।

ईंटों से मजबूत इमारतें ही नहीं, मजबूत जीवन भी बनें, उनके बच्चों का भविष्य बने, शिक्ष का अवसर मिले, स्वास्थ्य सेवाएं मिलें l

ईंट-भट्ठे की आग में केवल कच्ची मिट्टी नहीं पककर पक्की ईंट बनती है ; उसमें श्रमिकों का जीवन भी तपता है।

कोई मजदूर बेटी की पढ़ाई के लिए काम करता है।

कोई बेटे के भविष्य के लिए।

कोई बीमारी का कर्ज चुकाने के लिए।

कोई अपने घर की टूटी छत सुधारने के लिए।

और कोई केवल इसलिए कि उसके परिवार के सामने अगले दिन का भोजन खड़ा है।

उसकी मेहनत से शहरों की इमारतें बनती हैं, लेकिन उसका अपना जीवन अक्सर अस्थायी झोपड़ी में गुजरता है। यह विरोधाभास केवल आर्थिक नहीं, नैतिक भी है।

इसलिए ईंट-भट्ठा मजदूरों की मुक्ति का अर्थ केवल उन्हें भट्ठे से निकाल देना नहीं है।

मुक्ति का अर्थ है—उन्हें ऐसी आर्थिक शक्ति देना कि वे फिर मजबूरी के कर्ज में न फँसें।

मुक्ति का अर्थ है—

मज़दूर की मजदूरी का पूरा हिसाब हो।

मज़दूर के श्रम का उचित मूल्य हो।

मज़दूर के शरीर को स्वास्थ्य का अधिकार हो।

मज़दूर की महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा मिले।

मज़दूर के बच्चों की शिक्षा न टूटे।

मज़दूर के पास अपना घर हो।

मज़दूर की सामाजिक सुरक्षा पोर्टेबल हो।

बरसात में रोजगार बंद न हो।

और सबसे महत्वपूर्ण—उनके पास अपने जीवन का निर्णय स्वयं लेने की स्वतंत्रता हो।

बरसात में भट्ठा बंद हो सकता है, सरकार की जिम्मेदारी नहीं।

चिमनी से धुआँ उठना बंद हो सकता है, मजदूर के घर का चूल्हा बंद नहीं होना चाहिए।भट्ठे की आग बुझ सकती है, लेकिन मजदूर के बच्चों की शिक्षा की लौ नहीं बुझनी चाहिए।

यही वह बिंदु है जहाँ रोजगार की गारंटी सामाजिक न्याय बनती है, स्वास्थ्य सुविधा मानवीय गरिमा में बदलती है और शिक्षा पीढ़ीगत गरीबी की दीवार तोड़ती है।

भारत के विकास की असली तस्वीर तब बदलेगी जब ईंट-भट्ठे पर काम करने वाले परिवार का बच्चा यह कह सके—

“मेरे माता-पिता ने ईंटें बनाईं,

मैं अपने भविष्य की इमारत बनाऊँगा।”

और तब विकास का अर्थ केवल ऊँची इमारतें नहीं होगा।

विकास का अर्थ होगा—

जिस हाथ ने दूसरों के घर बनाए,

उस हाथ के अपने घर में भी रोशनी हो।

जिस श्रमिक ने शहरों को आकार दिया,

उसके जीवन को भी सम्मान और अवसर मिले।

जिस परिवार ने देश के निर्माण में अपना श्रम दिया,

उसके बच्चों को भी देश के भविष्य में अपना स्थान मिले।

यही ईंट-भट्ठा मजदूरों की वास्तविक मुक्ति है।

यही उनका अधिकार है।

और यही एक संवेदनशील, न्यायपूर्ण और समावेशी भारत के विकास की पहचान होनी चाहिए।

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nlbharatiauthor@gmail.com



 

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