होलिका दहन : आस्था या अन्याय?”
आज मैं जिस विषय पर आपके समक्ष अपने विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ, वह विषय केवल धार्मिक या परंपराओं से ही संबंधित नहीं है बल्कि इतिहास, समाजशास्त्र,स्त्री विमर्श और मानवीय विवेक से गहराई से जुड़ा हुआ विषय है-होलिका दहन : आस्था या अन्याय?
जैसा कि हम बूढ़े भारत के हो या आधुनिक भारत के,हम सब बचपन से देखते आ रहे हैं कि होली से एक दिन पूर्व होलिका दहन होता है। हमें बताया गया था और आज भी वही जाता है कि होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
क्या कभी हमने यह सवाल उठाया कि क्या हर वर्ष एक स्त्री पात्र को प्रतीकात्मक रूप से जलाना ही बुराई पर अच्छी का प्रतीक है तो क्यों और कैसे और कब तक ये दहन जारी रहेगा?
क्या एक स्त्री पात्र को बुराई के प्रतीक के रूप में जलाना वास्तव में न्यायसंगत है? कब तक ऐसी बुराई को अच्छाई मानकर जश्न मनाया जायेगा ? हम चौदहवीं सदी के भारत की सड़ी-गली व्यवस्थाओं की बात नहीं कर रहे हैं l क्या आधुनिक भारत में भी जब हम चाँद पर पहुंचने लगे हैं,ऐसे विज्ञान के युग में क्या किसी मानवतावादी स्त्री को पूज्य मानने वाले आधुनिक सभ्य समाज को किसी स्त्री के प्रतीक को जलाकर उत्सव मनाना चाहिए? क्या यह सभ्य समाज को शोभा देता है?
परंपरागत कथा की बात की जाये जो आज के युग में नहीं दोहराई जानी चाहिए, कथा के अनुसार हिरण्यकश्यप नामक महानराजा अपनी बहन होलिका के साथ मिलकर अपने पुत्र प्रह्लाद को अग्नि में जलाने की योजना बनाता है जबकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। दैवीय चमत्कार हो जाता है —होलिका आग में जल कर राख हो जाती है और प्रह्लाद बच जाता है,और तब से हर साल होलिका का दहन किया जाता है। ऐसी मान्यता है, क्या सच है क्या झूठ किसी ने कभी सही-सही तहकीकात नहीं किया, कपोलकलपित कथाओं को सच मानकर
किसी स्त्री के प्रतीक को जलाकर उत्सव मनाया जा रहा है l
मेरा सवाल है,निष्पक्ष और विवेकपूर्ण विचार कीजियेगा ;यदि होलिका को सचमुच वरदान था,तो होलिका को नहीं जलना था,वह जली तो क्यों जली? यदि वरदान झूठा था,तो क्या यह ईश्वरीय न्याय पर सवाल नहीं खड़ा होता ?
और अब सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि —
क्या किसी स्त्री के प्रतीक को सदियों तक जलाना,किसी भी रूप में नैतिक और मानवीय हो सकता है? या सचमुच किसी षणयंत्र के तहत यह अनैतिक एवं अमानवीय कृत्य हो रहा है तो इस पर विराम कब और कौन लगेगा? यह तो विज्ञान के इस युग में सुनिश्चित हो जाना चाहिए l होलिका जैसी किसी स्त्री के प्रतीक का दहन बंद हो जाना चाहिए l क्या होलिका दहन स्त्री-विरोधी परंपरा का प्रतीक है? क्या यह धार्मिक धंधे का हिस्सा है? अगर है तब भी होलिका दहन बंद होना चाहिए ?
इतिहास गवाह है कि —हमारे समाज में अनेक स्त्री पात्रों -ताड़का, शूर्पणखा, कैकेयी, और होलिका पात्रों को चरित्रहीन, षड्यंत्रकारी और राक्षसी बनाकर प्रस्तुत किया गया था, दुर्भाग्यवश 21वी सदी में ऐसे प्रस्तुतीकरण हो रहे है l इतिहासकारों ने जब -जब कोई स्त्री सत्ता के विरुद्ध खड़ी हुई है या या स्वतंत्र सोच रखी है तब उस खलनायिका बना कर प्रस्तुत कर दिया l होलिका भी इसी षणयंत्र की शिकार सदियों से हो रही है l क्या यह एक स्त्री के सत्ता के विरुद्ध खड़ा होने कि, कभी खत्म होने वाली सजा तो नहीं है ?
क्या यह कोई छिपा हुआ सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्ष तो नहीं है? जिसकी तह में अत्याचार,अन्याय शोषण, उत्पीड़न तो नहीं छिपा है l
कुछ इतिहास के जानकारों का मानना है कि होलिका संभवतः लोक संस्कृति, जनजातीय समाज या मातृसत्तात्मक व्यवस्था की प्रतिनिधि रही lआक्रमणकारी आर्य-ब्राह्मण सत्ता ने जब इन समाजों पर विजय पा लिया तब लोक संस्कृति, जनजातीय समाज, मूलनिवासी समाज के महानायको को असुर,lराक्षस, दानव और नायिकाओं को राक्षसी घोषित कर दिया l अंततः इतिहास को मिथक बनाकर,मिथक को धर्म का अटल हिस्सा बना दिया गया।
सवाल तो यह भी उठता? इतिहास कौन लिखता है?
सच्ची और बहुत गहरी बात है —इतिहास विजेता लिखता है, पराजित नहीं। पराजित लिखेगा भी तो जला दिया जायेगा, तहस-नहस कर दिया जायेगा, नामों -निशान मिटा दिया जायेगा l
सच तो यही है -जीतने वाला ही वही नायक होता l हारने वाला कितना भी बड़ा महान क्यों न रहा हो, भले ही छल या धोखेबाजी से हराया गया हो पर खलनायक तो हारने वाला कहा जाता है l
क्या यह नहीं लगता है कि — होलिका एक विद्रोही स्त्री,जननेत्री, जननायिका थी या सामाजिक सुधारक जिसे प्रभुत्ववादी सत्ता को चुनौती देने के कारण उसे राक्षसी घोषित कर जला दिया गया।
आधुनिक भारत जहाँ डिजिटल और एआई का बोलबाला बढ़ रहा है क्या हम ऐसे विज्ञानवादी युग में वही गलती तो नहीं दोहरा रहे हैं?
हर साल होलिका का पुतला जलाकर —क्या हम अनजाने में अथवा धर्म की अफीम खाकर एक स्त्री को बार-बार दंडित नहीं कर रहे? एक नायिका स्त्री को राक्षसी बनाकर कब तक और दहन होता रहेगा? धर्मधीशो की चेतना कब जागेगी? कब एक स्त्री पात्र का दहन बंद होगा l
अगर सच के चश्मे से देखा जाये तो यह सामाजिक चेतना का उत्सव कहीं से नहीं लगता है, यह ऐतिहासिक अन्याय की पुनरावृत्ति है l
वक़्त के बदलाव के साथ होलिका दहन को पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिए l
आधुनिक युग को देखते हुए अब समय आ गया है कि —
होलिका दहन को स्त्री दहन नहीं,
बल्कि भ्रस्टाचार,अहंकार, अन्याय, अज्ञान, अमानुषता,घृणा,भेदभावऔर क्रूरता के दहन के रूप किया जाना चाहिए न कि किसी स्त्री के प्रतीक के रूप में दहन होना चाहिए l यदि परंपरायें मानवता के विरुद्ध हो जाये तो ऐसी परम्पराओं को खत्म कर देना चाहिए अथवा पुनर्विचार और सुधार की कसौटी पर परखना चाहिए परन्तु यहां तो आदिम मानवता विरोधी परम्पराएं -होलिका दहन और जातिवाद एवं अन्य मानवता विरोधी को फूँक मार-मार प्राण प्रतिष्ठा की जा रही हैं l
सच ही कहा गया बिना विवेक की आस्था, अंधश्रद्धा बन जाती है और विवेक बिना संवेदना के क्रूर हो जाता है, और कब तक अंधश्रद्धा के रथ पर सवार होकर क्रूरता मानवता की छाती पर कीलें ठोकती रहेगी..... विचार जरूर कीजियेगा l
रंगोत्स्व का त्यौहार मनाना चाहिए पर किसी के अपमान उत्सव तो मानवता विरोधी हो जाता है l
स्वस्थ और मानवकल्याणकारी परंपराएँ निभाना चाहिए पर यह नहीं कि अन्याय और अत्याचार को उत्सव की तरह युगों -युगों तक ढ़ोते रहे l
आदमी को धर्म चाहिए पर धर्म में मानवता,समानता और बन्धुत्व भाव होना चाहिए l
अब होलिका का दहन स्त्री पात्र के प्रतीकात्मक रूप से नहीं जलाना चाहिए, यदि दहन होना ही है तो भ्रस्टाचार,अहंकार, अन्याय, अज्ञान, अमानुषता,घृणा,भेदभाव, नफ़रत,क्रूरता अत्याचारियों भ्रष्ट्रचारियों के प्रतीकों का दहन होना चाहिए l
अब होली पर नफ़रत,अत्याचार, अन्याय,विषमता का नहीं —बल्कि संवेदना, विवेक और समानता का ग़ुलाल उड़े और पिचकारियों से खुशी, समानता, सद्भावना और भाईचारे का रंग बरसे ।
नन्दलाल भारती
25/02/2026
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