हिस्से का कफ़न
गाँव की चौपाल पर बैठे बूढ़े रामखेलावन की आवाज़ अचानक भारी हो गई थी वे बोले मशीन युग के बेटे माँ-बाप को तब तक चाहते हैं, जब तक उनकी साँसों में कमाई की गर्मी होती है… और जब बुढ़ापे की ठंडी साँसें बचती हैं, तब वही बेटे पराये हो जाते हैं, वहां बैठे सभी लोग सन्न रह गए l
किसी ने धीरे से कहा—“पर क्या कोई बेटा इतना पत्थरदिल भी हो सकता है कि जिस माँ ने उसे नौ महीने कोख में रखा, उसी माँ का शव कफ़न के इंतज़ार में धूप में पड़ा रहे?”
रामखेलावन ने गहरी साँस लेकर हुक्का का धुंआ आसमान की ओर छोड़ते हुए और बोले—“क्यों तुम चुन्नीलाल और दिव्यानी की सुलगती दास्तान याद नहीं है l
यह दास्तान सिर्फ एक परिवार की नहीं है, यह उस अंधे मोह की कहानी है जहाँ माँ-बाप अपने बेटों के लिए सब कुछ लुटा देते हैं, यहां तक की अपना जीवन भीl
बुढ़ौती कैसे कटेगी इसकी चिंता नहीं करते दानी कर्णवीर की तरह सब बच्चों के भविष्य पर लगा देते हैं और अंत में उनके हिस्से में आता है—एक अधूरा जीवन… और एक कफ़न का इंतज़ार। रामखेलावन फिर क्या, उन्होंने चुन्नीलाल, दिव्यानी और उनके दोनों बेटों—प्रीतेश और जीतेश अपने माँ-बाप के जीवन के लिए सुनानी ही साबित हो गए थे l
चुन्नीलाल पेट के कैंसर से पीड़ित थे, वे खुद के इलाज के लिए खेत का एक टुकड़ा भी नहीं भेजना चाहते थे l प्रीतेश और जीतेश दोनों परदेसी थे,वे इसी गाँव में रहते थे, वो खंडहर चुन्नीलाल के बड़े मकान की छोटी निशानी है l पहले वो नए मकान नहीं थे l
चुन्नीलाल और दिव्यानी, काका-काकी उस खंडहर वाले मकान में रहते थेl यह खंडहर कभी आलिशान घर था, पूरा गाँव चुन्नीलाल से रायमशविरा लेने आते थे, पांच -दस लोग सुबह -शाम बैठते थे,हुक्का का दौर चलता था l
भले ही गाँव के घर में आग नहीं मिले पर दिव्यानी काकी की बोरसी में हमेशा आग होती थी, गाँव की औरतें दिव्यानी काकी से आग माँग कर ले जाती थी, बड़े नेक इंसान थे, चुन्नीलाल काका और दिव्यानी काकी l
रामसंजीवन पूछा-बाबा, वो बाबा इतने बुद्धिमान थे l
रामखेलावन से पहले चतुरी काका चश्मा आँख से उतार कर आँख मसलते हुए बोले-हाँ बेटवा, वे अंग्रेजों के जमाने में कलकत्ता में किसी मोटर-कंपनी में साहब थे, पूरा गांव उन्हें मैंनेजर साहब कहता था l
रामखेलावन बोले -चतुरिया सही कह रहा है l चुन्नीलाल काका तीन भाई थे-धन्नी लाल,मन्नीलाल और चुन्नीलाल लालl वे देख रहे हो जंगल जैसा खंडहर जो साँपो का बसेरा है, वही तीनों भाईयों का परिवार एक साथ रहता था l
रामसंजीवन पूछा - उतनी बड़ी जगह मुर्दहिया कैसे बन गयी बाबा?
दिव्यानी काकी को पति की कमाई का घमंड हो गया और तीनों भाई अलग हो गए l चुन्नीलाल काका नौकरी कर रहे थे, दिव्यानी काकी घर गृहस्थी संभाल रही थी,प्रीतेश और जीतेश पढ़ -लिख रहे थेl
चुन्नीलाल काका अपने भाईयों को बहुत प्यार करते थे, थे भी सबसे छोटे l प्रितेश और जीतेश भी शादीशुदा हो गए, शहर- प्रदेश करने लगे l चुन्नीलाल और दिव्यानी काका -काकी जीवन में भूचाल तब आ गया जब काका रिटायर होकर गाँव आ गए l
चुन्नीलाल के पास जब तक पैसे थे, तब तक दोनों बेटे जोंक की तरह चूसते रहे और बाद अपनी-अपनी पत्नियों को गाँव में छोड़कर शहर चले गएl
बड़ा बेटा प्रितेश तो एकदम अजनबी हो गया, वह शहर में पैर जमाते ही अपनी पत्नी और बच्चों को भी लेकर चला गया l जितेश भी बाल -बच्चेदार था वह भी परदेसी था l इधर चुन्नीलाल बीमार रहने लगे, गाँव के डॉक्टरों को दिखाए तो वे पेट दर्द की दवा पुड़िया में लपेटकर दे देते पर आराम की जगह दिक्क़त बढ़ने लगी l वे घबरा कर टाउनएरिया के डॉ को दिखाए तब पता चला की गठान है l
सालों तक तड़पते रहे, डॉक्टर की दवा लेते रहे, इसी बीच किसी अन्य डॉक्टर से संपर्क हो गया ,जो दूर गाँव का था डॉक्टर थे l
चुन्नी काका बैल बेंचकर उसी से ऑपरेशन करवा लिए पर शरीर में खून की कमी या नीम हकीम डॉक्टर ने उनकी जान ले लिया l
दिव्यानी काकी अकेली होकर रह गयी,अपनी हैसियत के अनुसार मृत्युभोज भी की, दोनों बेटे और उनका परिवार भी शामिल हुआ, और फिर सब वापस हो लिए l हर पितृ-विसर्जन के दिन दिव्यानी काकी कौओं को मैनेजर साहब के पसंद का खाना खिलाती थी, भले ही वह भूखी रहें l
दिव्यानी काकी बड़ी जुझारू औरत थी, खुद अपने खेत में काम करती फ़सल उगाती, पैदावार भी होती,उनके भाई -भतीजे मदद करते-रहते थेl कहते है ना जिसका कोई नहीं उसका ब्रह्माण्ड l उम्र कहाँ किसी को बख्शती है, दिव्यानी काकी बीमार रहने लगी,प्रितेश को माँ-बाप की सम्पति से एकाएक मोह जाग उठा, उसने अपनी पत्नी और छोटी बेटी को गाँव पहुँचा दिया l
धीरे-धीरे दिव्यानी के हाथ पाँव शिथिल होने लगे और प्रितेश घरवाली ललिता जल्लाद बनने लगी, पुआल में दबादबाकर मारती थीl खटिया पर पड़ी भूख से तड़प रही थी, भूख तड़पती हुई दिव्यानी को देखकर पड़ोस में रहने बुढ़िया दादी अपने हाथ से एक निवाला दिव्यानी के मुंह में डालने लगी, इतने में प्रितेश की घरवाली रजौती ने बुढ़िया दादी के हाथ से कटोरी छिनकर फेंक दी, उसी रात दिव्यानी भूखे प्यासे तड़प कर मर गयी l जितेश की घरवाली समौती ने न कभी सेवा की, न खाना - पानी दी पर बुढ़िया पर हाथ नहीं उठायी थी l
दिव्यानी के मरने के पहले गिद्ध की तरह दोनों बेटे अपने बाल -बच्चों के डेरा डाल दिए थे l दिव्यानी मर भी गयी पर बेटों-बहुओं को पता ही नहीं चला, वही बुढ़िया जो दिव्यानी के मुंह में एक निवाला नहीं डाल पायी, उसी बुढ़िया ने दिव्यानी के मरने की खबर धन्नीलाल के बेटे को दी, तब पूरे गॉव में खबर फैल गयी कि दिव्यानी मर गयी l
गाँव वालों ने दिव्यानी के मृत शरीर को घर में से बाहर निकाल कर पुआल बिछाकर पर सुलाया था l
प्रितेश और जितेश दोनों विपरीत दिशा में मुंह कर बैठे रहे,दो कण्डा और एक अगरबत्ती का पैकट कोई नहीं लाया,गांव के लोग लाये थे l बुढ़िया रात में मरी थी, शाम होने को आ गयी, इसके बाद गाँव वालों ने चंदा लगाकर कफ़न एवं अन्य अंतिम संस्कार का सामान लाये, दोनों बेटों में से एक की भी अंतरात्मा नहीं जागी कि अपनी माँ की मृत शरीर पर एक गज कफ़न डाले दे बस आपस में लड़ते -झगड़ते रहे l
गाँव वालों ने गंगाजी के किनारे पूरे सम्मान के साथ दाह संस्कार करने का निर्णय लिया, जीपे भी आकर खड़ी हो गयी,इतने दिव्यानी के भाई-भतीजे गाजे बाजे से आ गए l
गाँव वालों और दिव्यानी के मायके वालों ने दिव्यानी का जनाजा निकाला, दोनों बेटे प्रितेश और जितेश आगे -आगे मुंह लटकाये चल तो रहे थे पर उन्हें किसी प्रकार का कोई दुःख नहीं था l
तीसरा और मृतक भोज दिव्यानी के भाई भतीजों ने किया, मृतक भोज में बावन गाँव के लोग शामिल हुए थे l मृतक भोज तक की पूरी जिम्मेदारी उठाने के बाद दिव्यानी के भाई -भतीजे अपने गाँव चले गए और फिर कभी नहीं आए l
प्रितेश और जितेश, चुन्नीलाल और दिव्यानी की छोडी सम्पति और जमीन जायदाद मालिक बन गए l
रामसजीवन बोला बाप रे इस गाँव की यह कहानी है l
सच्ची घटना है सिर्फ कहानी नहीं है रामखेलावन बोला l
चतुरी बोले -ससुरों को क्या मिल रहा है? वही बेंच कर कुकर्मी बेटों को बचाने के कोर्ट -मुकदमा लड़ रहे,बेटे-बेटियों का ब्याह कर रहे है, सब तो बर्बाद हो गया है,बचा क्या है?
रामखेलावन बोले -“जिस माँ ने इन बेटों को अपने हाथ से निवाला खिलाया, उसी के बेटों की कमाई का गज भर कफ़न तक उस माँ को नसीब नहीं हुआ l
गाँव वालों ने आपस में चंदा किया, कफ़न, लकड़ी और बाकी सब इंतज़ाम कर दिए।
प्रीतेश और जीतेश वहीं सिर झुकाए खड़े थे पर चेहरे पर शर्म से ज्यादा, उनके चेहरे पर स्वार्थ की खामोशी थी।
उसी समय दिव्यानी के भाई ने काँपती आवाज़ में कहा तो था पर वे शब्द, शब्द नहीं,शोले थे l
“आज मेरी बहन की मृत देह को कफ़न देने का हक तुम दोनों बेटों प्रितेश और जितेश ने खो दिया हैl
जिस माँ को तुम लोगों ने जीते जी कुत्ते -बिल्लियों से बदतर ज़िंदगी दी, उसके मरने पर घड़ियाली आंसू बहाकर बेटे होने का ढोंग मत करो।”मेरे बहन बहनोई की सम्पति पर तुम नालायकों का ही अधिकार होगाl
तीसरा और तेरहवीं सब उसके भाई भतीजे करेंगे, इसी गाँव में जहाँ दिव्यानी की डोली आयी थी और जहाँ से अर्थी उठ रही है ,दिव्यानी के भाई ने कर दिखाया, छोटा भाई होकर बड़े बेटे तरह l
गाँव के सामने ही उन्होंने अपनी बहन के शव को कंधा दिया।
देखो वे दोनों बेशर्म,जिस संपत्ति को बेच-बेचकर वे अपनी इज्जत बचाने की कोशिश कर रहे है वह भी जल्दी ही खत्म हो जाएगी l
जीतेश भी कर्ज़ में डूब हुआ है चतुरी बोले l
रामखेलावन अंगुली से दिखाते हुए बोले-संजीवन बेटा “यह उसी चुन्नीलाल और दिव्यानी का घर है… जिनके नालायक बेटे अपने माँ - बाप को कफ़न तक नहीं दिए थे, आज उनकी ही जमीन जायदाद की कमाई खा रहे हैं, कोर्ट कचहरी लड़ रहे हैं l
उस दिन ना प्रीतेश की आँखों में आँसू आए थे ना जितेश के l
संजीवन बेटा जो औलाद माँ-बाप के आँसू का मोल नहीं समझती, समय एक दिन उनकी पूरी पीढ़ी को रुला देता है।
तब से इस गाँव के बड़े-बुजुर्ग जब किसी बेटे को माँ-बाप से मुँह मोड़ते हुए देखते हैं, माँ -बाप का अपमान करते हुए देखते हैं ,माँ -बाप को आंसू पोंछते हुए देखते हैं तो कहते हैं,
देखना रे सावधान रहना;
कहीं तुम्हारे हिस्से का कफ़न भी तुम्हारे बच्चों के लिए एक दिन सवाल न बन जाए।”
नन्दलाल भारती
11/03/2026
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