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हिसाब अभी बाकी है

 

हिसाब अभी बाकी है/नन्दलाल भारती

सुबह की चाय का कप हाथ में लिए जयदेव बरामदे में बैठे थे।

चाय कब ठंडी हो गई, उन्हें पता ही नहीं चला।

सामने सड़क पर दूधवाला साइकिल से निकल गया। अखबार वाला अखबार फेंककर आगे बढ़ गया। पड़ोस के अहिरवाल साहब अपने पोते का हाथ पकड़े टहल रहे थे। पोता बार-बार दादा का हाथ खींचकर कुछ कह रहा था और अहिरवाल साहब हँसते हुए उसकी बात सुन रहे थे।

जयदेवबाबू की आँखें उस दृश्य पर टिक गईं।

उन्होंने अनायास अपनी हथेली देखी।

कभी इन्हीं हाथों ने बच्चों की फीस भरी थी। इन्हीं हाथों ने रात-दिन काम करके घर बनाया था। इन्हीं हाथों ने बूढ़े माँ-बाप की सेवा किये थे, घर-परिवार की उन्नति के लिए रात दिन एक किये थे।

अब वही हाथ काँपते थे।

उन्होंने भीतर आवाज लगाई—

“सावित्री...”

रसोई से उत्तर आया—

“हाँ, क्या हुआ?”

“मन बहुत विचलित है।”

सावित्री बाहर आई। उसके हाथ में चाय की दूसरी प्याली थी।

“क्यों? क्या हुआ जी ?”

जयदेव ने सिर हिलाया।

“कुछ नहीं।”

“कुछ तो है।”

जयदेव ने सामने देखा।

“मन अशांत है।”

सावित्री उनके पास बैठ गई।

“क्यों?”

जयदेव बहुत देर तक चुप रहे। फिर अचानक बोले—

“कौन-सा अपराध हो गया हमसे कि आखिरी समय में माँ-बाप की सेवा करने का मौका ही नहीं मिला?”

सावित्री चौंकी।

“आज यह बात क्यों?”

“क्योंकि आज समझ में आ रहा है कि जिंदगी भर हम किसके लिए दौड़ते रहे।”

“बच्चों के लिए घर - परिवार के लिए ।”

“हाँ। लेकिन अपने माँ-बाप के लिए?”

सावित्री चुप हो गई।

जयदेव की आवाज भारी हो गई।

“पिताजी बीमार थे। मैं शहर में नौकरी के लिए भागा था। माँ ने कितनी बार बुलाया। मैं कहता रहा—‘अभी बच्चों की पढ़ाई जरूरी है।’ पिता अस्पताल में थे और मैं फीस जमा करने की चिंता में था। माँ चली गईं तो मैं उनके पास नहीं था।”

उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

“क्या वह भी कोई हिसाब है, सावित्री?”

सावित्री ने पति के कंधे पर हाथ रखा।

“उस समय भी तो मजबूरी थी।”

“मजबूरी थी... लेकिन क्या मजबूरी रिश्तों का दर्द मिटा देती है?”

सावित्री के पास उत्तर नहीं था।

जयदेव आगे बोले—

“हमने बच्चों की जिंदगी बनाने के लिए अपनी जिंदगी गिरवी रख दी। अभिषेक को इंजीनियर बनाया। अमित को पढ़ाया। अनुपमा की शादी की। कभी नहीं सोचा कि कल हमारे लिए क्या बचेगा।”

उन्होंने कटु मुस्कान के साथ कहा—

“और आज देखो...

सावित्री ने धीरे से कहा—

“बच्चे बुरे नहीं हैं।”

“मैंने कब कहा कि बुरे हैं?”

“तो फिर?”

“बस... समय बुरा है।”

कुछ देर बाद जयदेव बोले—
“सावित्री, आदमी जब जवान होता है तो सोचता है कि बुढ़ापे में उसके बच्चे उसका सहारा होंगे। लेकिन शायद वह भूल जाता है कि बच्चे बड़े होते-होते अपने-अपने संसार में चले जाते हैं।”
सावित्री बोली—
“सबका नसीब अपना-अपना।”
“और हमारा?”
“हमारा भी।”
जयदेव ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हारे भीतर इतना विश्वास कहाँ से आता है?”
सावित्री मुस्करा दी।
“तुम्हारे साथ रहते-रहते।”
जयदेव और सावित्री का विवाह बहुत साधारण था।
माटी का घर , मिट्टी का आँगन, बाहर नीम का पेड़ और कुछ नहीं ।
शादी के बाद दोनों ने अभाव देखे, लेकिन शिकायत नहीं की।
जयदेव अशासकीय दफ्तर में छोटी सी नौकरी करते थे। वेतन सीमित था। घर में खर्च अधिक।
पहला बच्चा हुआ तो सावित्री ने अपने खर्च पर लगाम लगा ली ।
दूसरा बच्चा हुआ तो उसने सिलाई शुरू कर दी।
बेटी हुई तो जयदेव ने कहा—
“इसे बेटों से कम मत पढ़ाना।”
सावित्री ने हँसकर कहा—
“तुम्हें लगता है मैं भेद करूँगी?”
“नहीं। बस समाज करता है।”
और सचमुच समाज करता रहा।
रिश्तेदार कहते—
“दो बेटों के बाद बेटी पर इतना खर्च क्यों?”
जयदेव कहते—
“बेटी खर्च नहीं है।”
अनुपमा पढ़ने में बहुत तेज थी।
वह अक्सर कहती—
“पापा, मैं बड़ी होकर व्यवसाय करूंगी ।”
जयदेव कहते—
“तू जो बनना चाहे बनना।”
लेकिन इसी बीच घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई।
अभिषेक की इंजीनियरिंग की फीस आई।
जयदेव ने पीएफ से कर्ज लिया कुछ रकम सूद पर भी लिया l
अमित की पढ़ाई के लिए बैंक से कर्जा लेना पड़ा ।
अनुपमा की पढ़ाई कर लिए जयदेव और सावित्री को एड़ी- चोटी एक करना पड़ा तब पढ़ाई पूरी हुई थी, बच्चों की पढ़ाई और घर - परिवार के खानखर्च में एकदम टूट गए थे पर सहारा दूर तक नहीं दिखाई पड़ रहा था l
एक रात बेटी हौशला ने माँ के हाथ से बाप की दी गयी अंगूठी को माँ की अंगुली में नहीं होने की वजह पूछ बैठी—
“माँ, अंगूठी कहाँ गयी ?”
सावित्री ने हँसते हुए कहा—निवेश
“बच्चों की किताबों में, तुम्हारे पापा बच्चों और परिवार के खुद के जीवन की कमाई गिरवी रख दिए तो मैंने गहना-अंगूठी निवेश कर दी l
हौशला समझ गई।
वह माँ से लिपटकर रो उठी ।
जयदेव ने उस दिन कहा था—
“रो मत बेटी। पढ़ाई पूरी कर। यही हमारा, हमारे खानदान का असली गहना है।”
वक्त गुजरता गया।
अभिषेक को नौकरी मिल गई।
अमित भी कमाने लगा।
हौशला की शादी हो गई।
जयदेव और सावित्री को लगा—अब जीवन थोड़ा आसान होगा।
लेकिन यही वह समय था जब बच्चों की अपनी दुनिया बनने लगी।
अभिषेक की शादी भानुप्रिया से हुई।
भानुप्रिया शिक्षित थी, महत्वाकांक्षी थी और आत्मनिर्भर रहना चाहती थी।
शुरुआत में उसने सास-ससुर की तनिक सेवा की।
फिर एक दिन उसने अभिषेक से कहा—
“मुझे बूढ़े -बुढ़िया की रोटी नहीं थापना है ।”क्या मैं इसीलिए आयी हूँ l
“तुम्हें किसी चीज की कमी तो नहीं, माँ तुमसे ज्यादा काम करती है, पिताजी भी कहाँ खाली बैठे रोटी तोड़ रहे ?”
“तुम्हारी माँ।”
“माँ ने?”
“हाँ। उन्होंने कहा कि घर में बुजुर्ग हैं, बच्चे हैं उनकी देखभाल की जिम्मेदारी बहू की होती है l
अभिषेक ने समझाने की कोशिश की—
“माँ का मतलब नौकरानी नहीं था।”तुम कुल की मर्यादा हो l
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।
छोटी-छोटी बातें जमा होती गईं।
खाना किस समय बने।
बच्चे को कौन देखे।
घर का खर्च कौन उठाए।
किसे कितना समय मिले।

भानुप्रिया को लगता था कि अभिषेक अपने माता-पिता के प्रति जरूरत से ज्यादा जिम्मेदार है।
अभिषेक को लगता था कि वह पत्नी को खुश करने के चक्कर में माता-पिता को खो रहा है।
और माता-पिता को लगता था कि बेटे को बचाने के चक्कर में कहीं उसकी गृहस्थी न टूट जाए।
तीनों दिशाओं में खिंचता अभिषेक भीतर से टूटने लगा।
एक रात घर में बहुत बड़ा झगड़ा हुआ।
भानुप्रिया चिल्ला रही थी, अभिषेक के साथ थर्ड डिग्री का व्यवहार कर रही थी l
“तुमको हमेशा अपने माता-पिता की चिंता रहती है।मेरे माँ-बाप, मेरे मायके और मेरी चिंता कभी नहीं!”
अभिषेक बोला—
“मैं किसकी चिंता नहीं करता?”
“मेरी!”मेरे माँ -बाप की l
“मैं दिन-रात काम करता हूँ।”
“पैसा कमाना ही जिम्मेदारी नहीं है।”
जयदेव अपने कमरे में सब सुन रहे थे।
सावित्री ने दरवाजा बंद कर लिया।
जयदेव ने धीमे से कहा—
“हमारी वजह से झगड़ा हो रहा है।”
सावित्री ने तुरंत कहा—
“ऐसा मत कहो।”
“सच यही है।”
“नहीं।”
“अगर हम नहीं होते तो शायद उनका जीवन आसान होता।”
सावित्री की आँखों में आँसू आ गए।
“तो क्या बुढ़ापा अपराध है?”
जयदेव चुप हो गए।
उस रात दोनों ने सो नहीं पाये बस करवटे बदलते रात बीत गयी ।
अगले दिन जयदेव ने अभिषेक से कहा—
“बेटा, भानुप्रिया को अपने साथ शहर रखो, वह हमारे लिए रोटी थापने नहीं आयी है,उसको उसके मायके को सम्भालो,हम अकेले रह लेंगे।”
अभिषेक चौंक गया।
“क्या कह रहे हो ?
“तुम्हारी गृहस्थी मत बिगाड़ो।”
अभिषेक ने पिता के पैर पकड़ लिए।
“मुझे मत छोड़िए।”
जयदेव की आँखें भर आईं।
“मैं तुम्हें नहीं छोड़ रहा बेटा। तुम्हारी जिंदगी बचा रहा हूँ।”
अभिषेक रो पड़ा।
लेकिन दरवाजे के बाहर खड़ी भानुप्रिया यह सब सुन रही थी।
उसके चेहरे पर भी आँसू थे।
उसे पहली बार लगा कि यह लड़ाई उतनी सरल नहीं थी जितनी वह समझती रही थी।
दूसरी ओर अमित भी संघर्ष कर रहा था।
उसकी नौकरी की शुरुआत थी।
बूढ़े -बूढ़ी की बीमारी का खर्च था।
वह हर महीने माता-पिता को पैसे भेजना चाहता, लेकिन कई बार खुद उधार लेकर महीना पूरा करता।
एक रात उसने पत्नी से कहा—
“इस बार पापा को दस हजार भेजना है।”
पत्नी बोली—
“अमित की फीस?”
“वह भी देनी है।”
“तो?”
अभिषेक चुप।
भानुप्रिया ने धीरे से कहा—
“तुम्हें लगता है मैं तुम्हारे माता-पिता, भाई -बहन के खिलाफ हूँ?”
“नहीं।”
“फिर मुझे दोषी क्यों समझते हो?”
अभिषेक ने उसकी ओर देखा।
“मैं किसी को दोषी नहीं समझता। बस... लगता है मैं हर तरफ कम पड़ रहा हूँ।”
भानुप्रिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“हम मिलकर संभालेंगे।”
अभिषेक की आँखों में पहली बार राहत आई।
हौशला भी अपने घर में आसान जिंदगी नहीं जी रही थी।
ससुराल में उसका पति अच्छा था, लेकिन परिवार की अपनी जरूरतें थीं।
फिर भी वह बराबर माँ-बाप को फोन करती।
एक दिन उसने फोन पर पूछा—
“माँ, पापा दवा खत्म तो नहीं हुई?”
“नहीं।”
“सच?”
“हाँ।”
“पापा?”
“वे ठीक हैं।”
हौशला समझ रही थी कि माँ झूठ बोल रही है।
उसने उसी दिन अपने पति से कहा—
“मुझे माँ-पापा के लिए कुछ करते रहना चाहिए ।”
पति ने पूछा—
“क्या ?”
“पुत्र की तरह सेवा l माँ बाप सिर्फ पुत्रों की जिम्मेदारी नहीं होती l
उन्होंने बिना कुछ सोचे कहा जरूर परन्तु माँ -बाप की छोड़ी विरासत में हिस्सेदारी भी l
वह देर तक जागती रही। उसके मन में विचारों के ज्वार - भाटे उठ रहे थे कि क्यों न पतिदेव से पूछ लूं कि आपके माँ -बाप ने अपनी बेटियों को क्या दिया है, आपको क्या दिया है पर मौन साध ली
उसके मन में एक और प्रश्न उठ रहा था—
क्या बेटी की जिम्मेदारी का कोई हिस्सा समाज ने तय किया है?
या बेटी को केवल विदा कर देने के बाद उसके मायके से उसके अधिकार भी विदा कर दिए जाते हैं?
समय ने सबको अपनी-अपनी परीक्षा में डाल दिया।
एक दिन सावित्री की तबीयत अचानक बिगड़ गई।
जयदेव और अमित उसे लेकर अस्पताल पहुँचे।
डॉक्टर ने कई जाँच लिख दीं।
रिपोर्ट देखकर डॉक्टर ने कहा—
“इलाज लंबा चलेगा।”
जयदेव ने पूछा—
“खर्च कितना आएगा?
अमित बोला पापा खर्च की चिंता मत करो l
डॉक्टर ने रकम बताई।
जयदेव के चेहरे का रंग बदल गया फिर वे बोले इन्सुरेंस l
घर लौटकर उन्होंने अपनी अलमारी खोली।
कुछ कागज,रसीदें और एक पुराना फोटो एल्बम ।
उसमें बच्चों के बचपन की तस्वीरें थीं।
एक तस्वीर में अभिषेक उनके कंधे पर बैठा था।
दूसरी में अमित उनकी उँगली पकड़े था।
तीसरी में हौशला स्कूल की ड्रेस में मुस्करा रही थी।
जयदेव ने तस्वीरों को छाती से लगा लिया।
सावित्री ने पूछा—
“क्या देख रहे हो?”
“अपना सबसे बड़ा धन।”
“तो फिर चिंता क्यों?”
“क्योंकि धन अब अपने-अपने घर में है।
अगले दिन अभिषेक अस्पताल पहुँचा।
उसके साथ भानुप्रिया भी थी।
अमित ने डॉक्टर से सारी जानकारी ली।
फिर उसने कहा—
“पिताजी, माँ का इलाज अच्छे अस्पताल में होगा।”
जयदेव ने पूछा—
“बहुत खर्च होगा।”
“तो होगा।”
“बेटी, इतना खर्च—”
“तीनों बच्चे अभिषेक, हौशला, अमित एक साथ बोले हम हैं, चिंता कैसी?
जयदेव की आँखें भर आईं।
भानुप्रिया बोली -मेरे बाप ने धोखा दिया “मुझे देर से समझ आया बाबूजी ।”
जयदेव ने उसके सिर पर हाथ रख दिया ।
“देर से समझ आना भी समझ न आने से बेहतर है।”
अमित ने भी अपनी बचत निकाल दी।
हौशला ने गिरवी रख दिया।
सावित्री को जब पता चला तो उसने बेटी को डाँटा—
“तूने ऐसा क्यों किया?”
हौशला हँसी—
“माँ, आपने मेरे लिए अपने गहने बेचे थे। पापा ने खुद को गिरवी रख दिया था,मैंने तो कुछ नहीं किया।”
सावित्री ने बेटी को सीने से लगा लिया।
“पगली, माँ-बाप और बच्चों के बीच हिसाब कहाँ होता है?”
हौशला ने आँसू पोंछते हुए कहा—
“होता है माँ। बस वह पैसों का नहीं होता।”
सावित्री का इलाज चलता रहा।
इस दौरान परिवार के लोग एक-दूसरे के करीब आने लगे।
भानुप्रिया के पिता आत्महत्या कर लिए, उसका विद्रोही मिजाज धीरे-धीरे शांत हो रहा था ।
बाप की आत्महत्या के बाद उसे एहसास हुआ कि उसकी स्वतंत्रता किसी ने छीनी नहीं थी। वह खुद हर रिश्ते को अपनी स्वतंत्रता के खिलाफ समझ रही थी।
अभिषेक ने भी सीखा कि पत्नी को समझाना और माता-पिता की सेवा करना दो अलग-अलग जिम्मेदारियाँ नहीं, बल्कि एक ही परिवार के दो हिस्से हैं।
अमित ने अपनी सीमाओं को स्वीकार करना सीखा।
हौशला ने बेटी होने के अपराधबोध से मुक्त होना सीखा।
और जयदेव-सावित्री ने एक बहुत कठिन बात सीखी—
संतानों से प्रेम करना और उनसे अपेक्षा रखना दो अलग बातें हैं।
एक शाम जयदेव ने टेबलेट निगलते हुए सावित्री से कहा—
“लगता है सब बदल रहा है।”
सावित्री बोली—
“बदलाव धीरे आता है।”
“लेकिन क्या यह स्थायी होगा?”
“कौन जानता है?”
“फिर भी विश्वास है?”
“है।”
“क्यों?”
“क्योंकि जिन बच्चों को हमने प्रेम दिया है, उनके भीतर प्रेम मर नहीं सकता। कभी दब सकता है, कभी भटक सकता है, लेकिन मरता नहीं।”
जयदेव देर तक चुप रहे।
फिर बोले—
“सावित्री, शायद हमारा हिसाब अभी बाकी है।”
कुछ वर्ष बीते।
सावित्री धीरे-धीरे ठीक हुई।
जयदेव की चाल और धीमी हो गई।
अब घर में एक नियम था।
हर रविवार पूरा परिवार साथ बैठकर खाना खाता।
एक रविवार अभिषेक का बेटा गौरव अपने पिता से पूछा—
“पापा, दादा दादी की दवा कौन लाता है?”
अभिषेक बोला—
“हम सब।”
“क्यों?”
“क्योंकि दादा -दादी हमारे हैं।”
गौरव ने सहजता से कहा—
“तो फिर जब दादी बूढ़ी होंगी, मैं उनकी सेवा करूँगा।”
जयदेव दूर बैठे मुस्करा रहे थे।
उन्हें लगा जैसे जिंदगी ने उनके सामने एक नया पन्ना खोल दिया है।
एक रात जयदेव की तबीयत बहुत खराब हो गई।
उन्होंने अमित का हाथ पकड़कर कहा—
“बेटा, एक बात कहूँ?”
“हाँ पापा।”
“मुझे तुम्हारी सेवा की जरूरत से ज्यादा तुम्हारे मन की जरूरत है।”
अमित की आँखों से आँसू बहने लगे।
जयदेव सावित्री की तरफ इशारा करते हुए बोले अमित बेटा वो तुम्हारी माँ अब तुम्हारे भरोसे रहेगी उसका ख्याल रखना, उसका भी हिस्सा बराबर है, तुम तीनों के बराबर lअपना घर बसा लेना l
हौशला बोली -हम सब मिलकर माँ का ख्याल रखेंगे l
“पापा, अभिषेक और अमित दोनों एक साथ बोले मैंने आपको बहुत दुख दिया।”
“तुमने नहीं। परिस्थितियों ने।”
“लेकिन मैंने आपको अकेला छोड़ा अभिषेक बोला ”
जयदेव मुस्कराए।
“तुम लौट आए।”
“देर से।”
“देर से लौटने वाला रास्ता भूल गया था, बेटा। खोया नहीं था।”
अभिषेक ने पिता का हाथ माथे से लगा लिया।
उस रात जयदेव ने सावित्री को बुलाया।
“सावित्री।”
“हाँ।”
“अब मन शांत है।”
“क्यों?”
“क्योंकि लगता है... हिसाब चुकता होने लगा है।”
सावित्री ने मुस्कराकर कहा—
“मैंने तो कहा था—सब ठीक होगा।”
जयदेव ने उसकी ओर देखा।
“तुमने उम्मीद नहीं छोड़ी।”
“और तुमने?”
“मैंने भी नहीं।”
कुछ समय बाद जयदेव चले गए अपनी विरासत के चार हिस्से कर l
उनके जाने के बाद घर में बहुत बड़ा खालीपन था।
लेकिन इस बार खालीपन में पछतावा अकेला नहीं था।
उसके साथ प्रेम भी था।
अंतिम संस्कार के बाद तीनों बच्चे बरामदे में बैठे थे।
अभिषेक ने कहा—
“पापा हमेशा कहते थे—हिसाब अभी बाकी है।”
अमित बोला—
“अब समझ आया।”
हौशला ने पूछा—
“क्या?”
अमित ने कहा—
“वे पैसे का हिसाब नहीं कहते थे।”
भानुप्रिया ने धीरे से कहा—
“वे शायद यह देखना चाहते थे कि हम उनके दिए प्रेम को आगे ले जाते हैं या नहीं।”
सावित्री ने सबकी ओर देखा।
“अब हिसाब तुम्हें चुकाना है।”
तीनों बच्चे चौंके।
सावित्री मुस्कराई।
“मेरे लिए नहीं।”
“तो?”
“अपने बच्चों के लिए।”
वह उठी और जयदेव की तस्वीर के सामने दीपक जला दिया।
“तुम्हारे पिता ने हमें संपत्ति नहीं दी। उन्होंने हमें यह सिखाया कि रिश्ते जिम्मेदारी से नहीं, विश्वास से टिकते हैं।”
गौरव पास खड़ा सब सुन रहा था।
उसने दादी का हाथ पकड़ लिया।
“दादी, मैं आपको कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
सावित्री ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“वादा मत कर।”
“क्यों?”
“वादा टूट सकता है। बस इतना याद रखना—जब किसी अपने को तुम्हारी जरूरत हो, तो उसके पास बैठ जाना।”
गौरव ने सिर हिला दिया।
सालों बाद सावित्री भी बहुत बूढ़ी हो गई।
एक सुबह वह बरामदे में बैठी थी।
हौशला उसके बालों में तेल लगा रही थी।
अमित दवा लेकर आया।
अभिषेक रसोई से चाय लेकर निकला।
भानुप्रिया ने आवाज दी—
“माँ, नाश्ता तैयार है।”
गौरव ने दादी के पैर दबाते हुए पूछा—
“दादी, आज फिर पुरानी कहानी सुनाओगी?”
सावित्री हँस पड़ी।
“कौन-सी?”
“वही... जिसमें दादाजी कहते थे—हिसाब अभी बाकी है।”
सावित्री ने आँखें बंद कर लीं।
उसे जयदेव की आवाज सुनाई दी—
“आशा भी कितनी सुंदर है, जो हौसला और विश्वास जगाती है।”
उसने आँखें खोलीं।
सामने उसके बच्चे थे।
पोते-पोतियाँ नाती -नातिन थे।
घर में चहल-पहल थी।
उसने आसमान की ओर देखा और कहा—
“जयदेव, अब समझी हूँ... हिसाब कभी खत्म नहीं होता।”
हौशला ने पूछा—
“क्यों माँ?”
सावित्री मुस्कराई।
“क्योंकि एक पीढ़ी जो प्रेम देती है, अगली पीढ़ी उसे आगे बाँटती है। यही असली हिसाब है।”
बरामदे में कुछ क्षण के लिए मौन छा गया।
फिर गौरव ने दादी के पैर दबाते हुए कहा—
“तो दादी, मैं भी यह हिसाब आगे चुकाऊँगा।”
सावित्री की आँखों से आँसू बह निकले।
लेकिन वे दुख के आँसू नहीं थे।
वे उस विश्वास के आँसू थे, जिसने एक टूटते हुए परिवार को फिर से जोड़ दिया था।
बाहर सुबह का सूरज निकल आया था।
बरामदे में चाय की भाप उठ रही थी।
और जयदेव की लिखी मेज पर पड़ी किताबों के पन्ने हवा के झोंके से फड़फड़ा रहे थे
जैसे कोई अदृश्य हाथ अब भी कह रहा हो;
“उम्मीद मत छोड़ना...
हिसाब अभी बाकी है।”

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