हिन्दी के विकास में डॉ. भीमराव आंबेडकर की भूमिका, योगदान एवं सीमाएँ
— नन्दलाल भारती
भाषा केवल शब्दों का संसार नहीं होती; वह किसी समाज की स्मृति, संस्कृति, संवेदना और सामूहिक चेतना की वाहक होती है। भाषा मनुष्य के भीतर बसे अनुभवों को आवाज देती है, उसकी स्मृतियों को सुरक्षित रखती है और उसे अपने समाज तथा संस्कृति से जोड़ती है।
भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश में भाषा का प्रश्न इसलिए केवल अभिव्यक्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि पहचान, संवाद, लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता से जुड़ा प्रश्न भी है।
हिन्दी ने भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं, लोक-अनुभवों और जन-अभिव्यक्तियों के बीच संवाद का सेतु बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब भारत अपने लोकतांत्रिक गणराज्य की संवैधानिक नींव रख रहा था, तब यह प्रश्न भी सामने था कि इतनी भाषायी विविधता वाले देश में हिन्दी की भूमिका क्या हो और उसका स्वरूप कैसा हो।
एक ओर हिन्दी को व्यापक जनसंपर्क और राष्ट्रीय संवाद की महत्वपूर्ण भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की आकांक्षा थी, तो दूसरी ओर भारत की समृद्ध भाषायी विविधता को सुरक्षित रखने की चिंता भी थी। चुनौती यह थी कि एकता स्थापित हो, लेकिन एकरूपता न थोपी जाए; हिन्दी का सम्मान हो, लेकिन दूसरी भाषाओं का सम्मान कम न हो।
यहीं से हिन्दी और भारतीय संविधान के संबंध का एक महत्वपूर्ण अध्याय आरंभ होता है और इसी संदर्भ में डॉ. भीमराव आंबेडकर की भूमिका को समझना आवश्यक हो जाता है।
डॉ. आंबेडकर हिन्दी के साहित्यकार, कवि अथवा हिन्दी भाषा आंदोलन के प्रत्यक्ष नेता नहीं थे। हिन्दी साहित्य के रचनात्मक विकास में कबीर, रविदास, सूरदास, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद और अनेक साहित्यकारों का प्रत्यक्ष योगदान रहा है। डॉ. आंबेडकर का हिन्दी से संबंध मुख्यतः संवैधानिक, लोकतांत्रिक और भाषायी दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
हिन्दी के विकास में उनके योगदान का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि उन्होंने हिन्दी में कितना लिखा, बल्कि इस आधार पर भी किया जाना चाहिए कि जिस लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढाँचे में हिन्दी को प्रतिष्ठा मिली, उसके निर्माण में उनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी।
संविधान-निर्माण और भाषा का प्रश्न:
स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माण के समय भाषा का प्रश्न अत्यंत संवेदनशील था। भारत अनेक भाषाओं, बोलियों, संस्कृतियों और परंपराओं वाला देश है। ऐसी स्थिति में भाषा के प्रश्न का समाधान केवल बहुमत के आधार पर नहीं किया जा सकता था। आवश्यकता थी ऐसी व्यवस्था की, जिसमें राष्ट्रीय संवाद के लिए हिन्दी को उचित स्थान मिले, लेकिन दूसरी भारतीय भाषाओं के अस्तित्व, सम्मान और अधिकारों की भी रक्षा हो।
डॉ. आंबेडकर संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे और संविधान-निर्माण की प्रक्रिया में उनकी केंद्रीय भूमिका थी। भाषा संबंधी संवैधानिक प्रावधान भी संविधान सभा की व्यापक बहस, विचार-विमर्श और विभिन्न मतों के बीच बनी सहमति का परिणाम थे।
हिन्दी को संवैधानिक प्रतिष्ठा मिलने का पूरा श्रेय अकेले डॉ. आंबेडकर को देना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण तथ्य है कि जिस संविधान-निर्माण प्रक्रिया में उन्होंने महत्वपूर्ण नेतृत्वकारी भूमिका निभाई, उसी प्रक्रिया में हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में संवैधानिक स्थान प्राप्त हुआ।
यही वह बिंदु है जहाँ डॉ. आंबेडकर का हिन्दी संबंधी योगदान प्रत्यक्ष साहित्यिक योगदान से आगे बढ़कर संवैधानिक महत्व प्राप्त करता है।
हिन्दी को संवैधानिक प्रतिष्ठा
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा हिन्दी तथा उसकी लिपि देवनागरी निर्धारित की गई। स्वतंत्र भारत में हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में संवैधानिक स्थान मिलना हिन्दी के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी।
भाषा को पहली बार स्वतंत्र भारत की सर्वोच्च संवैधानिक व्यवस्था में औपचारिक प्रतिष्ठा मिली। हिन्दी अब केवल साहित्य, संस्कृति और जनजीवन की भाषा नहीं रही, बल्कि संघ के प्रशासनिक और संवैधानिक जीवन में भी उसका स्थान निर्धारित हुआ।
डॉ. आंबेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उस संवैधानिक व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण सहभागी थे। इसलिए हिन्दी की संवैधानिक प्रतिष्ठा के संदर्भ में उनकी भूमिका को नकारना उचित नहीं होगा।
ऐतिहासिक संतुलन की दृष्टि से यह भी याद रखना चाहिए कि यह निर्णय संविधान सभा की सामूहिक प्रक्रिया का परिणाम था। डॉ. आंबेडकर की भूमिका को महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका के रूप में देखना अधिक उचित हैl
देवनागरी लिपि को संवैधानिक मान्यता
अनुच्छेद 343 में हिन्दी के साथ देवनागरी लिपि को भी संघ की राजभाषा के संदर्भ में संवैधानिक मान्यता दी गई।
भाषा और लिपि का संबंध केवल लेखन की सुविधा से नहीं होता। लिपि किसी भाषा की ऐतिहासिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। देवनागरी को संवैधानिक स्थान मिलने से हिन्दी की प्रशासनिक और संवैधानिक पहचान अधिक स्पष्ट हुई।
यह स्वतंत्र भारत की उस आकांक्षा का भी हिस्सा था जिसमें शासन और प्रशासन को भारतीय भाषायी संदर्भ से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा था।
हिन्दी के विकास की संवैधानिक दिशा
हिन्दी के विकास की दृष्टि से संविधान का अनुच्छेद 351 अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें संघ का यह दायित्व निर्धारित किया गया कि वह हिन्दी के प्रसार और विकास को बढ़ावा दे तथा हिन्दी को भारत की समग्र मिश्रित संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने के लिए विकसित करे।
यह प्रावधान हिन्दी के विकास को संकीर्ण भाषायी आग्रह से बाहर निकालकर व्यापक भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ से जोड़ता है।
हिन्दी की शक्ति उसकी व्यापकता में है। वह जितना दूसरी भारतीय भाषाओं से संवाद करेगी, उनके शब्दों, अभिव्यक्तियों और सांस्कृतिक अनुभवों को आत्मसात करेगी, उतनी ही अधिक समृद्ध और जनोन्मुख बनेगी।
इस दृष्टि से हिन्दी का विकास किसी एक क्षेत्र या समुदाय की सीमित आकांक्षा नहीं, बल्कि भारतीय भाषायी-सांस्कृतिक विविधता से निरंतर संवाद की प्रक्रिया है।
भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान
भारत की भाषायी विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक शक्ति है। हिन्दी का विकास दूसरी भारतीय भाषाओं को कमजोर करके नहीं, बल्कि उनके साथ संवाद करते हुए होना चाहिए।
तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, असमिया, उड़िया, उर्दू और अन्य भारतीय भाषाएँ भारत की सामूहिक सांस्कृतिक चेतना की अलग-अलग धाराएँ हैं। प्रत्येक भाषा अपने भीतर सदियों का अनुभव, ज्ञान और संवेदना लेकर चलती है।
हिन्दी का सम्मान तभी सार्थक होगा, जब उसके साथ दूसरी भारतीय भाषाओं के सम्मान की भावना भी बनी रहे।
हिन्दी को भारतीय भाषाओं की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि संवादशील और समावेशी भाषा के रूप में विकसित होना चाहिए।
लोकतंत्र और भाषा:
डॉ. आंबेडकर के चिंतन के केंद्र में व्यक्ति की गरिमा, समानता और अधिकार थे। भाषा के प्रश्न को भी इसी व्यापक लोकतांत्रिक दृष्टि से समझना चाहिए।
लोकतंत्र केवल संसद, चुनाव और शासन-व्यवस्था का नाम नहीं है। लोकतंत्र तब सार्थक होता है, जब व्यक्ति को अपनी बात कहने, अपनी पहचान बनाए रखने और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का अवसर मिले।
भाषा इस अभिव्यक्ति का सबसे स्वाभाविक माध्यम है।
यदि भाषा नागरिक और शासन के बीच दीवार बन जाए, तो लोकतंत्र कमजोर होता है। यदि भाषा संवाद का सेतु बन जाए, तो लोकतांत्रिक सहभागिता मजबूत होती है।
इसलिए भारत जैसे बहुभाषी देश में ऐसी भाषा-व्यवस्था आवश्यक थी जिसमें हिन्दी को उचित स्थान मिले, लेकिन अन्य भाषाओं के बोलने वालों को अपनी भाषायी पहचान और अभिव्यक्ति से वंचित न होना पड़े।
मातृभाषा का सम्मान:
मातृभाषा मनुष्य की भावनाओं, स्मृतियों, संस्कारों और सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ी होती है। मनुष्य जिस भाषा में पहली बार संसार को पहचानता है, उसी भाषा में उसकी संवेदना का सबसे सहज संसार निर्मित होता है।
हिन्दी का विस्तार मातृभाषाओं के अस्तित्व को समाप्त करने का माध्यम नहीं होना चाहिए। हिन्दी का वास्तविक महत्व तभी बढ़ेगा, जब वह भारतीय भाषाओं के साथ सहयोग और संवाद का संबंध बनाएगी।
भारत की भाषायी विविधता को बचाए रखते हुए हिन्दी को व्यापक संपर्क और संवाद की भाषा बनाना ही अधिक लोकतांत्रिक और टिकाऊ रास्ता है।
हिन्दी के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण:
संविधान ने हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार करते हुए अंग्रेजी के प्रयोग के लिए भी संक्रमणकालीन व्यवस्था की। इससे स्पष्ट होता है कि संविधान निर्माताओं ने भाषा के प्रश्न को केवल भावनात्मक आग्रह के आधार पर नहीं देखा।
भारत की तत्कालीन प्रशासनिक, शैक्षिक और भाषायी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एक व्यावहारिक व्यवस्था विकसित की गई। हिन्दी को संवैधानिक प्रतिष्ठा दी गई, लेकिन अंग्रेजी के प्रयोग को तत्काल समाप्त नहीं किया गया।
यह दृष्टिकोण हमें बताता है कि भाषा-नीति में भावनाओं के साथ-साथ व्यावहारिकता, संवाद और सहमति भी आवश्यक हैं।
हिन्दी : संपर्क से संवाद तक:
हिन्दी की वास्तविक शक्ति उसकी जनस्वीकृति में है। कोई भी भाषा केवल संवैधानिक प्रावधानों से महान नहीं बनती। भाषा तब जीवंत और प्रभावशाली बनती है, जब लोग उसे स्वाभाविक रूप से अपनाते हैं, उसमें अपने अनुभव व्यक्त करते हैं और उसके माध्यम से ज्ञान, विचार तथा संस्कृति का आदान-प्रदान करते हैं।
आज हिन्दी के सामने अवसर भी बहुत हैं और चुनौतियाँ भी।
डिजिटल माध्यमों, इंटरनेट, सोशल मीडिया और वैश्विक संचार ने हिन्दी के विस्तार के नए द्वार खोले हैं। हिन्दी आज भारत की सीमाओं से बाहर भी पढ़ी, सुनी और समझी जा रही है।
केवल विस्तार पर्याप्त नहीं है। हिन्दी को ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, शोध और आधुनिक चिंतन की भाषा भी बनना होगा। उसे समय के साथ बदलना होगा, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए।
हिन्दी जितनी सरल, सहज, वैज्ञानिक, आधुनिक और समावेशी होगी, उतनी ही प्रभावी ढंग से वह नई पीढ़ी से संवाद कर सकेगी।
डॉ. आंबेडकर की भाषा-दृष्टि का व्यापक अर्थ
डॉ. आंबेडकर की भाषा संबंधी भूमिका को उनके व्यापक लोकतांत्रिक चिंतन से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
भारत की एकता केवल एक भाषा में नहीं हो सकती। राष्ट्रीय एकता का स्थायी आधार समान नागरिकता, संवैधानिक अधिकार, सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा है।
इस दृष्टि से हिन्दी की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिन्दी ऐसी भाषा बने जो लोगों को जोड़ने का काम करे, दूरी पैदा करने का नहीं; संवाद का माध्यम बने, वर्चस्व का नहीं; ज्ञान का माध्यम बने, संकीर्णता का नहीं।
यही हिन्दी की लोकतांत्रिक शक्ति है।
यदि हिन्दी किसी पर थोपी जाएगी तो उसके प्रति स्वाभाविक दूरी पैदा हो सकती है। लेकिन यदि हिन्दी अपने साहित्य, ज्ञान, सरलता और संवाद की क्षमता के कारण स्वाभाविक रूप से स्वीकार की जाती है, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक और स्थायी होगा।
भाषा की सबसे बड़ी शक्ति आदेश में नहीं, स्वीकृति में होती है।
डॉ. आंबेडकर के योगदान की सीमाएँ
किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व का संतुलित मूल्यांकन तभी संभव है, जब उसके योगदान के साथ उसकी सीमाओं को भी स्वीकार किया जाए।
डॉ. आंबेडकर हिन्दी के साहित्यकार नहीं थे। उन्होंने हिन्दी साहित्य के रचनात्मक विकास के लिए कोई साहित्यिक आंदोलन नहीं चलाया। हिन्दी के साहित्यिक इतिहास में उनका योगदान कबीर, रविदास, तुलसी, भारतेन्दु, द्विवेदी, प्रेमचंद अथवा अन्य प्रमुख साहित्यकारों की तरह प्रत्यक्ष नहीं है।
इसी प्रकार हिन्दी को संघ की राजभाषा बनाने का निर्णय केवल डॉ. आंबेडकर का निर्णय नहीं था। यह संविधान सभा की लंबी बहस, अनेक मतों और व्यापक विचार-विमर्श से निर्मित संवैधानिक सहमति का परिणाम था।
इसलिए डॉ. आंबेडकर को हिन्दी का प्रत्यक्ष साहित्यिक विकासकर्ता या हिन्दी को राजभाषा बनाने का अकेला श्रेय देना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
लेकिन इन सीमाओं को स्वीकार करने का अर्थ उनके योगदान को कम करके आँकना भी नहीं है।
डॉ अम्बेडकर हिन्दी की संवैधानिक प्रतिष्ठा और लोकतांत्रिक भाषायी व्यवस्था के महत्वपूर्ण शिल्पकारों में से एक कहना अधिक संतुलित और तथ्यपरक होगा।
डॉ. आंबेडकर की लोकतांत्रिक और संवैधानिक दृष्टि के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिन्दी का विकास भारतीय भाषायी विविधता, समानता और संवाद के सम्मान के साथ होना चाहिए।
हिन्दी के भविष्य के लिए डॉ. आंबेडकर की प्रासंगिकता
आज जब हिन्दी का विस्तार तेजी से हो रहा है,तब डॉ. आंबेडकर की लोकतांत्रिक दृष्टि को नए संदर्भ में समझने की आवश्यकता है।
हिन्दी का भविष्य केवल इस बात में नहीं है कि उसे कितने लोग बोलते हैं। उसका भविष्य इस बात में भी है कि वह कितने लोगों को अपनी अभिव्यक्ति में स्थान देती है।
क्या हिन्दी में ग्रामीण भारत की आवाज के लिए जगह है?
क्या उसमें श्रमिक, किसान, स्त्री, दलित, आदिवासी, वंचित और हाशिये के समुदाय अपने अनुभवों को सहजता से व्यक्त कर सकते हैं?
क्या हिन्दी आधुनिक विज्ञान, तकनीक और ज्ञान-विमर्श को अपनी भाषा में उपलब्ध करा सकती है?
क्या हिन्दी दूसरी भारतीय भाषाओं से सीखते हुए स्वयं को निरंतर समृद्ध कर सकती है?इन प्रश्नों के उत्तर ही हिन्दी के भविष्य की दिशा तय करेंगे।
हिन्दी का विकास तभी सार्थक होगा, जब वह केवल सत्ता और प्रशासन की भाषा न रहकर जन की भाषा, ज्ञान की भाषा, संवेदना की भाषा और संवाद की भाषा बने।
हिन्दी के विकास में डॉ. भीमराव आंबेडकर का योगदान मुख्यतः साहित्यिक नहीं, बल्कि संवैधानिक, लोकतांत्रिक और भाषायी दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
डॉ अम्बेडकर ने हिन्दी के साहित्यिक विकास में प्रत्यक्ष भूमिका नहीं निभाई, लेकिन जिस संविधान-निर्माण प्रक्रिया में वे प्रारूप समिति के अध्यक्ष और प्रमुख सहभागी थे, उसी प्रक्रिया में हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में संवैधानिक प्रतिष्ठा मिली। देवनागरी को संवैधानिक मान्यता मिली और हिन्दी के विकास की दिशा भी संविधान में निर्धारित हुई।
डॉ. आंबेडकर ने हिन्दी को साहित्य नहीं दिया, लेकिन हिन्दी के संवैधानिक भविष्य से जुड़े उस लोकतांत्रिक ढाँचे के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें भाषा को राष्ट्रीय जीवन, प्रशासन और जनसंवाद से जोड़ने का अवसर मिला।
आज आवश्यकता है कि हिन्दी अपने विस्तार को अपनी श्रेष्ठता का प्रमाण न माने, बल्कि अपनी समावेशी शक्ति को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाए।
हिन्दी का विकास दूसरी भारतीय भाषाओं के कमजोर होने में नहीं, बल्कि उनके साथ संवाद और सह-अस्तित्व में है। हिन्दी जितनी अधिक भारतीय भाषाओं से सीखेगी, उतनी ही अधिक समृद्ध होगी। जितनी अधिक जनसामान्य की आवाज बनेगी, उतनी ही अधिक जीवंत होगी। जितनी अधिक ज्ञान-विज्ञान और आधुनिक चिंतन को अपनाएगी, उतनी ही अधिक भविष्य की भाषा बनेगी।
डॉ. आंबेडकर की लोकतांत्रिक दृष्टि से हिन्दी के विकास का सबसे महत्वपूर्ण संदेश सदैव याद किया जाता रहेगा -
भाषा मनुष्य को बाँटने का माध्यम नहीं, जोड़ने का सेतु बने; भाषा में वर्चस्व नहीं, संवाद हो; और भाषा की प्रगति के केंद्र में मनुष्य की गरिमा, समानता और स्वतंत्र अभिव्यक्ति हो।
हिन्दी की वास्तविक ऊँचाई इस बात में नहीं कि वह कितनी बड़ी भाषा बनती है, बल्कि इस बात में है कि वह कितने मनुष्यों को अपनी आवाज देने, कितने अनुभवों को शब्द देने और कितने दिलों को संवाद से जोड़ने में सफल होती है।
यही हिन्दी की लोकतांत्रिक शक्ति है और इसी व्यापक संदर्भ में हिन्दी के विकास में डॉ. भीमराव आंबेडकर की भूमिका को समझना अधिक न्यायसंगत, संतुलित और सार्थक होगा।
— नन्दलाल भारती
कवि, कथाकार एवं सामाजिक चिंतक
nlbharatiauthor@gmail.com
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