हलवाह/नन्दलाल भारती
दाँत हिलाने वाली ठंड थी, बुजुर्गो के दाँत कड़कड़ा रहे थे l रात का अँधेरा छँटा भी नहीं था, हाँ मुर्गे अपनी ड्यूटी बजाना शुरू कर दिए थे l पूरब के आसमान में बस लालिमा उभरने वाली थी।
दलितों की बस्ती के खपरैल और घासफुस के घरों पर ओस मोतियों की तरह नहीं, बल्कि सदियों की ठंडी कराहों की तरह जमी थी।तभी ठाकुर खुंजबिहारी की गूँजी आवाज़ ने पूरे सन्नाटे को चीर दिया—
“अरे ओ दमअईया ससुरा, विहान हो गया मुर्गे बोल रहे हैं l ससुरा तू है कि मुर्दा की तरह खटिया पर पड़ा है? अरे ससुरा दमअईया क्या तू खटिया पर पड़ा -पड़ा कब्र में जायेगा?
दमई पोखरी के भींटा पर टट्टी करने बैठा ही था कि चौंककर उठकर खड़ा हो गया और वही से बोला बाबूसाहेब आया l वह पोखरी के पानी से गुप्तांग जल्दी से साफ किया, और वही से वह सरपट खुंजबिहारी की हवेली की तरफ भागाl
गांजा के धुआं से उसकी छाती में जमें बलगम से उभरी पुरानी खाँसी ने दमईका पूरा शरीर हिला कर रख दिया। वह हड़बड़ाहट हवेली तो पहुंच पर लड़खड़ा कर गिर पड़ा l खुंज बिहारी के रौद्र रूप से पूरी बस्ती परिचित थी, बेचारा दमई डर के मारे थर -थर काँप रहा था l
उधर दमई की पत्नी दुखवन्ति ने घबराकर मिट्टी के चूल्हे की बुझी राख कुरेद दी। बेटा सुरजू गोनरी ओढ़े पुआल के बिस्तर में गड़ा-सिकुड़ा पड़ा तो था पर वह भी ठाकुर खुंजबिहारी की आवाज़ सुनकर सहम कर उठकर बैठ गया था ।
दमई को पता था—हवेली देर से पहुँचना सिर्फ़ देर नहीं, बल्कि सजा की घोषणा होती थी lवह फटी धोती संभालता हजार छेदो वाली बंडी पहने थे पाँवों में पनही नहीं थी नहीं पनही पहनने का सामर्थ्य नहीं थी नहीं ठाकुर की इजाजत l
ठाकुर खुंजबिहारी के परदादा के जमाने से यह परिवार ठाकुर का गुलाम था l वही गुलामी की बेड़ियाँ दमई के पांव में पड़ी थीं।
मुर्गा बोलने से पहले हवेली नहीं पहुंचने की सजा के तौर पर ठाकुर खुंजबिहारी ने दमई को नीम के पेड़ में बाँध कर खूब लाठी बरसाकर बोला ससुरे अब कभी देर से आया तो देख ले वो बीच चकरोट पर पीपल का पेड़ उसी पर तुम्हें ढाठी देकर लटका दूंगा या जिंदा दफना दूंगा l
दमई इकलौता नहीं था जिसे ठाकुर खुंजबिहारी ने बांधकर मारा था, ऎसा मज़दूर बस्ती के हर घर के साथ हुआ था l कई लोग बस्ती छोड़कर भागे भी थे जो कभी लौटकर वापस नहीं आए l उन हलवाहों की जमीन जायदाद पर क्रूर जमींदारों ने कब्जा कर लिया था l
गांव के जमींदारों का जमीर इतना मर गया था कि दलितों के हाथ तोड़कर अंगूठा लगवा लेते थे lधीरे -धीरे पूरी बस्ती भूमिहीन हो गयी थी, जिसका दर्द आजादी के छिहत्तर साल बाद भी उनकी नई पीढ़ियां भोग रही हैं l
कभी जो खेत और जमीन दलितों के हुआ करते थेवही खेत ठाकुरों ने जबरिया अंगूठा लगवाकर अपना बना लिए, बेचारे दलित अपनी ही जमीन से बेदखल कर दिए गए l ठाकुरों के कब्जे दलितों के दरवाज़े तक हो गएl गांव के पंचानबे प्रतिशत रकबे पर जमींदारों के झंडे गड़ गए थेl पोखरी-तालाब, गांव समाज की जमींने सब जमींदार ठाकुरों की होकर रह गयी l जमींदारों का अत्याचार बहुत बढ़ गया था l
दमई जैसी हर दलित की दशा जमींदारों ने बना रखा था l खुंज बिहारी के बाप -दादा ने दमई के बाप दुधई को जबरिया उठाकर ले गए और मारपीट कर हलवाही की जुआठ दमई के गले में डाल दिए थे l द
दस बिस्वा ऊसर जमीन वह भी गांव समाज की जमीन यानि सरकारी जमीन और सेर भर अनाज की मजदूरी घर के हलवाह के नाम पर देते थे,जो दमई के बाप को मिला वही दमई को भी मिल रहा था l
वह भी एक जमाना था जब बस्ती के घरों में जन्म लेने वाला हर बच्चा पहले रोना नहीं, हल की मूठ पकड़ना सीखकर पैदा होता था। इतनी आग मूतते थे गांव के ठाकुर लोग l
सुबह होते-होते दमई हल-बैल के साथ खेत में था। बैलों की गर्दन झुकी थी, मगर दमई की कमर उससे भी ज़्यादा झुक चुकी थी l वह कब बच्चा था जवान हुआ कब बूढ़ा पता ही नहीं चलाl यही सुलगती दास्तान पूरी बस्ती की थी l
गाँव के दलित खेत मालिक अपनी ही भूमि से बेदखल होकर भूमिहीन मज़दूर थे, तरक्की से दूर विकास की बाट जोह रहे थे l ठाकुर एवं अन्य अशूद्र जातियों का जमीन, जल और जंगल पर पूरी तरह कब्जा हो गया था, आज़ाद भारत में भी वही हाल है l
मेहनत की धूप ऊपर बढ़ रही थी,मिट्टी तप रही थी l दमई जैसे बस्ती के पचासो भूमिहीन खेतिहर हलवाहों का पसीना कभी ठाकुरों नहीं सरकार के हिसाब में आया l
मंदगति से आज़ाद भारत के संविधान में निहित दलित उत्थान के अधिकार शोषितों तक पहुंचने लगे ज़माना तेजी से बदल रहा था।जमींदारी कानून कागजों पर तो खत्म हो गया , पर गाँव में नहीं। शोषक वर्ग पहले जैसे ही शोषितों के हाड़ -मांस बेहिचक नोंच रहा था lयह दलित कोई और नहीं क्षत्रिय कुल से ही संबंधित था,ब्राह्मणवाद की भेंट चढ़ कर ठाकुर यानि भगवान इतना क्रूर हो गया था कि दलित मानकर जबरिया हलवाह बनाकर चमड़ी छिल रहा था l
कुछ बदला था तो सिर्फ कागजों में, हलवाहों की दशा वैसी दयनीय बनी हुई थी बस गुलामी का तरीका बदल गया था—अब तीसरी पर खेती होने लगी थी l
बीज-खाद ठाकुर का, बाकी सब कुछ खेतिहर मज़दूरों की यानि हलवाहों की होती थी -निराई, गुड़ाई, सिंचाई, कटाई, मड़ाई, दुलाई —सब हलवाह l हलवाह बार- बार सोचते-“ये खेती है या भूख का नया मोहफांस ? क्योंकि फसल की पैदावार का तीन हिस्सा तो हवेली का हो जाता था , एक हिस्सा हलवाह के घर आता था l
ग्राम प्रधान के चुनाव के समय ग्राम प्रधान के उम्मीदवार हाथ जोड़कर आते पांव छूते, उनकी पत्नियां आँचल से दलित मतदाताओं के पांव पखारती, चरण स्पर्श कर वोट मांगती l
“उम्मीदवार बड़े-बड़े वादे करते कहते इस बार हमारा साथ दो, पट्टा दिलवाएंगे, आवन्टन करवाएंगे पक्का मकान बनवाएंगे ।”मनरेगा योजना के अंतर्गत घर के सदस्य को रोजगार देंगे और बहुत मुंगेरीलाल के सपने परोसते l बस्ती के दलित खेतिहर मज़दूर, हलवाह हर बार वोट देते पर हर बार वादा खेत की मेड़ पर सूख जाता और वादे चौराहे पर चारोखाने चित हो जाते l
हर प्रधान की साझेदारी ठाकुरों से हो जाती,सत्तर वोट के बदले प्रधान जमींदारों के गुलाम होकर रह जाते, ठाकुरों के वोट के सामने दलितों के सर्वाधिक वोटो की कोई कीमत नहीं होती थी, बेचारा दलित ठगा महसूस करने लगता था l
ग्राम समाज की जो ऊसर जमीन दलितों को आवन्टन में मिल सकती थी, उन जमीनों पर ठाकुरों का कब्जा पहले से ही था l कहीं खेल के मैदान के नाम पर, कहीं हरियाली के नाम पर, कहीं मछली पालन, मुगी पालन के नाम, कहीं घूर के नाम पर हुई थी।बेचारे भूमिहीन खेतिहर मज़दूर हलवाह हर बार छले जाते l हर प्रधान ठाकुरों के हिजड़ा हो जाता था l
अनपढ़ दमई जैसे हलवाहों की तीसरी पीढ़ी तैयार हो गयी l दमई, खुद्दी, धनेश्वर, सुरजू, खुरजू,खरप्तेश्वर,मनसु, जनसु, जगेसर, मनेसर,पीतेश्वर,नंदूवार, कामनाथ, लखड़ू जैसे अनपढ़ माटी के लाल "हलवाह"आंसू से रोटी गीली करते -करते माटी में मिल गए l
अनपढ़ पीढ़ी के खून पसीने से शिक्षित पीढ़ी अब जवान हो रही थी पर मज़दूर बस्ती के किसी एक युवक को सरकारी नौकरी नहीं मिली । दमई के खानदान का एक जिद्दी जयवीर गांव से स्कूली शिक्षा लेकर शहर भाग कर चला गया l
शहर में जयवीर ने मेहनत मज़दूरी किया,एम. एड तक पढ़ाई किया,ट्यूशन पढ़ाया और ना जाने क्या - क्या किया? उसका बाप रामनिखारे शहर में साइकिल रिक्शा खींचा l हलवाह का पोता जयवीर कहाँ मज़दूरी करने में शर्माने वाला था, पैसा कमाया, ज्ञान अर्जित कियाl जयवीर ने नौकरी के लिए बड़ी -बड़ी परीक्षाएं पास किया पर गिद्ध जैसे द्रोणाचार्यों ने साक्षात्कार में कई बार फेल भी किया l
अपनी जिद्द का पक्का जयवीर हार नहीं माना आख़िरकार यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बन गया l आज़ादी के छिहत्तर साल बाद पहली बार बस्ती के जयवीर को सरकारी नौकरी मिली थी, जिसका उत्सव बस्ती वालों ने खूब मनाया था l
जयवीर ने बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर, ज्योतिबा फुले, काशीराम को गहराई से पढ़ा उनके संघर्षो से दलितों के उद्धार के गुर सीखा l बीस साल के बाद जब गाँव लौटा तो तुरंत पंचायत भवन में बस्ती वालों की सभा बुलाया l
जयवीर बोला,
“कब तक बस्ती के लोग हलवाही करेंगे? अब तो शोषण का तरीका भी बदल गया है,नए जमाने की तीसरी पर खेती पुरानी हलवाही क्रूर समाज की मानसिक सोच पहले वाली जैसी हलवाही है l शोषण कम होने की बजाय बढ़ रहा हैl हमारी माँ-बहनों की अस्मिता से पर्दा उठाया जा रहा हैl बस्ती के लोग तीसरी पर खेती कर रहे हैं, उनके हिस्से तो मज़दूरी भी नहीं आ रही है l
बाबूसाहेब लोग हवेलियो से बाहर नहीं निकलते, हमारे लोगो का पसीना पीकर धरती सोना उगलती है, और हमारे लोग भूख से बिलबिलाते रहते हैं ll
सरकार आवन्टन करती है,जमीन देती है, पट्टा देती है, मगर प्रधान और जमींदार लोग मिलबांट कर सब खा जाते हैं।”
बूढ़ा लालूराम हकलाते हुए बोला -“बेटा, हवेली से टकराएगा तो क्रूर समाज तुम्हें मार देगा l
जयवीर, थरथर काँपते लालूराम के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला -
“दादा , डर के आगे जीत है l डर ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। इस डर को खत्म करना होगा l दादा, अधिकार पाने के लिए लड़ना होगा, मरना भी होगा, अगर करो या मरो की हिम्मत है तो हमारा अधिकार कोई नहीं लूट सकता l लुटेरों की गलफरी में हाथ डालकर अधिकार ले लेंगे l
जयवीर की बातों को सुनकर जवान ही नहीं बूढ़ी हड्डियों में भी खून दौड़ पड़ा,उस रात बस्ती के दलित परिवारों ने तय किया— तहसील जाएंगे।कलेक्टर ऑफिस जायेंगे, मुख्यमंत्री को लिखेंगे, प्रधानमंत्री को लिखेंगे अगर कहीं नहीं सुनवाई हुई तो देश की सबसे बड़ी अदालत में जायेंगे अपना अधिकार लेकर रहेंगे l
दलित बस्ती के लोग पहली बार सामूहिक रूप से तहसील पहुँचे। कागज में रोटी, नमक,प्याज़ लपेटे, गमछे में पोटली बांधे,अपने फटे-पुराने कपड़े, धूल भरे पाँव, मगर आँखों में उम्मीद लिए l तहसीलदार के दफ्तर के सामने धरने पर बैठ गए l
तहसीलदार ने बस्ती वालों को भगाने के पूरे प्रयास किये, खूब टालमटोल भी किये पर बस्ती वालों की ज़िद के सामने तहसीलदार साहब को हथियार डालना पड़ा, वे लेखपाल को बुलाये l
लेखपाल बोला—“रिकॉर्ड में तो गाँव समाज की जमीन है पर इन जमीनों पर पहले से ही ठाकुरों का कब्जा है।”
जयवीर ने मोबाइल निकाला।
उसने गांव समाज की जमीनों की तस्वीरें दिखाया जिन पर ठाकुरों की गेहूँ लहलहा रही थी।कहीं तालाब बनाकर कब्जा किया गया था, कहीं पेड़ लगाकर, कहीं ट्यूबवेल लगाकर एकड़ो जमीने तो जमींदारों के कब्जे में थी l
जयवीर विनम्रता से बोला -साहब, यह तो सरकारी जमीन की चोरी है।”इस जमीन पर आवन्टन हो जाने से,अधिकार वंचित भूमिहीन हलवाह, मज़दूरों का उद्धार हो सकता है l भूमि चोरों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी तो हो सकती है l
तहसीलदार साहब चुप थे, साहब के दफ्तर में सन्नाटा पसर चुका था और तहसील के बाहर कानाफुंसी का बाजार बहुत गर्म हो गया था l
यह खबर कानों-कान जिला मुख्यालय तक जा पहुंची कई पत्रकार कैमरा लेकर गाँव पहुँच गए ।
पत्रकारों ने हलवाह मज़दूरों की झोपड़ीयों, खाली अनाज की कुठूलियों, भूख से बिलबिलाते अर्धनग्न बच्चों को, फटी-पुरानी साड़ियों में लिपटी औरतों, पेवन धोतियों और कई जगह से फटी बनियान पहने बड़े बूढ़ो को कमरे में कैद किये, फिर जमींदारों के ठाट, उनकी हवेलियो, गोदामों और चारों तरफ जमींदारों की लहलहाती फसलों, गांव समाज के अवैध जमीन के कब्जो को केमरे में रिकॉर्ड कर लिए ।
दूसरे दिन सुबह के अखबार के मोटे -मोटे अक्षरों में छपा कि ;
“आजादी के 76 साल बाद भी दलित परिवार पीढ़ीगत हलवाही के चंगुल में ”
स्थानीय न्यूज़ चैनलों ने भी प्रसारण हुआ l सोशल मीडिया पर खूब वीडियो वायरल हुए ।
जिले के संबंधित अफसरों पर दबाव बढ़ा। ग्राम प्रधान बौखला गया।
उसने बस्ती वालों को डराया धमकायाl
ग्राम प्रधान,जयवीर को धमकाते हुए बोला -बहुत नेता बन रहे हो, सब नेतागिरी एक दिन में निकल जायेगी ! तुमने खबर छपवाकर गाँव की नाक कटवा दिया l देख लेना, गाँव में रहना मुश्किल कर दूँगा।”
जयवीर शांत स्वर में बोला -प्रधान साहब गांव की नाक ऊँची हो जाएगी l आपकी नाक तो और भी ऊँची हो जाएगी, जिस दिन बस्ती के हलवाह खुद के खेत में हल जोतेंगे ll
“प्रधानसाहब शोषितों की आवाज़ गूंजेगी, कागज़ बोलेंगे।अब हवेलिया नहीं बोलेगी, शांत रहेगी, बस्ती के हलवाह बहुत खून के आंसू बहा लिए l अब हलवाह अपने खेत के मालिक बनेगें, उनकी चौखटों पर खुशियाँ खेलेगी l
जयवीर के विश्वास और प्रतिज्ञा से आज़ादी के छिहतर बाद यह पहली बार हुआ था जब दलित बस्ती की आवाज़ दूर तक पहुंची थी l
हफ्ते भर बाद पूरी तहसील गांव में उतर गयी -लेखपाल, कानूनगो, तहसीलदार,और पुलिस बल भी ।
ग्राम समाज की पचीस बीघा ऊसर जमीन, जो वर्षों से ठाकुर के कब्जे में थी, चिन्हित की गई। रिकॉर्ड खुला तो जमींदारों के कब्जे का फर्जीवाड़ा सामने आ गया।
प्रधान और जमींदारों की मिली भगत नंगी हो गयी l
प्रशासन ने तुरंत जांच बैठाई।
अशूद्र प्रधान निलंबित हुआ पर दलित बस्ती वालों ने बचा लिया l
जमींदारों पर गाँव समाज की जमीन पर अवैध कब्जे का मुकदमा दर्ज हुआ।
अब क्या जिस हवेलियो में कभी डंडे-लात घुसे बरसते थे,भूखे, अर्धनंगे हलवाह चीखते -चिल्लाते तड़पते रह जाते थे उन्हीं हवेलियों में में अब मातम जैसा सन्नाटा था।
महीने भर बाद जमींदारों के अवैध कब्जे वाली और गाँव समाज की अन्य खाली जमीने दलित परिवारों के नाम आवंटित हुई।
मनरेगा के अंतर्गत से मेड़बंदी करायी गयी l नहर से खेत तक पानी पहुंचाने के लिए नालियाँ बनवाई गयी l
हलवाह से नए बने भूमि मालिकों को सहकारी समिति से अच्छी किस्म के बीज और खाद से मुफ्त उपलब्ध कराएं गए ।
जब उन खेतों में फ़सल लहलहायी, तब नए दलित खेत मालिक तक मेड़ों पर बैठे जो कभी हलवाह हुआ करते थे जयवीर को सजल नेत्रों से दुआएं देख रहे थे l
लालूराम ने खेत से मिट्टी उठाकर माथे से लगाते हुए बोला —
“कितनी खुशी की बात है कि अब हम हलवाह नहीं, अपनी जमीन के किसान हो गए हैं,धन्यवाद जयवीरl
फ़सल तैयार हुई फ़सल की कटाई शुरू हुई तो पूरा गाँव टकटकी लगाए देख रहा था।
जहाँ कभी दबंग जमींदारों का आधिपत्य था, वहाँ अब बस्ती के दलित परिवार अपनी फसल काट रहे थे। औरतें गा रही थीं, बच्चे छुपम-छुपाई खेल रहे थे।
लालूराम का पोता स्कूल की ड्रेस में दौलतराम मेड़ पर खड़ा था।उसके हाथ में किताब थी वह हवा में कलम लहराते हुए बोला- दादा आज से मैं दौलतराम, दौलत अम्बेडकर होगा l वह राम उपनाम जिसको सुनते ही लोग अछूत समझते हैं,भेदभाव करते हैं,उस राम को मैं अपने से दूर करता हूँ, अलविदा कहता हूँ l
लालूराम मुस्कराते हुए बोले -बेटा दौलतअम्बेडकर,तेरे हाथ में हल नहीं, कलम ही अच्छी लगती है। इसी कलम से जमीन भी बचेगी और इज्जत भी, कुल का मान -सम्मान भी बढ़ेगा और बस्ती की नाक भी ऊँची होगी l
दौलत अम्बेडकर मुस्कुराकर बस्ता को सीने से लगा लिया l
बस्ती के बाहर वही नीम के पेड़ के नीचे डिहबाबा का चबूतरा था, और पास में बाबासाहेब अम्बेडकर की मूर्ति खड़ी थी मगर कहानी बदल चुकी थी।
अब हलवाही की बात नहीं ना तीसरी पर खेती की बात भी होती थीं, अब वहाँ दलित किसान समिति की बैठक होती थी।
जयवीर ने बस्ती वालों को सम्बोधित करते हुए कहा;
“हमारी लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं थी, हम भी इंसान हैं, इसी गाँव के है गाँव के जल, जंगल, जमीन पर हमारा भी अधिकार है, अधिकार पाने की लड़ाई थी इंसान समझे जाने की लड़ाई थी।
दूर हवेलियों की ऊँची दीवारें खड़ी तो थीं, परन्तु अब वे पहले जैसी ऊँची नहीं लग रही थीं।क्योंकि अब दलित बस्ती के घरों के सामने आत्मसम्मान की फसल लहलहा चुकी थी।
“हलवाह” केवल लालूराम दमई, खुद्दी, धनेश्वर, खरप्तेश्वर, पीतेश्वर,नंदूवार, कामनाथ, लखड़ू जैसे हलवाहों और उदयवीर जैसे देवदूत की या एक दलित कहानी नहीं है , बल्कि उन करोड़ों भूमिहीन खेतिहर दलित परिवारों की आवाज़ है, जो आज भी व्यवस्था, जमींदारी मानसिकता और राजनीतिक मिलीभगत के पाटन के बीच पिसे जा रहे हैं।
संगठन ही शक्ति है, जब संगठन बनता है तब डर का किला भी टूटकर बिखर जाता है,तब कागजी दस्तावेज़ बोलते हैं, मीडिया साथ खड़ी हो जाती है तब सामूहिक संघर्ष खड़ा होता है—तो हलवाहो की पीढ़ियाँ भी खेत मालिक किसान बन जाती है ।
नन्दलाल भारती
परिचय:
नाम - नन्द लाल भारती
शिक्षा - एम.ए.(समाज शास्त्र)एल.एल.बी(आनर्स)
पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट
जन्म स्थान जिला -आजमगढ (उत्तर प्रदेश)
वर्तमान निवास :इंदौर (मध्य प्रदेश )
प्रकाशित पुस्तकें :
1-अमानत-उपन्यास-प्रकाशक-इंसा,
2-चांदी की हंसुली-उपन्यास-प्रकाशक-मनोरमा साहित्य सेवा, इंदौर
3-उखड़े पांव- लघुकथा संग्रह-प्रकाशक-यश पब्लिकेशंस, दिल्ली
4-सूली का जीवन-उपन्यास-प्रकाशक-इण्डिया नेटबुक्स प्रा.लि.नोएडा
5-गाल भर धुआं-कहानी संग्रह--इण्डिया नेटबुक्स प्रा.लि.नोएडा
6-युध्दरत-उपन्यास-प्रकाशक-इंडि
7-श्रापित आदमी-उपन्यास-प्रकाशक-इण्डिया नेटबुक्स प्रा.लि.नोएडा
8-बेटी-उपन्यास-प्रकाशक-इण्डिया नेटबुक्स प्रा.लि.नोएडा
9-गांठें-लघुकथा संग्रह-प्रकाशक-इण्डिया नेटबुक्स प्रा.लि.नोएडा
10-गुनाह -उपन्यास- प्रकाशक-इण्डिया नेटबुक्स, नोएडा
11-अनुभूति(काव्य संग्रह)
अप्रकाशित पुस्तकें :दहकन (कहानी संग्रह)एवं अन्य कई प्रतिनिधि काव्य, कहानी, लघुकथा संग्रह और बुक्स एवं कब्र के करीब (आत्मकथा) एवं अन्य ई पुस्तकें l
कई शोधार्थी मेरे लेखन पर पी. एच. डी कर रहे हैं
सम्मान/पुरस्कार:
विद्यावाचस्पति, विद्यासागर, हिन्दी भाषा भूषण हाशिए की आवाज कथा सम्मान - 2018 (भारतीय सामाजिक संस्थान,नई दिल्ली ) एवं अन्य
शोधकार्य: लेंग्वेज डिपार्टमेंट, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इनफार्मेशन एण्ड टेक्नोलॉजी, हैदराबाद
जनप्रवाह(साप्ताहिक) समाचार पत्र,ग्वालियर (मध्य प्रदेश)से उपन्यास चांदी की हंसुली का धारावाहिक प्रकाशन।
प्रसारण: आकाशवाणी एवं दूरदर्शन इंदौर से कविता पाठ।
लघुफिल्म: पेशकश पटकथा/निर्देशन:श्री अनिल पतंग
पीएचडी : कई शोधकर्ता पीएचडी कर रहे हैं l
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