हॉफ बाजू कुर्ता
— नन्दलाल भारती
लालधारी बरामदे में रखी कुर्सी पर बैठे थे। सुबह की धूप आँगन में उतर रही थी। उनके तन पर नया हॉफ बाजू बाघ प्रिंट कुर्ता था। लाल-काले रंगों की बारीक छपाई उनके साँवले चेहरे पर जैसे उम्र की गंभीरता के साथ एक अलग ही गरिमा भर रही थी।
सामने चाय की प्याली लिए बैठे जगधारी ने उन्हें गौर से देखा और मुस्करा पड़े।
“लालधारी बाबू, तुम्हारे ऊपर हॉफ बाजू बाघ प्रिंट कुर्ता खूब फब रहा है। सच कहूँ तो आज तो तुम किसी बड़े विद्वान जैसे लग रहे हो।”
लालधारी बाबू भी मुस्कराए, लेकिन वह मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँच सकी।
“बाघप्रिंट केवल कपड़े पर बनी डिजाइन नहीं है, जगधारी। इसमें मध्य प्रदेश की मिट्टी, प्रकृति, स्थानीय जल और पीढ़ियों की कारीगरी की कहानी छिपी है। प्राकृतिक रंग, लकड़ी के ब्लॉक और कारीगर का धैर्य—सब मिलकर इसे बनाते हैं।”
जगधारी ने चुटकी ली, “अरे भाई, इतना तो मैं भी जानता हूँ। बाघप्रिंट और माहेश्वरी की कारीगरी की अपनी खास पहचान है।”
लालधारी बाबू ने अपने कुर्ते की बाँह को देखा।
जानते हो जगधारी, यह कुर्ता जितना सुंदर दिखाई दे रहा है, उससे कहीं ज्यादा दर्द अपने भीतर छिपाए है।”
जगधारी की हँसी अचानक थम गई।
“क्या कह रहे हो बाबू? आखिर ऐसी कौन-सी दास्तान जुड़ी है इससे?”
लालधारी बाबू ने गहरी साँस ली।
“झूठ नहीं कह रहा। यह कुर्ता मेरे बेटे ने खरीदा था। मृगनयनी स्टोर से। महँगा था। बहुत महँगा।”
“तो फिर दर्द किस बात का?”
“बाप के लिए कुर्ता खरीदना बेटे के लिए इतना पीड़ादायी हो सकता है, यह जानोगे तो तुम्हारे भी पैरों के नीचे की जमीन खिसक जाएगी।”
कुछ क्षण दोनों के बीच खामोशी रही।
फिर लालधारी बाबू बोले—
“पांच साल पहले की बात है। मेरा बेटा अरुण, अपनी पत्नी रागिनी और छह साल के बेटे कुंवर जय के साथ पहली बार कुंवरजय का जन्मदिन पर घर परिवार के साथ मनाने आया था। शादी के बाद वह कई बार आया था, लेकिन पत्नी के साथ पहली बार शादी के दस साल बाद ।”
जगधारी ने याद करते हुए कहा, “हाँ, उस दिन तो तुमने खूब धूमधाम थी। पूरा परिवार और ईष्टमित्र जुटे ।”
“हाँ। मुझे लगा था मेरा घर फिर से घर बन गया है।”
लालधारी बाबू की आवाज भर्रा गई।
“सुबह अरुण ने चुपके से मेरे हाथ में यह कुर्ता रख दिया था— मैंने उसे सीने से लगा लिया। मैंने कहा था—‘बेटा, मेरे पास कई कुर्ते हैं।’
वह बोला—‘पापा, आपकी मैं न पैसे से मदद कर पाता हूँ न आपको समय दे पाता हूँ, कम से कम यह कुर्ता रख लीजिए।’”
लालधारी बाबू कुछ देर चुप रहे।
“लेकिन रागिनी को यह पसंद नहीं आया।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसके हिसाब से पति की कमाई पर उसका अधिकार होता है । पति के कमाई पर उसका अपना बच्चा भी जैसे उसके अधिकार-क्षेत्र के बाद आता है। उसकी नजरों में माता-पिता, भाई-बहन, का न उसके पति पर अधिकार है न उसकी कमाई पर l
रागिनी परिवार की कुलबहू होकर कुलकी मर्यादा कलंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थीl परिवार की बहन -बेटियों को सड़क पर नंगी कर अपमानित करने की धमकी देती थी l सास-ससुर को रास्ते का कांटा मानती थी, भला उसकी कैसे पसंद आता?
“उसने उसी दिन रागिनी ने अरुण को भद्दी-भद्दी गालियां दी,अरुण की माँ को गालियां, पुलिस में शिकायत करने की धमकी दी l अरुण बेचारा अपराधी की तरह सिर झुकाए खड़ा रहा।
बड़ा हंगामा हो गया,वह बोली—‘मेरे रहते तुम्हें अपने पिता पर इतना पैसा खर्च करने की क्या जरूरत थी?’”
“सिर्फ एक कुर्ते पर?”
“कुर्ता तो बहाना था, जगधारी। असली सवाल था—पति की कमाई पर किसका अधिकार है?”
लालधारी बाबू ने कुर्ते की सलवटें ठीक कीं।
“रागिनी ने उसी दिन मृगनयनी स्टोर से अपने लिए अपने माँ-बाप के लिए कई महँगी चीजें खरीदीं। फिर मायके के लिए भी सामान लिया। बिल देखकर अरुण के चेहरे का रंग उड़ गया था।”
“उसने कुछ कहा नहीं?”
“कहा था। बहुत धीरे से—‘रागिनी, इस महीने खर्च बहुत हो गया।’”
“फिर?”
“वह भड़क गई। बोली—‘तुम्हारे पिता के लिए कुर्ता खरीदते समय पैसे की याद नहीं आई?’”
जगधारी ने सिर झुका लिया।
“और अरुण?”
“चुप।”
“क्यों?”
“डर।”
“कैसा डर?”
लालधारी बाबू की आँखें अचानक कठोर हो गईं।
“घर टूटने का डर। पत्नी को खोने का डर। बच्चे से दूर होने का डर। और सबसे बड़ा डर—कानून और पुलिस के नाम पर खड़ा किया गया वह भय, जिसे रागिनी और उसके मायके वाले बार-बार उसके सामने रखते थे।”
जगधारी ने असहज होकर पूछा, “क्या सचमुच मामला इतना गंभीर था?”
“गंभीर से भी ज्यादा।”
लालधारी बाबू ने आगे कहा—
“रागिनी अपने पति पर अधिकार को प्रेम नहीं, नियंत्रण समझने लगी थी। अरुण किससे मिले, कहाँ जाएँ, किस रिश्तेदार से कितनी देर बात करें—सब पर निगरानी। धीरे-धीरे उसने अरुण को उसके माँ -बाप,भाई-बहन से भी दूर कर दिया।”
“लेकिन माँ-बाप भाई-बहन तो अपने होते हैं।”
“यही तो त्रासदी है।”
लालधारी बाबू की आँखें नम हो गईं।
“एक दिन अरुण अपनी पत्नी और बहन के साथ राजवाडा गया। बहन आयुषी अपनी ससुराल से मायके आई थी।
रागिनी ने दोनों की एक वीडियो बना ली, फिर उसमें ऐसी बातें जोड़कर सोशल मीडिया पर डाल दीं कि भाई-बहन के पवित्र रिश्ते पर ही सवाल उठने लगे।”
जगधारी के चेहरे पर अविश्वास उभर आया।
“नहीं!”
“हाँ। भाई -बहन के पवित्र रिश्ते को बेवफ़ा बदनाम करने की पूरी कोशिश की पर असफल रही l
“उसने विरोध नहीं किया?”
“किया था। उसी रात उसने पत्नी से कहा—‘तुमने मेरी बहन की इज्जत पर चोट की है।’”
“फिर?”
“रागिनी ने कहा—‘अगर तुम्हें मेरे साथ रहना है तो मेरे नियम मानने होंगे।’”
बरामदे में हवा कुछ तेज हो गई थी।
जगधारी ने धीमे स्वर में पूछा, “फिर अरुण ने क्या किया?”
“कुछ नहीं। अगले दिन फिर वही दिनचर्या। नौकरी, घर, पत्नी, बच्चा और चुप्पी।”
“लेकिन यह कब तक?”
“दस साल।”
जगधारी जैसे पत्थर हो गया।
“दस साल?”
“हाँ। दस साल से अरुण अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा घर चलाने के नाम पर पत्नी देता रहा। मायके की जरूरतों के नाम पर भी पैसा जाता रहा। वह अपने माता-पिता के लिए कुछ करना चाहता तो घर में झगड़ा खड़ा हो जाता। रागिनी बेखौफ़ अरुण को लूटकर माँ - बाप और भाई-बहनों का भविष्य बना रही थी l
“और तुम?”
“हमने कभी बेटे से उसका घर तोड़ने को नहीं कहा। हमने सिर्फ इतना कहा—‘बेटा, घर बचाना है तो सम्मान के साथ बचाओ।’” हमें अपने पोते को देखने के लिए बरसों तक इंतजार किया l आज भी हम और हमारे परिवार की आँखे अरुण और पोते कुंवर जय को देखने के लिए तरसती रहती हैं l
“उसने?”
“एक दिन बोला—‘पापा, अगर मैंने विरोध किया तो वह आत्महत्या कर लेगी। फिर मुझे और आप सबको जेल भेज दिया जाएगा।’”
जगधारी ने गहरी साँस ली।
“यह तो भय में जीना हुआ।”
“हाँ। विवाह अगर भय का दूसरा नाम बन जाए तो सात वचन भी बोझ बन जाते हैं।”
कुछ देर दोनों चुप रहे।
लालधारी बाबू ने सामने लगे नीम के पेड़ को देखा।
“हमारे समाज में विवाह को केवल अधिकारों की सूची बना देना भी खतरनाक है। पति-पत्नी एक-दूसरे के जीवनसाथी हैं,
स्वामी और दास नहीं।
पत्नी को सम्मान चाहिए तो पति को भी सम्मान चाहिए।
पति की कमाई पर पत्नी का अधिकार हो सकता है, लेकिन पति के माता-पिता और उसके जन्मजात रिश्तों को मिटा देने का अधिकार किसी को नहीं मिल जाता।”
जगधारी ने सिर हिलाया।
“बिल्कुल।”
लालधारी बाबू ने आगे कहा—
“और यह बात केवल बहुओं के लिए नहीं है। बेटों को भी समझना होगा कि पत्नी को घर में लाकर उसके अधिकार, सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा करना उनकी जिम्मेदारी है। पत्नी को केवल ‘पराई’ कहकर दबाना भी उतना ही गलत है।
परिवार अधिकारों की लड़ाई नहीं, साझेदारी का नाम है।”
जगधारी ने पूछा, “फिर सती-सावित्री की बातें क्यों की जाती हैं?”
लालधारी बाबू हल्के से मुस्कराए।
“सती और सावित्री की कथाएँ अगर समझने के लिए हैं तो उनका अर्थ स्त्री की गुलामी नहीं है।
सावित्री ने सत्यवान के जीवन के लिए संघर्ष किया था। उसमें प्रेम था, साहस था, बुद्धि थी, निष्ठा थी। उसे पति पर अत्याचार करने या अपने अधिकार का प्रदर्शन करने की कथा मत बनाओ।”
“तो आज की सावित्री कैसी हो?”
“जो संकट में पति का हाथ पकड़े, उसके सपनों का सम्मान करे, उसके माता-पिता का सम्मान करे और पति भी उसके मायके, उसके सपनों और उसकी गरिमा का सम्मान करे। दोनों एक-दूसरे के लिए सावित्री और सत्यवान बनें—तभी विवाह का अर्थ पूरा होगा।”
जगधारी ने कहा, “बात तो बहुत बड़ी कह दी तुमने।”
“बात बड़ी नहीं है, जगधारी। हम उसे भूल गए हैं।”
लालधारी बाबू कुछ क्षण बाद बोले—
“मेरे परिवार में दो बहुएँ आईं। दोनों को हमने बेटी समझकर घर में जगह दी। लेकिन पहली बहू अपने भीतर इतना आक्रोश लेकर आई कि धीरे-धीरे घर में दीवारें उठने लगीं।
दूसरी ने अपने-पराए की खाई खोद दी। अपनों के लिए वह सब कुछ करने को तैयार रही, लेकिन ससुराल के दूसरे रिश्तों को बोझ समझती रही।”
“और तीसरी?”
लालधारी बाबू की आवाज में पहली बार उम्मीद झलकी।
“तीसरी का अभी इंतजार है।”
“तुम्हें क्या उम्मीद है?”
“उम्मीद है कि वह किसी संस्कारी माँ-बाप की बेटी होकर आएगी, लेकिन केवल अपने मायके की नहीं। वह इस घर को भी अपना घर समझेगी। और अगर वह संस्कारी और समझदार होगी तो हम भी उसे बहू नहीं, बेटी की तरह सम्मान देंगे।”
जगधारी ने मुस्कराकर कहा—
“लेकिन बाबू, रिश्ते एकतरफा नहीं बनते।”
“यही तो मैं कह रहा हूँ।”
लालधारी बाबू ने कुर्ते की ओर देखा।
“रिश्ता भी बाघप्रिंट जैसा है। एक रंग से सुंदर कपड़ा नहीं बनता। लाल रंग अकेला हो तो अलग कहानी है, काला अकेला हो तो अलग। लेकिन जब कुशल हाथ उन्हें संतुलन से मिलाते हैं तो एक सुंदर आकृति बनती है।”
जगधारी मुस्करा दिया।
“तुम फिर कुर्ते पर आ गए।”
“क्योंकि यह कुर्ता अब मेरे लिए कपड़ा नहीं रहा।”
“क्या है?”
“मेरे बेटे की चुप्पी है। उसके भीतर दबा प्रेम है। उसकी विवशता है। और एक बूढ़े पिता की वह इच्छा भी, जो अपने बेटे से केवल इतना चाहती है कि वह सुखी रहे।”
उसी समय भीतर से लालधारी बाबू की पत्नी की आवाज आई—
“चाय ठंडी हो रही है।”
लालधारी बाबू उठने लगे तो जगधारी ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“अगर अरुण आज तुम्हारे सामने बैठा हो तो क्या कहोगे?”
लालधारी बाबू कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले—
“मैं कहूँगा—बेटा, डरकर मत जी। लेकिन जल्दबाजी में भी कोई ऐसा कदम मत उठाना जिससे किसी की जिंदगी बर्बाद हो। सच को सच की तरह सामने रखो। जरूरत पड़े तो परिवार, विश्वसनीय मित्र और योग्य कानूनी सलाह लो। पत्नी से बात करो। सीमा तय करो। लेकिन अपने रिश्ते मत जलाओ।”
“और रागिनी से?”
“उसे भी यही कहूँगा—बहू, पति तुम्हारी संपत्ति नहीं है। जैसे तुम किसी की संपत्ति नहीं हो। विवाह दो स्वतंत्र मनुष्यों का साथ है। प्रेम में अधिकार हो सकता है, लेकिन स्वामित्व नहीं। मायका तुम्हारा है, ससुराल भी तुम्हारा हो सकता है। मगर किसी एक को बचाने के लिए दूसरे को मिटाना प्रेम नहीं है।”
जगधारी ने पूछा—
“और अपने परिवार की दूसरी बहुओं से?”
लालधारी बाबू ने कहा—
“मैं कहूँगा—तुम्हें इस घर में सम्मान चाहिए तो हम देंगे। तुम्हारी बात सुनी जाएगी। लेकिन हमारे बेटे को हमसे काटने की कीमत पर नहीं। हमारे रिश्तों को कमजोर करके तुम्हारा घर मजबूत नहीं होगा। घर की नींव काटकर कोई अपना महल नहीं बना सकता।”
इतने में बाहर से बच्चे के हँसने की आवाज आई।
कुंवर जय दौड़ता हुआ बरामदे में आया।
“दादाजी! आपका कुर्ता बहुत अच्छा है।”
लालधारी बाबू ने उसे गोद में उठा लिया।
“तुम्हारे पापा ने दिया है।”
बच्चे ने कुर्ते को छूते हुए कहा—
“पापा अच्छे हैं।”
लालधारी बाबू की आँखों में आँसू आ गए।
उन्होंने बच्चे को कसकर सीने से लगा लिया।
जगधारी यह दृश्य देखता रहा।
उसे लगा, यह कुर्ता केवल एक बूढ़े पिता के शरीर पर नहीं था। वह एक टूटते परिवार की कहानी पहनाए हुए था।
तभी लालधारी बाबू ने धीरे से कहा—
“जगधारी, रिश्ते मजबूर करके नहीं बचते।”
“तो कैसे बचते हैं?”
“विश्वास से। सम्मान से। संवाद से। और इस समझ से कि किसी रिश्ते को मजबूत करने के लिए दूसरे रिश्ते को कुचलना जरूरी नहीं।”
जगधारी ने पूछा—
“और तुम्हारा यह कुर्ता?”
लालधारी बाबू ने मुस्कराकर कहा—
उन्होंने अपनी हॉफ बाजू की बाँह को देखा।
बाघप्रिंट के लाल-काले रंग धूप में चमक रहे थे।
“बाघप्रिंट का रंग फीका पड़ सकता है, जगधारी। कपड़ा पुराना हो सकता है। लेकिन रिश्तों पर पड़े अविश्वास के दाग अगर समय रहते न धोए जाएँ तो पीढ़ियाँ उन्हें ढोती हैं।”
जगधारी ने गंभीर होकर कहा—
“तो क्या इस कुर्ते को संभालकर रखना?”
लालधारी बाबू ने सिर हिलाया।
“नहीं। इसे पहनूँगा।”
“क्यों?”
“ताकि हर बार इसे पहनते हुए खुद को याद दिला सकूँ—रिश्तों को बचाने के लिए किसी एक को हराना नहीं है।”
उन्होंने आरव का हाथ थाम लिया।
“हमें ऐसी बहुएँ चाहिए जो परिवार जोड़ें, और ऐसे बेटे भी चाहिए जो पत्नी और माता-पिता के बीच दीवार न बनें। हमें ऐसी बेटियाँ चाहिए जो अपने मायके को सम्मान दें, और ऐसे माता-पिता भी जो बहू को बेटी कहकर केवल त्याग की उम्मीद न करें। रिश्ते बराबरी से बनेंगे, तभी टिकेंगे।”
जगधारी ने मुस्कराकर कहा—
“अब समझ आया कि यह हॉफ बाजू कुर्ता इतना खास क्यों है।”
“क्यों?”
“क्योंकि इसमें बाघप्रिंट से ज्यादा तुम्हारे परिवार का दर्द छपा है।”
लालधारी बाबू ने उसकी ओर देखा।
“और उम्मीद भी।”
“किस बात की?”
“कि अगली पीढ़ी रिश्तों को मजबूर नहीं, मजबूत बनाएगी।”
बरामदे में धूप और फैल गई थी।
लालधारी बाबू का हॉफ बाजू बाघप्रिंट कुर्ता उस धूप में चमक रहा था।
उसकी लाल-काली आकृतियाँ जैसे कह रही थीं—
रिश्ते किसी की जागीर नहीं होते।
प्रेम किसी पर एकाधिकार नहीं है।
परिवार किसी एक व्यक्ति की सत्ता नहीं—सबकी साझी जिम्मेदारी है।
और शायद उस दिन पहली बार लालधारी बाबू को लगा था कि उनके बेटे के हाथ से खरीदा गया वह कुर्ता केवल जन्मदिन का उपहार नहीं था।
वह एक पिता के लिए बेटे के मन में बची हुई जगह का प्रमाण था।
उस जगह को बचाना था।
हर कीमत पर नहीं—
सही कीमत पर।
क्योंकि रिश्ते बचाने का अर्थ किसी को मजबूर करना नहीं,
एक-दूसरे को समझकर मजबूत बनाना है।
“सच कहते हैं,” लालधारी बाबू ने धीमे स्वर में कहा, “बहू और दामाद नारियल की तरह होते हैं। नारियल टूटने के बाद ही पता चलता है कि भीतर से सड़ा हुआ है या अच्छा।”
जगधारी ने उनकी ओर देखकर ठहाका लगाया और बोला—
“लालधारी, तुम्हारे हिस्से तो दोनों सड़े हुए आए!”
लालधारी बाबू भी हँस पड़े। बरामदे में देर तक उनकी हँसी गूँजती रही, जैसे वर्षों से जमा पीड़ा के बीच जीवन ने फिर से मुस्कराने की कोई वजह खोज ली हो।
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