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हक और हंसिया

 

हक और हंसिया /नन्दलाल भारती
रिमझिम बरसात हो रही थी। धान की फ़सले लहलहा रही थी l धान की पत्तियों पर पानी की बूंदे मोतियों की तरह चमक रही थी l खेतों की मेड़ों से पानी कलकल कर बह रहा था l बहते हुए साफ पानी में छोटी मछलियां चाँदी की तरह चमक रही थी l
चारों तरफ हरियाली की चादर बिछी थी—धान के खेत हवा के साथ झूमते हुए आने वाले अच्छे दिनों की कहानी कह रहे थे,लेकिन इस हरियाली के बीच भी एक सच्चाई छिपी हुई थी, जो सदियों से बंजर जैसी सूखी पड़ी थी—गैरबराबरी की सच्चाई छुआछूत -भेदभाव की सचाई ।
गांव के दखिन के आखिरी छोर पर, कच्चे मकान के सामने खड़ा साजेंद्र अपने सपनों को सींच रहा था,उसने बी.टी.सी. की परीक्षा पास कर लिया था । अब उसे जॉइनिंग लेटर का इंतज़ार था।
साजेंद्र की आँखों में एक नई दुनिया बस रही थी—जहाँ वह बच्चों को पढ़ाएगा, उन्हें इंसानियत का पाठ सीखायेगा , शायद उस समाज को बदल सकेगा जिसने उसे हमेशा एक "जाति" में बांधकर अछूत बनाये रखा l
लेकिन उसे क्या पता कि उसकी ज़िंदगी की किताब का एक काला पन्ना अभी खुलने वाला है ।
सुबह-सुबह जब उसने अपनी भैंस को हौदी के खूंटे में बांधा तो भैंस हौदी में पड़े भूसे में मुँह नहीं डाल रही थी।
साजेंद्र ने देखा—भूसा सूखा था, उसमें हरी घास नहीं थी उसने हंसिया उठाया और घर के सामने वाले भींटा की तरफ बढ़ गया—वही भींटा जो गांव समाज की ज़मीन थी, लेकिन इस जमीन पर गांव के ठाकुर दुभग्गा का कब्जा था जैसाकि अक्सर गांव समाज की जमीन पर कब्जा गांव के ठाकुरों का या अन्य किसी दबंग जाति का ही होता है l
इस गांव में सिर्फ एक ठाकुर परिवार "दुभग्गा "का परिवार रहता था,इस परिवार का मुखिया दुभग्गा अव्वल दर्जे का बदमाश था,गांव के अहीर,धोबी, नाई और दलित सब दबंग दुभग्गा से डरे -सहमे परेशान रहते थेl
गांव की अधिकतर जमीन पर ठाकुर दुभग्गा का कब्जा था, बाभन लोग भी जमीन के बड़े मालिकों में गिने जाते थे,अहीर, धोबी और नाई परिवार के पास तनिक जमीन थी परन्तु गांव के दलित ज्यादातर भूमिहीन थे, जिनका संघर्ष सदियों से जारी था l
साजेंद्र भींटा पर जैसे ही घास काटने लगा, अचानक पीछे से एक भारी भरकम आवाज़ गूंजी—
“क्यों बे मस्टरवा, ये किसका खेत है?”
साजेंद्र ने पलटकर देखा—सामने ठाकुर दुभग्गा खड़ा था। गांव का वही दबंग, जमींदार जिसका नाम सुनते ही शरीफ लोग रास्ता बदल लेते थे।
साजेंद्र बोला -बाबूसाहब यह तो किसी का नहीं है-गांव समाज का भींटा है l
इतनी ही बात पर साजेंद्र के सपनों और हकीकत के बीच की टक्कर हो गयी l
उसे इस बात का जरा भी अनुमान नहीं था l
ठाकुर आव ना देखा ना ताव, लोहे की चूलेदार लाठी से दे माराl साजेंद्र मुंह के बल गिर पड़ा,चिल्ला -चिल्लाकर ठाकुर जातिसूचक गालियां देते हुए बोला हरामखोर तेरी ये हिम्मत कि ठाकुर दुभग्गासिंह से जबान लड़ाए,और कई लाठियाँ बरसा दिया l
साजेंद्र हंसिया घुमाते हुए बचने की कोशिश कर रहा था, तब ठाकुर ने साजेंद्र के घुटने पर एक और लाठी दे मारा,घायल साजेंद्र मिट्टी -कीचड़ से लथपथ उठने की कोशिश कर रहा था, पर ठाकुर थमने का नाम नहीं ले रहा था l
साजेंद जोर की सांस खींचा और उठकर खड़ा हो गया, ठाकुर फिर मारा, प्रहार इतना भयंकर था कि लाठी हाथ भर मिट्टी में धंस गयी l
बचाओ -बचाओ की गुहार लगाते हुए साजेंद्र भागने की कोशिश करने लगा पर घुटने और कमर में चोट की वजह से भाग नहीं पा रहा था l ठाकुर के सिर पर खून सवार था, साजेंद्र को जान से मार देना चाहता था l वह लाठी भांजे जा रहा था l खेत में काम करने वाले लोग ही नहीं घरों में से भी लोग देख रहे थे पर बीच-बचाव करने की किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी l
घायल सांप की तरह साजेंद्र उठा और हंसिया हवा में लहराते हुए बोला ठाकुर चमार मरे हुए जानवर का ही नहीं, जान पर आ जाये तो जिंदा बदमाशों की भी चमड़ी निकाल सकते हैं l
अब क्या ठाकुर का खून तेजी से उबाल मारा,उसने साजेंद्र के सिर को साध कर लाठी मारा पर निशाना चूक गया , लेकिन साजेंद्र का हंसिया ठाकुर के पेट में धंस गया, साजेंद्र ने हंसिया खींच लिया, हंसिया सदरी को फाड़ते हुए बाहर आ तो गया पर अतंडिया बाहर नहीं आयी, ना कोई अंदरूनी घाव हुआ खून बहने लगा l
ठाकुर लाठी छोड़कर, पेट पकड़कर भागा और चार -छः ठाकुरों के साथ पुलिस थाना पहुँचा l
दरोगाजी ने ठाकुर का भरपूर साथ दिया, तुरंत पूरी बस्ती को घेर लिया गया l
l हर घर की तलाशी हुई, बूढ़े औरतें किसी पर कोई रहम नहीं सब की धुनाई हुई l धरपकड़ हुई l
साजेंद्र सहित सभी नामजद बस्ती के और लड़के को पुलिस जानवरों की तरह मारती -पीटती थाने ले गयी l पूरी रात दरोगा और पुलिस सभी लड़को की हड्डीयां तोड़ डाले, वे उठकर खड़े होने लायक नहीं रहे तब पुलिस जीप में लादकर बस्ती में पटक गयी l साजेंद्र को इरादतन हत्या करने के अपराध में आईपीसी की कई धाराएं- 302,34,120बी, 201 लगाकर बड़े जेल भेज दिया गया l
जिसके जुर्म में फांसी के फंदे पर साजेंद्र लटका दिया जाये या आजीवन कैद की सजा हो जाये lबरसों तक मुकदमा चला, आखिर में फैसले का दिन भी आया l
कोर्ट में फैसले का वह दिन साजेंद्र के जीवन का सबसे लंबा दिन था। कोर्ट पर साजेंद्र को पूरा भरोसा था, तब जज न्याय करते थे पक्षपात नहीं, कोर्ट पर आम आदमी का अटूट भरोसा होता था, न्याय जरूर मिलेगा, वही हुआ न्याय मिला l
बरसों की यातना, अपमान और संघर्ष साजेंद्र के चेहरे पर साफ झलक रहे थे। पुलिस की बेरुखी, समाज की चुप्पी और ठाकुर परिवार के अत्याचारों ने उसे अंदर से तोड़ने की पूरी कोशिश की थी—लेकिन उसका आत्मसम्मान मरा नहीं था।
जज साहब ने जैसे ही फैसला पढ़ना शुरू किया, पूरे कोर्टरूम में सन्नाटा छा गया।
“साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि आरोपी साजेंद्र ने आत्मरक्षा में हंसिया उठाया,अपना बचाव किया। इसलिए साजेंद्र सभी आरोपों से बरी किया जाता है। साथ ही, शिकायतकर्ता ठाकुर दुभग्गा को दोषी ठहराया जाता है l गाँव समाज की जमीनों पर अशुद्रो के पट्टे और कब्जे को निरस्त कर भूमिहीन को आवन्टित करने का आदेश दिया जाता l उस दिन हक और हंसिया की जीत हुई,लाठी का हार l
ये शब्द सिर्फ एक फैसला नहीं थे—ये उस सच्चाई की जीत थी जिसे लंबे समय से दबाने की कोशिश की जा रही थी।
साजेंद्र की आँखों में आंसू थे—कमजोरी के नहीं, बल्कि जीत के आंसू लबालब भरे थे । यह जीत सिर्फ उसकी नहीं थी, बल्कि उन सभी लोगों की थी जो अन्याय के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत रखते हैं।
कुछ ही दिनों बाद, जब वह स्कूल के प्रांगण में शिक्षक के रूप में खड़ा हुआ ,बच्चों की मासूम आँखें उसे देख रही थीं। उसने पहले दिन कक्षा में ब्लैकबोर्ड पर लिखा—
ना कोई ऊंचा ना कोई नीचा
सब एक समान
हम पढ़ेंगे लिखेंगे करेंगे नेक काम
कर्म से आदमी बनता महान l
और फिर बच्चों की तरफ मुड़कर बोला;
प्यारे बच्चों, आज से हम सिर्फ पढ़ाई ही नहीं पढ़ाई के साथ अच्छा इंसान बनना भी सीखेंगे…”
उस दिन, भींटा पर उगी घास की तरह एक नई सोच भी जन्म ले चुकी थी—जो अब किसी की लाठी के डर से नहीं, जोर जबरदस्ती से नहीं, जुल्म -अत्याचार, जातिवाद, भेदभाव से नहीं, पाखंडियों के धार्मिक पोथियों के डर से भी नहीं बल्कि हक़ और हंसिया की नींव पर खड़ी न्याय की माटी में समानता की सोच जन्म ले चुकी थी।
नन्दलाल भारती
15/05/2026 

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