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गुरुदक्षिणा में ठगा गया भविष्य

 
आलेख : गुरुदक्षिणा में ठगा गया भविष्य : एकलव्य से आधुनिक भारत तक
— नन्दलाल भारती
कवि, कथाकार एवं सामाजिक चिंतक
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एकलव्य का अंगूठा : केवल अतीत की घटना नहीं रही यह घटना आज भी भारतीय समाज को डंस रही है l
महाभारत में एकलव्य और द्रोणाचार्य का प्रसंग भारतीय समाज के सामने एक ऐसा प्रश्न खड़ा करता है, जो युगों की यात्रा करते हुए आज भी हमारे सामने उपस्थित है। क्या प्रतिभा से बड़ा जन्म होता है? क्या शिक्षा और ज्ञान पर किसी वर्ग का अधिकार हो सकता है? क्या गुरु का सम्मान करने का अर्थ यह है कि शिष्य अन्याय के सामने भी सिर झुका दे? और क्या किसी योग्य व्यक्ति की उन्नति रोककर किसी विशेष व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाए रखना धर्म कहा जा सकता है?
एकलव्य की कथा इन प्रश्नों का सामना करने के लिए विवश करती है। इस कथा में एक प्रतिभाशाली निषाद युवक धनुर्विद्या सीखना चाहता है। वह द्रोणाचार्य के पास पहुँचता है, लेकिन उसे शिक्षा नहीं मिलती। निराश होकर वह स्वयं अभ्यास करता है और अपनी मेहनत से असाधारण धनुर्धर बन जाता है। जब द्रोणाचार्य को उसकी योग्यता का पता चलता है, तो वे गुरु-दक्षिणा में उसका दाहिना अंगूठा माँग लेते हैं। एकलव्य श्रद्धापूर्वक अपना अंगूठा अर्पित कर देता है।

इस प्रसंग को परंपरागत रूप से गुरु-भक्ति और त्याग के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। लेकिन दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है—जिस गुरु ने शिष्य को शिक्षा देने से इनकार किया, उसी गुरु ने उसकी अर्जित प्रतिभा को नष्ट करने वाली दक्षिणा क्यों माँगी?

आधुनिक सामाजिक दृष्टि से इस प्रसंग की एक प्रमुख व्याख्या यह है कि एकलव्य का अंगूठा केवल शरीर का अंग नहीं था; वह उसकी प्रतिभा, संभावनाओं और भविष्य का प्रतीक बन गया। यह व्याख्या हमें उस व्यवस्था पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है जिसमें योग्य होने के बावजूद किसी व्यक्ति को अवसर से वंचित किया जा सकता है।
द्रोणाचार्य की गुरु-दक्षिणा नहीं थी प्रतिभा पर प्रहार थी - 
द्रोणाचार्य राजकुमारों के गुरु थे। अर्जुन उनके प्रिय शिष्यों में थे और द्रोणाचार्य ने उसे महान धनुर्धर बनाने का संकल्प लिया था। एकलव्य की असाधारण योग्यता ने उस संकल्प के सामने चुनौती खड़ी कर दी। कथा के इस मोड़ पर गुरु-दक्षिणा का नैतिक अर्थ गंभीर प्रश्नों के घेरे में आ जाता है।
गुरु-दक्षिणा का आदर्श ज्ञान देने वाले के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने से जुड़ा है। लेकिन यदि दक्षिणा के नाम पर किसी की क्षमता ही छीन ली जाए, तो उसे किस नैतिक आधार पर उचित ठहराया जा सकता है?
एकलव्य ने द्रोणाचार्य से नियमित शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। उसने अपने प्रयास, अनुशासन और अभ्यास से धनुर्विद्या सीखी थी। फिर भी उसकी प्रतिभा को सीमित करने की कीमत उसी से माँगी गई। इसीलिए एकलव्य की कथा को शिक्षा के अवसरों में असमानता और सामाजिक बहिष्कार के प्रतीक के रूप में भी पढ़ा जाता है।  इस प्रसंग के माध्यम से शिक्षा की विशिष्टता और उस पर एकाधिकार के प्रश्न उठाता है।
यहाँ प्रश्न केवल द्रोणाचार्य के व्यक्तिगत निर्णय का नहीं है। प्रश्न उस मानसिकता का है जो किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति को आगे बढ़ते देखकर उसका मार्ग रोकना चाहती है।
यदि अर्जुन की श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए एकलव्य की क्षमता घटाना आवश्यक हो जाए, तो यह श्रेष्ठता प्रतिभा की है या अवसरों पर नियंत्रण की?
एकलव्य : वंचित प्रतिभा का प्रतीक थे और रहेंगे,
एकलव्य की कथा में सबसे प्रेरक पक्ष उसका आत्मविश्वास है। उसे शिक्षा नहीं मिली, फिर भी उसने सीखना नहीं छोड़ा। उसने अपने सामने उपस्थित बाधा को अंतिम सत्य नहीं माना। वह स्वयं अभ्यास करता रहा और अपनी योग्यता विकसित की।
यहीं एकलव्य उन करोड़ों विद्यार्थियों का प्रतीक बन जाता है जिन्हें संसाधनों, मार्गदर्शन, सामाजिक स्वीकृति या अवसरों की कमी के बावजूद आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
लेकिन एकलव्य की प्रशंसा केवल उसके त्याग के लिए करना पर्याप्त नहीं है। उसकी मेहनत और प्रतिभा की प्रशंसा के साथ यह प्रश्न भी उठना चाहिए कि उसे ऐसी स्थिति में पहुँचाया ही क्यों गया जहाँ उसकी योग्यता का मूल्य उसके भविष्य की कीमत पर चुकाया गया।
किसी वंचित व्यक्ति को संघर्ष करने की प्रेरणा देना अच्छी बात है, लेकिन उसके संघर्ष को अनिवार्य बनाने वाली व्यवस्था पर प्रश्न न उठाना अधूरा दृष्टिकोण है।
एकलव्य हमें आत्मनिर्भरता सिखाता है, पर उसकी कथा यह भी सिखाती है कि व्यक्तिगत प्रतिभा को अवसरों की समानता का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
स्वतंत्र भारत में एकलव्य को नए रूप में देखा और समझा जाना जरूरी हो गया हैl

भारत स्वतंत्र हुआ। संविधान ने समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता के आदर्श स्वीकार किए। अस्पृश्यता को समाप्त करने का प्रावधान किया गया और सार्वजनिक जीवन में जाति के आधार पर भेदभाव के विरुद्ध संवैधानिक सुरक्षा दी गई। संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 17 क्रमशः समानता, भेदभाव-निषेध, सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता और अस्पृश्यता के उन्मूलन से जुड़े हैं।  इन मूल्यों को विधिक आधार प्रदान करता है।
लेकिन संविधान में समानता की घोषणा हो जाने मात्र से समाज की प्रत्येक असमानता समाप्त नहीं हो जाती। सामाजिक व्यवहार, संस्थागत संस्कृति और अवसरों के वितरण में परिवर्तन के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।
आज भी अनेक स्थानों से जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता, सामाजिक बहिष्कार और हिंसा की घटनाएँ सामने आती हैं। कहीं दलित दूल्हे के घोड़ी पर चढ़ने पर विवाद या हमला होने की खबर आती है, कहीं मंदिर-प्रवेश को लेकर तनाव पैदा होता है, तो कहीं सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग पर सामाजिक टकराव होता है। ऐसी घटनाएँ किसी एक समुदाय की संपूर्ण मानसिकता का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं, लेकिन वे यह अवश्य दिखाती हैं कि संवैधानिक समानता और सामाजिक व्यवहार के बीच दूरी अब भी मौजूद है।
यहाँ एकलव्य की कथा एक प्रतीकात्मक प्रश्न बनकर लौटती है—क्या समाज हर व्यक्ति को आगे बढ़ते देखने के लिए तैयार है, या कुछ लोगों की प्रगति आज भी स्थापित सामाजिक वर्चस्व को चुनौती समझी जाती है?
 शिक्षा के मंदिरों में समानता कहाँ है?  शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता है। शिक्षा मनुष्य को ज्ञान, विवेक, आत्मविश्वास और स्वतंत्र निर्णय की क्षमता देती है। लेकिन यदि शिक्षण संस्थानों में ही किसी विद्यार्थी को उसकी जाति, समुदाय, भाषा, आर्थिक स्थिति या सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण कमतर समझा जाए, तो शिक्षा का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।
वंचित समुदायों के विद्यार्थियों को कभी-कभी पूर्वाग्रह, अपमान, अलगाव और संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ता है। उच्च शिक्षा में प्रवेश पा लेना ही पर्याप्त नहीं; संस्थान में सम्मानजनक वातावरण, निष्पक्ष मूल्यांकन, उचित मार्गदर्शन और शिकायतों के समाधान की व्यवस्था भी जरूरी है।
किसी विद्यार्थी की योग्यता पर प्रश्न उठाना अकादमिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन उसकी सामाजिक पहचान के आधार पर उसे कमतर मानना भेदभाव है। किसी छात्र की असफलता को केवल उसकी जाति से जोड़ना गलत है; उसी तरह किसी विद्यार्थी की कठिनाइयों में सामाजिक भेदभाव की संभावित भूमिका को बिना जाँच के नकार देना भी उचित नहीं।
उच्च शिक्षण संस्थानों में वंचित समुदायों के विद्यार्थियों की आत्महत्या की घटनाएँ समाज को गंभीर आत्ममंथन के लिए बाध्य करती हैं। हर घटना के कारण अलग-अलग जाँचे जाने चाहिए, लेकिन किसी भी संस्थान को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विद्यार्थी अपमान, अलगाव या असहायता के कारण अकेला न पड़ जाए।
यदि शिक्षा का मंदिर ही विद्यार्थी के आत्मसम्मान को चोट पहुँचाए, तो वह ज्ञान का केंद्र कैसे बना रह सकता है?
एकलव्य को शिक्षा से वंचित किए जाने की कथा और आज के संस्थानों में अवसरों की असमानता के बीच सीधी ऐतिहासिक समानता स्थापित करना उचित नहीं होगा। फिर भी दोनों के बीच एक नैतिक समानता पर विचार किया जा सकता है—योग्यता को फलने-फूलने के लिए अवसर और सम्मान आवश्यक हैं।
नौकरी, पदोन्नति और संस्थागत वर्चस्व आज भी विद्यमान है l
शिक्षा के बाद रोजगार और कार्यस्थल का प्रश्न आता है। सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों और निजी कंपनियों में नियुक्ति, मूल्यांकन, प्रशिक्षण तथा पदोन्नति की प्रक्रियाएँ निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए।
यदि किसी कर्मचारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट या चरित्रावली पूर्वाग्रह से प्रभावित हो, यदि उचित योग्यता के बावजूद उसे पदोन्नति के अवसर से अनुचित रूप से वंचित किया जाए, या यदि किसी संस्था में निर्णय लेने वाले पदों पर सामाजिक विविधता का अभाव बना रहे, तो इन परिस्थितियों की निष्पक्ष जाँच आवश्यक है।
हालाँकि हर पदोन्नति न मिलना या हर नियुक्ति में असफल होना जातिगत भेदभाव का प्रमाण नहीं है। योग्यता, अनुभव, प्रदर्शन, नियम और संस्थागत आवश्यकताएँ भी महत्त्वपूर्ण होती हैं। लेकिन यदि बार-बार असमान व्यवहार के संकेत मिलते हैं, तो पारदर्शी प्रक्रिया, प्रभावी शिकायत-निवारण और जवाबदेही सुनिश्चित करना संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
विश्वविद्यालयों के शीर्ष पद हों या सरकारी सेवाओं में नेतृत्व के अवसर, प्रश्न केवल यह नहीं कि कौन नियुक्त हुआ। प्रश्न यह भी है कि चयन की प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष है, अवसरों तक पहुँच कितनी समान है और संस्थागत संस्कृति सभी कर्मचारियों को समान सम्मान देती है या नहीं।
निजी क्षेत्र में भी सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण अवसरों में अंतर की संभावना को गंभीरता से समझने की जरूरत है। समावेशी संस्थान केवल नियमों से नहीं बनते; वे निष्पक्ष व्यवहार, प्रतिनिधित्व और जवाबदेही से बनते हैं।
एकलव्य का आधुनिक रूप वह कर्मचारी भी हो सकता है जो अपनी योग्यता सिद्ध करने के बाद भी अवसरों की असमानता से जूझ रहा हो—बशर्ते उसके अनुभव की जाँच तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर की जाए।

गरीबी, भूमिहीनता और अवसरों की असमानता बड़ी समस्या है l
सामाजिक अन्याय केवल अपमान या छुआछूत तक सीमित नहीं रहता। वह संसाधनों और अवसरों के वितरण में भी दिखाई दे सकता है। भूमिहीनता, बेरोजगारी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक सीमित पहुँच, आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक नेटवर्क की कमी व्यक्ति की प्रगति को प्रभावित कर सकती है।
संपन्न परिवार अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, मार्गदर्शन और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध करा सकते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को कई बार पढ़ाई के साथ काम करना पड़ता है, संसाधनों की कमी से जूझना पड़ता है या पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण अवसर छोड़ने पड़ते हैं।
जाति और वर्ग हमेशा एक ही चीज नहीं हैं, लेकिन भारतीय समाज में वे अनेक परिस्थितियों में एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। इसलिए सामाजिक न्याय की चर्चा में आर्थिक अवसरों और जातिगत भेदभाव—दोनों को समझना आवश्यक है।
किसी समुदाय के व्यक्ति को उसकी जाति के कारण सम्मान और दूसरे को उसी कारण अपमान मिलना सामाजिक समानता की भावना को चोट पहुँचाता है। इसी तरह प्रतिभा का मूल्यांकन व्यक्ति की उपलब्धियों से होना चाहिए, न कि उसके परिवार की संपत्ति या सामाजिक प्रतिष्ठा से।
समाज तब आगे बढ़ता है जब वह कमजोर व्यक्ति को ऊपर उठने का अवसर देता है, न कि उसकी कठिनाइयों को उसकी नियति बताकर स्वीकार कर लेता है।

नारी उत्पीड़न और सामाजिक वर्चस्व क्यों? यह भी सवाल उठना चाहिए -
सामाजिक अन्याय का एक गंभीर रूप महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और उत्पीड़न भी है। जाति, वर्ग, आर्थिक निर्भरता और लैंगिक असमानता कई बार एक-दूसरे से जुड़कर महिलाओं की कठिनाइयाँ बढ़ा देते हैं। वंचित समुदायों की महिलाओं को कुछ परिस्थितियों में जातिगत अपमान और लैंगिक हिंसा—दोनों का सामना करना पड़ सकता है।
लेकिन महिलाओं के अनुभव एक जैसे नहीं होते। इसलिए उनकी समस्याओं को समझने के लिए सामाजिक परिस्थितियों, कानून, संस्थागत प्रतिक्रिया और स्थानीय संदर्भों का अध्ययन आवश्यक है।
एक न्यायपूर्ण समाज वह है जिसमें महिला की गरिमा, सुरक्षा और निर्णय लेने की स्वतंत्रता को परिवार, जाति या समुदाय की कथित प्रतिष्ठा से नीचे न रखा जाए।
एकलव्य की कथा से प्रेरित व्यापक प्रश्न यहाँ भी लागू होता है—क्या किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिभा पर सामाजिक वर्चस्व का नियंत्रण स्वीकार्य होना चाहिए?
लोकतंत्र में धर्मतंत्र की चुनौती
भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। यहाँ शासन का आधार संविधान और कानून हैं, किसी एक धार्मिक समुदाय की सामाजिक श्रेष्ठता नहीं। धार्मिक आस्था व्यक्ति की स्वतंत्रता का विषय है, लेकिन सार्वजनिक संस्थानों और नागरिक अधिकारों का संचालन समानता तथा कानून के आधार पर होना चाहिए।
जब धर्म की व्याख्या का उपयोग किसी समूह को श्रेष्ठ और दूसरे को हीन ठहराने, शिक्षा या सार्वजनिक संसाधनों तक पहुँच सीमित करने अथवा सामाजिक भेदभाव को उचित बताने के लिए किया जाता है, तब लोकतांत्रिक मूल्यों के सामने चुनौती पैदा होती है।
धर्म और आध्यात्मिकता की अनेक परंपराओं ने करुणा, सेवा, त्याग और मानव-कल्याण पर बल दिया है। इसलिए धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए भी उन व्याख्याओं पर प्रश्न उठाना आवश्यक है जो मनुष्य की गरिमा को कम करती हैं।
भारत की विविधता उसकी शक्ति है। लेकिन विविधता तभी फलती-फूलती है जब सभी नागरिकों को समान सम्मान और अधिकार प्राप्त हों। लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं; वह संस्थाओं की निष्पक्षता, नागरिकों की समानता और असहमति के सम्मान से भी जीवित रहता है।
एकलव्य का अंगूठा दान -क्या यह द्रोणाचार्य की दूरगामी नीति का परिणाम है? इस विषय पर विमर्श जरुरी है l
यह कहना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा कि आज की सभी सामाजिक समस्याएँ द्रोणाचार्य की किसी दूरगामी योजना का परिणाम हैं। महाभारत का प्रसंग एक महाकाव्यात्मक कथा है, जबकि आधुनिक भारत की असमानताओं के पीछे लंबे ऐतिहासिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कारण हैं।
फिर भी द्रोणाचार्य और एकलव्य की कथा एक प्रभावशाली रूपक प्रस्तुत करती है। यह हमें उस मानसिकता को पहचानने में मदद करती है जो अवसरों पर अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति की प्रगति रोकना चाहती है।
जब शिक्षा पर विशेषाधिकार का पहरा हो, जब योग्यता के बावजूद किसी व्यक्ति को सामाजिक पहचान के कारण कमतर आँका जाए, जब संस्थागत निर्णयों में निष्पक्षता की जगह पूर्वाग्रह ले ले, तब एकलव्य की कथा नए अर्थ ग्रहण करती है।
इस दृष्टि से ‘द्रोणाचार्य नीति’ किसी एक जाति के प्रत्येक व्यक्ति का परिचय नहीं, बल्कि उस भेदभावपूर्ण प्रवृत्ति का प्रतीक है जो समान अवसरों के बजाय सामाजिक वर्चस्व को प्राथमिकता देती है। किसी भी समुदाय के सभी लोगों को एक ही दृष्टि से देखना उचित नहीं; आलोचना का लक्ष्य अन्यायपूर्ण व्यवहार और उसे बनाए रखने वाली संरचनाएँ होनी चाहिए।
भारत बुद्ध का देश और समतामूलक भारत का सपना को मूर्त रूप देने की आवश्यकता है l
भारत की बौद्ध परंपरा करुणा, विवेक और दुःख से मुक्ति की खोज के लिए जानी जाती है। गौतम बुद्ध ने मनुष्य के नैतिक आचरण और आत्मपरिवर्तन को महत्त्व दिया। आधुनिक भारत में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने समानता, स्वतंत्रता और बंधुता को सामाजिक लोकतंत्र की बुनियाद माना।
इन विचारों से प्रेरणा लेकर भारत को ऐसा समाज बनाने की जरूरत है जहाँ किसी बच्चे की प्रतिभा जन्म के कारण सीमित न हो, किसी विद्यार्थी को अपमान के कारण शिक्षा छोड़ने की नौबत न आए, किसी कर्मचारी को पूर्वाग्रह के कारण अवसरों से वंचित न होना पड़े और किसी महिला की गरिमा सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर कुचली न जाए।
इसके लिए केवल भावनात्मक नारों से काम नहीं चलेगा। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, छात्रवृत्ति, निष्पक्ष भर्ती, पारदर्शी पदोन्नति, भेदभाव के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई, आर्थिक अवसर और सामाजिक जागरूकता—इन सभी पर गंभीरता से काम करना होगा।
समतामूलक भारत का निर्माण किसी एक समुदाय के विरुद्ध संघर्ष नहीं, बल्कि उन व्यवस्थागत बाधाओं के विरुद्ध संघर्ष है जो किसी भी मनुष्य की गरिमा और क्षमता को सीमित करती हैं।
बहुत कटे अंगूठे पर अब किसी एकलव्य का अंगूठा नहीं कटना चाहिए तभी भारत विकसित भारत बन सकता है l
एकलव्य की कथा हमें प्रतिभा, परिश्रम और समर्पण की प्रेरणा देती है, लेकिन उससे भी बड़ा सबक यह है कि किसी की योग्यता को दूसरे की श्रेष्ठता बचाने के लिए कुचला नहीं जाना चाहिए।
आज स्वतंत्र भारत के सामने चुनौती है कि वह संविधान में घोषित समानता को सामाजिक व्यवहार और संस्थागत संस्कृति में उतारे। शिक्षा के अवसर, रोजगार, पदोन्नति, सामाजिक सम्मान और न्याय—इन सभी क्षेत्रों में निष्पक्षता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
यदि हम विकसित भारत का सपना देखते हैं, तो हमें यह भी देखना होगा कि विकास का लाभ किस तक पहुँच रहा है, कौन पीछे छूट रहा है और किन बाधाओं के कारण कुछ लोग अपनी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। आधुनिकता केवल तकनीक, इमारतों और आर्थिक वृद्धि से नहीं आती; वह नागरिकों की गरिमा और समान अवसरों से भी मापी जाती है।
एकलव्य को केवल त्याग की मूर्ति बनाकर पूजना पर्याप्त नहीं; उस व्यवस्था पर प्रश्न उठाना भी जरूरी है जिसने उसकी प्रतिभा के सामने बाधा खड़ी की।
आज का भारत तभी सच्चे अर्थों में समतामूलक बनेगा जब किसी विद्यार्थी को सीखने के लिए अपनी सामाजिक पहचान से संघर्ष न करना पड़े, किसी योग्य कर्मचारी को निष्पक्ष अवसर पाने के लिए अपमान न सहना पड़े और किसी नागरिक को सम्मान पाने के लिए अपना जन्म छिपाना न पड़े।
आइए, हम यह संकल्प लें कि किसी की प्रतिभा को जन्म के आधार पर नहीं आँकेंगे, किसी के अधिकार को सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर नहीं छीनेंगे और अन्याय को परंपरा कहकर स्वीकार नहीं करेंगे।
अंततः प्रश्न यही है—
क्या हम एकलव्य के अंगूठे की कथा को केवल अतीत का गौरव मानकर दोहराते रहेंगे, या उससे सीख लेकर ऐसा भारत बनाएँगे जहाँ किसी का भविष्य किसी की श्रेष्ठता बचाने के लिए कुर्बान न हो?
क्या बुद्ध, कबीर, फुले और आंबेडकर की समता-परंपरा से प्रेरणा लेकर हम ऐसा समाज बना पाएँगे जिसमें ज्ञान पर सबका अधिकार हो और न्याय सबके लिए समान हो?
एकलव्य का अंगूठा इतिहास की कथा हो सकता है, लेकिन आज किसी भी प्रतिभा का भविष्य का कत्ल कर देना सामाजिक अन्याय है। अब समय है कि अंगूठे काटने वाली मानसिकता का अंत हो और हर हाथ को सीखने, रचने, आगे बढ़ने तथा सम्मानपूर्वक जीने का अवसर मिले।
यही समतामूलक भारत का सपना है—और यही एकलव्य के प्रति हमारी सच्ची आस्था होगी ।
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