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एक कुनबे का कातिल

 
एक कुनबे का कातिल
— नन्दलाल भारती
कवि, कथाकार एवं सामाजिक चिंतक
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दीक्षा अचानक चौंककर रुक गयी और बोली, “अरे भैया, वो देखो!”
दिवाकर ने सड़क के दूसरी ओर नजर दौड़ाई। “क्या दिखा रही हो, दीक्षा?”
“वो लुटेरा!”
“कौन लुटेरा?”
“वही अंधा आदमी, जो ठूँठ जैसा वह आदमी ठूँठ पेड़ के पास बैठा है।
दिवाकर ने ध्यान से देखा। एक दुबला-पतला बूढ़ा आदमी, हाथ में लकड़ी की छड़ी लिए, सूखे पेड़ के तने से पीठ टिकाए बैठा था। उसकी आँखें खुली थीं, लेकिन उनमें रोशनी नहीं थी। चेहरे पर झुर्रियों का जाल था और सफेद बाल बिखरे हुए थे।
“अंधा आदमी लुटेरा है?” दिवाकर ने आश्चर्य से पूछा।
“हाँ भैया! पहचान में नहीं आया?”
“मैं कैसे पहचानूँ? मैंने इसे  देखा नहीं।”
“अरे भैया, यह प्रभुठेकमिया है—वही बेईमान, जिसने चार भाइयों के परिवार को उजाड़ दिया था। वही, जिसने अपने ही रिश्तों का खून किया था।”
पास खड़ी सरोज ने दोनों को टोकते हुए कहा, “तुम भाई-बहन की चलती-फिरती अदालत में किस मुकदमे की सुनवाई शुरू हो गई? और वह भी एक अंधे बूढ़े के खिलाफ!”
दीक्षा का चेहरा गंभीर हो गया।
“भाभी, यह कोई साधारण आदमी नहीं है। इसके चेहरे पर भले ही बुढ़ापे की झुर्रियाँ हों, लेकिन इसके अतीत में चार परिवारों की बर्बादी लिखी है।”
सरोज ने बूढ़े की ओर देखा। “तुम्हें कैसे मालूम कि इसने अपराध किया है?”
दिवाकर ने लंबी साँस ली।
“भाभी, कुछ अपराध ऐसे होते हैं जिनकी सजा अदालत के कागजों में नहीं मिलती, लेकिन उनका दर्द पीढ़ियों तक जीवित रहता है। प्रभुठेकमिया उन्हीं अपराधियों में से एक है।”
“आखिर ऐसा क्या किया था इसने?” सरोज ने पूछा।
दिवाकर कुछ क्षण चुप रहे। फिर बोले, “सुनोगी तो समझोगी कि जमीन का एक टुकड़ा किसी परिवार के लिए सिर्फ मिट्टी नहीं होता। उसमें उसकी मेहनत, उसकी स्मृतियाँ, उसके बच्चों का भविष्य और पुरखों की निशानियाँ दबी होती हैं।”
गाँव में चार सगे भाई रहते थे—भीरू, धीरू, बीरू और कीरू। चारों के पास दो एकड़ जमीन थी। जमीन बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन मेहनत से पेट भरने और परिवार का सम्मान बचाए रखने के लिए पर्याप्त थी।
चारों भाइयों के घरों के बीच कोई ऊँची दीवार नहीं थी। खेतों की मेड़ें अलग अलग भी नहीं थीं,  दुख-सुख सब साझा थे। किसी के घर शादी होती तो दूसरे भाइयों के आँगन में भी चूल्हा देर तक जलता। किसी की फसल खराब होती तो दूसरा भाई अनाज दे देता।
भीरू सबसे बड़े थे। वे अक्सर कहा करते थे, “जमीन कम हो तो मेहनत बढ़ा लेना, लेकिन भाइयों के बीच मन की मेड़ ऊँची मत करना। खेत की मेड़ टूटे तो दोबारा बन सकती है, रिश्तों की मेड़ टूट जाए तो पीढ़ियाँ लग जाती हैं।”
लेकिन उन्हें क्या मालूम था कि उनके ही कुनबे में एक ऐसा व्यक्ति प्रवेश कर चुका है, जो जमीन की मेड़ें नहीं, रिश्तों की जड़ें काटने वाला है।
धीरू की सौतेली बेटी अपने विवाह से पहले ही बाप को खो चुकी थी। बाद में विधुर धीरू ने उसी की माँ जगानी से दूसरी शादी कर ली। दूसरी पत्नी जगानी से भी एक बेटी हुई। दोनों बेटियाँ एक ही घर में पली-बढ़ीं, मगर पारिवारिक रिश्तों की उलझनों ने उनके जीवन की दिशाएँ अलग कर दीं। दूसरी पत्नी की बेटी का पति था प्रभुठेकमिया।
प्रभुठेकमिया कलेक्टर कार्यालय में काम करता था। सरकारी दफ्तरों की भाषा, दस्तावेजों की बारीकियाँ और अधिकारियों की कार्यप्रणाली वह अच्छी तरह जानता था। उसकी नौकरी ने उसे सेवा का अवसर दिया था, लेकिन उसने उसे छल का औजार बना लिया था।
पहले वह छोटी-मोटी घूस लेकर काम करता था। फिर उसे लगने लगा कि ईमानदारी से कमाई गई तनख्वाह में वह वैभव नहीं मिल सकता, जिसका सपना उसने देख रखा था।
एक दिन उसने अपने ससुर धीरू से कहा, “बाबूजी, आदमी जिंदगी भर दूसरों का भला करता रहे तो अंत में उसके हाथ क्या आता है? जिसके पास जमीन है, उसी की इज्जत है। आपके पास मौका है, अपनी हालत सुधार लीजिए।”
धीरू ने पूछा, “कैसा मौका?”
“आपके भाइयों के पास जमीन है। परिवार की जमीन परिवार में ही रहे, तो इसमें बुराई क्या है? कागज-पत्तर का काम मैं करवा दूँगा। आपको किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।”
धीरू असमंजस में पड़ गए।
“लेकिन वह जमीन मेरे भाइयों की है। उनके बच्चों का भी तो हक है।”
प्रभुठेकमिया मुस्कराया, “बाबूजी, हक की बातें गरीब लोग करते हैं। समझदार लोग कागज बनवाते हैं। अदालत में भावनाएँ नहीं, दस्तावेज चलते हैं।”
उस दिन धीरू ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन लालच का बीज उनके मन में पड़ चुका था।
कुछ दिनों बाद प्रभुठेकमिया ने सरकारी अभिलेखों में हेरफेर कराकर फर्जी दस्तावेज तैयार करवाए। कागजों पर ऐसी कहानी लिखी गई, जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं था। जमीन के हस्तांतरण को वैध दिखाने के लिए नाम, हस्ताक्षर और पुराने अभिलेखों का इस्तेमाल किया गया।
धीरे-धीरे भीरू, बीरू और कीरू की जमीन पर भी धीरू का नाम चढ़ गया।
जब तक भाइयों को इस धोखाधड़ी की भनक लगी, तब तक सरकारी कागजों में उनकी अपनी जमीन पर उनका ही अधिकार संदिग्ध बना दिया गया था।
भीरू ने दस्तावेज देखे तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।
“धीरू! यह क्या है? हमारी जमीन तुम्हारे नाम कैसे हो गई?”
धीरू की आँखें झुक गईं। वे कुछ बोलना चाहते थे, मगर शब्द गले में अटक गए।
भीरू ने उनका कंधा पकड़ लिया।
“छोटे भाई, जमीन चली जाए तो आदमी फिर भी मेहनत करके जी सकता है। लेकिन अपने ही भाई की आँखों में धूल झोंककर तुम किस मुँह से जीओगे?”
धीरू रो पड़े। “भैया, मुझसे गलती हो गई।”
“गलती खेत में हल चलाते समय होती है, धीरू! किसी का हक छीनने की योजना गलती नहीं, बेईमानी होती है।”
तभी प्रभुठेकमिया बीच में आ गया।
“बड़े बाबूजी, आप बेकार में भावुक हो रहे हैं। कागज हमारे पास हैं। जो कहना है, अदालत में कहिए।”
भीरू ने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा, “बेटा, कागज पर कब्जा किया जा सकता है, सच पर नहीं। याद रखना, झूठ की उम्र उतनी ही होती है, जितनी देर तक सच बोलने वाला चुप रहता है।”
प्रभुठेकमिया हँस पड़ा।
“आप बूढ़े लोग दुनिया को अपने जमाने की नजर से देखते हैं। आजकल सच वही है, जो फाइल में दर्ज है।”
भीरू ने उसी दिन फैसला कर लिया कि वे अपने भाइयों का हक वापस लेकर रहेंगे।
भीरू ने तहसील से लेकर कलेक्टर कार्यालय तक शिकायतें कीं। वकील से सलाह ली। पुराने खसरे, खतौनी और जमीन के बँटवारे से जुड़े प्रमाण जुटाए। लेकिन जिस व्यवस्था में प्रभुठेकमिया की पहुँच थी, वहाँ हर दरवाजा एक नई अड़चन लेकर खुलता था।
कभी कहा जाता कि दस्तावेज अधूरे हैं, कभी पुराने अभिलेख नहीं मिलते। कभी अगली तारीख दे दी जाती, तो कभी फाइल ही गायब हो जाती।
एक दिन बीरू ने झुंझलाकर कहा, “भैया, गरीब आदमी न्याय माँगने निकलता है तो उसकी जेब खाली होती है और सामने वाले की पहुँच लंबी। हम कब तक लड़ेंगे?”
भीरू ने जवाब दिया, “जब तक साँस है, तब तक लड़ेंगे। जमीन का मुकदमा सिर्फ जमीन का नहीं है। आज हम चुप हो गए तो कल हमारे बच्चे पूछेंगे कि उनका हक किसने छीना और उनके बाप-दादा क्या करते रहे।”
कीरू पहले ही भयभीत थे। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “भैया, मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं। मैं दुश्मनी नहीं पाल सकता। जो होना था, हो गया। जान बची है तो सब कुछ है।”
भीरू ने दुखी होकर कहा, “जान बचाना जरूरी है, कीरू। मगर डर के कारण अन्याय को स्वीकार कर लेना भी क्या जीना है?”
कीरू चुप हो गए। उन्हें अपने बच्चों का भविष्य दिखाई दे रहा था और भीरू को अपने परिवार का छिना हुआ अधिकार।
इसी बीच भीरू को धमकियाँ मिलने लगीं।
एक शाम घर लौटते समय उन्होंने पत्नी से कहा, “लगता है, अब उन्हें मेरी साँसें भी खटकने लगी हैं।” 
पत्नी घबरा गईं। “मुकदमा छोड़ दीजिए। जमीन फिर कभी मिल जाएगी, लेकिन आप नहीं रहे तो हम किसके सहारे जिएँगे?”
भीरू ने उदास स्वर में कहा, “अगर मैं डरकर पीछे हट गया, तो मेरे बाद मेरे बच्चे भी डरना सीखेंगे। मैं उन्हें जमीन से पहले रीढ़ की विरासत देना चाहता हूँ।”
कुछ समय बाद भीरू की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। गाँव में तरह-तरह की चर्चाएँ हुईं। परिवार ने हत्या की आशंका जताई और प्रभुठेकमिया के लोगों पर संदेह किया, लेकिन ठोस सबूत सामने नहीं आ सके। मामला आरोपों, आशंकाओं और अधूरी जाँच के बीच उलझकर रह गया।
भीरू की मृत्यु ने पूरे परिवार को भीतर तक तोड़ दिया।
बीरू ने कुछ दिनों तक लड़ाई जारी रखी। फिर उन्हें भी धमकियाँ मिलीं। बच्चों की सुरक्षा का भय उनके साहस पर भारी पड़ने लगा। उन्होंने मुकदमे से दूरी बना ली।
कीरू ने तो पहले ही हथियार डाल दिए थे।
धीरे-धीरे गाँव में इस मामले पर बोलना बंद हो गया। लोग जानते थे कि अन्याय हुआ है, मगर हर व्यक्ति को अपनी जान, अपना परिवार और अपनी रोजी-रोटी प्यारी थी।
प्रभुठेकमिया की जीत होती दिखाई देने लगी।
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई थी।
जमीन के कागज अपने नाम करवाने के बाद प्रभुठेकमिया को लगा कि अब कोई उसे चुनौती नहीं दे सकेगा। मगर उसके लालच की कोई सीमा नहीं थी।
धीरू अपनी गलती के बोझ से टूटने लगे थे। जिस जमीन को पाने के लिए उन्होंने भाइयों का विश्वास खोया था, उसी जमीन पर खड़े होकर उन्हें अपने बड़े भाई का चेहरा याद आता, जिसकी हत्या को उन्होंने और उनके सौतेले दमाद प्रभुठेकमियाँ ने आत्महत्या घोषित करवा दिया था,पुलिस क़ानून सब लाचार हो गए थे l
एक दिन उन्होंने प्रभुठेकमिया से कहा, “बेटा, मेरे हिस्से की जमीन रखो, लेकिन भाइयों का हक लौटा दो। मैं अब यह बोझ नहीं उठा सकता।”
प्रभुठेकमिया का चेहरा कठोर हो गया।
“बाबूजी, अब पीछे लौटने का कोई रास्ता नहीं है। कागज बन चुके हैं। आप शांत रहिए।”भीरू की हत्या जिस तरह आत्महत्या हो गयी उससे अलग बीरु को जमीन में गड़वा दूंगा किसी को पता ही नहीं चलेगा कहाँ गया बीरु, तुम चिंता मत करो l
“लेकिन यह जमीन मेरे भाइयों की है। भीरू की मौत के बाद से मैं सो नहीं पाया हूँ। उसकी आवाज आज भी मेरे कानों में गूँजती है।”
“मरे हुए लोग वापस नहीं आते,” प्रभुठेकमिया ने बेरुखी से कहा, “और जमीन भावनाओं से वापस नहीं होती।”
धीरू की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैंने तुझे दामाद समझा था, तूने मुझे अपने अपराध का औजार बना लिया।”
प्रभुठेकमिया ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसके लिए अब रिश्तों का अर्थ सिर्फ उपयोग था।
कुछ समय बाद धीरू बीमार पड़ गए। अपराधबोध और मानसिक तनाव ने उन्हें बिस्तर पर ला दिया। वे बार-बार भीरू का नाम लेते और कहते, “भैया, मुझे माफ कर देना। मैंने तुम्हारा विश्वास बेच दिया।”
उनकी बेटी, जो धीरू की असली बेटी  थी, भूमिहीन मज़दूरों जैसी दूसरों के खेतों में मजदूरी करके अपना जीवन चलाने लगी। जिस परिवार में कभी दो एकड़ जमीन का सहारा था, वहाँ अब रोज की रोटी के लिए दूसरों के खेतों में पसीना बहाना पड़ता था।
एक दिन वह तहसील पहुँची। उसके हाथ में पुराने कागज थे और आँखों में उम्मीद की आखिरी लौ।
उसने अधिकारी से कहा, “साहब, मेरे पिता की जमीन के मामले में बेईमानी हुई है। मेरे चाचा की जमीन भी धोखे से हड़पी गई। आप अभिलेख जाँच लीजिए।”
अधिकारी ने फाइल पर नजर डालकर कहा, “मामला पुराना है। पहले प्रमाण जुटाइए, फिर आवेदन दीजिए।”
वह बोली, “साहब, प्रमाण जुटाने के लिए ही तो आई हूँ। जिनके पास पैसा है, वे कागज बदलवा देते हैं। हमारे पास सच है, लेकिन सच साबित करने के लिए भी पैसा चाहिए।”
अधिकारी ने नजरें फेर लीं।
वह बाहर निकली तो उसकी आँखें नम थीं। उसने आसमान की ओर देखा और बुदबुदाई, “हे भगवान, क्या गरीब का हक भी अमीर की फाइल में बंद होकर रह जाएगा?”
वर्ष बीतते गए। प्रभुठेकमिया ने संपत्ति तो जुटा ली, मगर अपने आसपास विश्वास का एक भी ऐसा रिश्ता नहीं बचाया, जिस पर निश्चिंत होकर सिर रख सके। उम्र बढ़ी, आँखों की रोशनी चली गई और शरीर कमजोर होकर ठूँठ पेड़ जैसा गया। जिन लोगों के सामने वह कभी रौब जमाता था, वे धीरे-धीरे उससे दूर होते गए।
जिस जमीन को पाने के लिए उसने दूसरों की दुनिया उजाड़ी थी, वही जमीन अब उसके लिए एक बोझिल स्मृति बन गई।
“तो यह है प्रभुठेकमिया की कहानी!” सरोज ने धीमे स्वर में कहा। “लेकिन दिवाकर, क्या अदालत में इसके खिलाफ कुछ साबित नहीं हुआ?”
दिवाकर ने उत्तर दिया, “कुछ शिकायतें हुईं, कुछ जाँचें चलीं, लेकिन परिवार को वह न्याय नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी। जमीन के कागजों में दर्ज नाम बदलना आसान था, मगर पीड़ितों की जिंदगी में हुए नुकसान की भरपाई कौन करता?”
दीक्षा की आँखें बूढ़े प्रभुठेकमिया पर टिकी थीं।
“भाभी, सोचिए! अगर भीरू काका आज जीवित होते तो क्या अपने परिवार की यह दुर्दशा देखकर चुप रहते? और धीरू काका ने अपने लालच की जो कीमत चुकाई, वह भी किसी सजा से कम थी क्या?”
सरोज ने कहा, “लेकिन वह आदमी अब अंधा है, बूढ़ा है। उसके अपराधों का फैसला किए बिना उसे कोसते रहना भी तो ठीक नहीं।”
“मैं उसकी आँखों की रोशनी जाने पर खुश नहीं हूँ, भाभी,” दीक्षा ने गंभीर होकर कहा, “मुझे दुख उस सच का है, जिसे वह अपनी आँखें रहते हुए भी नहीं देख पाया। उसे अपने सामने भाइयों का बिखरता परिवार दिखाई नहीं दिया, अनाथ होते बच्चे दिखाई नहीं दिए, मेहनत-मजदूरी करती वह लड़की दिखाई नहीं दी। अब आँखें नहीं हैं, तो क्या हुआ? देखने के लिए संवेदना भी तो चाहिए।”
दिवाकर ने सहमति में सिर हिलाया।
“किसी मनुष्य का सबसे बड़ा अंधापन आँखों में नहीं, उसके विवेक में होता है।”
इसी बीच बूढ़ा प्रभुठेकमिया अपनी छड़ी टटोलते हुए उठा। वह धीरे-धीरे ठूँठ पेड़ की जड़ों के पास पहुँचा और वहीं बैठ गया।
उसने पेड़ के सूखे तने पर हाथ फेरा। फिर बुदबुदाया, “तू भी मेरे जैसा ही है। कभी हरा-भरा रहा होगा। अब न पत्ते हैं, न छाँव।”
दीक्षा ने धीरे से कहा, “देखिए भैया, अपने लिए इसे भी ठूँठ पेड़ में अपना अतीत दिखाई दे रहा है।”
दिवाकर बोले, “शायद अब इसे समझ में आ रहा है कि दूसरों की जड़ें काटने वाला आखिरकार खुद भी अकेला रह जाता है।”
तभी दूर से एक मजदूर महिला अपनी छोटी बेटी का हाथ पकड़े गुजरती दिखाई दी। वह थकी हुई थी। उसके कपड़े धूल से भरे थे। उसने बूढ़े की ओर देखा, लेकिन पहचानने पर भी पास नहीं गई।
प्रभुठेकमिया ने उसकी आहट सुनकर पूछा, “कौन है?”
महिला ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह आगे बढ़ गई।
कुछ कदम बाद उसकी बेटी ने पूछा, “अम्मा, वह बूढ़ा कौन था? तुमने उसे देखकर बात क्यों नहीं की?”
महिला कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “बेटी, हर बूढ़ा सम्मान का अधिकारी होता है, लेकिन हर बूढ़े के कर्म सम्मान के योग्य नहीं होते। हमें किसी से नफरत नहीं करनी चाहिए, मगर अपने साथ हुए अन्याय को भूलना भी नहीं चाहिए।”
प्रभुठेकमिया ने शायद उसके शब्द सुन लिए थे। उसका चेहरा काँपने लगा। उसने छड़ी कसकर पकड़ ली।
उसके होंठ हिले, “मैंने क्या पाया? जमीन... मकान... पैसा... और आखिर में यह अंधेरा!”
दीक्षा ने उसकी ओर देखा। पहली बार उसे उस चेहरे पर केवल अपराधी नहीं, अपने कर्मों के मलबे में दबा एक बूढ़ा मनुष्य भी दिखाई दिया।
“भैया,” उसने धीमे स्वर में कहा, “क्या पता, इसे अपने किए का पछतावा हो रहा हो।”
दिवाकर ने कहा, “पछतावा तभी सार्थक होता है, जब आदमी अपने अपराध को स्वीकार करे और जहाँ तक संभव हो, उसका प्रायश्चित करे। मन ही मन दुखी होने से किसी का छीना हुआ हक वापस नहीं आता।”
सरोज ने पूछा, “अगर यह सचमुच पछता रहा है, तो क्या इसे क्षमा नहीं मिलनी चाहिए?”
दिवाकर कुछ क्षण मौन रहे।
“क्षमा और न्याय एक ही चीज नहीं हैं, सरोज। किसी को क्षमा करना पीड़ित का अधिकार हो सकता है, लेकिन अपराध की जवाबदेही समाप्त कर देना समाज का अधिकार नहीं। पछतावा जरूरी है, पर न्याय भी उतना ही जरूरी है।”
बूढ़ा अब भी ठूँठ पेड़ के पास बैठा था। उसकी उँगलियाँ सूखी छाल पर घूम रही थीं, जैसे वह उस पेड़ में अपना भविष्य टटोल रहा हो।
दीक्षा ने कहा, “भैया, आदमी की अदालत से तो यह बच गया, लेकिन क्या परमात्मा की अदालत से भी बच पाएगा?”
दिवाकर ने दूर तक फैले आकाश की ओर देखा।
“परमात्मा की अदालत कहाँ लगती है, यह मैं नहीं जानता। इतना जरूर जानता हूँ कि मनुष्य कानून की आँखों में धूल झोंक सकता है, इतिहास के पन्नों में अपना नाम छिपा सकता है, लेकिन अपने कर्मों के परिणाम से पूरी तरह नहीं बच सकता। जिन रिश्तों को वह तोड़ता है, जिन जिंदगियों को उजाड़ता है, उनकी गूँज कभी-कभी उसकी अपनी खामोशी में लौट आती है।”
सरोज ने कहा, “काश, प्रभुठेकमिया ने समय रहते यह समझ लिया होता कि जमीन का मालिक बनना और मनुष्य बने रहना दो अलग-अलग बातें हैं।”
दिवाकर ने गहरी साँस ली।
“जिस दिन लालच रिश्तों से बड़ा हो जाता है, उसी दिन मनुष्य अपने भीतर के न्यायाधीश को मार देता है। फिर बाहर की अदालत से बच भी जाए, तो भीतर की अदालत से कैसे बचेगा?”
तीनों कुछ देर चुप रहे।
सूरज ढल रहा था। ठूँठ पेड़ की लंबी परछाईं जमीन पर फैलती जा रही थी। उसके नीचे बैठा अंधा बूढ़ा उस अँधेरे को देख नहीं सकता था, लेकिन शायद पहली बार अपने जीवन के अँधेरे को महसूस कर रहा था।
दीक्षा ने जाते-जाते एक बार पीछे मुड़कर देखा।
“भैया, यह सिर्फ भीरू काका का कातिल नहीं है। इसने पूरे कुनबे का विश्वास, भविष्य और सुख छीन लिया। जमीन पर कब्जा करने के लिए इसने रिश्तों की हत्या की।”
दिवाकर ने धीमे मगर दृढ़ स्वर में कहा—
“हाँ, दीक्षा! किसी का हक छीनना केवल जमीन छीनना नहीं होता। कभी-कभी उससे पूरा कुनबा उजड़ जाता है। और याद रखना, कानून की अदालत में फैसला देर से हो सकता है, अधूरा भी रह सकता है; मगर मनुष्य को अपने कर्मों का हिसाब देने से बचने का कोई आसान रास्ता नहीं मिलता।”
वे आगे बढ़ गए।
पीछे ठूँठ पेड़ खड़ा था—बिना पत्तों, बिना छाँव, बिना हरियाली के।
और उसके नीचे बैठा प्रभुठेकमिया अपनी अंधी आँखों के साथ उस सच के सामने अकेला था, जिसे देखने से वह जीवन भर बचता रहा था।
जमीन पर कब्जा करके वह मालिक तो बन गया था, लेकिन इंसानियत की अदालत में अपना सब कुछ हार चुका था।
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