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Dr. Srimati Tara Singh
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दुखान्त यात्रा

 

दुखान्त यात्रा

 रेल बड़ी मुश्किल से सरक रही थी, रेल न रफ्तार पकड़ रही थी नहीं मंदगति  चल चल भी नहीं थी बस रेंग रही थी l विजयबाबू  का गाँव रेलवे स्टेशन से 80 किलोमीटर से अधिक दूर था,देर से रेल के पहुँचने पर रेलवे स्टेशन से गाँव तक पहुंचने के लिए साधन मिलना मुश्किल हो जाता था, रेलवे स्टेशन से गाँव पहुंचना और गाँव से स्टेशन मुश्किल भरा सफ़र होता था l

शहर जाने के लिए  रेल के निर्धारित समय से पांच घंटा पहले गाँव छोड़ना पड़ता था, अस्सी किलोमीटर की यात्रा जीप या बस से तय करने में आधा दिन लग जाता था l विजय बाबू की माँ तीन टाइम का खाना अलग-अलग पोटली में बांध कर देती थी, गुड़, चना-भुजैना की एक अलग मोटरी, इसके अलावा तिसी,सरसों,राई और बहुत कुछ की गठरी माँ खुद बांध देती थी l 

मना  करने पर माँ कहती, ये चीजें शहर में कहाँ मिलती है? कहाँ सिर पर रखकर ले  जाना है-जीप, बस और फिर रेल में रखकर ले  जाना है l आख़िरकार माँ की बात मानना ही पड़ता था l

लम्बी जदोजहद और  भागदौड़ के बाद विजय बाबू स्टेशन पहुँचे तो मालूम हुआ की रेल पटना से  चार घंटा देर से चली है, जो रेल पटना से बम्बई जाने वाली थी, इसी रेल में विजयबाबू की टिकट थी l

एक समय था जब बिहार से आने वाली रेलों के विषय में कहा जाता था कि बिहार से आने वाली  रेलें कभी समय पर नहीं आती हैl

विजयबाबू की रेल यात्रा बनारस से शुरू होकर खंडवा में समाप्त होने वाली  थीl यह रेल  पटना से शुरू होकर बम्बई तक सफर कराती  थी l रेल तो लेट थी प्लेटफॉर्म पर आते  ही अफरा-तफरी मच गयी l रेल में गर्दिश तो भयंकर होती थी l कई बार तो दूसरों की  रिज़र्व सीट पर लोग कब्जा जमा लेते थे l 

एक ऐसा ही हादसा विजयबाबू साथ हो चुका था, जब विजयबाबू सपरिवार खंडवा से बनारस जाने के यात्रा कर रहे थे,यह ट्रेन  बम्बई  से पटना जा रही थी, इसी रेल में  छः सीट रिज़र्व थीl विजयबाबू  की सीटों पर  कब्जा जमाये  लोग उनके परिवार के जिनके नाम सीट आरक्षित थी, उन्हें ही  नहीं बैठने दे रहे l

शोहदे किस्म के ये यात्री और उनके साथ सफर कर रही महिलाएं, सामान तक सीट के नीचे नहीं रखने दे रही थी, वे लोग बार-बार सामान उठाकर फेंकने की कोशिश कर रहे थे l न तो टी टी दिखाई दे रहा था न रेलवे पुलिस का कोई, उन बदमाश किस्म के लोगों ने आरक्षित सीट को कबाड़ का जैसे गोदाम बना रखा था l ये शोहदे लोग विजयबाबू को रेल से बाहर फेंकने की धमकी दे रहे थे l

विजयबाबू के छोटे-छोटे बच्चे रो रहे थे, शोहदे लोग सीट खाली करने को तैयार न थे, उपर से रेल से बाहर फेंकने की धमकी दे रहे थे lऔरतें तो और तेज तरार थी, दादागिरी की हद पार हो रही थी, डिब्बा खचाखच भरा हुआ था, कुछ महीने का छोटा बेटा सौरभ विजयबाबू की पत्नी नमिता की गोद में लिए खड़ी थी, छोटे बेटे औरव को गोद में लिए खड़ी थी बेटा सौरव मम्मी का हाथ थामे खड़े-खडे रो रहे थे l

आठ साल की बड़ी बिटिया खुशबू  विजयबाबू से लिपट कर  रो रही थी,  उसे डर लग रहा था कि बदमाश उसके पापा को ट्रेन से बाहर फेंक देंगे l  बदमाशों ने सीट  पर कब्जा करने के लिए ऎसा  माहौल ही बना दिया था ताकि विजयबाबू और उनके परिजन डर अपनी आरक्षित बदमाशों के लिए छोड़ दें l

विजयबाबू के परिजन बड़ी मुश्किल से तीन सीट पर बैठकर खंडवा से बनारस तक  की यात्रा पूरी किया था l इस जोखिम भरी यात्रा में सामान भी चोरी हो गया था,पत्नी नमिता के कान की बाला शोहदे यात्रियों  के गुट की किसी महिला ने खींच लिया था परन्तु वाराणसी से खंडवा की एक  यात्रा में विजयबाबू को छुआछूत का सामना करना पड़ा था l

इस रेल यात्रा में विजयबाबू की सीट रेल डिब्बे  के गेट के ठीक सामने थी l मई का महीना था,गर्मी बहुत थी,गेट के सामने बैठे यात्रियों को हवा का झोंका राहत दे देता था,सेकंड क्लास के डिब्बे में भीड़ तो जनरल डिब्बे जैसी थी, पैसेंजर नीचे भी बैठे हुए थे,तीन-तीन सीट की सीट पर छः-छः लोग बैठे हुए थे l 

रेल सीटी बजाती हुई इलाहबाद त्रिवेणी संगम पार की ही थी कि एक  लुंगी- बनियानधारी बड़ी सी तोंदवाला, माथे पर चौड़ा सा लाल  टीका लगाए,कंधे से कमर के नीचे तक मोटा धागा लटकाये,लम्बा-चौड़ा जैसा आया आदमी आया l 

वह आदमी हाफते हुए बोला बाबू थोड़ा जगह दे दो, बहुत गर्मी लग रही है, तीन आदमी के बैठने की जगह थी पाँच पहले से बैठे थे l वह भैंसे जैसा मोटा आदमी एकदम धम से सीट पर बैठ गया, दो लोग तो सीट से अगल-बगल गिर पड़े थे l 

रेल अब सरपट भाग रही थी, कुछ देर बाद वह मोटा आदमी हवा के झोंको से जब राहत लेकर,विषैली डकार छोड़ा तनिक अधिक राहत महसूस किया,आसपास के लोग नाक पर हाथ रख लिएl रेल बहुत स्पीड  से भाग रही थी l

कुछ यात्री, उस मोटे यात्री को घूर-घूर कर देख रहे थे पर वह सबसे बेखबर थाl

कुछ देर कुछ मंत्र का जाप किया, फिर विजयबाबू की तरफ देखते हुए पूछा-

बाबूसाहेब कहाँ के रहने वाले  हो?

विजयबाबू बोले-आज़मगढ़ से l

वह व्यक्ति दोहराया आज़मगढ़ से l

विजयबाबू-हाँ आज़मगढ़ से l   

तोंद वाला  व्यक्ति बोला- वहां के मेरे कई जजमान हैं l मैं बनारस से एक जजमान की कार से भदोही गया था l वहां पूजापाठ किया,भोजन प्रसादी लेकर बम्बई जा रहा हूँ l बम्बई में बेटा लोग तबेला  का  कारोबार कर है l

मोटा व्यक्ति बोला -बाबूसाहेब बम्बई चल रहे हैं? 

विजयबाबू बोले - नहीं l 

वह व्यक्ति सवाल पर सवाल पूछे जा रहा था, उत्तर-प्रदेश और बिहार के लोगों की आदत होती है, जब तक जाति  का पता नहीं कर लेंगे, न तो चैन से बैठेंगे और न तो बैठने देंगेl यहां  के लोगों को बस अपनी जाति-कौम के लोग पसंद आते हैं l उस आदमी को भी जाति  जानने की खुजली थी l

वह चुप रहने के मूड में तनिक भी नहीं था,फिर पूछा कहाँ जा रहे हो, बाबूसाहेब कोई दक्षिणा तो नहीं लूंगा l

विजयबाबू बोले -खंडवा जाऊंगा, अब चैन से  बैठने दीजिये l

पालथी मारे पसरा वह व्यक्ति बोला-नाराज क्यों हो रहे बाबूसाहेब?

विजयबाबू बोले-खंडवा से इंदौर जाऊंगा l

तोंद वाला व्यक्ति पूछा- इंदौर घूमने जा रहे हो क्या?

विजयबाबू का सिर दर्द से फटा जा रहा था, उस व्यक्ति पर  गुस्सा तो बहुत आ रहा था वह था कि चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था l 

विजयबाबू बोले-नौकरी करता हूँ l

वह बोला- बाबूसाहेब नौकरी करने की क्या जरुरत पड़ गयी l बाप-दादा की जमींदारी संभालते,दस-पांच मज़दूर रख लेते, पुरखों के रुतबे में ऐशो-आराम की ज़िन्दगी जीते l

विजय बाबू बोले-आपकी भी तो बड़ी कास्तकारी होगी l

वह व्यक्ति बोला-सब काम मजदूर करते हैं l

विजयबाबू बोले-मेरी कोई जमींदारी नहीं है, आपकी बड़ी कास्तकारी और आपके बेटा लोग बम्बई में गोबर फेंकने का काम कर रहे हैं, उनसे क्यों नहीं कहते शहर में गोबर फेंकने की बजाय कास्तकारी  संभाले l अब चुपचाप बैठिये नहीं तो अपनी सीट पर जाइये वही कथा सुनाइए, कोई सुने तो? 

वह बोला लगता है क्षत्रिय का खून उबाल मार रहा  है l कौन से क्षत्रिय हो?

विजयबाबू बोले - सूर्यवंशी?

अच्छा चमार हो l रैदास हो, वह  तनिक उग्र होकर बोला था, आसपास के यात्री कान लगाए हुए थे l

विजयबाबू बोले -हाँ चमार हूँ -रविदासी अब उठो,भागो यहां से अपनी सीट पर जाओ l

वह बोला -तेवर तो चमारों वाला ही है  l

विजयबाबू बोले -अरे परजीवी ढोंगी कैसे बताऊं........हाँ चमार हूँ l 

वह मोटा व्यक्ति बोला -हे राम, अपवित्र हो गया, कहते हुए उठा अपने लोटे में पानी लेकर आया,दरवाज़े के सामने पानी का छिंटा खुद पर मारकर  पवित्र होकर जैसे ही आगे बढ़ा कोई यात्री बोला- ये  परजीवी देश  और समाज को दीमक की तरह सदियों से खाये जा रहे हैं, ये परजीवी और ना जाने कब तक खाते रहेंगे? 

वह शैतान जैसा व्यक्ति बोला-हंस के रूप में कौवे? वह जब विजयबाबू के सामने से आते-जाते  समय कहता,रामजी धर्म बचानाl ना जाने रामराज कब आएगा l

विजय बाबू बोले-परजीवी आदमी मेरी सीट गंदी  कर दिया,उपर से ढकोसला कर रहा है l

तोंद वाला कंधे पर लटकाये मोटा धागा हाथ से ऐंठते हुए बोला-मैं श्राप दे दूंगा l

विजय बाबू बोले-तोंदू मैं तुम्हें श्राप देता हूँ,तुम आदमियत के धर्म का पालन करना l

इतने में कोई यात्री जोर से बोला-परजीवी बाबा देश को रामराज की नहीं संतशिरोमणि जगतगुरू रविदासजी के बेगमपुरा की जरूरत है l

वह मोटा आदमी गुसियाया तो पर उग्र नहीं हुआ, तोंद पर हाथ फेरते हुए अपनी सीट पर सिमट गया l

दूसरे दिन रेल काफी देर से खंडवा पहुंची थी, खंडवा से बस की यात्रा ठीकठाक थी, इंदौर पहुँचते बारिस हो गयीl कोई साधन नहीं मिल रहा थाl एक ऑटोरिक्शा मिला,  दो सौ रूपये में रिज़र्व हुआ,जबकि उस वक्त स्टेशन से विजयबाबू के घर तक ऑटो रिज़र्व करने पर  अधिकतम  किराया पचास रूपये था l

ऑटो चला, उसे रास्ते में जितनी सवारी मिली, सबको बैठाता, उतारता गया l ड्राइवर सीट पर एक तरफ विजयबाबू को बैठना पड़ा l विजयबाबू खुद भींग गए,माँ की दी गठरी-मोटरी का  सामान भींग गया l

बदमाश ऑटो वाला आखिर में विजयबाबू को उनके क्वार्टर से  दूर एक आटा चक्की के सामने जबरदस्ती उतारने लगा l

विजयबाबू बोले-घर तक तो छोड़ो l

ऑटो ड्राइवर बोला- किराये के दो सौ रूपये दे दो और रिक्शा से उतर जाओ l 

विजय बाबू बोले-तुम मुझे लूट रहे रहो?

ऑटो ड्राइवर बोला-हाँ.....रिक्शा अब आगे नहीं जायेगा तो नहीं जायेगा l

विजय बाबू बोले- ऎसा क्यों? मैंने तो घर तक के लिए  रिज़र्व किया था,रास्ते भर की सवारी बैठाकर घूम-घूम कर घर-घर छोड़ने के लिए नहीं l आखिर में दो  सौ रुपये छिनकर सुनसान सड़क पर जबरदस्ती उतार रहे हो, ये कौन सा  क़ानून है l 

ऑटो ड्राइवर-मेरा क़ानून है lरूपये  दे रहे हो कि नहीं कहते रॉड निकाल लिया l

विजय बाबू बोले-सौ नम्बर डायल करता हूँ कहते हुए फोन हाथ में लिए ही थे कि

ऑटो ड्राइवर बोला-पुलिस थाना जेब में रखता हूँ l

विजयबाबू बोले-जिस दिन पुलिस के चंगुल में फंस जाओगे, बर्बाद हो जाओगे, जितनी गुंडई कर रहे हो इतनी गुंडई तो इस शहर में कभी नहीं थी l

ऑटो ड्राइवर बोला-गुंडई दिखा दूंगा तो थाह-पता नहीं चलेगा, कहाँ से आए कहाँ चले गए l

विजयबाबू बोले- मैंने  रिक्शा रिज़र्व किया, तुमने पूरे रास्ते में पंद्रह सवारी बिठाये,उतारे, अब तुम मुझे से दूर रात के अंधेरे मुझे लूट रहे हो l 

विवाद बढ़ने लगा,ऑटो वाला बदतमीज़ी करने लगा l रात के एक बज रहे थे, बदमाश ड्राइवर और विजयबाबू चिल्लाचोट सुनकर चक्की वाले काका बाहर आए l विजयबाबू को पहचान कर बोले- विजय बाबू आप?

विजयबाबू बोले-हाँ काका मैं l

काका बोले- इतनी रात को कहाँ से आ रहे हो?

विजयबाबू बोले- गाँव से आ रहा हूँ l रेल बहुत लेट पहुंची थी l दो घंटे से मुझे ये  सवारियों के घर-घर घूमा कर घर से दूर जबरदस्ती उतार रहा l रिज़र्व रिक्शा मैं और मेरा सारा सामान भी भींग गया,अब ये जबरिया  लूट रहा है, मारने के लिए रॉड दिखा रहा है l

पूरी दास्तान सुनकर काका रिक्शा वाले से बोले-तुम रिक्शा चलाते हो या कोई गिरोह l शहर का नाम क्यों खराब कर रहे हो, बीस मिनट के सफर में तुमने दो घंटे लगा दिया, नया आदमी जानकर लूट रहे हो रात के अंधेरे शर्म-लाज है की नहीं? 

विजयबाबू-मारो दो सौ रूपये लुटेरे के मुंह पर, जाओ आराम करो,डेढ़ बजने वाले हैंl 

भूल जाओ कोई लुटेरा रिक्शावाला मिला था, ये सब छोड़ो,अच्छा ये बताओ यात्रा कैसी रही?

विजयबाबू बोले - काका दुखान्तl

उस डरावनी रात  में जब ऑटोरिक्शा वाले ने जबरिया दो सौ रुपये झपटे, विजयबाबू ने चक्की वाले काका के कहने पर चुपचाप रूपये दे दिये l 

विजयबाबू गठरी-मोटरी लेकर घर पहुंचे तो नमिता इंतजार में बैठी थी,इंतजार कर बच्चे सो गए थे l विजयबाबू हैरान -परेशान धम से पलंग पर गिर पड़े l

नमिता बोली -क्या हुआ दुःखी क्यों हो?

विजयबाबू बोले- माँ की तबियत ठीक है, पिताजी भी ठीक है, गाँव में सब कुछ ठीक है पर यात्रा में भी लोग जाति सूंघ लेते हैं l

नमिता बोली-ऎसा कब तक इस देश में होता रहेगा l अब नमिता की आँखों में आँसू उतरने लगे थे, जबकि एक रेल यात्रा में बाला ही नहीं, भरोसा भी छीन गया था l

विजयबाबू से नींद कोसों दूर थी, उनकी  मन में  सवाल ज्वालामुखी की तरह उठ रहे थे l 

वे सोच रहे the “हमने कोई अपराध तो नहीं किया था… फिर हर मोड़ पर सज़ा क्यों?”जाति के नाम पर अपमान क्यों?

विजयबाबू की रात करवटो में गुजरी पर वे  सुबह जल्दी उठे और लेखनी उठा लिए l

विजय बाबू ने उस यात्रा के बारे में लिखा—

रेल की बोगी में सीट पर जबरिया कब्जा और हाथपाई के लिए संवेदना की कमी लिखा l

छुआछूत के लिए मानवता की हत्या लिखा।

ऑटो वाले की लूट में गरीबी नहीं, संस्कारों का दिवालियापन लिखा।

उन्होंने बच्चों को पास बिठाया और कहा—

“अगर कभी तुम्हें ताक़त मिले, तो शोहदापन नहीं चुनना।

अगर कभी डर लगे, तो अन्याय नहीं करना।

और अगर कभी अपमान सहना पड़े, तो उसे चुप्पी नहीं बनने देना—उसे बदलाव बनाना।”

नमिता ने अपने टूटे हुए बाले की जगह दूसरा बाला कभी नहीं पहनी ।

वह बोली—

“यह निशान हमें याद दिलाएगा कि आदमी होना, सिर्फ़ ज़िंदा रहना नहीं होता।”

विजयबाबू समझ गए—

यह यात्रा रेल से खंडवा से बनारस अथवा बनारस से खंडवा  तक की नहीं थी, यह समाज की गिरती आदमियत की यात्रा थी।

और इस यात्रा का अंत रोना नहीं, जगाना होना चाहिए।

उस दिन से विजयबाबू जहाँ भी बैठे, जब भी सुने—

उन्होंने चुप रहना छोड़ दिया, लिखना शुरू कर दिया l

नन्दलाल भारती

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