II डिजिटल युग में मौलिक लेखन की प्रासंगिकता /नन्दलाल भारती ll
दुनिया डिजिटल युग की तरफ तेजी बढ़ रही है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), ब्लॉग, ई-पुस्तकें और ऑनलाइन मंचों ने लेखन की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है।
वर्तमान में कोई भी व्यक्ति कुछ ही क्षणों में अपने विचारों की दुनिया तक पहुँचा सकता है। डिजिटल युग जितना सुविधाजनक उतना ही क्रांतिकारी है, उतनी ही बड़ी चुनौतियाँ डिजिटल युग लेकर आया है। डिजिटल चुनौती का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है— मौलिक लेखन की प्रासंगिकता।
मौलिक लेखन का मतलब सिर्फ नया लिखना ही नहीं है, बल्कि अपने अनुभव, चिंतन, संवेदना और वैचारिक ईमानदारी के साथ लिखना भी है। डिजिटल माध्यमों पर जानकारी की बाढ़ ने लेखन को आसान बना दिया है,परंतु उसी अनुपात में नकल, साहित्यिक चोरी और कृत्रिमता भी बढ़ी है। इस परिवर्तनकारी डिजिटल युग में भी मौलिक लेखन ही साहित्य, समाज और मानवता-समानता की असली पहचान बनकर उभरता है।
मौलिक लेखन- विचारों की स्वतंत्रता का स्तम्भ है,लेखक की स्वतंत्र सोच और रचनात्मक क्षमता का परिचायक भी होता है। लेखक जब अपने अनुभवों और संवेदनाओं के आधार पर लिखता है, तभी उसका लेखन समाज को नई दिशा दे सकता है। यह सच जिन लेखकों ने समय की सच्चाइयों को ईमानदारी से कागज पर उकेरा है वही लेखक अमर हुए, है समय ने उनको सम्मानित किया हैl ऐसे अनेक साहित्यकार हुए हैं जिन्हें जीवनकाल में उपेक्षा, गरीबी, असफलता या सीमित पहचान मिली, लेकिन मृत्यु के बाद उनकी रचनाएँ विश्व साहित्य की धरोहर बन गईं। कुछ प्रमुख साहित्यकार इसके उदाहरण हैं—
1.चेक गणराज्य के फ्रांज काफ्का को जीते जी बहुत कम प्रसिद्धि मिली थी परन्तु मृत्यु के बाद उनके उपन्यास The Trial and The Metamorphosis ने उन्हें आधुनिक साहित्य का महान लेखक बना दिया।
2. संयुक्त राज्य अमेरिका की एमिली डिकिन्सन,के जीवनकाल जीवित में उनकी बहुत कम कविताएँ प्रकाशित हुईं थी लेकिन मृत्यु के बाद उनकी हजारों कविताएँ मिलीं, जो दुनिया की महान कवयित्रियों में गिनी जाती हैं l
3-संयुक्त राज्य अमेरिका के ही एडगर एलन पो ने अपने जीवन में आर्थिक संघर्ष झेला। मृत्यु के बाद वही एडगर एलन रहस्य और भय साहित्य के जनक के रूप में अमर हो गए l
4. देश: यूनाइटेड किंगडम के जॉन कीट्स की कम उम्र में मृत्यु हो गयी थी, उन्हें जीवनकाल में बहुत आलोचना मिली, पर बाद में वे अंग्रेज़ी रोमांटिक कविता के महान स्तंभ के रूप में प्रसिद्ध हुए l
5. हेनरी डेविड थोरो, संयुक्त राज्य अमेरिका से ही हैं उनकी जीवनकाल में कम पहचान थी, लेकिन बाद में उनकी पुस्तक Walden और विचारों ने दुनिया भर के आंदोलनों को प्रभावित किया।
6. पुर्तगाल के साहित्यकार फर्नांडो पेसोआ की मृत्यु के बाद उनके हजारों अप्रकाशित पन्ने मिले और वे आधुनिक यूरोपीय साहित्य के महान कवियों में गिने जाने लगे।
7. अपने देश भारत के मुक्तिबोध — जीवनभर संघर्ष और उपेक्षा झेले । मृत्यु के बाद उनकी कविता और आलोचना ने उन्हें हिंदी का कालजयी लेखक बना दिया।
8. ऐन फ्रैंक — नीदरलैंड के निवासी थे,
उनकी डायरी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई और विश्व साहित्य की सबसे मार्मिक कृतियों में शामिल हो गई।
9. विन्सेंट वान गॉग — देश: नीदरलैंड,वे मुख्यतः चित्रकार थे, लेकिन उनके पत्र भी साहित्यिक महत्व रखते हैं। जीवन में संघर्षरत रहे, मृत्यु के बाद विश्वप्रसिद्ध हुए हैं l
10-हमारे देश भारत के मुंशी प्रेमचंद को जीवन काल में तकलीफो का सामना करना पड़ा था, सुनने में आता है कि मृत्यु के बाद चार कंधा देने वाले नहीं थे, कंधा देने वाला कोई व्यक्ति किराये पर लाया गया आज उसी मुंशी प्रेमचंद को उपन्यास सम्राट कहा जाता है l
इन साहित्यकारों ने नैतिकता, विवेक और बुद्धिमता का उपयोग किया, जिसकी वजह से कालजाई हो गए l कटुसत्य है सच्चे रचनाकार की पहचान बनने में समय लगता है कभी -कभी सदिया भी लग जाती हैं l
भारतीय समाज अपने युग के महान लेखकों को देर से समझ पाता है क्योंकि भारतीय समाज की आँखों पर धर्म और जाति की मोटी परत चढी होती है l वर्णवादी व्यवस्था में भी कोई ईमानदारी से नहीं कह सकता है कि साहित्यिक मंचों और संस्थाओं में दलित -आदिवासी लेखकों को उचित स्थान मिलता है,भीड़ का हिस्सा ही समझा जाता है l
भारतीय समाज में अनेक ऐसे दलित और आदिवासी साहित्यकार हुए हैं, जिनकी रचनाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद उन्हें वह सम्मान और पहचान नहीं मिल सकी जिसके वे हकदार थे,जिन्हें आज भी व्यापक भारतीय समाज पूरी तरह नहीं पहचान पाया है—जैसे-ओम प्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, शरणकुमार लिम्बाले, बामा, कौसल्या वसंती, जयप्रकाश,कर्दम, सूरजपाल चौहान इनके अतिरिक्त और भी दलित साहित्यकार हैं, जिन्हें बूढ़े भारतीय समाज ने पहचान नहीं दिया है l
आदिवासी साहित्यकारों की बात की जाये तो रामदयाल मुंडा, निर्मला पुतुल, महादेव टोप्पो, हरिराम मीणा, जेसिंता केरकट्टा, वाहरू सोनवणे शामिल है,इन दलित आदिवासी साहित्यकारों को चैटजीपीटी/ डिजिटल दुनिया पहचानती है परन्तु भारतीय समाज अनभिज्ञ बना हुआ है l
इन दलित आदिवासी साहित्यकारों की रचनाएँ सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज़ हैं, पर बूढ़े भारत और मुख्यधारा की मीडिया ने अपेक्षित स्थान नहीं दिया परन्तु अंतर्राष्ट्रीय पहचान डिजिटल मीडिया ने जरूर दिया हैl
मैं खुद "नन्दलाल भारती",इण्डियन सोसायटी आफ आथर्स(इंसा) दिल्ली,आथर्स गिल्ड आफ इंडिया, दिल्ली,हिन्दी परिवार,इंदौर (मध्य प्रदेश)म.प्र.तुलसी अकादमी,भोपाल (म.प्र) म.प्र.लेखक संघ,भोपाल, श्रीमध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति, इंदौर एवं अन्य संस्थाओं का सदस्य हूँ परन्तु इण्डियन सोसायटी आफ आथर्स(इंसा) दिल्ली के अलावा किसी संस्था ने अपेक्षित स्थान तो दूर स्थान ही नहीं दिया l
इंदौर जिस शहर में मैं रहता हूँ उसी शहर की " श्रीमध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति, इंदौर"जो देश की सबसे पुरानी संस्था है, मैं आजीवन सदस्य भी हूँ, इस संस्था ने कभी बतौर सदस्य आमंत्रित ही नहीं किया,इतना बड़ा भेदभाव और पक्षपात तो साहित्यिक संस्थाएं कर रही है, तो बूढ़े भारत की बूढ़ी सोच को क्या कहें l
आत्मसंतोष की बात है कि समकालीन हिंदी साहित्य में लेखन को सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के हस्ताक्षर के रूप में डिजिटल युग ने तो पहचान दिया है l
सोशल मीडिया पर “कॉपी-पेस्ट संस्कृति”का तूफान मचा हुआ है।यक़ीनन इससे साहित्यिक नैतिकता एवं बौद्धिकता पंगु तो होगी क्योंकि किसी भी प्रकार की सूचनाएँ एक क्लिक पर उपलब्ध हो जाती है ।
याद रखने वाली बात यह होगी कि डिजिटल युग में भी मौलिक लेखन और बौद्धिकता की महत्ता कभी भी कम नहीं हो सकती समय जरूर सम्मानित करता है l
डिजिटल प्लेटफॉर्म ने लेखकों को अवसर दिए हैं क्योंकि अब किसी पत्रिका या प्रकाशक पर पूरी तरह निर्भर रहने की जरूरत नहीं रही। प्रकाशक सहयोग राशि के नाम पर लेखक से रूपये वसूलते हैं, अब तो कुछ प्रकाशक कॉपीराइट के नाम पर वसूली करने लगे हैं l
लेखकों के लिए तो कठिन समय है, ऐसी विपरीत परिस्थिति में डिजिटल माध्यम- ब्लॉग, पोर्टल,वेबसाइट, ई-बुक, ई- मैगज़ीन, ई-न्यूज़ पेपर और सोशल मीडिया ने सभी लेखकों को मंच प्रदान किया हैl यहां किसी प्रकार का पक्षपात और भेदभाव नहीं है l क्या स्त्री क्या पुरुष क्या दलित आदिवासी क्या गैर दलित-आदिवासी सभी को डिजिटल दुनिया में अवसर मिल रहा है l
यह डिजिटलक्रान्ति का ही तो चमत्कार है,दलित-आदिवासी महिलाये हो या अन्य वर्ग की महिला लेखक,उनके साथ भी डिजिटल उन्हें भी diलेखकों जिससे समाज अनभिज्ञ था, दुनिया जानने लगी है परंतु दुःख की बात है कि कुछ लोग गंभीर एवं नैतिकतापूर्ण चिंतन की बजाय रातोरात प्रसिद्ध होना चाहते हैं जो नामुमकिन है, जबकि डिजिटल युग में भी बिना गंभीर एवं नैतिकतापूर्ण चिंतन के असम्भव है l
एआई यानि कृत्रिम बुद्धिमता की सोच अलग है एआई तो क्षण भर में निर्देश के अनुसार तैयार कर सकता है, परंतु वह मानवीय संवेदना, संघर्ष और अनुभव की गहराई नहीं दे पायेगा, जो लेखक के दिल दिमाग़ से होकर कागज उतरेगा । एआई मशीन भाषा तो बना सकती है, लेकिन आत्मा नहीं,इसलिए मौलिक लेखन की आवश्यकता डिजिटल युग में भी और अधिक बढ़ गई हैl यदि लेखक केवल लोकप्रियता या ट्रेंड के पीछे भागेगा, तो समाज को नई दिशा नहीं मिल पाएगी। मौलिक लेखन ही सामाजिक परिवर्तन का आधार बन सकता है।
डिजिटल युग में जब लोग दूसरों की भाषा, शैली और विचारों की नकल करने लगे हैं, तब स्वामी विवेकानंद का यह कथन सत्य प्रतीत होता है,उनका प्रसिद्ध कथन है—
“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।”
स्वामी विवेकानंद का मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति में असीम शक्ति और सृजनात्मक क्षमता होती है। वे अंधानुकरण के विरोधी थे। उन्होंने युवाओं से कहा था कि वे अपने विवेक का उपयोग करें और स्वतंत्र रूप से सोचें। यह संदेश मौलिक लेखन का भी मूल है।
साहित्य तभी जीवित रहेगा जब उसमें मनुष्य की आत्मा और सच्चाई का प्रतिबिंब झलकेगा ।मौलिक लेखन केवल साहित्यिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। यह समाज की वास्तविक समस्याओं को सामने लाता है, नई चेतना पैदा करता है और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत बनाता है। दलित साहित्य, स्त्री विमर्श, आदिवासी साहित्य और श्रमिक जीवन पर आधारित रचनाएँ इसलिए प्रभावशाली हैं क्योंकि वे वास्तविक अनुभवों और संघर्षों से उपजी हैं।
डिजिटल माध्यमों ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन इसके साथ यह जिम्मेदारी भी आती है कि लेखक सत्य, संवेदना और मौलिकता को बनाए रखें। डिजिटल युग में लेखन केवल तकनीकी उत्पादन बनकर रह जाएगा, तो साहित्य की आत्मा मर जाएगी ।
यक़ीनन डिजिटल युग ने लेखन को नई गति और व्यापकता दी है, परंतु डिजिटल युग में मौलिकता की रक्षा करना सबसे बड़ी चुनौती है। मौलिक लेखन ही लेखक की असली पहचान है। यह समाज को नई दिशा देता है, विचारों को स्वतंत्रता प्रदान करता है और मानवता को जीवित रखता है।
डॉ भीमराव अम्बेडकर ने शिक्षा, चिंतन और बौद्धिक स्वतंत्रता को सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार माना। डॉ अम्बेडकर ने कहा है
“शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो।”
डॉ. अम्बेडकर ने केवल पुस्तकीय ज्ञान पर जोर नहीं दिया, बल्कि तार्किक और स्वतंत्र चिंतन की आवश्यकता को महत्वपूर्ण बताया है । डॉ अम्बेडकर ने अपने लेखन में सामाजिक असमानता, जातिवाद और शोषण के विरुद्ध तथ्यपूर्ण और मौलिक विचार प्रस्तुत किए हैं । डॉ अम्बेडकर की रचनाएँ आज भी इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि वे किसी की नकल नहीं, बल्कि उनके गहन अध्ययन और व्यक्तिगत संघर्षों का परिणाम थीं।
डॉ अम्बेडकर ने कहा है कि—
“मनुष्य का जीवन महान तभी बनता है जब वह अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने का साहस रखता है।”
डॉ. अम्बेडकर और स्वामी विवेकानंद जैसे महान विचारकों ने स्वतंत्र चिंतन, शिक्षा और आत्मविश्वास पर बल दिया। उनके विचार आज के डिजिटल युग में और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। तकनीक चाहे जितनी विकसित हो जाए, मानवीय संवेदना, अनुभव और सच्चाई से उपजा लेखन कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकता।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि लेखक डिजिटल साधनों का उपयोग तो करें, परंतु अपनी मौलिकता, वैचारिक ईमानदारी और सामाजिक जिम्मेदारी को धूमिल नहीं होने दे l
नन्दलाल भारती
29/05/2026
12:02 PM (4 hours ago)
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