आलेख :धार्मिक राजनीति : लोकतंत्र और जनहित का संकट
— नन्दलाल भारती
कवि, कथाकार एवं सामाजिक चिंतक
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लोकतंत्र केवल चुनाव कराने, सरकार बनाने और सत्ता परिवर्तन की व्यवस्था का नाम नहीं है। लोकतंत्र एक ऐसी जीवन-पद्धति है, जिसमें नागरिकों की स्वतंत्रता, समानता, न्याय, गरिमा और सहभागिता को सर्वोच्च महत्त्व प्राप्त होता है। इसका मूल उद्देश्य जनहित की रक्षा करना और ऐसी शासन-व्यवस्था स्थापित करना है, जिसमें सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह रहे। लेकिन जब राजनीति का केंद्र शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महँगाई, गरीबी, सामाजिक न्याय और नागरिक अधिकारों के बजाय धार्मिक पहचान तथा आस्था के राजनीतिक इस्तेमाल पर टिकने लगता है, तब लोकतंत्र की दिशा और प्राथमिकताएँ प्रभावित होने लगती हैं।
धर्म व्यक्ति को नैतिकता, करुणा, सेवा और आत्मानुशासन की प्रेरणा दे सकता है। समस्या धर्म में नहीं, बल्कि तब पैदा होती है जब धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाता है, धार्मिक पहचान के आधार पर समाज को बाँटा जाता है और नागरिकों की मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए आस्था को चुनावी हथियार बनाया जाता है। ऐसी राजनीति लोकतंत्र को जनकल्याण के मार्ग से हटाकर सत्ता-संरक्षण और सामाजिक ध्रुवीकरण की दिशा में ले जा सकती है।
लोकतंत्र की सार्थकता इस बात से तय होती है कि सत्ता जनता के जीवन को कितना बेहतर बनाती है, न कि इस बात से कि धार्मिक भावनाओं को कितनी कुशलता से राजनीतिक समर्थन में बदला जाता है।
लोकतंत्र का मूल उद्देश्य : लोकहित सर्वोपरि-
लोकतंत्र का अर्थ है जनता की भागीदारी, जनता के लिए शासन और जनता के प्रति जवाबदेही। इसमें सरकार का मूल्यांकन उसके कार्यों, नीतियों और परिणामों के आधार पर होना चाहिए। क्या बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है? क्या युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं? क्या किसानों को उनकी मेहनत का उचित प्रतिफल मिल रहा है? क्या मजदूर सुरक्षित जीवन जी पा रहे हैं? क्या महिलाओं को समान अवसर और सुरक्षा प्राप्त है? क्या वंचित नागरिकों को न्याय तक पहुँच मिल रही है?
ये प्रश्न लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी हैं।
लोकतंत्र में धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान आवश्यक है, लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक पहचान का राजनीतिक इस्तेमाल दो अलग-अलग विषय हैं। किसी नागरिक को अपनी आस्था मानने, उसका पालन करने या उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता है, बशर्ते वह कानून और दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन न करे। इसी प्रकार किसी नागरिक को धार्मिक आस्था न रखने या अपने विश्वासों पर प्रश्न उठाने की स्वतंत्रता भी लोकतांत्रिक समाज का महत्त्वपूर्ण पक्ष है।
राज्य की जिम्मेदारी है कि वह सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करे। लोकतंत्र की शक्ति किसी एक धार्मिक समुदाय की राजनीतिक प्रधानता में नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के समान अधिकारों और न्यायपूर्ण अवसरों की रक्षा में निहित है।
धार्मिक राजनीति : आस्था से सत्ता तक का सफर-
धार्मिक राजनीति तब संकट का रूप लेने लगती है, जब धार्मिक प्रतीकों, ऐतिहासिक स्मृतियों, धार्मिक स्थलों और सामुदायिक भावनाओं का इस्तेमाल नागरिकों को प्रभावित करने के लिए किया जाता है, जबकि सार्वजनिक नीतियों और जनसमस्याओं पर अपेक्षित चर्चा पीछे छूट जाती है।
चुनाव के समय यदि नागरिकों से शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सार्वजनिक सेवाओं के विषय में प्रश्न पूछने के बजाय उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर समर्थन माँगा जाए, तो मतदाता के विवेक को सीमित करने का खतरा पैदा होता है। जब किसी राजनीतिक दल या नेता के प्रति समर्थन को धर्म के प्रति निष्ठा का प्रमाण बताया जाने लगे, तब लोकतांत्रिक विकल्पों की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
धार्मिक भावनाओं का राजनीतिक उपयोग केवल किसी एक धर्म या दल तक सीमित समस्या नहीं है। किसी भी धार्मिक समुदाय की भावनाओं को भड़काकर दूसरे समुदाय के प्रति अविश्वास पैदा करना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चुनौती है। इसलिए धार्मिक राजनीति की आलोचना निष्पक्ष और सिद्धांत आधारित होनी चाहिए। कसौटी यह नहीं कि कौन-सा दल या समुदाय ऐसा कर रहा है, बल्कि यह है कि क्या राजनीतिक आचरण नागरिकों की समानता, स्वतंत्रता, न्याय और सामाजिक सद्भाव को मजबूत कर रहा है अथवा कमजोर।
आस्था व्यक्तिगत और सामुदायिक जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है, लेकिन उसका उपयोग किसी नागरिक को कमतर सिद्ध करने या उसके अधिकार सीमित करने के लिए नहीं होना चाहिए।
धार्मिक ध्रुवीकरण और लोकतांत्रिक विवेक का संकट-
लोकतंत्र की सफलता के लिए जागरूक मतदाता आवश्यक है। मतदाता को नीतियों, उम्मीदवारों के कार्यों, शासन के रिकॉर्ड और सार्वजनिक हित के आधार पर निर्णय लेने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन जब राजनीतिक विमर्श धार्मिक ध्रुवीकरण से प्रभावित होता है, तब नागरिकों के बीच भय, संदेह और विरोध की भावना बढ़ सकती है।
धार्मिक पहचान के आधार पर समाज को दो विरोधी खेमों में बाँटने से साझा समस्याओं पर सहयोग कठिन हो जाता है। बेरोजगारी, महँगाई, प्रदूषण, जल संकट और शिक्षा की गुणवत्ता जैसी समस्याएँ किसी एक धर्म की नहीं होतीं। उनका प्रभाव विभिन्न समुदायों के लोगों पर पड़ता है। फिर भी यदि राजनीतिक चर्चा का बड़ा हिस्सा धार्मिक श्रेष्ठता, ऐतिहासिक प्रतिशोध और सामुदायिक आरोप-प्रत्यारोप में उलझ जाए, तो जनहित के मुद्दों को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिलती।
ध्रुवीकरण का एक गंभीर परिणाम यह भी हो सकता है कि नागरिक अपने राजनीतिक प्रतिनिधियों से कठिन प्रश्न पूछने में संकोच करने लगें। वे यह सोचकर चुप रह सकते हैं कि सरकार की आलोचना करने से उनकी धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान पर प्रश्न उठाए जाएँगे। जबकि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना और किसी धर्म का अपमान करना एक ही बात नहीं है। नीतियों पर सवाल उठाना नागरिक अधिकार है; किसी समुदाय के विरुद्ध घृणा फैलाना सामाजिक जिम्मेदारी और कानून, दोनों की दृष्टि से गंभीर विषय हो सकता है।
जब तर्क की जगह भावनात्मक उत्तेजना, संवाद की जगह आरोप और जवाबदेही की जगह अंधसमर्थन ले लेता है, तब लोकतंत्र का विवेक कमजोर होने लगता है।
जनहित से विमुख राजनीति के परिणाम-
धार्मिक ध्रुवीकरण के कारण जनहित प्रभावित होने का खतरा कई स्तरों पर सामने आता है।
पहला, नीतिगत प्राथमिकताएँ कमजोर पड़ सकती हैं। यदि सार्वजनिक बहस में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक असमानता की जगह पहचान-आधारित विवाद हावी रहें, तो नागरिकों के वास्तविक प्रश्न पीछे छूट सकते हैं।
दूसरा, सामाजिक विश्वास कमजोर होता है। विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच संदेह और दूरी बढ़ने पर सहयोग, व्यापार, शिक्षा और स्थानीय विकास प्रभावित हो सकते हैं। लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं, नागरिकों के परस्पर विश्वास से भी चलता है।
तीसरा, संस्थाओं की निष्पक्षता पर प्रश्न उठ सकते हैं। यदि प्रशासन, पुलिस, शिक्षा संस्थानों या सार्वजनिक सेवाओं के संबंध में धार्मिक पक्षपात की धारणा मजबूत हो, तो नागरिकों का संस्थागत विश्वास कम हो सकता है। इसलिए निष्पक्ष कार्रवाई, पारदर्शिता और कानून का समान अनुपालन आवश्यक है।
चौथा, असहमति के लिए स्थान संकुचित हो सकता है। यदि किसी नीति पर सवाल उठाने वाले नागरिकों को धार्मिक या राष्ट्रविरोधी ठहराने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श बाधित होता है।
पाँचवाँ, आर्थिक और सामाजिक विकास प्रभावित हो सकता है। निरंतर तनाव और संघर्ष से स्थानीय व्यापार, निवेश, रोजगार और सामुदायिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। समाज की ऊर्जा विकास और समस्याओं के समाधान के बजाय आपसी संघर्ष में खर्च होने लगती है।
इन परिणामों को हर परिस्थिति में स्वतः घटित होने वाला नियम नहीं माना जा सकता। लेकिन धार्मिक पहचान के राजनीतिक दुरुपयोग, घृणा और भेदभाव से जुड़े जोखिमों को गंभीरता से समझना लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवश्यक है।
संविधान : धार्मिक स्वतंत्रता और समान नागरिकता का आधार-
भारत का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता को मान्यता देता है और साथ ही सभी नागरिकों की समानता, गरिमा तथा न्याय की रक्षा का आधार प्रदान करता है। प्रस्तावना में न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श लोकतांत्रिक जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 धर्म सहित निर्दिष्ट आधारों पर भेदभाव के निषेध से संबंधित है। अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जो संविधान में निर्धारित सीमाओं के अधीन है।
इन संवैधानिक प्रावधानों का मूल संदेश स्पष्ट है—भारत की नागरिकता किसी एक धार्मिक पहचान पर निर्भर नहीं है। प्रत्येक नागरिक के अधिकार और गरिमा का सम्मान होना चाहिए।
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म-विरोध नहीं है। इसका लोकतांत्रिक आशय यह है कि राज्य किसी धर्म के आधार पर नागरिकों के साथ अनुचित भेदभाव न करे और धार्मिक स्वतंत्रता तथा समान नागरिकता की रक्षा करे। धार्मिक समुदायों की सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करते हुए भी राज्य को सार्वजनिक हित, कानून और संवैधानिक मूल्यों के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए।
संविधान किसी राजनीतिक दल की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों और शासन की मर्यादाओं की रक्षा के लिए है। इसलिए किसी भी दल, नेता या सरकार के आचरण का मूल्यांकन संवैधानिक कसौटियों पर होना चाहिए।
मीडिया, शिक्षा और नागरिक समाज की जिम्मेदारी-
धार्मिक राजनीति से उत्पन्न चुनौतियों का सामना केवल सरकार या न्यायपालिका के भरोसे नहीं किया जा सकता। मीडिया, शिक्षा संस्थानों, साहित्यकारों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
मीडिया का दायित्व है कि वह सनसनी और उत्तेजना के बजाय तथ्यों, प्रमाणों और जनहित को प्राथमिकता दे। अपुष्ट सूचनाओं को प्रसारित करने से सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। इसलिए समाचारों की जाँच, जिम्मेदार भाषा और विभिन्न पक्षों को सुनना आवश्यक है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करने की योग्यता विकसित करना नहीं, बल्कि विवेकशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है। विद्यार्थियों को संविधान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, इतिहास की आलोचनात्मक समझ, विविधता के सम्मान और संवाद की संस्कृति से परिचित कराया जाना चाहिए।
साहित्य और कला मनुष्य को दूसरे के अनुभवों से जोड़ते हैं। वे धार्मिक पहचान के पार मानवीय पीड़ा, प्रेम, न्याय और सहअस्तित्व की अनुभूति कराते हैं। नागरिक समाज को भी धार्मिक समुदायों के बीच संवाद, साझा सामाजिक कार्यों और स्थानीय समस्याओं के सामूहिक समाधान को प्रोत्साहित करना चाहिए।
नागरिकों को चाहिए कि वे किसी संदेश या वीडियो पर विश्वास करने से पहले उसकी सत्यता जाँचें, घृणा फैलाने वाली सामग्री साझा न करें और अपने जनप्रतिनिधियों से विकास कार्यों का हिसाब माँगें। चुनाव में मतदान करते समय उम्मीदवारों की योग्यता, कार्य, नीतियों और सार्वजनिक जवाबदेही को महत्त्व दें।
लोकतंत्र की दिशा कैसे बदले?
लोकतंत्र को जनहित की दिशा में मजबूत करने के लिए कुछ बुनियादी कदम आवश्यक हैं।
पहला, चुनावी विमर्श में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, महँगाई, पर्यावरण और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को केंद्रीय स्थान मिले।
दूसरा, राजनीतिक दल अपने घोषणापत्रों में स्पष्ट लक्ष्य रखें और सत्ता में आने के बाद उनकी प्रगति का सार्वजनिक हिसाब दें।
तीसरा, धार्मिक पहचान के आधार पर घृणा, हिंसा और भेदभाव को बढ़ावा देने वाले आचरण पर कानून के अनुसार निष्पक्ष कार्रवाई हो।
चौथा, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और जवाबदेही मजबूत की जाए।
पाँचवाँ, नागरिकों के बीच संवाद और असहमति के सम्मान की संस्कृति विकसित हो। मतभेद लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसका स्वाभाविक हिस्सा हैं। आवश्यकता इस बात की है कि मतभेद हिंसा और घृणा में न बदलें।
सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि नागरिक किसी भी राजनीतिक नेतृत्व को प्रश्नों से ऊपर न मानें। लोकतंत्र में नेता जनता के सेवक और प्रतिनिधि होते हैं, उसके विवेक के स्वामी नहीं।
धर्म का सम्मान, राजनीति की जवाबदेही-
धार्मिक राजनीति का संकट तब गहराता है, जब धर्म की आड़ में जनहित के प्रश्न पीछे धकेल दिए जाते हैं, नागरिकों के बीच विभाजन बढ़ता है और सत्ता की जवाबदेही कमजोर पड़ती है। इसका समाधान धर्म का अपमान करना या धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करना नहीं, बल्कि राजनीति को संविधान, न्याय, समानता और जनकल्याण के प्रति जवाबदेह बनाना है।
हमें यह समझना होगा कि धार्मिक आस्था का सम्मान और राजनीतिक सत्ता की आलोचना एक साथ संभव हैं। किसी व्यक्ति का धार्मिक होना उसे बेहतर नागरिक बना सकता है, यदि उसकी आस्था करुणा, ईमानदारी और न्याय की प्रेरणा देती है। लेकिन कोई भी धार्मिक पहचान नागरिक अधिकारों, संवैधानिक मर्यादाओं और सार्वजनिक जवाबदेही से ऊपर नहीं हो सकती।
लोकतंत्र तभी सार्थक है, जब गरीब को न्याय, बच्चे को शिक्षा, युवा को अवसर, किसान को सम्मान, महिला को समानता और प्रत्येक नागरिक को निर्भय होकर जीने का अधिकार मिले। धार्मिक विविधता भारत की सामाजिक वास्तविकता है; उसे संघर्ष का कारण बनाने के बजाय सहअस्तित्व और पारस्परिक सम्मान का आधार बनाना चाहिए।
प्रश्न यह नहीं कि राजनीति में धर्म का नाम कितनी बार लिया जाता है; प्रश्न यह है कि राजनीति मनुष्य के जीवन में न्याय, शांति, समानता और खुशहाली कितनी बढ़ाती है।
यदि धार्मिक नारों के बीच नागरिकों की मूलभूत समस्याएँ अनसुनी रह जाएँ, तो लोकतंत्र को आत्ममंथन करना होगा। यदि सत्ता जनता के प्रश्नों से बचने लगे, तो नागरिकों को अधिक सजग होना होगा। और यदि धर्म के नाम पर मनुष्यों के बीच दीवारें खड़ी की जाएँ, तो संविधान की समता और बंधुता की भावना को और दृढ़ता से सामने लाना होगा।
लोकतंत्र का भविष्य धार्मिक ध्रुवीकरण की तीव्रता में नहीं, जनहित की प्राथमिकता, संवैधानिक मूल्यों की प्रतिष्ठा और नागरिक विवेक की जागरूकता में सुरक्षित है। यही लोकतांत्रिक राजनीति की कसौटी है और यही एक न्यायपूर्ण, समावेशी तथा मानवीय भारत के निर्माण का मार्ग है।
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