देहदान
सुबह साढ़े पांच बजे होंगे, सुबह तो बड़ी सुहानी थी, परन्तु अगस्त माह के तीसरे सप्ताह में प्यासा जनसमुदाय आकाश की ओर टकटकी लगाए था l दिन की गर्मी से परेशान आदमी को रात में कहाँ सकून मिलने वाला l
मेरे मन में विचार की बदरी उमड़-घुमड़ रही थी l हम दोनों यानि मेरी पत्नी ज्ञानवंती और मैं यानि शांतनु नगर निगम के उपवन में एक कोने में योगा-प्राणायाम कर रहे थे l भले ही पानी की कमी थी पर पेड़ पौधे अपना काम ईमानदारी से कर रहे थे, उपवन में आक्सीज गले तक भरी हुई थी, सांस लेने का आनंद ही अद्भुत था l
इसी बीच एक लम्बे -लम्बे पंखो से लदा इतराता हुआ मोर दिखाई पड़ा l मोर के पीछे-पीछे, उसकी पूँछ पकड़ने की कोशिश करता हुआ एक अबोध बच्चा,अब साढ़े छः बजे होंगे l
तभी बच्चे की माँ बोली बाबू आ जा नहीं पकड़ पाओगे, आओ घर चलें!
नटखट बच्चे को देखकर अपने बच्चे खेलते, गिरते-भागते, कुत्ते की पुंछ पकड़ने की कोशिश करते-डरते,खेल-खिलौने से घर बनाते,बेटी का मालिकाना हक जताना, छोटे का पांव पटक-पटक रोना, बीच वाले का मुंह फूलाकर अकेले बैठ जाना, अपने बच्चों का बाल-नटखटपन मोर का पीछा कर रहे बच्चे की तरह मन में चल रहा था l मोर बाड़ के अंदर उड़कर चला गया, उदास बच्चा अपनी माँ के पास l
मैं मन स्थिर करने की कोशिश कर रहा था पर मन था बच्चों के बचपन में उलझा हुआ था l बच्चे अब बच्चों के माँ बन चुके थे l मेरा मन बच्चों के घर वाले खेल में उलझा हुआ था, बच्चों के बनाये घर में उनमें से किसी की नाराजगी, तोड़फोड़, हाथ पैर पटक-पटक रोना-चिल्लाना, फिर तोड़फोड़ की जिम्मेदारी किसी पर थोपना, सबका अपने-अपने घर की खुद वकालत करना और आखिर में बिटिया के समझौते की पहल सब मानसिक चित्रपटल पर चल रहे थे l
आज बिखरते संयुक्त परिवार,स्वतंत्र देश, विश्वगुरु का खोखला गुरुर, धर्म का राजनितिकरण, बढ़ती धर्मांधता का शिकंजा,आसमानी महंगाई,बेरोजगारी, सिकुड़ती जमीन बच्चों को कुलाचे मारने की जगहे नक्शे से गायब lयही तो हो गयी है आज के दुनिया की हकीकत है-एक खेलl बचपन का खेल l
इसी अपनी दुनिया का तो हिस्सा है-अपना-अपना घर l हर घर की यही दास्तान, चाहे हमारा आपका हो-अपना घरl मेरे विचार बिजली की तरह कौध रहे थे, तभी ज्ञानवंती बोली अरे अब तो घर चलें l
ज्ञानवन्ती मेरी पत्नी है, पौराणिक कथा के पात्र श्रवण कुमार की माँ नहीं मेरे बच्चों-
बेटी-शालिनी जो बूढ़ा-बूढ़ी के दिल दिल की धड़कन है,बेटा-सुहास, जो हम दोनों का घुटना बनने का वादा करता था पर पौराणिक कथा के श्रवणकुमार की पत्नी जैसी विद्यावती ठग माँ-बाप की ठग बेटी का पति है,जो सास-ससुर और परिवार के दुःख-दर्द में कभी नहीं पूछतीl
साइबर क्रिमिनल की तरह विद्यावती की निगाह सुहास की तनख्वाह, बैंक एकाउन्ट औऱ मोबाइल पर होती थी पति के विरोध पर माँ-बाप बेटी मिलकर हर तरह की साजिशें -शोषण-उत्पीड़न, दहेज उत्पीड़न के जुर्म में पूरे परिवार को जेल भेजवाने की धमकी देते थे, सुहास को लूटने के लिए l
मायावी मोर पँखिनि विद्यावती वही पौराणिक कथा वाली विद्यावति श्रवण कुमार की पत्नी की प्रतिकृति के वश में हताश-निराश बच्चे के मोह में सुहास जीवन काटे जा रहा थाl घर के काम के साथ नौकरी, बच्चे का लालन-पालन, बच्चे की माँ-बाप सब कुछ सुहास थाl सुहास की कहानी सुनकर आदित्य नाग की हास्य कविता जरूर याद आयेगी lआदित्य नाग कुछ इस तरह लिखते हैं;
पति अपनी पत्नी से फ़रमाया..
तेरे प्यार में मैं यूँ ख़ौया हूँ की,
तेरे बिन मैं कहीं रहा ना जाये,
और तेरे संग भी रहा ना जाये।
तेरे बिन कुछ खाया ना जाये,
तेरे पकाये खाने भी खाया ना जाये।
तेरे बीन ये घर, घर ना लागे;
तेरे संग वैसे भी घर, घर ना लागे।
तेरे बिन रातों को डर जाता हूँ,
तेरे संग बिना श्रृंगार के तुझे देख डर जाता हूँ।
मैं वही पत्नी पीड़ित पति हूँ,
जो बस लिख पाता हूँ बोल मैं भी नहीँ पाता हूँ............
सबसे छोटे बेटे-सुबोध के बारे में भी जिक्र कर ही देता हूँ l सुबोध सचमुच पौराणिक कथा के पात्र श्रवण कुमार की प्रतिकृति था विदेश की नौकरी छोड़कर माँ-बाप यानि शांतनु और ज्ञानवंती के साथ रहकर अपना रोजी-रोजगार जमाने का अथक प्रयास रहा था l
ज्ञानवंती फिर अपनी सुरीली आवाज़ की सुरीली तीर छोड़ी औऱ बोली शांतनु आओ घर चलें, तुम्हारी दवाई का टाईम होने वाला है l मैं अब कहाँ रुकने वाला था गाड़ी की ओर चल पड़ा l पांच मिनट में वहीं अपने घर l
सुहास की जिंदगी में विद्यावती के हाथों सुलगाई आग का धुंआ बेखौफ़ पूरे परिवार का दम घोंट रहा था l ज्ञानवती जश्न में डूबी रहती थीl उधर मझली बहू ने आते ही विद्रोह का विगुल बजा दिया l यह मझली बहू छोटे भाई मांतनु की बड़ी पतोहू थी l पचास साल से हम दोनों यानि हम पति-पत्नी शांतनु और ज्ञानवंती, मांतनु के ही नहीं उसके परिवार के भी पालक थे l
मांतनु अपनी पतोहू के सुर मे सुर मिला रहा था,मझली बहू ने अपना घर परिवार अलग कर लिया l हम दोनों अलग-थलग कर दिए गए l सुहास की पत्नी विद्यावती ने तो पहले से सिर के जू की तरह फेंक दी थी l
हम दोनों आप सुबोध पर पूरी तरह आश्रित हो गए थे l गांव अब बहुत दूर हो गया था क्योंकि मझली बहू ऊँची और गहरी भी खाई खोद डाली थी, भाई एकदम बेगाना हो गया था l
पारिवारिक कलह की हवा से धीरे-धीरे सुबोध मे भी बदलाव आने लगा था इसका असर दिखाई पड़ने लगा था l कई बार तो ज्ञानवंती चुपचाप रो लेती l अब क्या धीरे-धीरे मेरी पलकों के कठोर बाँध भी टूटने लगे थे l मझली बहू ने आते ही अपना घर अलग कर लिया बड़ी बहू तो खरनाक बागी थी, उग्रवादी किस्म की तो थी परन्तु उसने नहीं बांटा था l वह तो देश के बड़े शहर मे पति सुहास की छाती पर मिर्च पीस रही थी l
श्रवणकुमार यानि सुबोध जो माँ-बाप के दुःख-सुख में अकेला खड़ा रहता, वही बात-बात में मीनमेख निकालने लगा,माँ-बाप के निर्णयों का विरोध कर मान-मर्यादा को ताख पर रखने लगा, कई बार तो शर्मिंदगी में रोना भी पड़ जाता था l
सुबोध हम दोनों के लिए श्रवण कुमार था,केयर टेकर था अघोषित वारिस भी वही था परन्तु अब विरोधी हो रहा था l हम दोनों को अब जीवन अच्छा नहीं रहा था l एक दिन सुबह घूमकर घर पहुंचा तो मेरा मन बहुत उदास था, मन में विचार आ रहा था कि अब जीने का अर्थ नहीं, जब अपने ही बेगाने हो गए हो, लहू से सींच कर पाला-पोषा, पढ़ाया-लिखाया, इज्जत से जीने लायक जिन्हें बनाया, उन्हें ही हमारे उपर विश्वास नहींl
मेरा मन रो रहा था, जीने की इच्छा मर रही थी ज्ञानवंती को देखा तो उसकी रोनी सूरत पर दया आ गयी l मैं नकली मुस्कान के साथ बोला-खुश हो जाओ ज्ञानवंती मैं तो आज बहुत खुश हूँ l
ज्ञानवंती हल्की सी मुस्कराहट के साथ बोली सच खुश हो ?
जी....खुशी की बात है,जीने की वजह मिल गयी है एक कजरी सुना दो ख़ुशी-ख़ुशी मैंने फरमाइश किया था l
ज्ञानवंती दुःखी स्वर में कजरी गाने लगी - रुन-झुन खोला केवड़िया ....... गाते-गाते रुक गयी और पूछी वजह तो बता दो शांतनु ?
मैं खुशी-खुशी बोला -देहदान l
ज्ञानवंती उदास होकर बोली- आईडिया बुरा तो नहीं है l इस कहानी में बस इतना ही l दोस्तों आपके कमेंट का इंतजार रहेगाl
नन्दलाल भारती
18/08/2025
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