आलेख :दोहरे मताधिकार से सामाजिक न्याय तक : दलित-आदिवासी उत्थान का अधूरा संघर्ष!
— नन्दलाल भारती
कवि, कथाकार एवं सामाजिक चिंतक
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किसी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति इस बात से नहीं मापी जा सकती कि वहाँ कितने लोग मतदान करते हैं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वंचित समाज के मत की कितनी स्वतंत्रता है, उसकी आवाज कितनी सुनी जाती है और सत्ता में उसकी भागीदारी कितनी प्रभावी है।
मतदान का अधिकार लोकतंत्र का आधार है, लेकिन क्या केवल एक वोट से सदियों के सामाजिक अन्याय की भरपाई हो सकती है? क्या उस व्यक्ति का राजनीतिक अधिकार वास्तव में सुरक्षित है, जो आर्थिक रूप से निर्भर, सामाजिक रूप से बहिष्कृत और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा हुआ है?
दलित और आदिवासी समाज के संदर्भ में ये प्रश्न आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने औपनिवेशिक भारत में थे। डॉ. भीमराव अम्बेडकर का पृथक निर्वाचक मंडल का संघर्ष, महात्मा गांधी का उसका विरोध और अंततः पूना समझौता भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे केवल अतीत की घटना मानकर भुलाया नहीं जा सकता।
इस इतिहास में राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न है, सामाजिक मुक्ति की आकांक्षा है और उस समझौते की पीड़ा भी है, जिसने एक बड़े वैचारिक संघर्ष को नया मोड़ दिया।
दोहरे मताधिकार का अर्थ क्या था?
दोहरे मताधिकार की माँग को समझने के लिए सबसे पहले पृथक निर्वाचक मंडल और संयुक्त निर्वाचक मंडल के बीच का अंतर समझना होगा। डॉ. अम्बेडकर चाहते थे कि तत्कालीन शब्दावली में कहे जाने वाले ‘डिप्रेस्ड क्लासेज’ अर्थात दलित समुदाय को अपने प्रतिनिधि चुनने का स्वतंत्र राजनीतिक अधिकार मिले। उनकी चिंता थी कि जातिगत भेदभाव से ग्रस्त समाज में यदि दलित प्रतिनिधियों का चुनाव मुख्यतः बहुसंख्यक समुदाय के मतों पर निर्भर रहेगा, तो वे अपने समुदाय के वास्तविक हितों के बजाय प्रभावशाली सामाजिक समूहों के दबाव में आ सकते हैं।
1932 के साम्प्रदायिक निर्णय (Communal Award) में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल का प्रावधान किया था। इस व्यवस्था में दलित मतदाता अपने पृथक निर्वाचन क्षेत्र में अपने प्रतिनिधि चुन सकते थे और साथ ही सामान्य निर्वाचन व्यवस्था में भी मतदान कर सकते थे। इसी दोहरी राजनीतिक भागीदारी को सामान्यतः दोहरे मताधिकार के रूप में समझा जाता है।
दोहरा मताधिकार केवल दो बार वोट डालने की सुविधा का प्रश्न नहीं था। इसके पीछे एक बुनियादी सवाल था—क्या दलित समाज अपने प्रतिनिधि स्वयं चुनेगा, या उसके प्रतिनिधित्व का निर्धारण दूसरी सामाजिक शक्तियों के प्रभाव से होगा?
डॉ. अम्बेडकर की दृष्टि में राजनीतिक शक्ति सामाजिक सुधार की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकती थी। जिस समाज को सदियों तक शिक्षा, संपत्ति, सार्वजनिक संसाधनों और सम्मान से वंचित रखा गया, उसे केवल सद्भावना के भरोसे छोड़ना न्याय नहीं था। उसे ऐसी राजनीतिक शक्ति चाहिए थी, जिसके माध्यम से वह अपने अधिकारों की आवाज स्वयं उठा सके।
गांधी ने विरोध क्यों किया?
महात्मा गांधी पृथक निर्वाचक मंडल के विरोधी थे। उनका मानना था कि दलितों के लिए पृथक निर्वाचन व्यवस्था हिंदू समाज को स्थायी रूप से विभाजित कर देगी और सामाजिक एकता की संभावना को कमजोर करेगी। वे अस्पृश्यता को पाप मानते थे और उसके उन्मूलन की बात करते थे, लेकिन दलितों के लिए अलग राजनीतिक निर्वाचन व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे।
इसी विरोध के तहत उन्होंने 1932 में यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू किया। उनका तर्क था कि राजनीतिक पृथक्करण से सामाजिक विभाजन गहरा सकता है। दूसरी ओर, अम्बेडकर का तर्क था कि जिस समाज में पहले से ही गहरी असमानता और अस्पृश्यता मौजूद हो, वहाँ केवल सामाजिक एकता का आह्वान वंचितों को स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति नहीं दे सकता।
यहीं दोनों नेताओं की दृष्टियों के बीच मूलभूत अंतर सामने आया। गांधी सामाजिक एकता के माध्यम से अस्पृश्यता समाप्त करने पर बल दे रहे थे, जबकि अम्बेडकर सामाजिक न्याय के लिए स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व को आवश्यक मानते थे।
यह समझना जरूरी है कि इस विवाद को किसी एक व्यक्ति की सदाशयता और दूसरे की जिद के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह भारतीय समाज के भविष्य, राजनीतिक अधिकारों और सामाजिक समानता की राह को लेकर दो अलग-अलग दृष्टिकोणों का संघर्ष था।
लेकिन एक प्रश्न आज भी विचारणीय है: यदि समाज में समानता स्थापित नहीं हुई थी, तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अलग पहचान देने से इतना भय क्यों था? और यदि सामाजिक एकता इतनी महत्वपूर्ण थी, तो उस एकता में दलितों की समान भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक सुरक्षा क्यों नहीं स्वीकार की जा सकती थी?
इन प्रश्नों का उत्तर इतिहास की आलोचनात्मक समझ में ही मिल सकता है।
अम्बेडकर को समझौता क्यों करना पड़ा?
24 सितंबर 1932 को हुआ पूना समझौता भारतीय राजनीति के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। इसके तहत पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की गई। प्रांतीय विधानमंडलों में दलित वर्गों के लिए सीटों की संख्या साम्प्रदायिक निर्णय में प्रस्तावित 71 से बढ़ाकर 148 कर दी गई। समझौते में प्रारंभिक चुनाव की ऐसी व्यवस्था भी थी, जिसमें दलित मतदाता उम्मीदवारों का एक पैनल चुन सकते थे।
फिर प्रश्न उठता है कि जब अम्बेडकर पृथक निर्वाचक मंडल को दलितों की स्वतंत्र राजनीतिक आवाज के लिए आवश्यक मानते थे, तो उन्होंने समझौता क्यों स्वीकार किया?
इसका उत्तर उस समय की असाधारण परिस्थितियों में छिपा है। गांधी का आमरण अनशन जारी था। उनके जीवन पर संकट की आशंका ने देशव्यापी भावनात्मक और राजनीतिक दबाव पैदा कर दिया था।
डॉ अम्बेडकर के सामने एक ओर अपने समुदाय के स्वतंत्र राजनीतिक अधिकारों की रक्षा का प्रश्न था, तो दूसरी ओर गांधी की संभावित मृत्यु के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराए जाने और उससे पैदा होने वाले सामाजिक तनाव का खतरा था।
डॉ अम्बेडकर ने समझौता स्वीकार किया, लेकिन इसे उनकी वैचारिक पराजय कहकर खारिज करना इतिहास को सरल बना देना होगा। उन्होंने उपलब्ध परिस्थितियों में अधिक आरक्षित सीटें और कुछ राजनीतिक सुरक्षा हासिल की, लेकिन पृथक निर्वाचक मंडल की मूल माँग छोड़नी पड़ी। इस समझौते के भीतर उपलब्धि भी थी और अधूरी रह गई आकांक्षा भी।
डॉ अम्बेडकर झुके या उन्होंने एक बड़े सामाजिक संकट को टालने के लिए समझौता किया? इस प्रश्न पर इतिहासकारों और सामाजिक चिंतकों के बीच बहस हो सकती है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह फैसला समान शक्ति वाले पक्षों के बीच सामान्य राजनीतिक बातचीत जैसी परिस्थितियों में नहीं हुआ था। गांधी के अनशन ने वार्ता पर भारी नैतिक और राजनीतिक दबाव बनाया था।
डॉ अम्बेडकर की चिंता आज भी विचारणीय है—किसी समुदाय के प्रतिनिधि का अपने समाज के प्रति उत्तरदायित्व तभी प्रभावी हो सकता है, जब उसके पास निर्णय लेने की वास्तविक स्वतंत्रता हो।
आरक्षित सीटें मिलीं, क्या स्वतंत्र आवाज भी मिली?
स्वतंत्र भारत के संविधान ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की व्यवस्था की। यह प्रतिनिधित्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कदम था। लेकिन संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था में आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार पूरे निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं के वोट से चुना जाता है।
इस व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना रहता है—क्या निर्वाचित प्रतिनिधि अपने समुदाय की समस्याओं को स्वतंत्रता और दृढ़ता से उठा पाता है, या उसे राजनीतिक दलों, चुनावी समीकरणों और सत्ता-संगठनों के दबावों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है?
यह कहना उचित नहीं होगा कि आरक्षित सीटों से चुने गए प्रतिनिधि अनिवार्य रूप से अपने समुदाय से दूर हो जाते हैं। पार्टियों के खूंटे से बंध जाते हैं, वे भी अपने सारे वादे भूल जाते हैं कुछ प्रतिनिधियों ने शिक्षा, सामाजिक न्याय, अधिकारों और विकास के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए होंगे,लेकिन यह भी सच है कि प्रतिनिधित्व की संख्या और प्रतिनिधित्व की प्रभावशीलता दो अलग-अलग बातें हैं।
यदि किसी क्षेत्र में दलित बस्ती को आज भी स्वच्छ पेयजल, गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, स्वास्थ्य सेवाएँ, सुरक्षित आवास और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध नहीं हैं, तो वहाँ निर्वाचित प्रतिनिधि की सफलता का मूल्यांकन केवल उसके पद से नहीं किया जा सकता।
यदि किसी आदिवासी क्षेत्र में विकास के नाम पर विस्थापन होता है, जंगल और जमीन से जुड़ी आजीविका संकट में पड़ती है, स्थानीय समुदाय की सहमति की अनदेखी होती है और शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाएँ दूर रहती हैं, तो विकास की घोषणाएँ उस समुदाय के जीवन में वास्तविक परिवर्तन नहीं ला पातीं।
यहाँ दलितों और आदिवासियों के ऐतिहासिक अनुभवों में अंतर समझना भी आवश्यक है। दोनों समुदायों ने अलग-अलग परिस्थितियों में वंचना और अन्याय का सामना किया है।
आदिवासी समाज के संदर्भ में भूमि, जंगल, जल, सांस्कृतिक स्वायत्तता और विस्थापन के प्रश्न विशेष महत्व रखते हैं। इसलिए दोनों के उत्थान के लिए समानता के साझा लक्ष्य के साथ उनकी विशिष्ट जरूरतों के अनुरूप नीतियाँ भी आवश्यक हैं।
दो वोट से आगे: शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सम्मान-
आज दोहरे मताधिकार की ऐतिहासिक बहस को दोहराना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता है कि हम उसके पीछे छिपे मूल प्रश्न—स्वतंत्र राजनीतिक आवाज और सामाजिक न्याय—को वर्तमान विकास की चुनौतियों से जोड़ें।
सबसे पहली प्राथमिकता गुणवत्तापूर्ण शिक्षा होनी चाहिए। वंचित समाज के बच्चे केवल विद्यालय में नामांकन तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें अच्छे शिक्षक, डिजिटल संसाधन, पुस्तकालय, छात्रवृत्ति, उच्च शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण के अवसर मिलें। विद्यालयों और महाविद्यालयों में जातिगत भेदभाव, अपमान तथा अवसरों की असमानता के विरुद्ध प्रभावी व्यवस्था हो।
शिक्षा किसी परिवार की आर्थिक हैसियत पर निर्भर विशेषाधिकार नहीं, बल्कि सम्मानपूर्ण जीवन की आधारशिला बने।
दूसरी प्राथमिकता आर्थिक आत्मनिर्भरता है। भूमि और आजीविका से वंचित परिवारों के लिए रोजगार, उद्यमिता, सस्ती ऋण-सुविधाएँ, बाजार तक पहुँच, तकनीकी प्रशिक्षण और सुरक्षित काम के अवसर सुनिश्चित किए जाएँ।
आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, वन उपज और स्थानीय संसाधनों पर आधारित उद्यमों को बढ़ावा दिया जाए। दलित युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार सृजित करने वाला उद्यमी बनने के लिए भी सहायता मिले।
तीसरा प्रश्न सामाजिक सम्मान का है। किसी व्यक्ति की योग्यता का मूल्यांकन उसकी जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि से नहीं, उसके ज्ञान, श्रम, क्षमता और मानवीय गुणों से होना चाहिए।
अस्पृश्यता, जातिगत हिंसा, भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार के विरुद्ध कानूनों का निष्पक्ष क्रियान्वयन हो। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब संविधान में घोषित समानता समाज के व्यवहार में भी दिखाई देगी।
चौथी प्राथमिकता जवाबदेह राजनीतिक प्रतिनिधित्व है। निर्वाचित प्रतिनिधियों के कामकाज का नियमित सामाजिक ऑडिट हो। आरक्षित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भूमि-अधिकार और बुनियादी सुविधाओं की प्रगति सार्वजनिक रूप से सामने आए। दलितों और आदिवासियों के भीतर महिलाओं, भूमिहीन परिवारों, दिव्यांग व्यक्तियों और सबसे अधिक वंचित समूहों की आवाज को भी निर्णय प्रक्रिया में जगह मिले।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 46 राज्य को अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षणिक तथा आर्थिक हितों को विशेष सावधानी से बढ़ावा देने और उन्हें सामाजिक अन्याय एवं शोषण से बचाने का निर्देश देता है। इसलिए विकासोन्मुखी राजनीति का मूल्यांकन केवल सड़कों, भवनों और बजट से नहीं, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि उससे सबसे वंचित व्यक्ति के जीवन में कितना परिवर्तन आया।
क्या आज फिर दोहरे मताधिकार के लिए संघर्ष जरूरी है?
यदि दोहरे मताधिकार से आशय 1932 की पृथक निर्वाचक मंडल वाली व्यवस्था को पुनः स्थापित करना है, तो यह एक गंभीर संवैधानिक और राजनीतिक प्रश्न है, जिस पर व्यापक लोकतांत्रिक विमर्श आवश्यक होगा। आज के संघर्ष को केवल उसी ऐतिहासिक व्यवस्था की पुनरावृत्ति तक सीमित कर देना उचित नहीं होगा।
लेकिन यदि इसका आशय दलितों और आदिवासियों को अपने प्रतिनिधि चुनने में अधिक स्वतंत्रता, अपने मुद्दों पर निर्णायक आवाज और राजनीतिक दलों के भीतर वास्तविक भागीदारी दिलाना है, तो यह माँग लोकतंत्र को अधिक उत्तरदायी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
इसके लिए राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र, उम्मीदवार चयन में पारदर्शिता, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, सामाजिक न्याय के मुद्दों पर स्पष्ट प्रतिबद्धता और निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही जरूरी है। साथ ही, वंचित समुदायों के भीतर लोकतांत्रिक नेतृत्व, स्वतंत्र विचार और संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता विकसित करनी होगी।
संघर्ष का उद्देश्य किसी दूसरे समुदाय के अधिकार छीनना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि किसी भी समुदाय की सामाजिक कमजोरी उसके राजनीतिक अधिकारों को कमजोर न कर सके।
लोकतंत्र का अधूरा वादा-
पूना समझौता हमें याद दिलाता है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व केवल सीटों की गणना नहीं है। उसके पीछे स्वतंत्रता, स्वाभिमान और अपने भविष्य के निर्णय स्वयं लेने की आकांक्षा होती है। गांधी और अम्बेडकर के बीच हुआ ऐतिहासिक संघर्ष आज भी हमें यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि सामाजिक एकता और सामाजिक न्याय में से किसी एक को चुनने के बजाय दोनों को कैसे सुनिश्चित किया जाए।
आजादी के दशकों बाद भी यदि किसी बच्चे की प्रतिभा सामाजिक पहचान के कारण दबती है, किसी परिवार को जातिगत भेदभाव झेलना पड़ता है, किसी आदिवासी समुदाय की आजीविका विकास योजनाओं की भेंट चढ़ती है और किसी शिक्षित युवा को समान अवसर पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, तो लोकतंत्र का वादा अभी अधूरा है।
दलित और आदिवासी समाज का उत्थान केवल उनके प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी नहीं है। यह सरकार, राजनीतिक दलों, शिक्षण संस्थानों, न्याय व्यवस्था, सामाजिक संगठनों और पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।
अब संघर्ष केवल वोट की संख्या बढ़ाने का नहीं, वोट की आवाज को स्वतंत्र और प्रभावशाली बनाने का है। केवल आरक्षित सीटों का नहीं, अवसरों में वास्तविक समानता का है। केवल विकास के आँकड़ों का नहीं, सम्मानपूर्ण जीवन का है।
डॉ. अम्बेडकर के सामाजिक न्याय के स्वप्न को साकार करने का रास्ता शिक्षा, संगठन, संवैधानिक चेतना, आर्थिक आत्मनिर्भरता और लोकतांत्रिक जवाबदेही से होकर गुजरता है।
जिस दिन दलित और आदिवासी समाज का बच्चा बिना भेदभाव के शिक्षा पाएगा, युवा अपनी योग्यता के बल पर आगे बढ़ेगा, महिला सुरक्षित और सम्मानपूर्ण जीवन जिएगी, किसान और वनवासी अपने संसाधनों पर न्यायपूर्ण अधिकार के साथ विकास में भागीदार बनेंगे और निर्वाचित प्रतिनिधि निर्भीक होकर वंचितों की आवाज उठाएँगे—उस दिन लोकतंत्र की जड़ें और गहरी होंगी।
सच्चा लोकतंत्र वह नहीं, जिसमें हर नागरिक के पास केवल एक वोट हो; सच्चा लोकतंत्र वह है, जिसमें हर नागरिक की आवाज का मूल्य हो, हर व्यक्ति को अवसर मिले और किसी की सामाजिक पहचान उसके भविष्य की सीमा न बने।
यही दोहरे मताधिकार की ऐतिहासिक बहस से मिलने वाला सबसे बड़ा सबक है—
राजनीतिक अधिकार तभी सार्थक होते हैं, जब वे सामाजिक समानता, आर्थिक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा में बदलते हैं। यही दलित-आदिवासी उत्थान का अधूरा संघर्ष है और यही भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की कसौटी भी है l
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