Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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चिरुआ भर पानी

 

चिरुआ भर पानी l
गाँव में उस दिन भी सूरज रोज की तरह उगा था, परन्तु मंदू के लिए हर दिन सज़ा होता था, वह दिन तो उसे आंसू दे गया था रक्त के आंसू l
हवेली की दालान के बाहर खड़े होकर वह इंतज़ार कर रहा था। हवेली के भीतर से बूढ़ी ठकुराइन ने उसके गमछा की झोली में दूर से एक मुट्ठा भुजैना और लोटे में चोटा वाले गुड़ का रस डाल दी । यही उसका नाश्ता था, यही उसकी ताकत और सूरज लटकने तक का भोजन भी था l
मंदू की उम्र चालीस साल के आसपास थी, पर उसका बचपन उसी दिन मर गया था जिस दिन जमींदार भैरोंसिंह ने उस बालक को बंधुआ मज़दूर बना लिया था l
भोर की धुंध अभी पूरी तरह छंटी भी नहीं थी कि मंदू और तीन हलवाहों- गनकू, लटकू और पलटू के पीछे -पीछे बैलों को लेकर खेत की ओर चल पड़ा।
सूरज धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रहा था और उसके साथ धूप की तपिश और लू भी बढ़ती जा रही थी। हवा नहीं,आग बरसने लगी थी l
मंदू हल पकड़े-पकड़े मिट्टी चीरता जा रहा था। उसके पेट में सुबह का भुजैना कब का जल चुका था। गला सूखकर काँटा हो रहा था।भूख और प्यास से उसका सिर चकराने लगा था lशाम ढलने तक जब वह बैलों को वापस लेकर हवेली पहुँचा, तब तक उसका शरीर भूख, प्यास और थकान से टूट चुका था।
तभी उसकी नज़र हवेली की बड़ी नीम की छाँव में गभरुआ कुत्ता जो टिन के लोटे को चाट रहा था और कुएं के जगत के पास नौकर कामनाथ ने ही जानवरों की बाल्टी में ताज़ा पानी भरकर रखा था।
मंदू की आँखों के सामने भूख -प्यास से मौत नज़र आने लगी थी, वह प्यास से तड़प रहा था, उसे लगा कि लोटा नौकर कामनाथ का है,उसने गभरुआ कुत्ता से लोटा छीन कर जानवरों की बाल्टी से लोटा भर पानी भरा और चिरुआ से एक लोटा और फिर दूसरा लोटा गटागट पेट में उतार लिया ।
पानी पेट में उतरते ही उसकी साँस लौट आई,पर उसकी किस्मत पर मौत की नज़र पड़ चुकी थी।
हवेली के किसी कोने से चोर निगाह वाला, हरामी छोटा जमींदार रतिन्दर सिंह, जमींदार भैरोंसिंह का चचेरा भाई, सब देख रहा था।चौदह–पंद्रह साल का वह छोकरा गुस्से में लाल तमतमाते हुए दौड़ा और डांटते हुए बोला l
“अबे चमारिया ! तुमने बड़े बाबूसाहेब के चाय वाले लोटे से पानी पी लिया! तुमने धर्म भरभंड कर दिया,मंदू कुछ बोल पाता उससे पहले वह बदमाश दनादन मंदू के सिर पर कई डंडे दे मारा और फिर थप्पड़ l
मंदू का सिर फट गया। खून बहने लगा।
वह कुएं के पास कनेर के पेड़ के पास गिर गया l उसके मन में बस एक ही सवाल था;
“क्या जानवर से लोटा छिनकर जानवरों की बाल्टी से पानी पीना भी अछूत जीवन में गुनाह हो जाता ?
कहने को तो मंदू हरिजन प्राइमरी पाठशाला पढ़ने गया भी था परन्तु वह से चौथी जमात से आगे की पढ़ाई नहीं कर पाया था,बदनसीबी से गाँव के जमींदारों के खेतों में पसीना खूब बहा रहा था l
हाय रे उत्पीड़न - शोषण करने वाले जमींदारों की चाकरी, बेचारे खेतिहर मजदूरों को तन ढंकने लिए,कभी ढंग के कपड़े नसीब नहीं हुए, ना मनपसंद भोजन, यही हाल मंदू का भी था बेचारा पेट भर अपने मन पसंद के खाने तक का सुख नहीं पाया था l
खेतिहर मजदूरों के लिए अच्छे कपड़े - लते तो सपने जैसा होता था l जमींदार शरीर की ताकत निचोड़ तो लेते थे पर न्यूनतम मज़दूरी देते और इस मजदूरी के अनाज हवेली में बैठी लुगाईयां कंकड, सड़े -गले अनाज भूसा की गाँठ मिलाकर मज़दूरी देती थी , बेचारे मज़दूर आंसू कर रह जाते थे l मजदूर -मजदून,बेबस आंसू गारते मज़दूरी लेकर घर जाते थे l
एक दिन मंदू के बाप खिरजू की उसके दूर के रिश्तेदार देवसिंगार से मुलाक़ात हो गयी l देवसिंगार ने खिरजू को अपनी आप बीती बताया l देवसिंगार के जमींदार की चौखट पर हुए शोषण और उत्पीड़न की दास्तान सुनकर खिरजू भी जमींदार की चाकरी छोड़कर बम्बई जाने की कसम खा लिया l
एक दिन रात के अंधेरे में खिरजू बंबई के लिए निकल पड़ा और बंबई भी पहुंच गया l खिरजू की ज़िद और नसीब दोनों ने मिलकर काम किये, उसे किसी कपड़ा मिल में स्थायी मज़दूर की नौकरी मिल गयी l दो महीने बाद खिरजू का मनीआर्डर और अंतरदेशीय पत्र उसकी पत्नी सुरजीदेवी को मिला था l
खिरजू के बंबई भाग कर चले जाने से जमींदार भैरवसिंघ बहुत कुपित हो गया और खिरजू के परिवार पर अत्याचार करने लगा l एक दिन मज़दूरों का खून चूसने वाले जमींदार ने नाबालिग मंदू को जबरिया बंधुआ मज़दूर बना लिया l
खिरजू का बचपन गरीबी और जमींदारों के आतंक में बीता था l खिरजू चार बेटों एक बेटी का बाप था l
मंदू के जमींदार की चौखट पर बंधने के बाद उसके भाई बंदू और छन्दू भी शहर भागकर चले गए, नौकरी धंधा में लग गए l पंदू और सुरमिला स्कूल जाने लगे,सुरमिला का स्कूल में मन नहीं लगा तो उसकी माँ ने बकरी चराने में लगा दी l
मंदू जमींदार भैरवसिंघ के चक्रव्यूह में बुरी तरह फंस गया था l मंदू अपने घर रात में सोने के लिए आता था l सुबह सूरज उगने से पहले ही जमींदार की हवेली मंदू को पहुंचना ही होता था, चाहे बुखार में क्यों न हो?
बचपन में मंदू को बिरहा गाने का बड़ा शौक था, पर जमींदार की चौखट पर पहुंचते ही सारे अरमानों का कत्ल हो गया थाl मंदू किसी दिन तनिक भी देरी से पहुंचता तो उसे जमींदार की फटकार सुननी पड़ती थी l
मंदू सफाई में कहता बाबूजी रात में बिरहा की रियाज करने लगा था, नींद जल्दी नहीं खुलीl मेरी बिरहा बस्ती वालों को बहुत पसंद आती है l
जमींदार डांटते हुए कहता ना शक्ल ना सुरत सुर गदहे जैसा, बड़ा बिरहा गायक बनने
चला है l हवेली के काम में तो तुम्हारा मन ही नहीं लगता l अरे कौआ कभी कोयल बन पाया है कि तू बिरहा गायक बनने चला है l चल भाग गोबर फेंक और हल लेकर खेत जा, दूसरे जमींदारों के हलवाह घंटे भर पहले से ही हल जोत रहे हैं, तू जबान लड़ रहा है, जबान मुंह में रखा कर, जबान चलाया तो तेरी जबान तेरे हाथ में एक दिन आ जाएगी l
मंदू सिर लटकाये फरूही से गोबर हटाया,और जुआठ में बैल नाधा, गनकू, लटकू और पलटू के पीछे -पीछे, कंधे पर हल लादे एक हाथ से बैल का पगहा पकड़े ठाकुर
का खेत जोतने पहुंच गया l
ठाकुर के पास चार जोड़ी से अधिक बैलों की खेती थीl ठाकुर गाँव के भूमिहिनों के हिस्से की गाँव समाज की कई बीघा जमीन अपनी जमीन बना रखा था, यही हाल पूरे ठाकुरों का था, पोखरी तालाब, भींटा सब पर उन्हीं का जबरिया कब्जा l
गाँव के खेतिहर मज़दूरों की पूरी बस्ती को भूमिहीनता की महामारी ने जकड़ लिया था, उन्हें पेशाब करने के लिए जमींदार, ठाकुरों के खेत में ही जाना पड़ता था, दरवाज़े तक जमींदारों के ही खेत थे l
मजदूर सुबह जब हल बैल लेकर निकलते तब बुढ़िया ठकुराइन मुट्ठी भर मक्के का भुजैना या परमल देती,एक लोटा चोटा का रस मज़दूरों के लोटे में उपर से डाल देती थी, यही भुजैना खाकर मजदूर रस पीकर जाते थे, सूरज लटकते -लटकते हल जोतते थे, ठाकुरों की दोपहर मज़दूरों के लिए ऐसी ही होती थी l मज़दूरी में वही सेर भर सड़ा-गला अनाज l
हाँ मज़दूरों के घर से खरमेटाव आ गया तो पेट में पानी और रोटी का टुकड़ा पहुंच गया वरना पीने को पानी भी नहीं l
मंदू की घरवाली अपने मृत शैय्या पर पड़े बाप से मिलने चली गयी,बुखार में तप रही मंदू की माँ एक दिन खरमेटाव नहीं ले जा सकी l वह अकेले खेत जोत रहा था l
गनकू, लटकू और पलटू को ठाकुर ने गन्ना बुवाई के खेत की तैयारी के लिए फावड़े से खेत खोदने के लिए लगा रखा था l
बेचारा मंदू सूरज लटकने के बाद जब हल बैल लेकर हवेली पहुँचा बैलो की जोड़ी और उसका खुद का गला सूख गया था, उसने जल्दी से बैलों को जुआठ से खोला, बैल भागकर हौद में मुंह डाल लिए l
धूप बहुत तेज थी, लू चल रही थी,हवेली में सन्नाटा था l गभरुआ कुकुरा टिन के लोटे को चाट रहा था l कुएं की जगत के नीचे जानवरों की हौद में पानी डालने वाली बाल्टी भरी हुई पड़ी थी, शायद नौकर कामनाथ कुछ देर पहले ही भरा था l वह गोबर लेकर खेत की तरफ जाते हुए मंदू को दिखाई पड गया था l
मंदू का प्यास के मारे जैसे प्राण निकल रहा था l वह गभरुआ से लोटा छिन कर बाल्टी से पानी भरा और गटागट दो लोटा पानी चिरुआ से पेट में उतार कर जैसे ही आगे बढ़ा था तभी जमींदार भैरवसिंघ का बदमाश चचेरा भाई रतिन्दर जो मज़दूरों को आंसू देने में माहिर था l वह चोर निगाह वाला चौदह -पंद्रह साल का छोकरा रतिन्दर अधेड़ मंदू को बोला -अबे चमरिया तूने बड़के बाबूसाहेब के चाय वाले लोटे से पानी पी लिया l
मंदू बोला -बाबू ये कामनाथ का लोटा है l गभरुआ चाट रहा था, उससे छिनकर चिरुआ भर पानी पीकर अपनी जान बचाया हूँ l क्या कोई गुनाह हो गया ?
रतिन्दर बोला -अबे चमारिया, तूने नहीं अब मैं गुनाह करता हूँ,जबान लड़ाता है, वह चिल्लाया बड़ी माँ साहेब देखो मंदूआ बड़े बाबूसाहब का चाय वाला लोटा जूठा कर दिया,कहते हुए पहले डंडा फिर थप्पड़ से मारने लगा था l
छोटी ठकुराइन बोली -अरे बाप रे ये तो अनर्थ हो गया l बड़े बाबूसाहेब के लोटा से पानी पी लिया l इस गुनाह के लिए रतिन्दरबाबू ने मंदूआ का सिर फोड़ दिया l मंदू के सिर से खून बह रहा है l
इतना सुनते ही हवेली की दालान में पूरी हवेली की औरतें बच्चे इकट्ठा हो गए l ठाकुर भैरवसिंघ कचहरी गए थे l देर शाम को ठाकुर लौटे तब लोटे का मुकदमा ठाकुर भैरवसिंघ की अदालत में पहुँचा l
मंदू भी हाजिर हुआ, ठाकुर बड़े घाघ किस्म के इंसान थे कुछ नहीं बोले,कामनाथ से लोटा मंगवाएं और मंदू को दिलवा दिए और बोले मंदू ये लोटा तुम्हारा है, अब तुम रस - पानी इसी लोटा में पीना l
रतिन्दर मुस्कराया l मंदू को शायद कोई अनहोनी लगी वह सिहर गया l मंदू जब रात में घर पहुँचा तब उसकी बूढ़ी माँ बुखार में तड़प रही थी l वह बेटे के सिर पर चोट का निशान देखकर घबरा गयी l मंदू ने आपबीती बताया, उसकी माँ रोने लगी l
यह खबर पूरी मज़दूर बस्ती में फैल गयी कि हवेली में लोटे से चिरुआ भर पानी पी लेने के जुर्म में रतिन्दर ने मंदू को बहुत मारा है l मंदू के घर पूरी बस्ती के लोग देर रात तक हालचाल पूछने आते रहे l
मंदू और उसकी माँ दोनों की रात बेचैनी में करवटे बदलते -बदलते बीती l जब भोर में उसकी माँ की नींद लगी तब वह अपने छः माह के बच्चे और पत्नी का मुंह देखे बिना रात के अंधेरे में घर से भाग कर बिना टिकट की यात्रा कर दिल्ली पहुंच तो गया l पहाड़गंज रेलवे स्टेशन जब उतरा तो भूख से बिलबिलाता हुआ एक ढाबे के सामने खड़ा होकर पॉकेट टटोलने लगा l पॉकेट में पैसा हो तब तो मिले l
ढाबा नेकदिल इंसान था,उसने इशारे से बुलाया l
मंदू से पूछा क्या हुआ पॉकेट कट गयी क्या?
मंदू बोला नहीं साहब l पॉकेट में कुछ था ही नहीं तो चोरी क्या होगी?
ढाबा मालिक बोला -घर से भाग कर आए हो?
मंदू सहमति में सिर हिलाया l
ढाबा मालिक पूछा क्यों भागकर आए हो?
मंदू ने बचपन से भागने तक की दास्तान सुना दिया l मंदू की दास्तान ढाबा मालिक को जैसे खुद की कहानी लगी l ढाबा मालिक का दिल रो उठा l वह पूछा खाना खाओगे l मंदू बोला हाँ बाबूजी दो दिन से अन्न का टुकड़ा पेट में नहीं गया है l
ढाबा मालिक बोला -बैठो पेट भर खाना खाओ l खाने के बाद बर्तन धो देना l
मंदू खाना खाकर बड़ी सफाई से बर्तन साफ कर बाहर निकला l
ढाबा मालिक पूछा - तुम्हारा नाम क्या?
मंदू प्रसाद वह बोला l
अब कहाँ जाओगे मंदू?
पता नहीं साहब l जहाँ काम धंधा मिल जायेगा, उधर ही रहने लगूंगा मंदू बोला l
ढाबा मालिक पूछा- ढाबा में काम करोगे?
मंदू बोला -हाँ l
ढाबा मालिक बोला -तुमको बर्तन धोने तो आता है, बर्तन धोने में लग जाओ, बाकी ढाबे का काम तुम्हारे भाई हेल्पर लोग सीखा देंगे l बीस रूपये रोज की मज़दूरी, खाना, रहना और कपड़ा मुफ्त l
मंदू ढाबे में काम करने लगा l छः महीना काम किया फिर खुद की चाय की दुकान सड़क के किनारे लगाने लगा l अच्छी आमदनी होने लगी l
इसी बीच मंदू का छोटा भाई छंदू शहर से गांव आ गया l जमींदार का भैरवसिंघ का भाई हरेंद्रसिंघ,छंदू को चोरी के इल्जाम में अंदर करवा दिया l पुलिस ने छंदू को पुलिस थाना की जेल में दो दिन तक पानी पी -पीकर उसके शरीर के पोर -पोर तोड़ डाले, जब पुलिस को लगा कि वह मर जायेगा तब पुलिस उसे जमींदार की हवेली लायी, फिर पुलिस उसके घर के बाहर पटक कर चली गयी l
छंदू की माँ ने सुकर के तेल से कई महीनों तक उसकी मालिश की तब जाकर वह चलने -फिरने लायक हुआ फिर कभी परदेस नहीं जा पाया बस गांव में मेहनत मज़दूरी कर बालबच्चों को पालने लगा l
उधर दिल्ली में मंदू का धंधा चल पड़ा,उसने चाय की दुकान बंद कर प्लास्टिक की दो फोल्डिंग मशीन लगा लिया l एक मशीन खुद चलाता दूसरी मशीन चलाने के लिए एक आदमी रख लिया l
फिर क्या अपने बीबी बच्चों को शहर ले गया , बच्चे पढ़नेलिखने लगे जो मंदू पेट भर रोटी और कपड़ा के लिए तरस रहा था अब सेठ मंदू प्रसाद हो गया l
समय रफ्तार से भाग रहा था मंदू के तीनों बेटे पढ़ लिख काम धंधा में लग गए l
गाँव में लोग उस घटना को धीरे-धीरे भूल गए।
जिस मंदू का चिरुआ भर पानी के लिए सिर फोडा गया था, जिसका खून बहा था वह मंदू अपने जीवन के इस हादसे को कैसे भूल सकता था वह बिल्कुल नहीं भूला।
दिल्ली के नेक दिल ढाबा मालिक के ढाबे में जूठे बर्तन धोते-धोते मंदू ने जिंदगी से लड़ना सीख लिया।पहले चाय की दुकान फिर प्लास्टिक फोल्डिंग मशीने लगाया, अपनी मेहनत,समझदारी और हिम्मत से वह धीरे-धीरे मंदू प्लास्टिक मोल्डिंग फैक्ट्री का मालिक बन गया।
मंदू अब “सेठ मंदू प्रसाद हो गया था, कई बरस बाद सेठ मंदू प्रसाद अपने गाँव लौटा तब भी वही गाँव था , वही खेत -खलिहान थे पर समय बदल गया था l हवेली खंडहर में तब्दील हो गयी थी l इसके बाद भी वह खंडहरनुमा हवेली में दाखिल हुआ
जहाँ तीस साल पहले उसने जानवरों की बाल्टी से गभरुआ कुत्ते से टिन का लोटा छिनकर भूखा-प्यासा मंदू दो लोटा पानी चिरुआ से पिया था। उसने वही खंडहरनुमा हवेली में गाँव वालों के सामने शपथ लिया कि वह गाँव एक ट्यूबवेल लगवाएगा जिसका पानी शूद्र हो या अशूद्र सबके लिए होगा l
कुछ ही महीनों में एक सार्वजनिक ट्यूबवेल लगवाकर, पानी की टंकी भी बनवा दिया और वही बगल में पशुओं के लिए एक पानी की टंकी बनवा दिया जिससे पशु भी प्यास बुझा सकें l
सेठ मंदू प्रसाद ने पानी की टंकी पर लिखवा दिया कि;
“पानी पर सबका बराबर का अधिकार है।
कोई ऊँच-नीच नहीं है, ना कोई शूद्र ना अशूद्र, सब इंसान है -प्यास की कोई जाति नहीं होती जातीय भेदभाव करने वाले हैवान होते हैं l
उस दिन से गाँव के दलित, मजदूर, औरतें और बच्चे बिना डर और भेदभाव के उसी ट्यूबवेल से पानी भरने लगे थे।
खंडहरनुमा हवेली अपनी करतूतों पर लजा रही थी सेठ मंदू प्रसाद खुश था l सेठ मंदू प्रसाद जिसने सदियों पुरानी जातिवाद की दहकती आग पर चिरुआ भर पानी डाल दिया तब पहली बार गाँव वालों को चिरुआ भर पानी के रहस्य का पता चला था l यह देखकर बुजुर्ग स्वामी प्रसाद ने कांपती हुई आवाज़ कहा था -देखो “चिरुआ भर पानी” भी क्रांति बन सकता है।
नन्दलाल भारती
15/03/2026

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